Friday, December 7, 2007

ये यादें

कभी हलकी सी मुस्कान होठों पर,
कभी आँखें नम कर जाती हैं
कभी सपने दिखलाती हैं दिन में,
कभी मन भारी कर जाती हैं..
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब आँखों के सामने ही
सब होता हुआ सा दिखता है,
जब रात के सन्नाटे में,
कुछ सुना हुआ सा लगता है,
गाल पर खारा पानी
टपटपा जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब भरी महफिल में भी
कुछ सूना सूना सा लगने लगे,
जब अपनों के बीच में भी,
अजनबी सा लगने लगे,
तब शायद बे-प्रीत होने लगती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

सालों का साथ जब
पल भर ही रह जाता है,
कितने दूर कितने पास,
ये सवाल मुश्किल हो जाता है,
वो हर पल भारी कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब रोने का बहाना नहीं मिलता,
जब हँसने का मन नहीं करता,
तब अपने आप से खुद को
दूर कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

क्यों दिलों का मिलना होता है?
क्यों ये बिछड़ना होता है?
क्यों ये विरह के पल,
मन को खाने लगते हैं?
क्यों ये खूबसूरत आकाश,
काटने को दौड़ता है?
ऐसे ही अनगिनत यक्ष प्रश्न,
अब हर वक्त मेरे सामने
खड़े कर जाती हैं
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

3 comments:

Rajesh said...

touching. from the core of heart

प्रभात शारदा said...

दिल की बात दिल ही जाने
दूजा समझ सके न कोई
अपनी बात मैं किससे कहूँ
साथी लगे मुझे न कोई

क्या कहूँ क्या समझू
असमंझ मैं बैठा हूँ
अपने ही हर शब्द को
फिर तराशने बैठा हूँ

तू रो मत और खो मत
ये दुनिया बड़ी बेईमानी है
मदमस्त हो कर जी, और देख
ये तो तेरी दीवानी है...

sumit said...

बहुत ही अच्छी कविता है
तपन भैया

सालों का साथ जब
पल भर ही रह जाता है,
कितने दूर कितने पास,
ये सवाल मुश्किल हो जाता है,
वो हर पल भारी कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!


सुमित