Saturday, October 2, 2010

दो अक्तूबर: मैं ज़िन्दगी भी बड़ी दोग़ली गुज़ारता हूँ

दो अक्तूबर। दो ऐसे लोगों का जन्मदिन जिन्होंने इस देश के भविष्य को बदला और आज का भारत इन दोनों के योगदान से बना और खड़ा है। मोहनदास करमचंद गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री। हालाँकि सारा संसार गाँधी जयन्ती मनाता है पर शास्त्री जी का कम योगदान नहीं रहा है। विडम्बना है कि सत्य का नारा देने वाले गाँधी के देश में सत्य बोलने वालों की कमी हो गई है। न लोग सच्चे रहे हैं, न मीडिया सच कहता है और न ही लोग सच सुनने की हिम्मत रखते हैं। ये और बात है कि महात्मा गाँधी नई पीढ़ी के लिये विवादों में घिरे रहने वाले व्यक्ति हैं।

दूसरी ओर लाल बहादुर शास्त्री हैं। चूँकि वे "गाँधी" अथवा "नेहरू" नहीं थे इसलिये कांग्रेस पार्टी ने उन्होंने कभी भी तरजीह नहीं दी। आज उनका जन्मदिन है ये भी कम लोगों का पता होता है। जय जवान, जय किसान का नारा देने वाला ये इंसान इस धरती से गया तो उसने सोचा भी नहीं था कि इस देश में न अब जवान की कद्र होगी न ही किसान को इंसान समझा जायेगा। जवान और किसान दोनों ही भूखे मरेंगे या मार दिये जायेंगे।

आखिर लोग जन्मदिन क्यों मनाते हैं? कईं वर्षों से यही सवाल मेरे मन में घूम रहा है। उन्हें बहुत खुशी होती है सेलिब्रेट करने में। इस दिन बधाइयों का ताँता लग जाता है। बधाई देने वाला सही में खुश होता है या नहीं पता नहीं पर इस दिन औपचारिकतायें जरूर निभाई जाती हैं। चाहें फ़ोन हो, एस.एम.एस हो, ईमेल अथवा ओर्कुट। औपचारिकतायें निभाने के लिये तो नेता भी जाने जाते हैं जब दो अक्टूबर के दिन ही राजघाट जाना याद रहता है। हर तरफ़ महज औपचारिकातायें ही हैं। औपचारिकतायें निभाना एक मजबूरी बन जाती है क्योंकि यही इस समाज का हिस्सा है।

मेरे लिये ये दिन पूरे साल का सबसे निराशावादी दिन होता है। पूरे साल आशा और निराशा के मध्य में जूझते हुए जब ये दिन आता है तो मन निराशा से भर जाता है। निराशा अपने चरम पर होती है। ज़िन्दगी का उद्देश्य कमज़ोर पड़ता दिखाई देता है। आशावादी होने के सारे दावे फ़ीके पड़ जाते हैं। एक तरफ़ तो मन सोचता है कि कर्म ही प्रबल है, कर्म ही महान है। मनुष्य अपना भाग्य खुद बनाता है तो फिर मुश्किल आने पर वही मन मन्दिर की ओर क्यों भागता है। क्या आस्तिकता एक कमजोरी है? ये दोहरा रूप क्यों?

भारत और इंडिया में बढ़ता अंतर निराशावाद को जन्म देता है। मेरे दोस्त नई इमारतों के खड़े होने को डेवलेप्मेंट यानि विकास का नाम देते हैं तो मुझे हँसी आती है। यदि विकास से खुशी आती तो अमरीका सबसे खुशहाल देश होता। क्या हजार वर्ष पहले हम खुश नहीं थे? क्या किसान की जमीन के अच्छे मोल देकर उसको खुश किया जा सकता है? जिस देश में खाने को दाना न हो उस देश में मोबाइल मुफ़्त बाँटे जाते हैं, खेलों पर अरबों लुटाये जाते हैं।

जब मैं कहता हूँ कि राम मंदिर अयोध्या में बने तो मुझे खुशी होगी। क्या ये कहने से मैं सेक्युलर नहीं रहता? एक मन कहता है कि हर इंसान का भगवान एक है तो फिर मन राम की ओर क्यों भागता है? क्या सेक्युलर होना एक ढोंग के बराबर है? क्या महात्मा गाँधी मरते हुए जब मुख से "हे राम" निकालते हैं तो वे एक हिन्दू और कम्युनल हो जाते हैं? क्या मदर टेरेसा जब यीशु की पूजा करती हैं तो वे एक ईसाई व एक कम्युनल हो जाती हैं? तो फिर राम का नाम लेना अपराध क्यों? जिस जमीन पर उन्होंने जन्म लिया उस जगह पर विवाद क्यों? आज का इंसान चेहरे पर मुखौटे लगाये फ़िरता है।

कितना घूमा..
पर मुखौटे ही देखने को मिले
चेहरे कहीं खो गये हैं क्या?
आज आइना भी
मुझसे यही कह रहा है!!

उस रूप में अच्छा दिखने की कोशिश करता है। सबसे प्यार मोहब्बत की बातें करता है। कभी कभी प्रयास करता हूँ कि मन निश्छल हो, किसी के प्रति द्वेष, ईर्ष्या न हो। पर यदि ऐसा हो जाये तो इंसान भगवान बन जाये। क्या हर व्यक्ति स्वयं को धोखा देता है? मिलावट के इस युग में लोगों में मिलावट आ गई है शायद।

मिलावट का दौर
जारी है
आज तो मैं भी
इससे अछूता नहीं रहा...

अपने जीवन काल में हम कितने ही व्यक्तियों से मिलते हैं, कुछ अच्छे दोस्त बन जाते हैं तो किसी से दिल नहीं मिलते। ये नहीं कह सकता कि वे अच्छे थे या बुरे पर अपने साथ मेल नहीं बैठा। जैन धर्म में एक दिन "क्षमा दिवस" के रूप में मनाते हैं। सोच रहा हूँ कि साल का यह दिन मैं भी क्षमा दिवस मनाऊँ।

हाल ही में मुन्नवर राणा के चंद शे’र पढ़े थे। उन्ही की कलम का एक शे’र है:
"कहीं पे बैठ के हँसना कहीं पे रो देना, मैं ज़िन्दगी भी बड़ी दोग़ली गुज़ारता हूँ "

नोट: मन कहता गया और उंगलियाँ चलती गईं। भूल-चूक माफ़।

4 comments:

संजय भास्कर said...

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

संजय भास्कर said...

गाँधी-जयंती पर सुन्दर प्रस्तुति....गाँधी बाबा की जय हो.

pooja said...

"मेरे लिये ये दिन पूरे साल का सबसे निराशावादी दिन होता है। पूरे साल आशा और निराशा के मध्य में जूझते हुए जब ये दिन आता है तो मन निराशा से भर जाता है."

तपन जी,
इतना निराश ना हों. उम्मीदों पर दुनिया कायम है. जन्म दिन मनाना सामाजिकता की निशानी है जो समयांतर में एक आवश्यकता और साथ ही साथ दिखावे की प्रथा भी हो गई है, किन्तु जीवन को इस से कोई फर्क नहीं पढता... वो अपनी गति से कर्म करते चलता है. मंदिर की तरफ भागना भी एक तरह से कर्म ही है... छोटा सा ही सही :).

वैसे ईश्वर को हमेशा याद करते रहने से अंत समय में "हे राम" कहना आसान हो जाता है और मुझे नहीं लगता की इस से कोई कम्युनल हो जाता है. अपनी अपनी श्रद्धा है.

neelam said...

दिल और दिमाग से, आदमी दोगला होता कई बार ,दिल की सुने या फिर दिमाग की ,यकीनन दिमाग ही हावी हो जाता है और वहीँ पर सारी सृष्टि अचंभित होने की बजाय ढर्रे पर चलने वाली मशीन लगने लगती है
आस्तिकता ,कम्युनल होना , आशा वादी होनाया निराशा वादी होना ये सब सापेक्ष शब्द हैं सबकी अलग अलग कसौटियां होती है ,सही और गलत को नापने की .
अपना तो बस यही मानना है कि चलते चलो बस चलते चलो, जिन्दगी को ,हर लम्हे को जीते चलो ,पर २ अक्टूबर को क्षमा दिवस हरगिज नहीं बनाना ,एक और अच्छा इंसान जो पैदा हुआ है उस दिन शास्त्री जी और बापू जी के अलावा भी ....................
.वो आज के दिन क्षमा याचना करे ये इस दोस्त(दीदी )को हरगिज नहीं मंजूर होगा

मन कहता गया और उंगलियाँ चलती गईं। भूल-चूक माफ़