Sunday, March 13, 2016

क्षणिकाएँ Kshanikaayein

क्षणिकाएँ

समय

कितना कहा
रूका ही नहीं
आज शायद
किसी दुश्मन ने 
आवाज़ दी होगी!!

दर्द

इसकी भी आदत
पड़ ही जायेगी
ये दर्द अभी नया जो है...

चेहरे

कितना घूमा..
पर मुखौटे ही देखने को मिले
चेहरे कहीं खो गये हैं क्या?
आज आइना भी
मुझसे यही कह रहा है!!

मिलावट

मिलावट का दौर
जारी है
आज तो मैं भी 
इससे अछूता नहीं रहा...

माँ

माँ रात को सोती ही नहीं
जब से पैदा हुआ हूँ
तभी से है उसे
ये लाइलाज बीमारी!!

3 comments:

UMESH said...

" गागर में सागर".... अति सुन्दर अभिव्यक्ति।

http://safaltasutra.com/

prateek singh said...
This comment has been removed by the author.
prateek singh said...

तपन जी बहुत ही सुन्दर रचना है| आपकी रचनाएं बेहद रोचक रहती हैं | आप ऐसी ही खूबसूरत रचनाओं को शब्दनगरी मे भी प्रकाशित कर सकते हैं | वहाँ अाप
"गजल, दरख़्त व छाँव"
जैसी रचनाये पढ़ व लिख सकते हैं |