Thursday, October 2, 2008

कविता से लेख तक का सफर

आज न तो किसी सामाजिक मुद्दे पर लिखने का मन है और न ही किसी राजनैतिक अथवा धार्मिक विषय पर। आज लिख रहा हूँ अपने ब्लॉग में पिछले एक साल के सफर के बारे में। मैंने जुलाई,२००७ से सक्रिय रूप से ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा। प्रति माह दो पोस्ट तो हो ही जाती हैं। व्यस्त कार्यक्रम में इतना काफी है। अगर आप मेरे इस ब्लॉग में पिछले वर्ष की पोस्ट को देखेंगे तो पायेंगे कि उनमें अधिकतर कवितायें रहीं। कवि मन बहुत सुंदर होता है। अपने आसपास के वातावरण को इतनी खूबसूरती से अपने शब्दों में पुरो लेता है कि आप मुग्ध हो जाते हैं। मैंने दहेज पर लिखा, आने वाले १५० वर्ष बाद के समय के बारे में लिखा, जो हिन्दयुग्म पर भी छपी थी। रक्षाबंधन, १५ अगस्त, कंजकें आदि त्योहारों पर लिखा। कवितायें लिख कर संतुष्टि सी होती थी। मैंने सीरियस और सामाजिक कवितायें जैसे मौत, क्यों दुनिया को जन्नत मनाते नहीं और किसान भी लिखी। इन कविताओं में दुख भी था, गुस्सा भी और निराशा भी। वर्ष का अंत आते आते समुद्र पर दो कवितायें लिखीं जो मेरी समझ में मेरी सबसे अच्छी कविताओं में से एक रहीं। क्षणिकायें लिखने का भी प्रयास किया।
मैं जो कुछ लिखता, संतुष्टि मिलती थी।


अब रूख करते हैं २००८ का। त्योहारों, प्रकृति की कविताओं से दूर मैं लिख रहा हूँ सामाजिक बीमारियों पर। समाज, धर्म और राजनीति-ऐसा लगने लगा कि इन तीनों को आप अलग कर ही नहीं सकते हैं। मैंने जब जब समाज पर लिखा, राजनीति उसमें जरूर रही। कभी धर्म पर लिखा...उसमें भी राजनीति। और राजनीति को आप जानते ही हैं...समाज को धर्म के नाम पर बाँटने का काम कर रही है। और ये किसी एक पार्टी या संगठन का काम नहीं है।

जब मैं भारतीयों को झूठे और मतलबपरस्त कहता हूँ तो उसमें हम सब आ जाते हैं। रियालिटी शो के द्वारा भारत के टूटे जाने के बारे में कहता हूँ तो यहाँ अपने आप उन चैनलों पर उंगली उठती है जो केवल पैसा कमाना चाहते हैं। लोगों के थूकने का भी जिक्र किया। ठाकरे और लालू की राजनीति भी मतलब परस्ती से भरी हुई है।
और रिजर्वेशन की राजनीति हमारे समाज का हिस्सा बन चुकी है। टीवी चैनलों में दिखाये जा रहे धारावाहिकों का बच्चों पर क्या असर होता है ये कहने की कोशिश की। चीन तिब्बत और भारत के विषय में कहा। मैंने अश्लील कौन में हमारी कमज़ोर मानसिकता पर भी सवाल उठाये।

ज़रा बाकि के लेखों पर नज़र दौड़ायें:

जहाँ बात बात पर कानून को जम कर जाता है तोड़ा
स्वार्थ व झूठ से भरे ४ वर्ष
माँ, तितली कैसी होती है?
मीडिया, अंधविश्वास और कलियुगी धर्म
क्यों जल रहा है जम्मू?
वंदेमातरम को राष्ट्र्गीत का दर्जा : कितना सही?
कोसी से कंधमाल तक...कहानी राजनीति की...
आतंक का है जोर, क्योंकि सरकार है कमजोर

एक दो जो कवितायें लिखीं वे स्वतंत्रता दिवस पर और सरकार के सरबजीत और अफजल से तुलना के बाद लिखी।

और भी लिख सकता था। लेख कोई भी रहे हों, केंद्र में बिंदु केवल एक रहा। मेरा भारत। भारत का, समाज का हर ओर से हनन हो रहा है। केवल आर्थिक पहलू पर हम ध्यान दे रहे हैं बाकि सब जाये भाड़ में। लेकिन बात ये नहीं। हाँ, मैं दुखी हूँ। मुझे लगता है कि ब्लॉग हमारी भड़ास निकालने का पर्याय बनता जा रहा है इसलिये मैं भी उसी ओर जा रहा हूँ। जितनी कवितायें पिछले वर्ष अंतिम ५ महीने में लिखी उतनी १० महीनों में अब तक नहीं लिखी गई हैं। लेख केवल भड़ास का माध्यम है।

गोपालदास "नीरज" के शब्दों में कविता:

आत्मा के सौन्दर्य का, शब्द रूप है काव्य
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य ।


समाज और राजनीति से अब मन खराब सा लगने लगा है। ऊपर के लेखों में आप पायेंगे कि निराशा है भारत से... भारतीय कहने वाले लोगों से...अपने आप से। एक लेख तो मैं १५ दिन पहले लिख चुका था पर ब्लॉग पर नहीं डाल पाया। वो मेरे पास ही है। धर्म, समाज और राजनीति में कौन सच्चा और कौन झूठा समझ नहीं आ रहा है। खिचड़ी सी पक चुकी है हमारे देश में!!!

पिछले वर्ष इन दिनों मैंने तीन कवितायें प्रकाशित करी थी और आज एक लेख। कारण अब स्पष्ट होने लगा होगा। तुकबंदी कोई भी कर सकता है पर कवि बनना बहुत कठिन है।

वापस कविता का रूख करने में प्रयासरत...

3 comments:

रंजन राजन said...

चलते रहने का नाम ही जीवन है।
इस धूप-छांव के बीच आशा की किरण भी है।
निराशा को आशा में बदलने का प्रयास करते रहें,
वो सुबह कभी तो आएगी........

सतीश सक्सेना said...

अच्छे लेखन के लिए शुक्रिया !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आप लिखते अच्छा है ..यूँ ही आगे बढ़ते रहे यही शुभ कामना है मेरी