Friday, April 18, 2008

सहनशीलता या कायरता?

ऊपर शीर्षक में दो शब्द दिये हुए हैं। सहनशीलता व कायरता। मैं समझता हूँ कि इन दो शब्दों में बहुत बारीक सी एक लकीर है जो इन दोनों को आपस में विलग करती है। आप सोच रहे होंगे कि अचानक इनकी क्या ज़रूरत आ पड़ी है। दरअसल अभी हाल ही में जो चीन व तिब्बत को लेकर भारत में माहौल चल रहा है, उस से व्यथित होकर मुझे ये लिखना पड़ रहा है।

हम सभी जानते हैं तिब्बत पर चीन का कब्जा है। तिब्बत दुनिया का सबसे ऊँचा इलाका है इसलिये ये "दुनिया की छत" के नाम से जाना जाता है। इस देश का इतिहास सातवीं शताब्दी से शुरू होता है। सन् १९११ में ये चीन से पूरी तरह से अलग हो गया। परन्तु १९४९-५० में चीन के ४०,००० सैनिकों ने तिब्बत पर हमला बोल दिया। तिब्बत के ५००० सैनिक इतनी विशाल सेना का सामना न कर सके और जंग हार गये। तब से चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया हुआ है।

इस विषय में यदि आपने जानना है कि किस प्रकार से जुल्म हो रहे हैं तो आप यहाँ पढ़ें।
मैं इस विषय में ज्यादा नहीं जाऊँगा बस मैं इतना जानता हूँ कि ये गलत हो रहा है। अत्याचार हो रहा है। लेकिन मैं दुखी हूँ कि भारत की सरकार चुप क्यों है? गाँधी, नेहरू की चमची ये सरकार उनके द्वारा किये गये कामों को क्यों नहीं दोहराती? उन्होंने भारत को आजाद करवाया तो ये बहरी और निकम्मी सरकार गूँगी बनकर क्यों बैठी है? चीन के खिलाफ बोलते वक्त ये मिमियाती क्यों है? क्या चीन सही कर रहा है? अगर हाँ, तो भारत ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन क्यों किया था? और अगर गलत कर रहा है, तो भारत तिब्बत की मदद क्यों नहीं कर रहा? भाजपा ने तिब्बतियों के समर्थन में रैली निकाली पर क्या वो सरकार में होती तो चीन को दो टूक जवाब दे पाती?

चीन एक ओर कशमीर पर अपना हक जमाये बैठा है तो दूसरी तरफ पूर्वांचल राज्यों में भी घुसपैठ जारी है। सिक्किम और अरूणाचल के कुछ हिस्सों को तो वो बड़े गर्व से अपना कहता है। चीनी राजदूत भारत में कहता है कि अरूणाचल चीन का है और भारत की सरकार चुप रहती है। भारतीय प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर जाते हैं और सीमा रेखा की बात करे बिना ही वापस आ जाते हैं। चीन चाहें जो मर्जी करे भारत कभी भी उसके खिलाफ नहीं बोलता है। किस बात का डर है? एक बार युद्ध में हार गये, क्या इसलिये खौफ खाये बैठे हैं? चीन को मालूम है कि यदि तिब्बत आजाद हो गया तो चीन भारत पर हमला नहीं कर पायेगा। तिब्बत चीन के लिये कवच के समान है।

भारत के पास किस बात की कमी है? आज इसके पास हर तरह के मारक हथियार हैं, जो युद्ध के समय काम आ सकते हैं। चीन से युद्ध करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं। तिब्बत को आजाद करवाने से भारत का ही भला होगा। फिर इस नेक काम को करने से पीछे क्यों हटें? भारत का इतिहास रहा है कि इसने बहुत सहनशीलता दिखाई है। कोई भी यु्द्ध करने से पहले कईं बार सोचा है। कभी खुद हमला नहीं किया है। लेकिन यहाँ बात सहनशीलता की नहीं। सही या गलत में से एक को चुनने की है। हमारा पड़ोसी हमारे से मदद की गुहार लगा रहा है और हम डरे सहमें से बैठे हैं। अगर हम तिब्बत को सैनीय मदद न भेजें पर बस उसके आंदोलन को सपोर्ट करें तब भी उनकी हौंसला अफ़ज़ाई के लिये काफी होगा। परन्तु लगता है हमारा देश सहनशील बना रहेगा। आखिर कब तक?मैं समझता हूँ कि भारत सहनशीलता की लकीर फाँद कर कायरता की श्रेणी में प्रवेश कर चुका है, जिसे अपने आप पर विश्वास नहीं है। किस हक से हम आजादी की सालगिरह मनाते हैं जब हम हमारे पड़ोसी को आज़ाद नहीं करा सकते। भारत स्वयं को शांति का दूत कहता है और शांति प्रिय तिब्बतवासियों के लिये कुछ भी नहीं कर रहा है। तीन किमी की ओलम्पिक मशाल की दौड़ औपचारिक व हास्यास्पद लगती है। आज चीन का गुलाम अकेला तिब्बत ही नहीं, भारत भी है।
आपका इस विषय में क्या कहना है। कृपया टिप्पणी करें।

4 comments:

प्रभात शारदा said...

Not only China, there are many other aspects also where our leaders show a big "कायरपन". Examples: Parliament attack, Kandahar Hi-jack, Nuclear deal...leave these big topics...there are many internal topics also......where they wanted to make people fools. Today there is a lack of firm determination.

We are now working against our famous proverbs: "Pran jaaye per vachan na jaaye", "Soney ki chidiya", "Athithi devo bbhava".....

We are suffering and moving to a century of Greatest Disaster where powers are in the hand of fools and wise mans are punished in their houses and no one listens them. All these are forcing people to be more self centric...and does not bother for other things. All are "Dhatrashtras and Ghandharis" as even though they are considered as supreme in so called democratic environment but have no power to correct the wrong happenings. This is the beginning of a new cunning era where there will never be a Lord Krishna and Pandavs have no courage to fight, and moreover they never found their Lord throughout their lifetime.

GAURAV said...
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GAURAV said...

This thought comes into my mind also few days back. When we cannot support the freedom movement of Tibet how can we justify India’s freedom movement. It mean separation of India from British empire is illegal. Ufff

This Indian government is feared of from Left (nothing but slave of china). These left have full command of Indian government. At least India should support the spiritual leader Dalai Lama.

nav pravah said...

तपन भाई,मैं आपके विचारों से काफी हद तक सहमत हूँ,वास्तव में कभी कभी यह बात हमारे जेहन में भी आती है की कहीं हमने सहनशीलता की सीमा पार तो नहीं कर दी? आक्रोश वाजिब है परन्तु हम एक ऐसे लोकतंत्र के वासी हैं जहाँ "लोक" की दरकार केवल चुनाव तक सीमित रहती है,उसके बाद का सारा काम तो "तंत्र" अपने "तांत्रिक अंदाज" में ख़ुद कर देता है.विरोध प्रदर्शन के साथ केवल उम्मीद कर सकते हैं की शायद परिस्थितियां कुछ बदलेंगी,और ये सकारात्मकता ही कुछ सुकून दे सकती है.
आलोक सिंह "साहिल"