Sunday, July 29, 2007

किसान

खाते पीते शहरी लोग,
गाँव में लहलहाते खेत,
मेहनती किसान ।

शहर में दौड़ती कार,
गाँव में रोबीला साहूकार,
कर्ज़दार किसान ।

बढ़ते रेस्तरां, व्यञ्जन,
रोटी को तरसता,
भूखा किसान ।

पेट भरना दूसरों का,
हँसते हुए सिखा गया,
मुर्दा किसान ।

4 comments:

Pooja Utreja said...

small and complete.. thats called poetry.. kee it up Tapan

shweta said...

very nice poem. Ek vastavikta ko vyakt karti hai.

GAURAV said...

कितनी सही अभिव्यति है

मोहिन्दर कुमार said...

आपके भाव बहुत सुन्दर हैं उन्हे और मुखरित कर अभिव्यक्ति और विस्तार दें...
सस्नेह