Sunday, March 2, 2008

वो सवा घंटा

आज सोचा था कि कुछ मालामाल क्रिकेट पर लिखा जाये, शायद पैसा हम पर भी मेहरबान हो जाये। पर अपनी ऐसी किस्मत कहाँ? आज नोएडा और दिल्ली के बीच जब सफर किया तो पता नहीं क्यों इसी पर लिखने का मन कर रहा है। हालाँकि काफी बार मैं इस रूट पर सफर कर चुका हूँ। पिछले २.५ साल से कर रहा हूँ पर बस से सफर का जो आनन्द है वो कैब में कहाँ? :-) मुझे पूरी उम्मीद है कि इसे पढ़ने के बाद जो दिल्ली वाले पाठक हैं उन्हे खुद पर बीते हुए कुछ वाकये याद आ जायेंगे। और जो दिल्ली के बाहर हैं उन्हें घर बैठे दिल्ली के सफर का मजा मिलेगा।

चलिये शुरू करते हैं कश्मीरी गेट से नोएडा का सफर व्हाइट लाइन बस में। ये वो बस होती है जिसका किराया एक ही होता है। इसमें कोई स्लैब्स नहीं होते। फिक्स्ड रेट १० रू। मैट्रो स्टेशन से बाहर आते ही मुझे ये बस खड़ी मिली और मैं उसमें चढ़ गया। नज़रें घुमाईं और मुझे एक सीट मिल गई। खिड़की की सीट थी तो मैं खुश था। सोने को भी मिल जायेगा और भीड़ से भी बचा जा सकेगा। फिर धूप की किसे फिक्र हो।

मैं बैठा और थोड़ी ही देर में मैंने अपने बैग से एक उपन्यास निकाल लिया। आदत से मजबूर हूँ, लम्बा सफर हो तो एक ही सहारा होता है। आसपास वाले हैरान हुए कि ये हिन्दी में क्या पढ़ रहा है? खैर बहुत जल्द लालकिले पर पहुँच गये। बस में लगातार लोग चढ़ रहे थे। कंडक्टर के लिये तो जगह खत्म होने को ही नहीं आ रही थी। देखते ही देखते दरियागंज आ गया और बस खचाखच भर गई। अगर बस की सीटिंग ४० लोगों की हो तो दिल्ली की बसों में खड़े होकर ८० लोग आ जाते होंगे्। कुल मिलाकर १०० से कम तो नहीं हो सकते। शतक तो ठोका ही जायेगा।
ओ भाई, कितनी बोरियाँ हैं तेरे पास? कंडक्टर ने एक आदमी से जब पूछा तो उसने डरते हुए जवाब दिया, "तीन"।
"तीन बोरियों के हिसाब से ३० रूपये निकाल ले फटाफट"
"२० ही तो लगेंगे"
उस आदमी के जवाब पर कंडक्टर भाई साहब बिफर गये और ये हाथ हवा में लहराया।
"देने हों तो दे, वरना सामान लेकर यहीं उतर जा, पीछे बड़ी सवारियाँ आ रहीं हैं"
आदमी सहम गया। क्या करता, ३० रू निकाल कर उसके हाथ में थमा दिये। दिल्ली सरकार के हिसाब से १०वीं पास ही कंडक्टर बन सकता है|पर इस तरह से किसी से बातें करना तो गँवारों की तरह लगता है।

"रे ताऊ, तैने समझ न आई के, भीतर ने हो ले बाकी सवारी भी आयेंगी अभी"। एक और दसवीं पास की आवाज़ (?)। दरअसल हर बस में एक सहायक भी होता है। जो आगे की सीट पर बैठा हुआ, टूटी हुई खिड़की से बाहर झाँकता है और अपने हाथों से बस के बाहर का हिस्सा पीटता रहता है। वो बताता है कि ड्राइवर को बस कितनी तेज़ चलानी है, और कहाँ रूकना है। कोई भी स्टॉप आयेगा तो आगे आने वाले १० जगहों के बारे में होटल के बैरे के मीनू बताने से भी तेज़ बोलता रहेगा। अब हुआ यूँ था कि किसी बुजुर्ग का बैग अड़ रहा था और वे बस में अंदर घुस नहीं पा रहे थे। घुसते भी कैसे, जहाँ खड़े होने के लिये २ लाइनें होनी चाहियें, वहाँ तीन और कहीं कहीं पर चार लाइनें थीं। अब आप अपना दिमाग चलाइये और हिसाब लगाइये कि २ की जगह ४ लाइनें हों तो निकलने की कितनी जगह मिलेगी।
पर दिल्ली की बसों में यही जुगाड़ तो चलता है।

ये तो शुक्र था कि आज उसी रूट पर चलने वाली कोई और बस उसी समय नहीं चल रही थी, वरना तो फर्मूला वन होते देर नहीं लगनी थी। वैसे भी ग्रेटर नोएडा में ही ट्रैक बनाने की योजना है। बस की आधी खिड़कियाँ टूटी हुईं थीं। गनीमत है कि सर्दियों के खत्म होने पर मैं उस बस से सफर कर रहा था, वरना कुल्फी जमते देर नहीं लगनी थी। मुझसे २ सीट आगे की खिड़की ऐसी थी मानो किसी ने उलटी कर रखी हो। हो भी सकता है। कुम्भ के मेले में तबीयत तो खरीब हो ही सकती है। खड़े हुए लोगों को देख कर मुझे अपनी किस्मत अच्छी लगने लगी थी।

उपन्यास के १५ पन्ने पढ़ने के बाद मुझे नींद आने लगी थी और मैं सो गया। जब नींद टूटी तो पता चला कि अगला स्टॉप मेरा ही था।

बैग में फटाफट किताब डाली। और मोबाइल फोन भी। पर्स चैक किया, वो पहले से ही बैग में था। आप सोच रहे होंगे कि किताब तो समझ आती है, पर फोन और पर्स क्यों डाला बैग में। २ बार पर्स और १ बार फोन जेब कतरों के हवाले कर चुका हूँ मैं। इसलिये बचाव के लिये ऐसा कदम मैं हमेशा उठाता हूँ। कोशिश रहती है कि पर्स बैग में ही रहे, और ज़रूरत के हिसाब से खुले पैसे जेब में।

पर अब मेरे सामने १० कदम का पहाड़ जैसा रास्ता था जो मुझे अगले एक मिनट में पूरा करना था।
ओह! जैसे ही पैर सीट के बाहर रखा बगल में खड़े एक आदमी ने मुझे घूरा। मेरा पैर उसके पैर पर जो पड़ गया था।
आगे एक सज्जन ने अपना एक बैग भी बस के फर्श पर रखा हुआ था। जहाँ पैर रखने की जगह नहीं वहाँ बैग!!
"अरे हटो भाई, आगे जाने दो" मैं ये शब्द दोहराता हुआ, भीड़ को चीरता हुआ, चला जा रहा था। सुबह जो खाकर निकला था, वो सारा अब हजम हो रहा था। मैं सोच रहा था कि पेट को पाचन क्रिया करने की ज़रूरत ही क्या है? बस में चढ़ो और भीड़ के धक्कों में झूलो। कुछ ऐसा ही उस वक्त मुझे महसूस हो रहा था।५ कदम चल चुका था और आगे का रस्ता संकीर्ण होता जा रहा था। पहाड़ो पर बर्फ गिरती है तो ज़मीन पर पैर नहीं पड़ते। ठीक वैसा ही मेरे साथ हो रहा था। ५-६ कदम चलने के बाद भी पैर फर्श तक नहीं पहुँच पा रहे थे। ३ कतारों को काट के आगे बढ़ रहा था तो मुझे लगने लगा कि बस में सफर करने वाले हर आदमी को बहादुरी पुरस्कार मिलना ही चाहिये। बैग को कंधे से मैं कब का उतार चुका था और वो मेरे दाहिने हाथ में ऊपर लटक रहा था। उसी दाहिने हाथ से मैंने छत पर लगा हुआ डंडा पकड़ा हुआ था। मेरे हाथ पैर अब तेज़ी से आगे की तरफ बढ़ रहे थे और मुझे अपनी मंज़िल नज़र आने लगी थी। वाह, आगे गेट है। पर दरवाज़े की ३ सीढियों पर ४ लोग पहले से ही खडे़ थे और कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी वहाँ नहीं उतरना था। शुक्र है कि बस खडी थी वरना कईं बार तो लोगों को बस से गिरते हुए भी देखा है, जब चालक जानबूझ कर जल्दबाजी के चक्कर में बस रोकता ही नहीं है।

पर आखिरकार, मेहनत रंग लाई और मैं झूले खाता हुआ उतरा व खुली हवा में फिर से साँस लेने लगा।

ये वो सफर है जिसका चश्मदीद दिल्ली में रहने वाला हर वो शख्स है जो इन बसों में सफर करता है। दिल्ली सरकार इन बस मालिकों का कुछ क्यों नहीं करती जो लोगों की जान जोखिम में डाल कर ज़रुरत से ज्यादा लोग भर लेते हैं। सरकार उन सहायकों व चालकों का कुछ क्यों नहीं करती जो यात्रियों से बुरी तरह पेश आते हैं। लगता ही नहीं कि ये दिल्ली के स्कूलों से पास हुए १०वीं व १२वीं के छात्र हैं। सवाल बहुत हैं पर जवाब किसी अफसर के पास नहीं है। क्योंकि यही बस मालिक इनका पेट भरते हैं। चलिये मेरा ये सफर यहीं समाप्त होता है। अरे हाँ, एक बात बतानी तो मैं भूल ही गया। वापसी में ऐसी ही एक बस में मैं ३० मिनट खड़े होकर गया। सोच रहें हैं कि मेरा क्या हुआ होगा। शायद इसीलिये मैंने आप सब के साथ अपना दुःख बाँटने के लिये ये लिखा है।

5 comments:

tapesh maheshwari said...

Story was really great.. a touch of truth and facts. i want to do one more request to you... while again traveling in the bus, please also noitice the problem faced by driver and conducters due to public. as you write, it seems that only bus conductor are responsible for all these condition. I have seen once on mathura -aligarh road that if bus conductor denied to take more passenger because of capacity problems then people used to throw stones on bus because they said, "they can go standing in the bus, it is urgent and they does not need any seat". In those situation when everyone is in hurry and bus are no so reguler, i dont think bus conductor has any other options.

i am requesting you that please also notice and worte something about the problems faced by Bus-conductors and drivers and Why there mentality becomes like that.

in last, i will appriciate ur thinking. story is very good and is drawing the real situation when you were travelling.

best of luck for ur future stories. Keep writting. BBye..

tapesh maheshwari.

PS: sorry as i could not write everything in Hindi and hope u will not mind :)

sumit said...

तपन भैया,
मैने भी ऐसे सफर का अनुभव कर रखा है
जब college bus से जाता था, पर मुझे first stand पे चढना और last stand पे उतरना होता था

GAURAV said...
This comment has been removed by the author.
GAURAV said...

Hi Tapan,
This is what most of the Indian have faced in their life at lest once ( countless time by me ). Discuss it with friend family & other but never though of putting in into words. Nice way to share your experience. First of all who is responsible for this ?
Bus-owner, Conductor, driver, We the people or Gov. I think we all. But there should be some step from government to increase the frequency of busses. People should buy proper tkt & follow the rule. And last but most important driver should treat bus as bus not as fighter plain. I more thing which I was expecting till last in your article but couldn’t found about the seat reservation. Like seat reserve for freedom fighter is reserved by Gunda & Seat reserve for MP never saw any MP :)

vikrant said...

Really good one...even i faced the same when i travelled 2-3 times from ggn to delhi...mein to sare raste conductor se yehi poochta rehta hoon ki mera wala stop aaya ke nahin...kabi woh kehta hai abi bahut time lagega to chup karke phir ek kone mein kahada ho jata tha...nahin to aahista aahista dhake kha kha kar peeche pahunch jata tha aur phir kisi na kisi se poochta rehta bhaiya dolakauan kitni door hai...par yaar in buses mein travel karne ke liye himat aur patience chaihye jo hamare mein khatam ho gayi hui hai as we r not used it...may be i am not bcoz shuru se kabi nahin kiya...delhi walon ko to aadat par gayi hoti hai...lets c kab muje bi aadat dalni par jaye:)