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Friday, December 23, 2011

बेल्लारी जिले के हम्पी में स्थित हैं विजयनगर साम्राज्य के प्राचीनतम मंदिर Hampi Temples & Monuments, Bellary District, Karnataka - Incredible Bharat

आज अतुल्य भारत में सैर करेंगे राजनैतिक दृष्टि से सबसे "संवेदनशील" माने जाने वाले भाजपा शासित राज्य की। घबराइये नहीं लेख में कोई राजनीति नहीं है। बहुत साफ़-सुथरा लेख है। पर बात यहाँ होगी अवैध खनन के मामले में भाजपा के गले की हड्डी बने बेल्लारी जिले की। बेल्लारी जहाँ भाजपा ने रेड्डी बँधुओं से नाता तोड़ा और उपचुनाव हारा, वो भी जमानत जब्त करवा कर!!

बात होगी विजयनगर की। बात है हम्पी की।

उत्तरी कर्नाटक के बेल्लारी जिले में स्थित एक गाँव है जिसका नाम है हम्पी। विजयनगर साम्राज्य के अवशेषों के बीच में स्थित है हम्पी। विजयनगर साम्राज्य के समय से ही यह इलाका धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। यहाँ पर है विरुपक्ष मंदिर और कईं स्मारक। हम्पी के इसी मंदिर और अवशेषों के लिये यूनेस्को ने इसे अपनी पुरातत्व विरासत में शामिल किया है। जुलाई 2011 में जिला प्रशासन ने इस गाँव व मुख्य सड़क को तुड़वा दिया है।

हम्पी का नाम पड़ा है तंगभद्रा नदी के नाम पर। दरअसल तंगभद्रा का प्राचीन नाम था पम्पा। और पम्पा से कन्नड़ में आया हम्पे और फिर बना हम्पी। कईं वर्षों तक इसे विरुपक्षपुरा के नाम से भी जाना जाता रहा है।

रामायण में हम्पी का जिक्र किष्किंधा के तौर पर होता है। जहाँ वानर राज बालि व सुग्रीव का राज्य माना गया। विजयनगर के महत्त्वपूर्ण इलाके के लिये हम्पी जाना जाता है। यह साम्राज्य 1336 से 1565 तक अस्तित्व में रहा। यह दक्षिण भारत का अंतिम हिन्दू साम्राज्य था। तालिकोट के युद्ध में बीजापुर, गोलकोंडा व अहमदनगर के मुस्लिम राज्यों ने विजयनगर को हराया।

हम्पी अपने वास्तुकला के लिये जाना जाता है। इस पूरे क्षेत्र में बड़े बड़े पत्थर हैं जिनसे हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। भारत के पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र से मंदिर व प्राचीन अवशेष मिले हैं।

बैंग्लोर से 353 किमी दूर तंगभद्रा नदी के किनारे बसा है हम्पी गाँव। यहाँ पर लोगों की खेती व विरुपक्ष मंदिर से आय होती है। कर्नाटक सरकार प्रति वर्ष नवम्बर माह विजयनगर उत्सव मनाती है। चूँकि इस क्षेत्र में भारी तादाद में खनिज पदार्थ पाये जाते हैं इसलिये कईं वर्षों से यहाँ खनन चल रहा है। और "बेल्लारी बँधु" आंध्र व कर्नाटक सरकारों से मिलीभगत कर "अवैध खनन" कर रहे हैं। विश्व की विरासत में से एक हम्पी और तंगभद्रा नदी पर बना बाँध दोनों ही सरकारी उपेक्षा झेल रहा है।

हम्पी में हिन्दू मंदिर बहुत हैं। विरुपक्ष मंदिर, हज़ारा राम मंदिर, कृष्णा मंदिर व विट्ठल मंदिर इनमें प्रमुख हैं।

न जाने क्यों कब तक हम्पी जैसे अनेकानेक किले, मंदिर व अन्य धरोहरें सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ जायेंगे। रही सही कसर हम पूरी कर देते हैं। कभी किलों में थूक कर तो कभी चट्टानों पर "आई लव यू" की घोषणा कर।

हम्पी के चित्र:


विरूपक्ष मंदिर

360 डिग्री तक फ़ैला हम्पी का विहंगम दृश्य

विट्ठल मंदिर

हम्पी के मंदिर


भारत में अनेक पर्यटन स्थल हैं, इस श्रृंख्ला का एकमात्र मक़सद उन स्थलों को सभी तक पहुँचाना ताकि पर्यटकों व सरकार तक इन स्थलॊं की पीड़ा पहुँचाई जा सके व पर्यटन भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत स्तम्भ बन सके।


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स्रोत : विकीपीडिया

जय हिन्द
वन्देमातरम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी
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Tuesday, November 22, 2011

क्या आप जानते हैं- भारत की सबसे बड़ी झीलें कौन सी हैं व विश्व का सबसे लम्बा रेलवे प्लेटफ़ार्म कहाँ पर है? Longest Railway Platform In The World, Largest Lakes Of India

क्या आप जानते हैं के इस अंक में आज हम जानेंगे भारत की सबसे बड़ी झीलों व भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे बड़े रेलवे प्लेटफ़ार्म के बारे में।

कश्मीर की वूलर झील के बारे में हम पहले से ही जान चुके हैं। गौरतलब है कि यह झील एशिया की भी सबसे बड़ी झील है। 

चिल्का झील (पुरी, ओड़ीशा)


अन्य झीलों की बात करें तो जिक्र आता है ओड़ीशा की चिल्का झील का। यह झील खारे पानी की सबसे बड़ी झील है व बंगाल की खाड़ी में जा कर मिलती है। चिल्का झील पुरी, खुर्द व गंजम जिलों तक फ़ैली हुई है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह झील बहुत सारे पशुओं व पेड़-पौधों के लिये जीवन दायिनी है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। सर्दियों में इस झील पर 160 से भी अधिक तरह के पक्षी अपना डेरा जमाते हैं। इस झील में कैस्पियन सागर, बैकल झील व अरल सागर से लेकर रूस, मंगोलिया व दक्षिण-पूर्व एशिया, लद्दाख और हिमालय से पक्षी आते हैं। ये पक्षी 12000 कि.मी से भी अधिक का सफ़र तय कर चिल्का झील तक पहुँचते हैं। इस झील की लम्बाई 64 कि.मी है। जी हाँ आपने सही पढ़ा है....

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) में स्थित गोविंद वल्लभ पंत सागर देश की सबसे बड़ी कृत्रिम रूप से तैयार की गई झील है। इसका नाम भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत जी के नाम से पड़ा।  वे 1950 से 1954 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। उत्तराखंड के बड़े राजनेताओं में से एक रहे। इस झील की गहराई 38 फ़ीट है।

कोल्लेरू (आंध्र प्रदेश)
साफ़ पानी की सबसे बड़ी झील कोल्लेरू झील है। आंध्रप्रदेश की यह झील कृष्णा व गोदावरी नदियों के संगम से बनी सबसे बड़ी झील है। बुडामेरू व तम्मिलेरू मौसमी नदियाँ भी इसी झील में आकर मिलती हैं।
245 वर्ग किमी तक फ़ैली यह झील आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कारण इंसान का लोभ। 42 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब खेती के लिये लिया जा रहा है, जगह जगह झील ने सूखना शुरु कर दिया है। करीबन दो करोड़ पक्षियों का यह आशियाना धीरे धीरे उजड़ रहा है। यहाँ के पक्षियों की संख्या को देखते हुए वर्ष 1999 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया।

खड़गपुर रेलवे स्टेशन (मिदनापुर-पश्चिम, पं. बंगाल)
आइये अब जानते हैं विश्व के सबसे बड़े रेलवे प्लेटफ़ार्म के बारे में। यह स्टेशन है पश्चिम बंगाल ( माफ़ कीजिये पश्चिम बंगा...पता नहीं ये नाम क्यों रखा है ममता दीदी ने.. बड़ी कठिनाई से बोला जाता है..) का खड़गपुर रेलवे स्टेशन। इस स्टेशन के प्लेटफ़ार्म की लम्बाई है 1.072 किमी। प्रारम्भ में यह प्लेटफ़ार्म 716 मीटर लम्बा था पर इसे पहले 833 मी और फिर बाद में अभी के जितना लम्बा किया गया। खड़गपुर का प्लेटफ़ार्म विश्व में सबसे लम्बा है। यह शहर मिदनापुर पश्चिम जिले में स्थित है। हम सभी जानते हैं कि खड़गपुर आईआईटी के लिये जाना जाता है। भारत की सबसे बड़ी रेलवे वर्कशॉप भी यहीं पर है।

हमारे भारत में गर्व करने के लिये न जाने कितने ही स्थान, झील, नदी, पहाड़ आदि हैं। प्राकृतिक ही नहीं अपितु किले, महल मीनार आदि अनगिनत स्थान हैं किन्तु फिर भी हम इन पर गर्व नहीं करते। भारत को भूल विदेशों की ओर देखते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि हम अपने देश को, स्वदेश को पहचानते ही नहीं। इसीलिये ऐसे लेख हमारी जानकारी बढ़ाते हैं। मैं स्वयं भी इन सबसे अनजान रहा हूँ। मुझे भारत और भारतीय पर गर्व है।

आने वाले लेखों में वो बातें जो विदेशी हमारे बारे में कहते हैं, भारत को मानते हैं। अध्यात्म व गौरवशाली इतिहास होंगे धूप-छाँव के मुख्य बिंदु।

जय हिन्द
वन्देमातरम


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Friday, October 14, 2011

क्या आप जानते हैं - कुतुब परिसर में खड़े लौहस्तम्भ को किस राजा ने बनवाया था? Qutub Complex, Iron Pillar History - Incredible India

अतुल्य भारत की पिछली कड़ी में कुतुब मीनार का जिक्र किया गया था। उसी कुतुब मीनार की चार दीवारी में खड़ा  हुआ है लौह स्तम्भ।

कुतुब परिसर में स्थित लौह स्तम्भ
दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तम्भ सात मीटर ऊँचा है। इसका वजन लगभग छह टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1600 वर्ष पूर्व बनवाया। मुझे यह जानकर हैरानी हुई थी कि आज का यह लौह स्तम्भ प्रारम्भ से यहाँ नहीं था। गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तम्भ विदिषा (विष्णुपदगिरी/उदयगिरि - मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने जैन-मंदिर परिसर के सत्ताईस मंदिर तोड़े तब यह स्तम्भ भी उनमें से एक था। मंदिर से तोड़े गये लोहे व अन्य पदार्थ से से उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई। 



संस्कृत में अंकित कुछ वाक्य
कहते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस स्तम्भ को भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था और इसे एक पहाड़ी-विष्णुपदगिरि पर खड़ा करवाया। इस पर लिखी गईं संस्कृत की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि बाह्लिक युद्ध के पश्चात उन्होंने यह स्तम्भ बनवाया। उनके काल में यह स्तम्भ समय बताने का भी कार्य करता था। विष्णुपदगिरि पहाड़ी पर स्थित इस स्तम्भ पर सूर्य की किरणें जिस ओर पड़तीं थीं उनकी गणना से समय पता लगाया जाता था।

ऐसा माना जाता है कि तोमर-साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तम्भ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तम्भ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन 1052 के तोमर राजा अनन्गपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

सन 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तम्भ को नुकसान पहुँचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

इस लौह स्तम्भ की खास बात यह है कि इसमें कभी ज़ंग नहीं लगा है। एक आम लोहा बारिश, सर्दी व गर्मी की लगातार बदलती ऋतुओं के कारण आसानी से ज़ंग खा जाता है किन्तु इसे हमारे इतिहास के बेहतरीन कारीगर व वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण ही कहा जायेगा कि यह लौह स्तम्भ आज विश्व में शोध का विषय बन गया है।

पंडित बाँकेराय द्वारा संस्कृत से किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद
नोट: मैंने यह लेख लिखने से पहले लौह स्तम्भ पर ज़ंग न लगने के कारण को जानना चाहा। परन्तु यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाया। हिन्दी में यदि विज्ञान की पढ़ाई की होती तो शायद कुछ बता पाता। इसलिये आप सब के समक्ष मैं विकीपीडिया के लेख की कुछ पंक्तियाँ जस की तस यहाँ चिपका रहा हूँ। इसके लिये मैं माफ़ी माँगता हूँ किन्तु मेरे पास और कोई चारा नहीं था.. :-( इतना समझ पाया हूँ कि लोहे में फ़ॉस्फ़ोरस का मिश्रण भी इसके ज़ंग-रहित होने का एक कारण है...

In a report published in the journal Current Science, R. Balasubramaniam of the IIT Kanpur explains how the pillar's resistance to corrosion is due to a passive protective film at the iron-rust interface. The presence of second-phase particles (slag and unreduced iron oxides) in the microstructure of the iron, that of high amounts of phosphorus in the metal, and the alternate wetting and drying existing under atmospheric conditions are the three main factors in the three-stage formation of that protective passive film.[1

Lepidocrocite and goethite are the first amorphous iron oxyhydroxides that appear upon oxidation of iron. High corrosion rates are initially observed. Then, an essential chemical reaction intervenes: slag and unreduced iron oxides (second phase particles) in the iron microstructure alter the polarization characteristics and enrich the metal–scale interface with phosphorus, thus indirectly promoting passivation of the iron[14] (cessation of rusting activity)

The next main agent to intervene in protection from oxidation is phosphorus, enhanced at the metal–scale interface by the same chemical interaction previously described between the slags and the metal. The ancient Indian smiths did not add lime to their furnaces

The most critical corrosion-resistance agent is iron hydrogen phosphate hydrate (FePO4-H3PO4-4H2O) under its crystalline form and building up as a thin layer next to the interface between metal and rust. Rust initially contains iron oxide/oxyhydroxides in their amorphous forms. Due to the initial corrosion of metal, there is more phosphorus at the metal–scale interface than in the bulk of the metal. Alternate environmental wetting and drying cycles provide the moisture for phosphoric-acid formation. Over time, the amorphous phosphate is precipitated into its crystalline form (the latter being therefore an indicator of old age, as this precipitation is a rather slow happening). The crystalline phosphate eventually forms a continuous layer next to the metal, which results in an excellent corrosion resistance layer.[17] In 1,600 years, the film has grown just one-twentieth of a millimetre thick.[18]

साभार - विकीपीडिया

जय हिन्द
वन्देमातरम

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Monday, July 25, 2011

भारत के किस राज्य में आते हैं सबसे अधिक विदेशी पर्यटक? क्या खास है इस राज्य में? Most Foreign Tourists In Southern State - Incredible India

तुल्य भारत की श्रृंख्ला में आज-भारत का दक्षिण का राज्य तमिलनाडु। हाल ही में तमिलनाडु अपनी राजनैतिक गतिविधियों के कारण चर्चा में रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि ये राज्य सबसे अधिक विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है? पुरातत्व विभाग ने तमिलनाडु राज्य में कईं ऐसे स्थानों की खोज की है जहाँ 3800 बरसों से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिलने की पुष्टि हुई है।

तमिलनाडु में 34000 से अधिक मंदिर हैं जैसे मदुरई का मीनाक्षी मंदिर, रामेश्वरम , श्री रंगनाथस्वामी मंदिर व वृहदेश्वर मंदिर। यूनेस्को की लिस्ट में तमिलनाडु के सबसे अधिक स्थल हैं जिनमें चोल शासन के दौरान बनाये गये मंदिर और महाबलीपुरम भी है। वृहदेश्वर मंदिर 1987 में यूनेस्को लिस्ट में शामिल हुआ जबकि गन्गईकोंडाचोलिस्वरम व ऐरावतेश्वर मंदिर 2004 में बाद में इसमें जोड़े गये।

चिकित्सा पर्यटन की दृष्टि से भी राज्य जाना जाता है और एशिया के कुछ बड़े अस्पताल भी इसी राज्य में हैं।

महाबलीपुरम चेन्नई से महज साठ किलोमीटर की दूर स्थित एक तटीय शहर है। सातवीं शताब्दी में पल्लव शासन के दौरान यह बंदरगाह के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी। कहा जाता है कि इसका नाम पल्लव राजा नरसिम्हावरमन ने रखा जो पहले ममल्लापुरम और अब यह महाबलीपुरम बन गया है। पल्लव शासन में महा-मल्ला (कुश्ती) एक प्रिय खेल मानी जाती थी। इसके अधिकतर ऐतिहासिक स्थल सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच ही बने।

महाबलीपुरम के मंदिर महाभारत काल में हुई अनेकों घटनाओं को दर्शते हैं। ये मंदिर नरसिम्हावर्मन व राजसिम्हावर्मन ने बनाये जो चट्टानों को काट कर बनाये गये और उस समय की कारीगरी की खासियत रही।
महाबलीपुरम शहर को अंग्रेजों ने आकर 1827 में बसाया।

तिरुवल्लुवर की प्रतिमा (कन्याकुमारी)
यदि अन्य पर्यटन स्थलों की बात करें तो कन्याकुमारी अपने सूर्योदय व सूर्यास्त के समय होने वाले अनुपम दृश्य के लिये जाना जाता है। यह भारत का दक्षिणतम शहर है। केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम से यह केवल 85 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके बारे में बताने को बहुत कुछ है इसलिये इसे किसी अन्य लेख के लिये छोड़ रहा हूँ।

येर्कोड, कोडाइकनाल, उदागामंडलम (ऊटी), वलपरई, येलगिरी इत्यादि प्राकृतिक सुंदरता बिखेरते हुए अत्यन्त विहंगम हिल स्टेशन हैं। ऊटी से  सटकर है कुन्नूर जो चाय के बागानों के लिये मशहूर है। ऊटी में ही अनेकों झील, झरने हैं। यदि आप प्रकृति को नज़दीक से देखना चाहते हैं तो इन हिल स्टेशनों पर अवश्य जायें। कोयम्बटूर सबसे नज़दीक एयरपोर्ट है। तमिलनाडु में कईं जीव अभयारण्य भी हैं। पिचावरम में विश्व के दूसरा सबसे बड़ा सदाबहार वन है।

पिचावरम के घने जंगल
मेट्टूपलम से ऊटी के बीच में पहाड़ी रास्तों के बीच से गुजरती हुई रेल है नीलगिरी। ये ज़मीन से 7500 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है जो दोनों शहरों के बीच 41 किमी की दूरी तय करती है। इस रेल को भी यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया हुआ है।

तमिलनाडु में प्राकृतिक सुंदरता भी है, ऐतिहासिक मंदिर-स्थल, वन-जीव-समुद्र भी है। यानि पर्यटन की दृष्टि से इस राज्य में आपको सबकुछ मिलेगा शायद इसलिये इस राज्य में भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं।

अतुल्य भारत की यह श्रृंख्ला आगे भी जारी रहेगी। हिन्दुस्तान नहीं देखा तो क्या देखा।

जय हिन्द।
वन्देमातरम।

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