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Thursday, January 12, 2012

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये। जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥ Blaming others is excusing ourselves. Kabir Doha

कबीर का जन्म करीबन छह सौ वर्ष पूर्व 1398 में हुआ। कुछ विद्वान मानते हैं कि वे 120 वर्ष तक जीवित रहे व 1518 में उन्होंने देह त्यागा। हालाँकि कुछ स्थानों पर उनका जन्म 1440 में भी बताया गया है। सही जन्म तिथि के बारे में किसी को नहीं पता है। ये वो समय था जिसे देश में भक्ति काल से भी जाना जाता है। पेशे से जुलाहे कबीर की गिनती विश्व में महान कवि व संत के रूप में होती है। इनके दोहे बच्चे बच्चे की जुबान पर होते हैं। भारत में धर्म की बात हो और कबीर का नाम न आये ऐसा हो नहीं सकता।

पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब में कबीर के पाँच सौ से ऊपर दोहे हैं। कबीर के दोहों की खासियत यह है कि इनके शब्द सरल होते हैं। हमारे आसपास की वस्तुओं व घटनाओं को ध्यान में रखकर वे दोहे लिखा करते थे। शब्द सरल हैं पर अर्थ जटिल परन्तु इतने शुद्ध कि अगर हम सब अपने जीवन में उन्हें उतार लें तो ये धरती स्वर्ग बन जाये। 


उनके जीवन के बारे में अनेक कथायें हैं। कहते हैं कि एक बार संत रामानन्द गंगा के किनारे स्नान करने हेतु गये थे। सीढियाँ उतर ही रहे थे कि तभी  उनका ध्यान कबीर पर गया और कहते हैं कि सही गुरू मिले तो जीवन साकार हो जाता है। विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस मिले थे कबीर को रामानन्द मिले।

वर्ष 2012 का आगमन हो चुका है। पिछले माह दिसम्बर से वैदिक गणित की श्रृंख्ला आरम्भ करी थी। हमारी संस्कृति, धर्म व जीवन के मूल्यों का ज्ञान हमें जीवन जीना व आध्यात्म की सीख देता है। आने वाले कुछ दिनों में सूक्तियाँ एवं अनमोल वचन भी आप धूप-छाँव पर पढ़ सकेंगे।

चूँकि मैं भी कबीर के दोहों से अनजान हूँ व हिन्दी में थोड़ा कच्चा हूँ इसलिये यदि किसी को इन दोहों व इनके शब्दार्थ/भावार्थ में त्रुटि दिखाई दे तो कृपया अवश्य बतायें।

आज का दोहा है:


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये।
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥

कहते हैं मानव की सबसे बड़ी गलतफ़हमी है कि हर किसी को लगता है कि वो गलत नहीं है। यह दोहा हमारा व्यवहार हमें बता रहा है। जब भी हम दुखी होते हैं तो हमें लगता है कि हम फ़लाने व्यक्ति के कारण दुखी हैं.. उसने ऐसा कैसे कर दिया.. या ऐसा क्यों नहीं किया... या उसको वो करना चाहिये था। या परिस्थितियों को रोते हैं.. काश ऐसा हो जाता.. काश वैसा हो जाता.. वगैरह वगैरह। यह अमूमन हम सब करते हैं। यह मानवीय व्यवहार है। अपने दुख का दोषी किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को ठहराना। कभी क्रोध आ जाये तो हम उसका दोष भी किसी दूसरे को देते हैं। और हमें हमेशा लगता है कि हम सही हैं। हमसे कभी भूल नहीं हो सकती। ये हमारा अहं ही है जो हमे इस तरह सोचने पर मजबूर कर देता है। अपनी गलतियों का कारण हम दूसरों में खोजते हैं। नतीजा, हम किसी दूसरे की आलोचना करते हैं और उसे ही भला बुरा कहने लगते हैं।

कबीर कहते हैं कि क्यों व्यर्थ में हम किसी दूसरे में दोष ढूँढने लगते हैं? वे कहते हैं कि हमें अपने अंदर झाँक कर देखना चाहिये। यदि कहीं कोई कमी है तो वो "मुझमें" है। मैं किसी दूसरे व्यक्ति में गलतियाँ क्यों ढूँढू? यदि मैं किसी के साथ निभा नहीं पा रहा हूँ तो बदलाव मुझे करना है। 

हाँ मैं यह जानता हूँ कि हर व्यक्ति चाहें वो हमेशा अच्छा लगे या बुरा, उसका प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। जिस व्यक्ति की आपसे नहीं निभती वही आपका व्यवहार की परीक्षा होती है कि आप उससे किस प्रकार बर्ताव करते हैं। किन्तु सब आपके हाथ में ही है। आपको अपने जीवन को किस ओर ले कर जाना यह कोई दूसरा निर्धारित नहीं करता। गाड़ी आपकी है, ड्राईवर आप हैं, मंजिल आपने चुननी हैं, रास्ता आपने बनाना है।

कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता। बस मतभेद होते हैं।

अंग्रेजी में एक कहावत है : "Blaming others is excusing ourselves.".




आपको यह प्रयास कैसा लगा टिप्पणी अवश्य करें। दोहे तुलसी के हों, अथवा कबीर के, अथवा मनु-स्मृति या चाणक्य एवं विदुर नीति - धार्मिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान सभी में है और इस ज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Wednesday, May 25, 2011

क्या आप जानते हैं भारत में पर्यटकों की कितनी संख्या है? Tourism In India - New Series

क्या आप जानते हैं पर्यटन हमारे देश भारत का सबसे बड़ा सेवा उद्योग (Service Industry) है? भारत की जीडीपी का 6.23 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आता है और रोजगार में इसका हिस्सा करीबन नौ प्रतिशत है। भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख विदेशी सैलानी आअते हैं। विदेशियों में अमरीका और ब्रिट्घेन से सबसे ज्यादा लोग आते हैं। आँकड़ें बताते हैं कि देसी सैलानियों की तादाद 56 करोड़ के करीब है!! आगे आँकड़ें सुनकर चौंकियेगा नहीं। 2008 में हमने केवल पर्यटन से ही 100 अरब अमरीकी डॉलर का कारोबार किया था जो 2018 तक तीन सौ अरब अमरीकी डॉलर हो जाने का अनुमान है। 

आँकड़ों से एक बात स्पष्ट रूप से उभरती है कि हम यदि चाहें तो हमारे देश में इतने पर्यटन स्थल हैं कि अरबों खरबों की कमाई हो सकती है व रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। इस देश में विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार होता है फिर भी इनकी संख्या में कमी नहीं आई है। इसके पीछे कारण है हमारे देश का गौरवशाली इतिहास, ऐतिहासिक किले व स्मारकें इत्यादि। यदि हम ऐतिहासिक स्थलों को सम्भाल नहीं पाये तो इनकी संख्या जरूर घटेगी। आज से करीबन चार वर्ष पूर्व धूप-छाँव पर आमेर के किले के बारे में लिखा था। उस किले की दशा देख कर यही लगा कि वो अपनी अंतिम साँसें  ले रहा हो। 

भारत में इतने पर्यटन स्थल हैं, इतनी खूबसूरत स्थान व ऐतिहासिक स्थल हैं कि हमें स्वयं भी नहीं पता। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात-राजस्थान से पूर्वोत्तर की सुंदरता अतुल्य है। शायद इसलिये भारत-सरकार भी "अतुल्य भारत" का प्रचार कर रही है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली व उत्तर-प्रदेश में सबसे अधिक विदेशी आते हैं वहीं देशी पर्यटकों के लिये आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश व तमिलनाडु पसंदीदी राज्य हैं। 

कुछ और आँकड़े आप तक पहुँचाना चाहूँगा। ताजमहल को देखने के लिये 30 लाख पर्यटक हर साल आते हैं। तमिलनाडु में हैं 34000 मंदिर।आने वाले अंकों में धूप-छाँव पर आप जान सकेंगे राज्यवार पर्यटक स्थल। प्रत्येक राज्य में कौन सी जगह हैं जिन्हें आप देखने के लिये जा सकते हैं। आप काज़ीरंगा अभयारण्य, बौद्धगया का महाबोद्धी मंदिर, हम्पी के स्मारक व अजंता-एलोरा समेत अनेको अनेक स्मारक व स्थलों के बारे में जानेंगे।

दिल्ली का लाल किला अब सफ़ेद रंग में रंगा जा रहा है। पुरातत्व विभाग कहता है कि लाल किला का रंग शुरु से लाल नहीं रहा इसलिये ऐसा किया जा रहा है। 

दिल्ली का लाल किला



अगले अंक में हम जम्मू-कश्मीर से अपनी यात्रा शुरु करेंगे। आपको ये प्रयास कैसा लगा कृपया अवश्य बतायें।

।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
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Thursday, May 19, 2011

भूले बिसरे गीत- धूप छाँव पर एक नई श्रृंख्ला की शुरुआत Old Songs - New Series on Dhoop Chaaon

मेरे पिछले लेख में मैंने आज के गानों को जमकर कोसा। बहुत बुरा-भला कहा। किन्तु वो कोसना अकारण नहीं था। धूप-छाँव पर आज से भूले-बिसरे गीत लेकर एक नईं श्रृंख्ला लेकर आ रहा हूँ। जो पाठक पुराने गीतों के शौकीन हैं उनकी यादें तो ताज़ा होंगी ही परन्तु जो उन्हें नहीं भी सुनते मेरा प्रयास रहेगा कि वे भी पुराने गानों के मुरीद बन जायें। हर अंक में किसी एक फ़िल्म के गीतों को लेकर आऊँगा।

आज की फ़िल्म है- प्यासा। चूँकि ये मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है इसलिये इस फ़िल्म के गीतों की तरफ़ मेरा झुकाव लाज़मी है।

गीत १. जिन्हें नाज़ है हिन्द पे वो कहाँ हैं?
इस अंक का पहला गीत वो है जिस गीत में इतनी सच्चाई थी जिसे सुनने के बाद सरकार ने रोक लगा दी थी...

गीत २. ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है...
इस दुनिया में इतना दर्द छुपा हुआ है जिसे बखान करना नामुमकिन  है, किन्तु इस गीत के जरिये वो संवेदना दिलों तक पहुँचती है जब एक कलाकार अपनी कला को किसी दूसरे के नाम पर "बिकते" हुए देखता है।

गीत ३. जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला..
एक बार फिर.. दर्द... इस बार एक प्रेमी के नज़र से दर्द के एक अलग रूप देखने को मिलता है।

गीत ४. जाने क्या तूने कही.. जाने क्या मैंने  सुनी..
वहीदा रहमान जब गुरुदत्त को अपनी ओर बुलाती हैं तब...


गीत ५. सर जो तेरा चकराये... 
आज के मस्ती वाले गीत सुनें और इसको सुनिये। इस गाने को सुनने के बाद सिर का दर्द सही में गायब हो जायेगा। जॉनी वॉकर की मस्ती व एक्टिंग को सलाम...

और अंत में,
गीत ६. तंग आ चुके हैं गम-ए-ज़िन्दगी से हम..
इस गीत की खासियत यह है कि इस गीत में संगीत नहीं है!!! रफ़ी के प्रशंसक कहते हैं कि जब मोहम्मद रफ़ी गाते हैं तो संगीत की ज़रूरत ही क्या है।


आशा करता हूँ कि इस श्रृंख्ला का यह पहला अंक आपको पसंद आ या होगा। हालाँकि अभी मुझे नहीं पता कि कितने और अंक मैं धूप-छाँव पर आपके लिये ला सकूँगा।
फ़िल्मों के बीच राजनैतिक/सामाजिक लेख जारी रहेंगे।  कोशिश यही रहेगी कि आपका मनोरंजन कर सकूँ और नई जानकारी आप तक पहुँचाऊँ।

धन्यवाद।
।वन्दे मातरम।
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Saturday, November 13, 2010

"गुस्ताखियाँ हाजिर हैं" :नया स्तम्भ Socio-Political Sarcastic Humour New Series Part-1

मित्रों, पहली बार हास्य-व्यंग्य की खट्टी-मीठी चटनी लेकर आपके समक्ष नया स्तम्भ ला रहा हूँ -
"गुस्ताखियाँ हाजिर हैं"

आज की कहानी के पात्र:

मैडम सोनिया जी, आडवाणी जी, अम्मा जी, करूणानिधि और बाबा रामदेव।

(पर्दा उठता है)

आडवाणी जी:
सोनिया जी, आप मेरे जन्मदिन पर क्या तोहफ़ा दे रही हैं?
सोनिया जी
: आडवाणी जी, वैसे तो मुझे लोग मैडम के नाम से बुलाते हैं, पर फिर भी मैं आपको नाराज़ न करते हुए आपके सवाल का जवाब देती हूँ। काँग्रेस सोच रही है, नहीं नहीं, मैं सोच रही हूँ कि आपको कुछ मंत्रियों के इस्तीफ़े उपहार में दिये जायें।
आडवाणी जी: वाह मैडम जी, वाह!! राहुल बाबा को मेरा आशीर्वाद देना, वे मेरे पास गुलदस्ता ले कर आये थे। उनसे बात करके अच्छा लगा।
सोनिया जी
: पर आडवाणी जी, इतनी नज़दीकियाँ अच्छी नहीं। लोग क्या सोचेंगे। खासतौर पर आपकी पार्टी आपके बारे में क्या सोचेगी।
आडवाणी जी: वो तो मेरे बारे में वैसे भी अब कुछ भी नहीं सोचते। बुढ़ापे में अब तो भगवान राम का ही सहारा।

बाबा रामदेव (नेपथ्य) : आप लोग गहरी साँस लेते हुए स्विस बैंक से काला धन वापिस क्यों नहीं मँगाते ?  जनता का लाखों करोड़ो रुपया वहाँ जमा है।

सोनिया जी
: लगता है कोई हमारी बातें सुन रहा है। आप राम का जिक्र कर रहे थे? आपको तो न राम मिले और न ही कुर्सी। दोनों ने आपको छोड़ दिया।
आडवाणी जी (स्वयं को कुर्सी पर बैठा सोचते हुए): फिर भी मैं राम राज के सपने देखता हूँ और उन्हें अपना आदर्श राजा मानता हूँ।
सोनिया जी
: इस "आदर्श"ता ने तो हमसे हमारा मुख्यमंत्री छीन लिया है पर हमारे पास भी एक राजा है। जो था, है और रहेगा। हम ए.राजा को पा कर धन्य हुए हैं।

बाबा रामदेव
(नेपथ्य): मैं कहता हूँ आप लोग पेट अंदर करते हुए स्विस बैंक से काला धन वापिस लाने का प्रयास क्यों नहीं करते ?

तभी करूणानिधि जी आते हैं।
करूणानिधि जी: मैडम सोनिया, ये राम-वाम छोड़ो। ये कुछ नहीं होता। हम राम को नहीं मानते। हम ए.राजा को वापिस नहीं बुलायेंगे।
सोनिया जी
: आप निश्चिंत रहें। हमारी पार्टी भी कुछ नहीं करेगी। हमने सुप्रीम-कोर्ट में उनकी शराफ़त का एफ़ीडेविट जमा करवा दिया है। हम उनकी शराफ़त साबित करनेके लिये कानून का सहारा लेंगे।
अम्मा जी: मैडम जी, यदि आप ए.राजा को गद्दी से हटा भी देते हैं, तब भी आपको महारानी की कुर्सी से कोई नहीं हटा पायेगा। हम आपके साथ हैं। (मन में) न जाने कब से सत्ता की मिठाई नहीं चखी है।

बाबा रामदेव (नेपथ्य) : अरे कोई हाथ गर्दन के पीछे से आगे ला कर नाक पकड़ते हुए जनता का पैसा देश में वापस तो लाओ ।
सोनिया जी: आडवाणी जी, आपके यहाँ वक्ता बड़े अच्छे हैं। ये बात तो दुनिया मानती है। सुषमा जी, जेटली जी हों या अन्य बड़े नेता।
आडवाणी जी
: हाँ, नितिन की अगुआई में हम अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। हमारा किला अब अभेद्य है।

जनता(नेपथ्य) : तभी आपकी पार्टी के लोग शब्दों के "बूमरैंग" फ़ेंकते रहते हैं। सुदर्शन चक्र आपके किले पर खुद ही आकर लग गया है।
एक कांग्रेसी: कोई चाहें हमें कितना बुरा भला कह ले पर मैडम जी के लिये एक शब्द भी नहीं सुनेंगे हम। तोड़फ़ोड़ मचा देंगे, आग लगा देंगे।
बाबा रामदेव (नेपथ्य): अरे कोई तो हाथों को पैरों से मोड़कर कमर पर लाते हुए.....

(पर्दा गिरता है)
क्रमश:
अगले अंक में: अन्य पात्रों से मुलाकात और नईं गुस्ताखियाँ।
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क्या आप जानते हैं स्विस बैंकों में इतना पैसा जमा है कि ३० साल तक हम और आप कोई टैक्स न भरें तो भी सरकार का काम बन जाये!!! ३० साल का टैक्स!!!


भारत में इतनी परेशानियाँ हैं और इतने विवाद हैं, कि हम सभी कहीं न कहीं उनका हिस्सा बनते हैं दुखी होते हैं। दुखी व परेशान होना उपाय नहीं है। जो भ्रष्टाचार व अन्य बुराइयाँ हम समाज व राजनीति में देखते हैं उन मुद्दों को उठाना बहुत जरूरी है। "गुस्ताखियाँ  हाजिर हैं" स्तम्भ की शुरुआत इसी मिशन का एक हिस्सा है। यहाँ हँसी मजाक भी होगा और गम्भीर मुद्दे भी उठाये जायेंगे। ये आवाज़ आगे और बुलंद होगी यही उम्मीद है।
अगले सप्ताह नईं गुस्ताखियों के साथ फिर हाजिर होंगे। तब तक के लिये नमस्कार।

गुस्ताखियाँ जारी हैं.....
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