Wednesday, June 4, 2008

माँ, तितली कैसी होती है?



रविवार को NDTV पर एक प्रोग्राम देख रहा था जिसका प्रसारण डल झील से हो रहा था। बहस हो रही थी कि क्या विकास पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है। उसी बहस के कुछ मुद्दों का जिक्र आगे के लेख में करूँगा। बहस की शुरूआत में डल झील के आसपास हो रहे निर्माण कार्य के बारे में बताया गया, जो शायद वहाँ के विकास के लिये हो रहा था। किन्तु उससे झील को काफी नुकसान पहुँच रहा है। आसपास के पेड़ कट रहे हैं। शायद मनुष्य के रहने के लिये। अजीब विडम्बना है। रहने के लिये पेड़ को काटना पड़ता है, जिससे मानव जिंदा रहता है। विडम्बना से ज्यादा मुझे मनुष्य के इस कार्य में विरोधाभास झलकता है।

खैर, बात ये भी उठी कि क्या ऐसा हो सकता है कि विकास भी होता रहे और पर्यावरण भी बचा रहे। किसी ने कहा कि हाँ, ये सम्भव है बशर्ते हम विकास के तरीके को बदले। यहाँ किसी ने ये भी कहा कि क्यों न डल झील की देखरेख किसी प्राईवेट संस्था को दे दी जाये। इस बात पर उमर अब्दुल्ला बिगड़ गये। राजनेता हैं भई। उन्होंने पलटवार किया और कहा कि सरकार अगर इस काम को प्राइवेट लोगों के हाथ में सौंप दे तो क्या जनता उसका फालतू खर्च उठाने को तैयार है? क्योंकि जो कम्पनी इस काम को अपने हाथों में लेगी वो बाद में पैसा भी जनता से ही निकालेगी। इस बात का उन सज्जन के पास जवाब नहीं था। अब जब अपनी जेब पर बन आई तो आवाज़ उठेगी क्यों? फिर चाहें पर्यावरण जाये भाड़ में।

अभी बीच में ही एक और सज्जन ने विकास पर ही सवाल उठा दिया। क्या जो हम निर्माण कर रहें हैं, उसको विकास कहा जा सकता है? ये विकास कहा जाये या फिर कुछ और... उनके कहने का आशय स्पष्ट था कि क्या पहाड़ों, पेड़ों को काट काट कर बड़ी-बड़ी इमारतें बनाना ही विकास कहलाता है? मुझे उनकी बात सही लगी। आज दिल्ली में जो ऊँची ऊँची इमारते हैं, गाज़ियाबाद, गुड़गाँव में सोसायेटियाँ बन रही हैं, वे सभी बनाते हुए पेड़ों के लिये जगह नहीं छोड़ रहीं हैं। आप देखेंगे जो सोसाइटी ९०-२००० के दशक में बनी हो और जो आज की तारीख में बन रही हो उसमें जमीन और आसमान का फर्क है। जगह कम हो गई है। न पार्किंग की जगह है और पेड़ अथवा पार्क को भूल ही जायें। कीमतें बढ़ गईं हैं। कमाल है!! जिन जगहों पर पहले बच्चों के खेलने के लिये पार्क होते थे, आज उन्हीं जगहों पर बच्चों को पढ़ाया जाता है। मेरा मतलब है कि स्कूल खोल दिया गया है। अब बच्चे किताबों में 'प' से पार्क पढ़ा करेंगे और देखने के लिये कम्प्यूटर तो है ही।

क्या वाकईं इसको विकास कहते हैं?

जहाँ पहले खेत हुआ करते थे, वहाँ की जमीन के लिये पैसे वाले घराने लड़ रहे हैं। वहाँ खाने के लिये कुछ नहीं पर गाडी के लिये कारखाने बनाने की योजना हो रही है। जिन लोगों को खाने और रहने के लिये लोन लेना पड़ता है, उन्हीं लोगों को गाडी के सपने दिखाये जा रहे हैं। अपना घर न सही, अपनी गाड़ी का सपना तो पूरा हो। जिस देश के लोग सड़क पर जरा सी टक्कर होते ही आपस में भिड़ जाते हों वहाँ के लोगों को अब और सावधान हो जाना चाहिये क्योंकि अब लड़ाई में बहुत सारी गाडियाँ और कूदने वाली हैं।

कार्यक्रम के अंत में एंकर एक ऐसा सवाल पीछे छोड़ जाता है जो सोचने पर मजबूर कर देता है। कुछ वर्ष बाद जब आने वाली पीढी हमसे पूछेगी कि तितली कैसी होती है? तब शायद हमारे पास पछताने और मुँह छिपाने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। अभी भी शहरों में तितली लुप्त प्रजातियों में शामिल हो रही है। मैं आप पर छोड़ता हूँ कि क्या अँधाधुँध हो रहे निर्माण को विकास कहा जाये जहाँ पर्यावरण की धज्जियाँ उड़ रही हैं?? ये भविष्य हमारा है। या हम लोग चाहें तो मिल कर विकास की नईं परिभाषा गढ़ें। सदाचार, भाइचारे का विकास...लोगों के आचरण का विकास...शिष्टाचार का विकास...आदि..जवाब हमें ही ढूँढने है...

दो बातें कहनी रह गईं...पहली..वन्य जीवों को नुकसान.. बाघों की निरंतर कमी जग जाहिर है..राष्ट्रीय पशु ही न रहेगा तो?
दूसरा... GNP(Gross Net Production) में बढोतरी हो रही है परन्तु GNH (Gross Net Happiness) में कमी हो रही है... इसको विकास का नाम दिया जाता है... ये भी उसी बहस का ही एक हिस्सा थीं..

जाते जाते एक बात और-आज विश्व पर्यावरण दिवस है

5 comments:

प्रभात शारदा said...

सच, सही कहा दोस्त ...

sumit said...

तपन भैया
ये सिर्फ दिखावे का विकास है और कुछ नही
और तितली देखे हुए तो मुझे भी जमाने हो गये है

Rajesh said...

coming generation will see tiatli only on screen, rajesh sharma

neha said...

well n rightly said bhaiya...
everyone should realize these things so that GNP n GNH may rise proportionately.
thank u 4 this enlightenment.
keep it up!!!

Pallavi said...

मैंने भी तितली स्कूल में देखी थी आखिरी बार ..