Sunday, June 15, 2008

स्वार्थ व झूठ से भरे ४ वर्ष

आप सोच रहे होंगे कि ४ साल किस बात के? दरअसल कल यानि १४ जून २००८ को इस कार्पोरेट जगत के चार साल पूरे हुए। कहने को तो जनवरी २००४ से काम करना शुरू किया था परन्तु चूँकि डिग्री जून में मिली थी इसलिये पहले ६ महीने गिनती में नहीं आ सकते। खैर मुद्दा ये नहीं है। आप लोगों ने एक फिल्म देखी होगी कारपोरेट| मैंने नहीं देखी, अभी देखनी है। कहते हैं उसमें इस जगत की कईं परतें खोली हुई हैं। मुझे भी इस धंधे में चार बरस पूरे हुए। लेकिन मेरा दायरा आईटी की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तक ही सीमित होगा। उम्मीद है अब तक आप आगे की भूमिका समझ चुके होंगे।

चलिये शुरू करते हैं मेरी पहली कम्पनी से। काम अच्छा, बहुत अच्छा। लोग अच्छे। बहुत बढ़िया तरीके से सब कुछ चल रहा था। आज की तारीख में मुफ्त में लस्सी और शीतल पेय (कोल्ड ड्रिंक) कौन सी कम्पनी पिलाती है? हर शुक्रवार को हिन्दी फिल्म दिखाई जाती थी। लेकिन एक दिन अचानक अफवाह उड़ती है कि १०० लोगों को निकाल दिया गया है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यकायक सब खत्म। जो नये छात्र कालेजों से अरमान लेकर आते हैं कि बड़ी कम्पनी में काम करेंगे उन इंजीनियरों को मना कर दिया जाता है। उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था। ऊपर वालों ने कहा कि प्रोजेक्ट नहीं चल रहे थे। लेकिन यदि ऐसा था तो लोगों को कम्पनी में आने का न्योता ही क्यों दिया? क्या ये कम्पनी की दूरदर्शिता की कमी थी या कुछ और? क्योंकि ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। क्या मंशा रही थी कम्पनी की? ये भी अफवाह थी कि कम्पनी भूमि में निवेश करना चाहती है इसीलिये साफ्टवेयर में ध्यान नहीं दे रही। पता नहीं क्या सच है क्या झूठ? कहते हैं कि अगर व्यापार करना है तो मालिक को भावुकता का त्याग करना पड़ता है। शायद ऐसा ही तब हुआ होगा। लेकिन लोगों के भविष्य को अँधकार में घकेल कर!! आज की तारीख में ये हाल काफी कम्पनियों में सुनने को मिल रहा है। शायद भावनायें व संवेदनायें कहीं खो गईं हैं स्वार्थ के सागर में?

लेकिन अभी तो स्वार्थ का एक सिरा ही देखने को मिला है। अब जानते हैं इंजीनियरों की राय। जहाँ ज्यादा पैसा देखा वहाँ कूद पड़े। फलानी कम्पनी यदि अमरीका भेजती है तो अपनी नौकरी छोड़ने में मिनट नहीं लगती है। पैसा किसे बुरा लगता है? फिर नमकहलाली व वफादारी जैसे शब्द अब कहानियों में ही सुनने को मिलते हैं। ये खेल इमोशंस से नहीं खेला जाता है, इन चार वर्षों ने ये बात तो घूँट घूँट कर पिलाई है मुझे। वो दौर गया जब लोग एक ही कम्पनी के होकर रह जाते थे और अपनी सारी उम्र उसी में लगाते थे। आज की तारीख में ऐसे आदमी को मूर्ख कह कर पुकारा जाता है। यदि आकड़ों की मानें तो एक इंजीनियर औसतन हर ७ महीने में कम्पनी बदलता है। कारण जो भी रहें। क्या है इस बेरूखी का राज़? क्यों नहीं हो पाते लोग संतुष्ट अपनी नौकरी से? क्या पैसा सचमुच बड़ा हो गया है? या लोगों की इच्छायें भानुमति का पिटारा बनती जा रहीं हैं? लेकिन ये भी कहा जाता है कि कम्पनी नहीं छोड़ी जाती बल्कि मैनेजर छोड़ा जाता है। लोगों की अपने मैनेजर से नहीं बनती है? क्या रवैया होता है काम करवाने का? क्या माहौल होता है काम का? किस तरह की चिंताओं से गुजरना होता है? काम का बोझ? कारण बहुत हो सकते हैं पर लगता है शाहरूख खान ने इन्हीं आकड़ों से प्रेरित होकर "विश" का एड बनाया है। थोड़ा और 'विश' करो।

चलिये स्वार्थसागर से बाहर आते हैं। ये बात आईटी के लोगों को पता होगी शायद। चूँकि ज्यादातर काम विदेश से आता है। तो जिस तरह का काम आता है उन्हें वैसे ही बंदे चाहिये होते हैं। लेकिन यदि न हों तो? कोई चिंता नहीं। एक नकली रिज़्यूम बनाओ और भेज दो। नकली काम दिखाया जाता है। नकली अनुभव होता है। सब कुछ दिखावा। जब काम आयेगा तब की तब देखी जायेगी। मैं इस तरह का शिकार हो चुका हूँ। जो काम मैंने कभी किया नहीं था उसमें ८ महीने बताये गये!!! इसी झूठ पर टिकी होती है कम्पनी की आय!!

ये मेरा अनुभव था ४ सालों का। कहाँ कहाँ सिफारिश चलती है वो नहीं बताऊँगा। क्योंकि वो तो पुरानी रीत चली आई है। हमारी नस नस में समाई है और आगे भी रहेगी। आई टी की कमोबेश हर कम्पनी में यही हाल हैं। ये हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बातों पर आपत्ति करें परन्तु ये मेरी व्यक्तिगत राय थी। जो मैंने देखा मैंने सबके सामने रखा। अभी तो चार ही साल पूरे करें हैं आगे क्या क्या देखने को मिलेगा ये वक्त ही बतायेगा।

7 comments:

Rajesh Sharma said...

money is not every thing. but no place of emotions in IT sector for both employee as well as employer.

सजीव सारथी said...

chaliye bahut kuch anubhav kiya aapne 4 salon men

Amit said...

bhai ek jagah tune Emotions ka prayog kara hain...
chal koi nahi... par mujhe tere is lekh mein bhavnaao ki kami lagi.. aur kuch khaas naya bhin nahi laga ya yeh kahlo ki yeh to sab IT Engineers ki kahani hain...
phir bhin chalo tune kuch sanjo kar likha to sahi...

vikrant said...

tapna tumne quark ke purane dinon ki yaad dila thi...bahut acha likha hai dost....

Amit Kumar said...

Good effort. acha tha par you have potential to write even better.

sayd tum ess lekh se aapne 4 saal ke baadas nikale ho.

any way thanks, it was a treat to read your blog and may all my best wishes are with you so that you become one fo the top hindi writer in India.

tapesh said...

good one bhai.. but yaar thoda sa "out of topic" and "extra" laga...
muje laga tuu pure 4 salon ka anubhav likhega... but this was more a "employee employment in IT" hoker raha gaya....

chal koi nahi ... you will always get both type of comments... so ... dont bother :)

Sandeep said...

yaar...mtree ke baarein mein to kuchh likha hi nahi?!!