Friday, March 7, 2008

अनेकता में Unएकता

भारत एक ऐसा देश है जिसमें २९ राज्य हैं। हर राज्य व केंद्र शासित प्रदेश की अपनी अलग ही खूबी है, अलग पहचान है। ये पहचान बनती है वहाँ के खानपान से, रहन सहन से, भाषा से, कपड़ों से व और भी कईं कारणों से। सन् १९४७ में जब हिन्दुस्तान का विभाजन हुआ व पाकिस्तान बना तब कहते हैं कि राजनेताओं ने अलग अलग राज्यों के राजा महाराजा व वहाँ के स्थानीय नेताओं से मिलकर एक ही देश में शामिल होने के लिये मनाया था। और इस तरह अलग अलग प्रदेश एक देश बने थे और हर जगह गूँजने लगा था एक ही नारा। अनेकता में एकता।

भारत में न जाने कितने ही तरह के लोग रहते हैं। करीबन २० भाषायें हैं और बोलियाँ कितनी हैं इसके बारे में मुझे नहीं पता। सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा हिन्दी है। भारत मुख्यतया ४-५ हिस्सों बाँटा जा सकता है।
एक सबसे ऊपर उत्तर में कश्मीर। जिसका ४७ से अब तक कोई हिसाब किताब नहीं है। पाकिस्तान उसे अपना कहता है, हिन्दुस्तान अपना कहता है और वहाँ रहने वाले लोग न पाकिस्तान में जाना चाहते है और न ही भारत में। अजीब विडम्बना है। ऐसे राज्य को अपना कहें भी तो कैसे जब वहाँ के लोग ही विरूद्ध हैं। क्या यही राजनीति है? मुझे जवाब नहीं पता।

दूसरे आते हैं हिन्दी भाषी राज्य जिसमें हिमाचल, पंजाब (इस पर सवाल उठाना चाहें तो उठा सकते हैं पर मैं पंजाबी को हिन्दी के बहुत नज़दीक मानता हूँ), दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार/झारखण्ड, मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ व कुछ हद तक गुजरात शामिल हैं। ये वो राज्य हैं जहाँ की खबरें हम लोग ज्यादातर सुनते हैं। हिन्दी या उससे मिलती जुलती भाषायें अथवा बोलियाँ यहाँ बोली जाती हैं। यहाँ आपस में मतभेद अलग ही कारणों से है। यहाँ सदियों पहले बनाई गई जाति प्रथा हावी है। कुछ जातियाँ पिछड़ी हुई मानी जाती हैं पर उनका विकास उन राजनेताओं के भरोसे है जो उनका इस्तेमाल राजनैतिक रोटियाँ सेंकने में करते हैं। आरक्षण उसकी जीती जागती मिसाल है। प्राथमिक शिक्षा न दे कर उच्च शिक्षा में आरक्षण देना उन बच्चों के लिये बैसाखी थमाने लायक है, जिसके वे आदी हो चुके हैं। कहने को सबका धर्म एक ही है पर कोई मीणा है, कोई जाट है, कोई गुर्जर है, कोई राजपूत है। इसी के चलते कभी "आजा नच ले" पर विवाद होता है तो कभी "जोधा अकबर" का। समझ में ये नहीं आता कि जब ये फिल्में बन रहीं होती हैं तब विवाद नहीं होता अपितु बनने के बाद होता है। क्या ये भी राजनीतिक चालें तो नहीं?

आइये आगे चलते हैं महाराष्ट्र की तरफ जहाँ मराठी लोग रहते हैं। यहाँ के बारे में आज के बारे में क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है। पर एक बात मैं ठाकरे परिवार से कहना चाहूँगा कि जितने भी मराठी विदेशों में जा कर बसे हुए हैं उन सब को वापस बुला लें क्योंकि वे लोग भी विदेशी लोगों के लिये "बिहारी" ही हैं। जैसे बिहार के लोग विभिन्न राज्यों में जा कर मेहनत करते हैं व अपना पेट पालते हैं, ठीक वैसे ही हम भी पैसा कमाने के लिये विदेश का रूख करते हैं। आगे से आपके परिवार के लिये गुजारिश है कि पासपोर्ट व वीसा आपके पास होना चाहिये यदि आप महाराष्ट्र से बाहर जाते हैं तो। अभी हाल ही में मैं चेन्नई गया था, तो वहाँ चाट वाला मिला जो बिहार से ही था। उसने कहा कि ऐसा क्यों है कि सबसे ज्यादा साक्षर राज्य यानि केरल से ज्यादा आई.ए.एस अधिकारी बिहार जैसे पिछड़े राज्य से बनते हैं। जवाब आसान है- क्योंकि वहाँ के लोग मेहनती हैं।

अब रूख करते हैं द्रविड़ प्रदेशों का। यहाँ भी हालात कुछ ज्यादा अच्छे नहीं हैं। यहाँ पर स्थानीय नेताओं व पार्टियों का दबदबा ज्यादा है। मीडिया में भी कम कवरेज मिलता है। क्या आपको पता चला कि रामेश्वरम में १६ गायों की असामयिक मृत्यु हो गई। पता कैसे चलेगा जब मीडिया वहाव ध्यान ही नहीं देता। मैंने ये बात अपने पिछले लेखों में भी बताई है। और वहाँ के कुछ लोगों में भी हिन्दी भाषियों के लिये बैर ही है।

यदि बंगाल व पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ जायें तो हालात बद से बदतर होते जायेंगे। उस तरफ कोई राजनेता ध्यान नहीं देता है। आतंकवाद वहाँ है, भूख वहाँ है, अशिक्षा वहाँ है, बेरोजगारी, रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या वहाँ है। इन सबके बावजूद टीवी पर उन राज्यों की खबर तभी आती है जब वहाँ कोई हादसा हो जाता है। बहुत शर्म की बात है। और मुझे लगता है कि यही हाल रहा तो वहाँ को लोग कब अलग देश की माँग करें पता नहीं।

इतने सारे राज्यों में घूमें ये तो पता चल गया कि भारत में अनेकता है। पर अगर आज को देखूँ तो मैं बहुत निराशावादी हो जाता हूँ और मुझे नहीं लगता कि इस समय कोई एकता बची है। लोगों के मन में द्वेष का भाव भरा हुआ है और हर कोई केवल अपने राज्य की सोच रहा है, पूरे देश की नहीं।

ये तो अभी हम लोगों ने लेख में धर्म या मजहब नाम के राक्षसों को तो छुआ ही नहीं है। धर्म पर मैं अपने विचार पहले ही यहाँ (http://tapansharma.blogspot.com/2007/01/blog-post_4643.html) जाहिर कर चुका हूँ।
मुझे डर है कि कहीं एक पुराने गाने की तर्ज पर कुछ ही सालों में हमें एक नया गाना सुनने को न मिल जाये-
इस भारत के टुकड़े हजार हुए,
मेरे भारत के टुकड़े हजार हुए,
कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा,
कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा।
क्या मैं गलत हूँ जो अगर मैं कहूँ कि आज के दौर में अनेकता में Unएकता छुपी हुई है?

3 comments:

tapesh maheshwari said...

Sahi kaha yaar… hum log buss naam ke leye EK hain …. In reality, we all think, behave and even act in different ways.

As you said that more than 50% in india used to speak hindi… I am not really aware about the % but for sure, more than 50% can understand Hindi and If want, communicate too.

I have not seen all the corners of india, but still feel that every state has some good as well as bad things. Politics may be one of the reason for all bed we have but not the only one. Perhaps, individuals are also responsible.

As an contrast of your blog, I want to stay that I have seen so many peoples who are writing about PROBLEMS but no one (or very few) who wrote the suggestions on “What we can do in this situation?” OR “How can we improve the conditions?”

skjain said...

hi tapesh,
I will give you example of s/w eng, where all the people working with each other with out any discrimination. We are maintaining this because we all are educated. only way to improve to give feeling of anekta me ekta is enhanced literacy of country. it will help people to understand the cast, state politics... and if people of state does not support this than ........
you can understand what i want to say

Sandeep said...

मुझे कोई शक नही की अगर हम लोग 'स्वतंत्रता' के समय अलग अलग ही रहे होते तो आज काफ़ी आगे होते| हाँ शायद दुनिया में इतना दबदबा नही होता पर, ऐसे रौब का क्या फायदा| जहाँ तक भाषा का सवाल है, अपने अपने राज्य (देश) में अपनी भाषाएँ बोलते और आपस में अंग्रेज़ी में (जैसे की पूरी दुनिया में होता है)|