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Tuesday, November 15, 2011

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में जाति व धर्म के आधार पर मिल रही "प्रोत्साहन राशि" एक रिश्वत है? Delhi Government Schools, Religion Caste Based Schemes

सुनने में आया है कि दिल्ली सरकार की ओर से एक स्कीम सरकारी स्कूलों में चल रही है। जिसके तहत हर एक या दो महीने में सरकार की ओर से कभी पाँच सौ, कभी सात सौ तो कभी पन्द्रह सौ रूपये बच्चों के अभिभावकों को दिये जाते हैं। लेकिन केवल अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़े और अल्पसंख्यक (अधिकतर
मुसलमानों) को ही। दिल्ली सरकार इसे प्रोत्साहन राशि कहती है। उसपर आलम यह है कि बच्चे स्कूल आते नहीं हैं। और ग्रेड्स मिलेंगे इसलिये पढ़ते नहीं हैं। हमारी एक रिश्तेदार हैं जो हाल ही में सरकारी स्कूल में अध्यापिका के तौर पर लगी हैं उन्होंने बताया कि बच्चे स्कूल उन्हीं दिनों आते हैं जब उन्हें पता लगता है कि "प्रोत्साहन राशि" मिलने वाली है।

यह है सरकारी विद्यालयों का हाल। अब प्रश्न यह उठता है कि बच्चों को पढ़ाने के लिये प्रोत्साहन राशि क्या एक "भीख" की तरह नहीं है? जहाँ लेने वाला भीख माँग रहा है क्योंकि वो स्कूल ही तभी आ रहा है। उसे पढ़ने का कोई उत्साह नहीं है। उसको पढ़ना नहीं है अपितु भीख माँगनी है। दूसरी ओर देने वाला भी भीख माँग रहा है। यह भीख है वोटों की। वे वोट जो उसे अगली बार फिर कुर्सी तक पहुँचायेंगे। सत्ता की गद्दी हथियाने में मदद करेंगे। चूँकि चुनावों के दौरान पैसे बाँटना अपराध है तो ये कानूनी रूप से "प्रोत्साहन राशि" के नाम पर रिश्वत दी जा रही है।

बच्चों को पढ़ाने के लिये उन्हें किताबें, यूनिफ़ार्म मुफ़्त दी जाती हैं। यह बेहद अच्छा कदम है। आठवीं तक के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने से ही हम शिक्षित हो सकेंगे। दिल्ली नगर निगम में ग्यारहवीं तक मुफ़्त शिक्षा का प्रावधान है। वैसे हम लोग साक्षरता दर देखते हैं। जो बढ़ तो रही है लेकिन शिक्षित दर नहीं देखते। लोगों में शिक्षा का अभाव है। साक्षर तो वो भी है जिसे अपने हस्ताक्षर करने आते हैं परन्तु क्या हम उसे शिक्षित कर पायें हैं? शिक्षित होने क्या लक्षण हैं ये मुझे नही पता। मैं तो गली में कूड़ा फ़ैलाने वालों को भी अशिक्षित करार दे देता हूँ या फिर हेलमेट को सर पर मगाने कि जगह जो हाथ में हेल्मेट पहनते हैं। बहरहाल हम बात कर रहे थे मुफ़्त शिक्षा की। सरकार यह कदम नि:संदेह एक बेहतरीन प्रयास है और दूरगामी भी। लेकिन इतने सब के बीच "प्रोत्साहन राशि" को मैं रिश्वत समझता हूँ। रिश्वत इसलिये भी क्योंकि यह केवल एस.सी,
एस.टी और मुसलमानों के लिये ही है। स्कोलरशिप केवल इन वर्गों के लिये ही क्यों हैं? फिर चाहें परिवार की आय कितनी ही हो।

इंजीनियरिंग में दाखिले के लिये आरक्षण है। आईपी में यदि आप दाखिले का फ़ार्म भरते हैं तो उसमें आप पायेंगे कि आपका धर्म व जाति पूछी होती है। और यदि कोई ऑपशन आपको नहीं पायेगा तो वो है "जनरल" श्रेणी का। खैर आरक्षण का यह मापदंड मेरी समझ से परे हो जाता है जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिये कम से कम दो लाख रूपये चाहियें। जो गरीब है, जो महंगाई की मार सह रहा है वो दो लाख रूपये कहाँ से लायेगा? फिर चाहें आप उसे आरक्षण ही क्यों न दें। इसका आशय स्पष्ट है कि दाखिला अमीर अनुसूचित जाति जनजाति व अल्पसंख्यकों को ही मिल रहा है। उन्हें आरक्षण दे कर क्या फ़ायदा?

आरक्षण की जिस बैसाखी से कांग्रेस ने भारत के लोगों को सहारा देने की कोशिश की थी वही बैसाखी इस देश को तोड़ रही है। कांग्रेस ने इलाज करने की बजाय इस बैसाखी का मोहताज बना दिया। ये बैसाखी अब सहारा नहीं है बल्कि खुद एक बीमारी बन गई है जो हमें खोखला कर रही है। क्योंकि ये बीमारी वोट लेने का जरिया मात्र बन कर रह गई है। मुसलमानों के वोट। दलितों के वोट। मुसलमानों व दलितों को प्रोत्साहन राशि का लोभ
दिया जा रहा है। जातिगत या धर्म के आधार पर आरक्षण इस देश को तोड़ रहा है।

आरक्षण आर्थिक आधार पर क्यों नहीं हो सकता? क्या ब्राह्मंण या अगड़ी जाति के लोग गरीब नहीं हो सकते? क्या इस प्रोत्साहन राशि के प्रलोभन की वजह से बच्चे पढ़ेंगे? मुझे तो नहीं लगता। उन्हें पैसा तो मिल रहा है लेकिन पढ़ाई नहीं। वे पढ़्ने के लिये नहीं पैसे लेने के लिये स्कूल आ रहे हैं। उनकी पढ़ाई करने की इच्छा ही नहीं रही है। उन्हें यूनिफ़ार्म दी जाये, उन्हें किताबें दें, उन्हें दोपहर का भोजन दें। यह सब बेहद आवश्यक है। परन्तु उन्हें ऐसी शिक्षा भी दी जाये कि आगे चल कर वे बैसाखी का सहारा न लें। और यदि यह सब हो रहा है तो आर्थिक आधार पर हो न कि जातिगत व धर्म के आधार पर.. क्योंकि आज महँगाई के दौर में गरीबी एक अभिशाप की तरह है और गरीब की कोई जाति नहीं होती।

दिल्लॊ सरकार की वेबसाईट जहाँ आप को तरह तरह की स्कीमें मिल जायेंगीं:
http://delhi.gov.in/wps/wcm/connect/doit_welfare/Welfare/Home/Services-+Schemes

जय हिन्द
वन्देमातरम

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Sunday, July 17, 2011

हिन्दुस्तान की राजनीति का साप्ताहिक सार Weekly Update Of Indian Politics

भ्रष्टाचार पर
चहुँ ओर से घिरी सरकार ने
किया मंत्रिमंडल फ़ेरबदल-
किसी की कुर्सी गई,
किसी को मिला सत्कार
जमकर हुई
राजनैतिक उथलपुथल।
पर इससे नहीं बदलेगा
सरकार का भ्रष्ट चेहरा
शतरंज खेलती मैडम हैं
मनमोहन तो हैं बस एक मोहरा ।

कईं बरसों से
रेल मंत्रालय
चढ़ता आया है
गठबंधन की बलि,
कभी बिहार की
शान होती थी रेल,
अब बंगाल की ओर चली।

चाहें बिहार चाहें बंगाल
रेल रही हमेशा कंगाल
परियोजनायें-
पटरी से उतरी पड़ी हैं
हाशिये पर है
सुरक्षा का ख्याल।

मुम्बई एक मर्तबा फिर दहली
सरकार ने हुँकार भरी-
आतंकवाद का मुकाबला
डटकर करेंगे
आतंकवादियों को
जल्द ही पकड़ेंगे...
पर प्रधानमंत्री जी...
पकड़कर आप करेंगे क्या?
जिनके अपने चले गये
उन्हें वापस ला सकेंगे क्या?

आपके नेता कहते हैं-
हम पाकिस्तान से बेहतर हैं!!!
तो अब ये दिन आ गये हैं..
पाकिस्तान से मुकाबला करेंगे क्या?
राहुल बाबा का अंदाज़ विलग
हमले रोके नहीं जा सकते।
हमले रोके नहीं जा सकते?
पाकिस्तान, बांग्लादेश
टोके नहीं जा सकते?

अफ़्ज़ल कसाब को मत मारो
डेढ़ सौ लोगों के कातिलों को
मत चढ़ाओ तुम फ़ाँसी पर...
पर इतना हम पर उपकार करो...
जैसे उन्हें सुरक्षित रखा है..
हमारी सुरक्षा का भी
वैसा पुख़्ता इंतज़ाम करो...
वैसा पुख्ता इंतज़ाम करो....

कभी रेल होगी
कभी आतंकवादी हमलों से होगा
यमराज का
हम पर वार-
परोक्ष रूप से हत्या का 
कोई गुनाह नहीं होता यार-
हिन्दुस्तान की राजनीति का 
यही है साप्ताहिक सार,
यही है साप्ताहिक सार।


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, May 17, 2011

भारतीय राजनीति में क्या मायने हैं विधानसभा चुनावों के परिणामों के (माइक्रोपोस्ट) Indian Politics And Assembly Election 2011 Results

मैं कोई चुनावी विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिये छोटी सी पोस्ट ही लिख पाया पर हाल-ए-राजनीति इससे बयां हो ही जायेगी।

इस बार के विधानसभा चुनावों के परिणाम दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिये अच्छे नहीं रहे पर बाजी मरी है छोटे राजनैतिक दलों ने।

यदि आप कांग्रेस की केरल और बंगाल में हूई जीतों का आकलन करें तो पायेंगे कि केरल में कांग्रेस  ने 82 में से महज 38 सीटें जीतीं। वो तो भला हो मुस्लिम लीग का जिसे 24 में से 20 सीट प्राप्त हुईं। वैसे तो मुस्लिम लीग भी साम्प्रदायिक पार्टी है पर फिर भी कांग्रेस को एक ही पार्टी साम्प्रदायिक नजर आती है। केरल में वैसे भी हर बार सत्ता पलटती है फिर भी यूपीए बड़ी कशमकश के बाद महज 2 सीटें ही आम बहुमत से अधिक ले पाई। बंगाल में भी तॄणमूल कांग्रेस के तिनके के सहारे ही सत्ता तक कांग्रेस पहुँच पाई। तमिलनाडु में दहाई के आँकड़े तक भी न पहुँच पाने के बाद पुड्डुचेरी में भी बुरी तरह हारी। 

केवल एक असम ऐसा प्रदेश रहा जहाँ गोगोई के कार्यकाल को सराहा गया जिसके बलबूते एक अपनी चिपक्षी पार्टियों को एक अच्छे अंतर से हराने में कामयाब हुई। यदि प्रमुख विपक्षी दलों असम गण परिषद और भाजपा एकजुट होतीं तो कुछ टक्कर दे सकतीं थीं।

अब यदि बात करें भाजपा की तो केरल बंगाल और तमिलनाडु में वो पहले ही शून्य पर थीं। बंगाल में एक आध सीट भी उसके लिये काफ़ी है। बाकि राज्यों में भी वोट प्रतिशत बढ़ा है जो इसके लिये अच्छा माना जा सकता है। पर असम में अगप से तालमेल न बैठाने का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ा जो पहले से भी कम सीटें हासिल कर पाई।

अब इस देश में पाँच ताकतवर महिलायें हो गईं हैं। एक आँटी हैं, एक अम्मा, एक बहन जी, एक दीदी और एक इन सब की मैडम!! देखना है कि नारी शक्ति इस देश में क्या गुल खिलाती है। आँटी के काम काज को अब सराहा नहीं जाता। न हीं अब कुछ खास रहा है। बहन जी और अम्मा करप्शन के सागर में पहले  ही डुबकी लगा चुकी हैं। पाठक भूल गये हों तो याद दिला दिया जाये कि उनके पास से साड़ियाँ और सैंडल बरामद हो चुके हैं। दीदी बंगाल की कंगाली को दूर करने में कामयाब होंगी या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा पर दीदी और अम्मा केंद्र की राजनीति पर असर जरूर डालेंगी क्योंकि इन दोनों पार्टियों से आने वाले राज्य सभा के सांसदों की संख्या भी 8-10 तक बढ़ सकती हैं।
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Sunday, May 8, 2011

दोरजी खांडू का निधन और पूर्वोत्तर राज्यों से होते सौतेले व्यवहार के बीच प्रधानमंत्री के नाम पत्र Death Of Dorji Khandu, North-East States Ignored By Media - Letter to Prime Minister

माननीय मनमोहन जी,

सर्वप्रथम आपकी सरकार को बधाई देता हूँ कि आप की यूपीए सरकार को तीन बरस होने वाले है। परन्तु शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इस बार प्रधानमंत्री की कुर्सी आपके लिये काँटों भरा ताज रहा है। आज मेरे पत्र लिखने का खास कारण है।

दोरजी खांडू को आप जानते ही होंगे। वे सेना में कार्यरत रहे और 71 के युद्ध के पश्चात उन्हें गोल्ड मैडल से भी नवाज़ा गया। वे बाद में चार बार जनता द्वारा चुने भी गये। बाद में अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए हैलीकॉप्टर  दुर्घटना में उनकी असमय मृत्यु हो गई। पर ये मृत्यु कईं प्रश्न खड़े कर गई है। पिछले दो वर्षों में कईं बार हैलीकॉप्टर दुर्घटनायें हुई हैं। जिनमें से दो बार तो इस देश के दो मुख्यमंत्री मारे गये हैं। गोल्ड मैडल विजेता सैनिक अधिकारी की इस तरह हुई हत्या होगी यह उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। हम पूरी दुनिया पर राज करने की बात करते आये हैं। इसरो एक के बाद एक सैटेलाईट अंतरिक्ष में भेज रहा है। वैज्ञानिक और सेना दोनों के पास ही यदि आधुनिक तकनीकें हैं तो मुख्यमंत्री को ढूँढने में चार दिन से ऊपर का समय कैसे लग जाता है? कहीं न कहीं तो गुंजाईश अवश्य है।

दोरजी खांडू की मृत्यु होती है और आपके मंत्री उनकी मृत्यु की पुष्टि होने से पहले ही दु:ख संदेश मीडिया को दे देते हैं। पुष्टि से पहले!!! यी हैं आपकी सरकार के विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा जी। आपका ध्यान मैं मीडिया की ओर भी ले जाना चाहता हूँ। हमारी मीडिया के द्वारा जिस तरह से उत्तर-पूर्व क्षेत्र को नजर अंदाज़ किया जा रहा है वो आप तक पहुँचाना जरूरी महसूस कर रहा हूँ। श्री खांडू की मौत हुई पर हमारा मीडिया ओसामा और ओबामा के नामों को गुनगुना रहा था। ओबामा उनके लिये भगवान बना हुआ है। इतनी बार तो शायद आपका नाम भी न लिया हो। सुबह अखबार टटोले तो पहले पन्ने पर कही पर बड़ी तो कहीं पर छोटी खबर दिखाई दी। खैर इन सब के बीच एक समाचार पत्र ऐसा भी रहा जिसने श्री खांडू के निधन का कोई समाचार नहीं छापा!!! कम से कम पहले पन्ने पर तो नहीं। 

दूसरी ओर हमारा नम्बर एक दुश्मन चीन उत्तर-पूर्व राज्यों में अपनी पैठ जमाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। परन्तु आपकी सरकार उसे भी नजर-अंदाज़ कर रही है। किस बात का खौफ़ है आपको? क्या आप चीन से डरते हैं? अमरीका द्वारा ओसामा को मारे जाने के पश्चात आपकी सेना के अधिकारी छाती ठोंक कर कह रहे थे कि हम भी ऐसा कर सकते हैं। पर क्या आपकी सरकार में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसने की हिम्मत है? जो चीन ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने के बाद भी पाकिस्तान का साथ दे रहा है उस चीन को माकूल जवाब देने में क्या आपकी सरकार समर्थ है?

आपके पास जब टू-जी आदि घोटालों से समय मिल जाये तो कृपया उत्तर-पूर्व के लोगों पर भी नजर डालियेगा। कहीं ऐसा न हो कि आने वाला वक्त भारत को बाईस राज्यों से जाने।


आज मातृ दिवस है। भारत माता के लिये आपसे निवेदन है कि हर राज्य को इस एक देश की माला में पिरोये रखें। आप सभी पाठकों से निवेदन है कि हम लोग ही पूर्वोत्तर के लोगों को पराया समझते हैं तो सरकार से कैसे हम कुछ आशा कैसे कर सकते हैं?
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी" : जननी और मातृभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान हैं। 


| जय हिन्द |
| वन्दे मातरम |
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Wednesday, April 20, 2011

शहीदों की जाति बताकर किसने किसका अपमान किया? Freedom Fighters Caste, Political Parties and Our Society

पिछले दिनों काँग्रेस की किसी साईट पर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की जातियाँ बताईं गईं। कौन जाट व कौन ब्राह्मण ये बताया गया। इस पर एक-दो खबरिया चैनलों ने शहीदों के अपमान को लेकर पूरे दिन "देशभक्ति" के नारे लगाये। खबरिया चैनलों के द्वारा "मुँह" में जबरदस्ती बात डालने पर शहीदों के परिवार वाले आगे आये फिर भाजपा ने भी इसका विरोध कर दिया। एक या दो दिन ही बीते थे कि भाजपा की किसी वेबसाईट पर भीमराव अंबेडकर की जाति बताये जाने पर बवाल खड़ा किया गया। जो भाजपा एक और मुद्दा सोचकर आगे बढ़ने का विचार करने ही वाली थे एकदम से "बैकफ़ुट" पर आ गई।

प्रश्न ये उत्पन्न हो रहा है कि जिस देश में सभी के नाम के साथ ही जाति जुड़ जाती हो उस देश में यदि इन शहीदों व महापुरुषों की जातियों का उल्लेख हुआ भी हो तो लोगों को क्यों परेशानी होती है? "पंडित जवाहरलाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे"। ये "ब्रह्म"वाक्य बच्चे के दिल और दिमाग पर तब छा जाता है जब उसको ठीक से लिखना भी नहीं आता। तो नेहरू एक कश्मीरी पंडित थे। इस वाक्य में परोक्ष रूप से उनकी जाति छिपी है। कोई इन मीडिया वालों को समझाओ भई। अम्बेडकर के जन्मदिवस पर देश छुट्टी मनाता है, नेता दलितों की कॉलोनियों में जाते हैं। क्या फिर भी कोई ये कहेगा कि अम्बेडकर की जाति नहीं पता!! सोचने वाली बात यह है कि यदि अम्बेडकर दलित न होते तो भी क्या स्कूलों व दफ़्तरों में अवकाश होता?

ये सब छोड़िये। जहाँ लोग गाड़ियों के पीछे "जाट का छोरा" व "गुज्जर मेल" जैसे शब्द लिख कर अपनी जाति स्वयं बताते हों और गर्व महसूस करते हों तो उस देश में यदि शहीदों की जाति को किसी पुस्तक व साईट पर लिख भी दिया तो क्या गुनाह किया? जब लोग खुद को अनुसूचित जाति व जनजाति में शामिल करवाने के लिये रेल की पटरियों पर सो जाते हैं, वाहनों में आग लगा देते हैं, रास्ते बंद कर देते हैं तो फिर अम्बेडकर, भगत सिंह की जाति पता चल जाने पर कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?

हाँ, एक बात जो कॉंग्रेस के मुख पत्र "संदेश" में कही गई कि सुखदेव सॉंडर्स की "हत्या" में शामिल थे। ये बात थोड़ी खटकती है। ऐसा लगता है कि इस पार्टी के मुताबिक केवल "गाँधीवादी" ही देशभक्त व शहीद थे। अन्य स्वतंत्रता सेनानी महज हत्यारे व क़ातिल थे। इस बात को मुद्दा बनाया जा सकता था। खैर इस देश में मुद्दों की कमी नहीं है। हर रोज़ हर पल नया मुद्दा। मीडिया वालों को चौबीसों घंटे काम जो चाहिये। तो ये एक और मुद्दा उठाकर क्या लाभ!

जाते जाते - जाति इस देश से कभी नहीं जायेगी ये एक सत्य है। जाति हमारी पहचान है। आप इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में दाखिले का पर्चा भरेंगे तो उसमें भी आपको अपनी "केटेगरी" बतानी पड़ेगी। अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं तो बल्ले बल्ले। पास हों या फ़ेल, बाबू के बेटे हों व चाहें आप को आरक्षण की जरूरत हो या न हो, आपका दाखिला पक्का। जहाँ घर्म के आधार पर कॉलेजों में दाखिला होता हो वहाँ जाति तो छोटी रह जाती है। किसी ने सच ही कहा है- जाति कभी नहीं जाती। गाँठ बाँध लें, यही जाति आपके काम आने वाली है।


।वंदेमातरम।
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Thursday, December 30, 2010

तस्वीरों में देखिये: पैरों में चप्पल पहन कर दिल्ली पुलिस कैसे करती है वी.आई.पी लोगों की सिक्युरिटी और दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर राजनैतिक दलों के बैनरों का मेला Delhi Police in Chappals For VVIP Security and Hoarding Mess At Delhi-UP Border

हाल ही में बुराड़ी, दिल्ली में कांग्रेस पार्टी का महाधिवेशन हुआ। पूरी दिल्ली और खासतौर पर रोहिणी से बस-अड्डे के रास्ते पर ढेरों बैनर व हॉडिंग लगे हुए नजर आये। तीन दिन तक चले इस महा-चिंतन में 10,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किये गये। बुराड़ी शिविर व उसके आस-पास चप्पे-चप्पे पर इतने पुलिस वाले दिख रहे थे जितने खेल-गाँव की सुरक्षा में भी नहीं दिखे। करीबन दस किलोमीटर तक हर पचास मीटर पर एक या दो पुलिसकर्मी दिखाई दे जाते।
जेब में हाथ डाले खड़ा एक पुलिस-कर्मी


इन्हीं पुलिस वालों में से एक पर हमारी नज़र पड़ गई। वज़ीराबाद चौराहे पर पुल-निर्माण के नज़दीक ही ये महाशय हाथों को जेब में डाले खड़े हुए थे।

जुराब के ऊपर चप्पल
हालाँकि इनकी बीड़ी पीते हुए की फ़ोटो तो नहीं ले पाये पर इनके पैरों की तरफ़ नजर गई तो पता चला कि जूतों की जगह जुराब के ऊपर चप्पल पहने हुए थे। ये आलम है आला नेताओं की सुरक्षा में "तैनात" पुलिस वालों का।

दूसरी तस्वीर है दिल्ली-यूपी बॉर्डर की जिसे यूपी गेट भी कहा जाता है। दिल्ली में जो बैनर अथवा हॉर्डिंग लगाये जाते हैं वे अधिकतर फ़्लाई-ऑवरों पर या मेट्रो के साथ-साथ लगे हुए दिखाई देंगे। पर जैसे ही आप यूपी गेट से गाज़ियाबाद-इंदिरापुरम में दाखिल होंगे आपको ढेर सारे हॉर्डिंग नजर आयेंगे।

राजनैतिक पार्टियों के हॉर्डिंग के पीछे छिपे दिशा निर्देश
और ये सब लगे होंगे दिशा बताने वाले बोर्ड पर। ये सिलसिला आज का नहीं है। मैं कम से कम पाँच साल से देख रहा हूँ। लेकिन तस्वीर पाँच दिन पुरानी है। काँग्रेस पार्टी की जनसभा 10 दिसम्बर को थी (बैनर के मुताबिक) पर ये आज भी आपको टँगा हुआ दिख जायेगा। यही रस्ता आगे चल कर लखनऊ भी जाता है। बोर्ड पर Lucknow का "W" दिखाई दे जायेगा।


कोशिश रहेगी कि तस्वीरों के माध्यम से आप तक कोई खबर पहुँचाई जा सके। इसी कोशिश में शुरू हुई है ये श्रॄंख्ला।

"तस्वीरों में देखिये" के पिछले अंक:

वैष्णौं देवी श्राइन बोर्ड कैसे फ़ैला रहा है प्रदूषण 


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Sunday, November 21, 2010

जब राहुल टकराये भिखारी से और यम से नगर निगम व दिल्ली सरकार के कर्मचारियों की हुई मुक्का-लात Rahul met Beggar, Municipal and Delhi Govt. Workers vs. Yamraj

अमेठी में एक भिखारी कुछ इस अंदाज़ में भीख माँग रहा था- भगवान के नाम पर दे दे "बाबा", अल्लाह के नाम पर दे दे "बाबा"।

वहीं से राहुल जी गुजर रहे थे।

राहुल गाँधी: तुमने पुकारा और हम चले आये, कहाँ है तुम्हारा घर... कोई बतलाये, तुमने पुकारा और हम चले आये। अमेठी मेरा संसदीय क्षेत्र है। मेरा ही नहीं मेरे परिवार का भी घर है। तुम किस जगह रहते हो?
भिखारी: राहुल बाबा, आप मेरे घर का क्या करेंगे? मैं तो जहाँ जगह मिलती है वहाँ बैठ जाता हूँ।
राहुल जी: तो फिर मैं आज रात कहाँ रुकूँगा? मैंने तो मीडिया को अमेठी आने को कह दिया था। ओह...
भिखारी: राहुल जी, आप अमेठी के लिये बहू क्यों नहीं ले आते? हर कोई यही चाहता है...
राहुल जी: आप सही कहते हैं। जल्द ही आपको खुशखबरी सुनने को मिलेगी। पर आप इतने उत्सुक क्यों हैं?
भिखारी: आप को दुल्हन मिलेगी जो आपके लिये अच्छा खाना बनायेगी और फिर हमें भी राहत मिलेगी जो आप हमारे यहाँ आते हैं। जिन गरीबों के पास खाने को रोटी नहीं वो आपको रोटी खिलाता है।
राहुल: तुम दलित हो? मुसलमान हो?
भिखारी: नहीं राहुल बाबा।
राहुल: फिर मैं तुम्हारे घर नहीं रुक सकता।

वहाँ से राहुल चल देते हैं। रास्ते में एक रिपोर्टर से टकरा जाते हैं। पीछे भिखारी बुड़बुड़ा कर रह जाता है (दलित गरीब और ब्राह्मण गरीब में क्या अंतर है?)

रिपोर्टर: सर, एक बात बतायें। आपने या आपकी सरकार ने दलितों व मुसलमानों के लिये क्या किया है?
राहुल: हमने दलितों व पिछड़ों को आरक्षण दिया है। और मुसलमानों के लिये......ह्म्म्म्म
रिपोर्टर: सुना है कि आपकी सरकार नीतीश सरकार का फ़ार्मूला लगा रही है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिये रोजगार योजना चालू की थी जिसके तहत उन्हें कढ़ाई बुनाई व अन्य रोजगार शिक्षा मुफ़्त दी जा रही है। और जो कुछ वे बना रही हैं उन्हें बेच कर आमदनी भी हो रही है जिससे उनका विकास हो रहा है।
राहुल: मुझे सिब्बल जी से बात करनी होगी फिर कोई टिप्पणी करूँगा।

(पर्दा गिरता है)

२००५ में विश्व बैंक के अनुसार भारत के ४१ फ़ीसदी लोग अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा (१.२५ डालर प्रति दिन यानि ६२ रूपये प्रतिदिन) से भी नीचे है। हालाँकि इस आँकड़े में सुधार हुआ है जब १९८२ में भारत के साठ फ़ीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे थे। शहर में लोग औसतन २१.६ रू और गाँव में महज १४.३ रू प्रतिदिन कमाते है। सोच सकते हैं कि हालत कितनी खराब है। मुझे मालूम है कि ये ब्लॉग पढ़ने वाले १००० रूपये प्रतिदिन से अधिक कमाई करते होंगे। पर रौंगटे तब खड़े हो जाते हैं जब यह पता चले कि दुनिया के एक-तिहाई गरीब भारत में हैं। और जब राजनेता आरक्षण के नाम पर दलित गरीब व अन्य गरीब में अंतर करते हैं तो आप समझ सकते हैं कि एक गरीब पर क्या गुजरती होगी। फिर क्यों न वो भी आरक्षण की माँग करे?

और अधिक जानने के लिये यहाँ जायें।
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नगर निगम और दिल्ली सरकार के कर्मचारी मरने के बाद ऊपर यमराज के पास पहुँचे।

यमराज: कुछ साल पहले दिल्ली में इमारत गिरी थी, उसका जिम्मेवार कौन था?
कर्मचारी: यम जी, उसका जिम्मेवार तो आपकी बहन यमुना थीं।
यमराज: तुम लोगों की ये हिम्मत!!!!! गुस्ताख।
कर्मचारी: वह यमुना नदी के किनारे था और बाढ़ की वजह से इसकी नींव कमजोर पड़ गई थी।
यमराज: इमारत गिरने पर तुम दोनों जागे और फिर आनन फ़ानन में ३८ इमारतों को खाली करने का नोटिस भेज दिया। ये भी न सोचा कि वे लोग बाद में कहाँ रहेंगे?
कर्मचारी: वो हमने ...वो उनके लिये टैंट..
यमराज: जब मकान बन रहे होते हैं, तुम लोग तब पैसा खाते हो और मकान गिरने के बाद उसका इल्जाम यमुना पर लगाते हो!!! तुम्हीं लोगो ने ही इतना बड़ा अक्षरधाम और खेलगाँव यमुना के रास्ते में उसके ऊपर ही बनवा दिया। तब तो तुम्हें विदेशी कमाई नजर आ रही थी। अब बोलो? उन बेघरों को उसी अक्षरधाम और खेल गाँव में क्यों नहीं ठहरा दिया?
कर्मचारी: वो..वो... ऐसा कैसे करते हम?...

विकीपीडिया के अनुसार:

अक्षरधाम को सन २००० अप्रैल में बनाने की इजाजत डी.डी.ए ने दी। और नवम्बर २००० में बनना शुरु हुआ। नवम्बर २००५ में यह बनकर तैयार हुआ। जमीन के नीचे मजबूती के लिये १५ फ़ीट तक ५० लाख ईंटें लगाईं गई। और इस तरह यमुना के ठीक ऊपर कंक्रीट का जाल बिछा दिया गया और उसका रास्ता बदल दिया गया। यमुना तो और बेहतर करने की बजाय अब खेलगाँव बना दिया गया और नदी से नाला बना दिया गया है।
आप सोच रहे होंगे कि यमराज ने कर्मचारियों को नरक भेजा या स्वर्ग? उन्होंने उन्हें वापस मृत्युलोक भेज दिया। वे नहीं चाहते थे कि यमलोक में भी भ्रष्टाचार फ़ैले।
(पर्दा गिरता है)


भारत में इतनी परेशानियाँ हैं और इतने विवाद हैं, कि हम सभी कहीं न कहीं उनका हिस्सा बनते हैं दुखी होते हैं। दुखी व परेशान होना उपाय नहीं है। जो भ्रष्टाचार व अन्य बुराइयाँ हम समाज व राजनीति में देखते हैं उन मुद्दों को उठाना बहुत जरूरी है। "गुस्ताखियाँ  हाजिर हैं" स्तम्भ की शुरुआत इसी मिशन का एक हिस्सा है। यहाँ हँसी मजाक भी होगा और गम्भीर मुद्दे भी उठाये जायेंगे। ये आवाज़ आगे और बुलंद होगी यही उम्मीद है।
अगले सप्ताह नईं गुस्ताखियों के साथ फिर हाजिर होंगे। तब तक के लिये नमस्कार।

गुस्ताखियाँ जारी हैं.....
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Saturday, December 20, 2008

राजस्थान की गोलमा: लोकतंत्र का मजाक, विडम्बना या मजबूरी

कल राजस्थान में मंत्रियों ने शपथ ली। जिन्होंने शपथ ली उनमें एक राज्यमंत्री हैं गोलमा देवी। बात उनकी इसलिये करनी पर रही है क्योंकि पढ़ाई के मामले में पिछड़े राज्यों में से एक राजस्थान की यह राज्यमंत्री कभी स्कूल नहीं गई। ये पूर्ण रूप से अशिक्षित हैं। शपथ पढ़ नहीं पाई। हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाया। ये शर्मनाक है। ये लोकतंत्र की विडम्बना है जो ऐसे अनपढ़ लोग हमारे मंत्री बने बैठे हैं। जरा थोड़ा पीछे जाते हैं। किरोड़ी लाल मीणा साहब इससे पहले भाजपा में थे। भाजपा ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। जनाब बागी हो गये और अपने साथ अपनी पत्नी और दो अन्यों को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़वा दिया। और कमाल की बात ये कि ये चारों ही चुनाव जीत गये। अब कांग्रेस को तो पूरे १०० विधायक मिले नहीं, तो उन्हें निर्दलियों का साथ लेना था। सो पेशकश की गई किरोड़ी लाल जी से। इन्होंने खुद तो मंत्री पद नहीं लिया पर अपनी पत्नी को जरूर दिलवा दिया। ये लोकतंत्र की मजबूरी है क्या? लोगों ने ऐसा क्या देखा गोलमा देवी में? क्या लोग अभी भी नहीं समझे कि हमें समझदार और शिक्षित व्यक्ति नेता के रूप में चाहिये? क्या उम्मीदवार और मंत्री बनने के लिये कितनी शिक्षा कम से कम होनी चाहिये,ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जाना चाहिये? ये नेता लोग तो करेंगे नहीं। इनका अपना खुद का नुकसान जो होगा। कांग्रेस और गहलोत सरकार की यह कैसी मजबूरी? सरकार बनाना इतना जरूरी कि गोलमा देवी को मंत्री पद दे दिया? मुझे कांग्रेस सरकार से ज्यादा गुस्सा लोगों पर आ रहा है। क्या गहलोत सरकार के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था? क्या लोगों को अपने क्षेत्र व प्रदेश की तरक्की नहीं चाहिये? हमें अब ये जागरूकता फैलानी चाहिये ऐसे लोग हमारे नेता न बनें। फ़ैसला हमें लेना है।
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