Friday, April 11, 2008

मिस्टर लाल का परिवार

मि.लाल के परिवार को जानिये मेरी नज़र से। आपकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा।

लो चले हैं मिस्टर लाल संग अपने परिवार के
श्रीमती जी और बच्चों को तोहफे दिलवाने त्योहार के।

आज बच्चे खुश हैं, पापा मोबाइल दिलवाने जा रहे हैं,
बीवी और बच्चों के चेहरे पर स्माइल लाने जा रहे हैं।

बड़े दिनों से जिद थी घर में, मॉल से लायेंगे मोबाइल,
चाहें घर में पानी न हो, या फिर न हो रिफाइंड ऑइल।

कोई इनके दिल से पूछे कितने का फोन खरीद पायेंगे,
दस तारीख भी तो सर पे है, होम लोन कैसे चुका पायेंगे।

दिल्ली के एक इलाके में अभी अभी एक घर लिया है ,
आधी पगार है उसमें जाती, ओवरटाइम भी खूब किया है।

लाल जी हैं परेशान, सरदी में आ रहा है पसीना,
गाड़ी की भी तो फरमाइश बाकी है, आने दो अगला महीना

आबादी की तरह बढ़े जा रहा है क्रेडिट कार्ड का बिल ,
परिवार के खर्चे से तेजी से धड़क रहा है लाल जी का दिल।

अभी हाल ही में तो डूबे थे शेयरों में पचास हजार,
साठ हजार पगार महीने की, फिर भी लगते हैं लाचार।

न ज़मीन अपनी है, न घर अपना है, न ही अपनी है गाड़ी,
सस्ते लोन और लालच ने लाल जी की बचत बिगाड़ी।

किसी भुलावे में जी रहा है, मध्यम वर्ग का हर परिवार
मार्केट, मनी, मॉल, मोबाइल से हर कोई है कितना बीमार।

7 comments:

Sandeep said...

बहुत बढ़िया भाई मेरे| ये तो हम लोगो की ही कहानी लगती है|

Anonymous said...

shaayad isse ko jeevan chakkr kehte hai. mann mai icchayen hongi to vaykti unhe poora kerne k liye adhik parishram kerega..perantu icchayen aajeevan parishram se dugni teeze se badhti rehegi....iss jeevan chakkr mai rehte hue bhi yadi aap sukoon ki zindagi jeena chahte hai to yeh aavashyak hai ki aap apne parivaar ko parishram kerke prapt ki gayee jeevan ki chote chote khushiyon ki keemat ka ahsaas dilaayen.

bina parishram kiye prapt ki gayee badi se badi kaamyaabi bhi aapko us khushi ka ahsaas nahi dila payeege ko khushi aap ko kada parishram kerke prapt hui choti see jeet degi.

issliye aane waali peedhe ko parishrami banayee...taaki woh jeevan ki sabhi khushiyaan apne boote per haasil ker sake.

GAURAV said...

कविता मैं एक आने वाली समस्या को काफी सही ढंग से पेश किया गया है पर मुझे लगता है काफी अतिश्युक्ति है इसमे. लोग काफी समझदार है उन्हें चादर देख कर पैर फैलाना आता है

Tapesh Maheshwari said...

Good poem yaar....
Something, which seems to be real... but still one sided comment on Medium families... (In my opinion only).

Majority of medium families are balanced and know their limits... e.g., while purchasing car they think for lower or lower-middle category, for purchasing a home they think to save their Tax and rent.

Overall, I like the poem.... one can end up comparing his/her own life while reading the poem....
Realllly good.

Pallavi said...

हमारे माता पिता छः हज़ार में चलाते थे घर बार , हमारी पगार साठ हजार फिर भी हम लाचार।

अति उत्तम तपन :)

प्रभात शारदा said...

Mast hai bhai...

Bahut hi halki fulki ... achi vyangatmak kavita

:) keep it up ...cheers

Anonymous said...

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