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Monday, August 15, 2011

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत - स्वतंत्रता दिवस पर खास जवानों के लिये Independence Day Special - Two Songs Dedicated to our Soldiers


स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत...

कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों (हक़ीकत)



"ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी " : इस गीत के बिना ये श्रृंख्ला पूरी नहीं हो सकती।


आपको ये श्रृंख्ला कैसी लगी, अवश्य बताइयेगा। बेशक न बतायें पर इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपका हर कार्य ऐसा हो जो इस देश की मिट्टी के काम आये। इस धरती को अपनी माँ समझें और देश को अपना परिवार।

मैथिली शरण गुप्त कह गये हैं : जननी जन्मभूमि: च स्वर्गदापि गरीयसी। यानि माँ और जन्मभूमि को स्वर्ग से बड़ा दर्जा प्राप्त है।

जय हिन्द।
वन्देमातरम।
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Sunday, August 14, 2011

कुछ कर गुज़रने को खून चला - स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 - 15 अगस्त ) RDB-Khoon Chala and Maa Tujhe Salaam Independence Day Special - Patriotic Songs Series



रंग दे बसन्ती फ़िल्म का "खून चला" आज की हकीकत से रूबरू कराता है इसलिये ये गीत इस श्रृंख्ला का हिस्सा बना।

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला

खुली -सी  चोट  लेकर , बड़ी -सी  टीस  लेकर
आहिस्ता  आहिस्ता
सवालों  की  ऊँगली , जवाबों  की  मुट्ठी
संग  लेकर  खून  चला
कुछ  कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला




माँ तुझे सलाम



स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।

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Saturday, August 13, 2011

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 से 15 अगस्त) VandeMataram Song from Anandmath, Patriotic Songs Series

आज के गीतों में से एक है फ़िल्म आनन्दमठ का गीत वन्देमातरम।
वन्देमातरम गीत के इतिहास को जानने के लिये


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वन्देमातरम( आनन्दमठ) 






स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।


वन्देमातरम
जय हिन्द
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Friday, August 12, 2011

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Independence Day Special Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011)

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम (शहीद)

है प्रीत जहाँ की रीत सदा (पूरब और पश्चिम का सदाबहार गीत)

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Thursday, August 11, 2011

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति से ओत-प्रोत गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011) Independence Day Special

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



देश भक्ति का एक गीत आप काबुलीवाला से पहले ही सुन चुके हैं

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं..



लाये हैं हम तूफ़ान से किश्ती निकाल के.. (फ़िल्म: जागृति)



जय हिन्द।
वन्देमातरम।
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Wednesday, August 10, 2011

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का क्रमवार लेखा-जोखा - स्वतंत्रता दिवस विशेष Chronological Order Of Events - Indian Independence Movement

देश के स्वतंत्रता आंदोलन की वो तारीखें जो इतिहास बन गईं। इन तारीखों में शहीदों का रक्त और उम्मीदें बँधीं हैं जो उन्होंने एक आज़ाद भारत के लिये देखीं थीं।

1608  : कैप्टन विलिय्म्स हॉकिंस का सूरत के जरिये व्यापार शुरु। मुगल शासक जहाँगीर  का वो क़दम जो इस देश की तक़दीर बदल गया।


1707  :  औरंगज़ेब की मृत्यु और मुगलों के अंत की शुरुआत।


1757  :  प्लासी का युद्ध, सिराजुद्दौला की हार।


1764  :  बक्सर का युद्ध, बंगाल ईस्ट इंडिया कम्पनी के हवाले।


1857  :  हिन्दुस्तान की पहली क्रान्ति। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे व मंगल पांडे शहीद। पूरे हिन्दुस्तान का कोई एक राजा न होना रहा नुकसान देह। बहादुर शाह ज़फ़र व मुगल हुकूमत का अंत।


1885  :  ए.ओ.ह्यूम (Alan Octavian Hume) द्वारा काँग्रेस की स्थापना।


1905  :  बंगाल का विभाजन। स्वदेशी का नारा बुलंद हुआ, दादाभाई नाओरोजी (कांग्रेस) द्वारा स्वराज की घोषणा। राज देशी नेताओं का, हुकुम ईस्ट इंडिया कम्पनी का।


1906  :  मुस्लिम लीग का हिन्दुस्तान की राजनीति में जन्म।


1907  :  काँग्रेस हुई दो फ़ाड़, बने गरम दल व नरम दल । बाल गंगाधर तिलक बने  गरम दल के नेता।


1908  :  11 अगस्त को खुदीराम बोस को फ़ाँसी। उम्र: महज अठारह बरस... !!


1909  :  Indian Council Act [Morley-Minto Reforms] मकसद भारतीयों की सरकार में दखल कम करना।


1914  :  विश्व युद्ध आरम्भ।
1916  :  गरम दल वापस कांग्रेस से जुड़े। काँग्रेस और मुस्लिम लीग में साथ मिलकर लड़ने का लखनऊ में हुआ समझौता।


1919  : तेरह अप्रैल,  स्थान- जलियाँवाला बाग, अमृतसर। ब्रिटिश मिलिट्री द्वारा 379 निहत्थों पर गोलियाँ दागी गईं। जलियाँवालाबाग में बाहर निकलने का केवल एक और वह भी तंग रास्ता है। दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं। कुछ लोग यदि आज भी जिन्दा होंगे तो सोच रहे होंगे कि आज के हालात देखने से अच्छा होता यदि शहीद हो जाते।


1920  :  असहयोग व खिलाफ़त आंदोलन आरम्भ।


1922  :  चौरा-चौरी आंदोलन में तीन हजार लोगों के झुंड ने पुलिस   चौकी जलाई व पुलिसवालों की हत्या की। नाराज़ गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया।

1924  :  काकोरी रेल लूटी गई।


1928  : लाला लाजपत राय की हत्या।


1929  :  साइमन कमिशन का भारत में आना, भगत सिंह द्वारा एसेम्बली में बम फ़ेंका गया। पूर्ण स्वराज का इरादा जाहिर किया। मक़सद हिन्दुस्तान पर केवल हिन्दुस्तानियों का राज होना, ब्रिटेन की दखल मंज़ूर नहीं।


1930  :  भगत सिंह द्वारा पूर्ण स्वराज के नारे के बाद काँग्रेस ने भी 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी। डांडी मार्च व नमक सत्याग्रह भी उसी साल हुए।


1931  :5 मार्च को गाँधी व वाइसरॉय इरविन में हुआ समझौता जिसके अंतर्गत अहिंसक सत्याग्रहियों को जेल से बाहर करने पर व नमक इत्यादि पर टैक्स से मुक्ति पर हुआ समझौता। हिंसा से विद्रोह करने वालों पर कोई बात नहीं। अठारह दिन पश्चात 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फ़ाँसी।

1937  : 1935 एक्ट के तहत हुए चुनावों में काँग्रेस की भारी जीत।
1939  :  दूसरा विश्व युद्ध शुरु।


1942  :  अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन, सुभाष चंद्र बोस का काँग्रेस छोड़ा जाना व अपनी स्वयं की आर्मी बनाना।
1946  :  बोस की असामयिक मृत्यु, कबिनेट मिशन का भारत आगमन, नौसेना द्वारा विद्रोह।


1947  :  पन्द्रह अगस्त को लालकिले पर तिरंगा फ़हराया गया, देश आज़ाद हुआ।


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, August 9, 2011

मैं अब तक क्यों मौन हूँ? Why Am I Silent Spectator of Crime happening in my city?

मित्रों,

आज से चार वर्ष पूर्व मैंने यह कविता लिखी थी। हो सकता है आप में से कुछ लोगों ने यह पढ़ी हुई हो पर आज स्वतंत्रता दिवस विशेष पर यह आज भी सामयिक है। देश में कितनी पीढ़ा और असंवेदनशीलता है यह कविता उसके बारे में बताती है। कहते हैं जुर्म सहने और जुर्म देख कर आवाज़ उठाने वाला उतना ही बड़ा गुनाहगार है जितना जुर्म करने वाला.. और आज के इस दौर में शोषण को देखते रहने वाले लोगों की तादाद बढ़ रही है....

अँधा वो नहीं,

जो चलने के लिये,
डंडे का सहारा ले,
अँधा तो वो है,
जो अत्याचार होते देखे,
और आँखें फिरा ले।

बहरा वो नहीं,
जिसको सुनाने के लिये,
ऊँचा बोलना पड़ता है,
बहरा वो है,
जो कानों में रूई ठूँस कर,
इंसाफ किया करता है।

गूँगा वो नहीं,
जिसके मुँह में ज़ुबान नहीं,
गूँगे वो हैं,
जो चुप रहते हैं जब तक,
रुपया उन पर मेहरबान नहीं।

यहाँ अँधे, गूँगे बहरों की,
फ़ौज दिखाई देती है,
यहाँ मासूम खून से तरबतर,
मौजें दिखाई देती हैं।

खूब सियासत होती है,
लोगों के जज़्बातों पर,
जश्न मनाया जाता है,
यहाँ ज़िंदा हज़ारों लाशों पर।

यहाँ धमाके होने चाहिये
ताकि खाना हजम हो सके,
मौत का तांडव न हो तो,
चेहरे पर रौनक कैसे आ सके।

यहाँ बगैर लाल रंग के,
हर दिन बेबुनियाद है,
लाशों को ४७, ८४, ०२ की,
काली तारीखें याद हैं।

कोई पूछे उन अँधों से,
कैसे देखा करते हो बलात्कार,
कोई पूछे उन बहरों से,
कैसे सुन लेते हो चीत्कार,
कोई पूछे उन गूँगों से,
क्यों मचाया है हाहाकार।

मुझसे मत पूछना,
इन सवालों को,
मुझे नहीं पता मैं अँधा हूँ,
बहरा हूँ, गूँगा हूँ या कौन हूँ?
हद है!
हर सवाल पर,
मैं अब तक क्यों मौन हूँ??
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Monday, August 8, 2011

संवेदना की अर्थी No Feelings Left In Metros

कल बस से कटा था एक हाथ,
कराहता रहा वो,
तड़पता रहा वो
कईं घंटे
एक मेट्रो शहर में-
हिन्दुस्तान का दिल कहते हैं हम जिसे!!

आज कार चलाते एक शख्स ने
टक्कर मार दी गाय को,
और पलट कर भी न देखा-
श्राद्ध पर रोटी खिलाने के लिये
गाय ढूँढेगा
तब शायद याद आ जाये
इस बेज़ुबान की-
माँ का दर्जा दिया है हमने जिसे!!

सड़क किनारे  पड़े पड़े
लाश बन गया है एक शरीर-
जिसे ठोकर मारते हुए
चल पड़ी है दुनिया
तरक्की की राह पर,
विश्व का
नम्बर एक बनने की चाह लिये

कहते हैं ये शहर नहीं सोता
पर हाँ
आँखें जरूर मूँद लेता है
पीड़ा देख नहीं सकता पगला!!

लाशें चीख रही हैं-
समय की माँग है-
संवेदना की
अर्थी पर रोने के लिये
रूदालियों को बुलाया जाये!!!
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