Sunday, November 16, 2008

तस्लीमा नसरीन फिर देश के बाहर

सच कड़वा होता है। और इसका स्वाद तस्लीमा नसरीन चख रही है और भुगत भी रही है। तस्लीमा फिर देश के बाहर हैं। अभी अगस्त में ही तो वापस आई थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ और मुस्लिम समाज की कुरीतियों को लिखना बहुत महँगा पड़ रहा है। सरकार कट्टरपंथियों की गुलाम है। यूँ तो इस सरकार से देश के आंतरिक हालात सम्भल नहीं रहे हैं। राज ठाकरे जो असलियत में करता है उस पर बैन नहीं, पर फिल्म पर जरूर बैन लगता है। तस्लीमा को छह महीने की किसी गुप्त शर्त पर भारत में रखा गया। और अब जाने को बोल दिया गया है। आंतरिक सुरक्षा और धर्म निरपेक्षता का हवाला दे कर। इस देश में कलम भी सुरक्षित नहीं। लेखकों को इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिये। एक लेखिका को सच बोलने की सज़ा पहले उसके अपने देश बांग्लादेश में दी गई और अब हमारे देश हिंदुस्तान में। एक तरफ हम कहते हैं कि मेहमान भगवान है दुसरी तरफ हम इस तरह से निकाल देते हैं। क्या सरकार चंद लोगों की गुलाम बन चुकी है? उन्हीं के हाथों की कठपुतली बन चुकी है। कांग्रेस सरकार महज अपना वोट बैंक कायम रखना चाहती है। हर धर्म में कुरीतियाँ होती हैं और उन्हें दूर करने के लिये समय समय पर लोग आते रहे हैं। दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना इसी उद्देश्य करी थी। गलत रीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने पर यदि इस तरह बेइज़्ज़ती उठानी पड़ती है तो हर कोई सच बोलने से डरेगा। जो बांग्लादेशी भाग कर सीमा लाँघ कर गैर कानूनी तरह से भारत में घुस आते हैं उनको खिलाफ ये सरकार कुछ नहीं करती। उनके वोटर कार्ड बनाये जाते हैं। क्योंकि वे लोग सरकार और पार्टी को वोट देंगे। लेकिन जो बांग्लादेशी सच्चा है उसको देश से निकाला जाता है फिर उसी वोट की खातिर। ये सरकार बिक चुकी है। इसे केवल अपने वोटों से मतलब है। तस्लीमा को देश में ही सुरक्षा क्यों नहीं दी जाती इस पर सरकार को जवाब देना चाहिये। आप भी माँगिये!!!

जय हिंद!!

7 comments:

Suresh Chiplunkar said...

तसलीमा नसरीन खतरा हैं, कोढ़ हैं, छूत की बीमारी हैं - कांग्रेस और वामपंथियों के लिये। इसी को कहते हैं सेकुलरिज़्म और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की ढोंगी दुहाई देना… एक के लिये नियम अलग दूसरे के लिये दूसरा, यही कांग्रेस ने देश को आज तक दिया है…

Ratan Singh Shekhawat said...

आख़िर देख लिजिए धर्मनिरपेक्षता एक लोकतान्त्रिक देश की सरकार की | और सबसे बड़े धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार वाम पंथियों की हकीकत भी देख लिजिए |

Suresh Chandra Gupta said...

कांग्रेस का मुख्य उद्देश्य सत्ता में रहना है. इस के लिए वह कुछ भी कर सकती है. आख़िर देश का विभाजन भी उस ने सत्ता के लिए ही किया था.

sumit said...

मैने भी समाचार पत्र मे तस्लीमा नसरीन के बारे मे पढा था
बहुत दुख हुआ ये जानकर उसे भारत छोडना पडा

शायद इसी को धर्मनिरपेक्षता कहते है

tapesh said...

oye dont mind yaar... hum log कट्टरपंथियों ko galiyan dete rahte hain... Vote bank ka rona rote hain....

Vote bank to hamare paas bhi hai (Hum log jo 'Discussion' kerte hain).... feer sarkaar humse kyoun nahi darti ???

Clearly, some problem is with us....and we should resove that first.....Why we could not rule on Vote bank? We are more in numbers and Vote policies work on Numbers ......

tanu said...

in baaton ka yahi upaay hai k hum me se har ek vyakti apna vote daale taki hum padelikhe varg ka bhi vote bank ban sake...
electon vaale din sirf chutti na banae..plzz apna vote jarur deke aae....tabhi hum hamare lie sarkaar se kuch maang sakte hain...

flowlinefire said...

राजनीती और कूटनीति यदि हम और आप समझ ले ....फिर चाणक्य कहाँ जाएंगे..!!
फिल्म पर बैन लगाना ज़रूरी था..शरद पवार..और बाला साहेब ठाकरे का तोड़ भी चाहीये..!!
जहाँ तक तसलीमा का सवाल...जो अपनी मुल्क का नही हो सका..वो मेरे भारत का क्या भला करेगा.
तसलीमा भी तो बांगला देशी है..ऊसकी वकालत क्यों...