Friday, October 14, 2011

क्या आप जानते हैं - कुतुब परिसर में खड़े लौहस्तम्भ को किस राजा ने बनवाया था? Qutub Complex, Iron Pillar History - Incredible India

अतुल्य भारत की पिछली कड़ी में कुतुब मीनार का जिक्र किया गया था। उसी कुतुब मीनार की चार दीवारी में खड़ा  हुआ है लौह स्तम्भ।

कुतुब परिसर में स्थित लौह स्तम्भ
दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तम्भ सात मीटर ऊँचा है। इसका वजन लगभग छह टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1600 वर्ष पूर्व बनवाया। मुझे यह जानकर हैरानी हुई थी कि आज का यह लौह स्तम्भ प्रारम्भ से यहाँ नहीं था। गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तम्भ विदिषा (विष्णुपदगिरी/उदयगिरि - मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने जैन-मंदिर परिसर के सत्ताईस मंदिर तोड़े तब यह स्तम्भ भी उनमें से एक था। मंदिर से तोड़े गये लोहे व अन्य पदार्थ से से उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई। 



संस्कृत में अंकित कुछ वाक्य
कहते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस स्तम्भ को भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था और इसे एक पहाड़ी-विष्णुपदगिरि पर खड़ा करवाया। इस पर लिखी गईं संस्कृत की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि बाह्लिक युद्ध के पश्चात उन्होंने यह स्तम्भ बनवाया। उनके काल में यह स्तम्भ समय बताने का भी कार्य करता था। विष्णुपदगिरि पहाड़ी पर स्थित इस स्तम्भ पर सूर्य की किरणें जिस ओर पड़तीं थीं उनकी गणना से समय पता लगाया जाता था।

ऐसा माना जाता है कि तोमर-साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तम्भ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तम्भ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन 1052 के तोमर राजा अनन्गपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

सन 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तम्भ को नुकसान पहुँचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

इस लौह स्तम्भ की खास बात यह है कि इसमें कभी ज़ंग नहीं लगा है। एक आम लोहा बारिश, सर्दी व गर्मी की लगातार बदलती ऋतुओं के कारण आसानी से ज़ंग खा जाता है किन्तु इसे हमारे इतिहास के बेहतरीन कारीगर व वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण ही कहा जायेगा कि यह लौह स्तम्भ आज विश्व में शोध का विषय बन गया है।

पंडित बाँकेराय द्वारा संस्कृत से किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद
नोट: मैंने यह लेख लिखने से पहले लौह स्तम्भ पर ज़ंग न लगने के कारण को जानना चाहा। परन्तु यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाया। हिन्दी में यदि विज्ञान की पढ़ाई की होती तो शायद कुछ बता पाता। इसलिये आप सब के समक्ष मैं विकीपीडिया के लेख की कुछ पंक्तियाँ जस की तस यहाँ चिपका रहा हूँ। इसके लिये मैं माफ़ी माँगता हूँ किन्तु मेरे पास और कोई चारा नहीं था.. :-( इतना समझ पाया हूँ कि लोहे में फ़ॉस्फ़ोरस का मिश्रण भी इसके ज़ंग-रहित होने का एक कारण है...

In a report published in the journal Current Science, R. Balasubramaniam of the IIT Kanpur explains how the pillar's resistance to corrosion is due to a passive protective film at the iron-rust interface. The presence of second-phase particles (slag and unreduced iron oxides) in the microstructure of the iron, that of high amounts of phosphorus in the metal, and the alternate wetting and drying existing under atmospheric conditions are the three main factors in the three-stage formation of that protective passive film.[1

Lepidocrocite and goethite are the first amorphous iron oxyhydroxides that appear upon oxidation of iron. High corrosion rates are initially observed. Then, an essential chemical reaction intervenes: slag and unreduced iron oxides (second phase particles) in the iron microstructure alter the polarization characteristics and enrich the metal–scale interface with phosphorus, thus indirectly promoting passivation of the iron[14] (cessation of rusting activity)

The next main agent to intervene in protection from oxidation is phosphorus, enhanced at the metal–scale interface by the same chemical interaction previously described between the slags and the metal. The ancient Indian smiths did not add lime to their furnaces

The most critical corrosion-resistance agent is iron hydrogen phosphate hydrate (FePO4-H3PO4-4H2O) under its crystalline form and building up as a thin layer next to the interface between metal and rust. Rust initially contains iron oxide/oxyhydroxides in their amorphous forms. Due to the initial corrosion of metal, there is more phosphorus at the metal–scale interface than in the bulk of the metal. Alternate environmental wetting and drying cycles provide the moisture for phosphoric-acid formation. Over time, the amorphous phosphate is precipitated into its crystalline form (the latter being therefore an indicator of old age, as this precipitation is a rather slow happening). The crystalline phosphate eventually forms a continuous layer next to the metal, which results in an excellent corrosion resistance layer.[17] In 1,600 years, the film has grown just one-twentieth of a millimetre thick.[18]

साभार - विकीपीडिया

जय हिन्द
वन्देमातरम

7 comments:

Anushree Malik said...

its good

gyan prakash said...

Thank you 😊 for this important information.

Pushpendra singh dewa said...

Its very good qutub meenar

Unknown said...

it's amazing this information is briliant.

Narendra Prajapati said...

it's amazing this information is briliant.

Unknown said...

Very nice qutub minar

vinod singh said...

The iron piller is indian history's most part so please anyone can explained.