Thursday, January 28, 2010

ये शवयात्रा जारी रहेगी (?) Death of Hockey and sports crisis

पिछले सप्ताह से हॉकी फ़ेडरेशन और खिलाड़ियों के बीच तनातनी बढ़ती हुई दिखाई दी। ऐसा नहीं कि यह लड़ाई अभी शुरु हुई हो। ये एक पीड़ा है हॉकी की व हॉकी खिलाड़ियों की। यह ज्वालामुखी है जो समय समय पर फ़टता ही रहेगा जब जब हॉकी असहाय महसूस करेगी। जब जब हॉकी का दम घुटेगा उसमें से लावा निकलता रहेगा। कभी पूर्व खिलाड़ी धनराज पिल्लै ने कहा था- "हॉकी ने मुझे मान दिया, इज्जत और शौहरत दी पर दौलत न दी"। आखिर कब तक खिलाड़ी बिना पैसे के खेलते रहेंगे? आखिर कब तक खिलाड़ी सुविधाओं के अभाव में खेलते रहेंगे और फिर हम उनसे विश्वकप जीतने की उम्मीदें भी करें।

बचपन से हमें सिखाया गया है कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। पर इसके हालात देख कर कहीं से लगता नहीं कि यह राष्ट्रीय खेल है। भविष्य में बच्चे इसे मानने से ही इनकार करेंगे। हॉकी व फ़ुटबॉल जैसे खेलों की दयनीय हालत का जिम्मेदार क्रिकेट की लगातार बढ़ती लोकप्रियता को भी माना जाता रहा है। एक समय था जब भारतीय हॉकी का बोलबाला हुआ करता था और हमने एक के बाद एक लगातार सोने के तमगे हासिल किये पर क्रिकेट का आगमन जैसे इस खेल को ग्रहण लगा गया। १५ जनवरी को हुआ सूर्य ग्रहण तो ४ घंटे में टल गया पर हॉकी पर लगा ग्रहण कब हटेगा ये कोई नहीं जानता। परगट सिंह, पिल्लै और दिलीप टर्की जैसे खिलाड़ी आते-जाते रहेंगे पर ग्रहण का अंधकार हमेशा इस खेल पर कायम रहेगा।

क्रिकेट के खेल में खिलाड़ी टीम में न भी खेलें तो भी १५ लाख सालाना कमा सकते हैं। पर इससे ठीक उलट हॉकी में खिलाड़ी खेल भी लिये तो भी कुछ मिलेगा या नहीं उस पर संशय बना रहता है। हाल ही में विवाद को जब ’सहारा’ का सहारा मिला तो खेल प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी। केपीएस गिल की हरकतों के बाद जब भारतीय हॉकी संघ तो तोड़ा गया और हॉकी इंडिया की स्थापना हुई तब लगा कि हॉकी का काया पलट होगा। पर ऐसा हुआ नहीं। संघ का नाम तो बदला पर हालात जस के तस ही रहे। हॉकी को सुधारने के प्रयास होते कहीं दिखाई नहीं दे रहे।

यदि आप दस वर्ष के किसी बच्चे से क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के नाम पूछेंगे तो वह ग्यारह की बजाय तीस बता सकता है। अब जरा हॉकी खिलाड़ियों के नाम पूछिये। तीन भी बता दे तो समझ लीजिये की हॉकी की उन्नति तय है। पर
ऐसा होता कहीं दिख तो नहीं रहा है। पूछ कर जरूर देखियेगा। यदि आप सच्चे खेल प्रेमी होंगे तो दुखी होगे। क्रिकेट की अधिकता दूसरे खेलों का ही नहीं पर भस्मासुर की तरह स्वयं का भी अंत करने की ओर अग्रसर है। ट्वेंटी-२० का खेल टेस्ट मैच के असली क्रिकेट को खत्म कर रहा है। साल भर में महज चार टेस्ट मैच खेलेगी भी भारतीय टीम। इससे ज्याद दुखद बात क्या होगी? क्रिकेट खिलाड़ी जहाँ करोड़ो का टैक्स भर रहे हैं जबकि दूसरे खेलों में लाख रूपये कमाने में भी पसीना निकल जाता है। कुश्ती, तीरंदाजी, टेनिस में पदकों के जीतने पर कुछ उम्मीद तो बंधती दिखती है पर सप्ताह भर चले इस झगड़े को देखते हुए फिर उम्मीदें ध्वस्त हो जाती हैं।

क्या करें कि यह मृत खेल फिर से जीवित हो सके? क्या हमारी व्यवस्था इसे ठीक कर सकती है? बीसीसीआई का नाम आप को पता होगा। ये बोर्ड भारत में क्रिकेट चलाता है। इस बोर्ड में बड़े से बड़े नेता बैठे हुए हैं जो अपना पैसा बनाने में लगे हुए हैं। शरद पवार आइसीसी के उपाध्यक्ष बने और अब डालमिया की तरह ही अध्यक्ष पद पाने की लालसा में हैं। मिल भी जायेगा। आइसीसी को पता है कि विश्व का सबसे कमाऊ क्रिकेट बोर्ड है बीसीसीआई। अब एक बात और आपको बता दूँ कि क्रिकेट ही नहीं बल्कि सभी खेलों में सबसे कमाऊ बोर्ड है हमारा बीसीसीआई। इस पर राज करने वाले यदि सच्चे क्रिकेट प्रेमी होते तो पैसे के लालच में क्रिकेट को ट्वेंटी-२० की आग में न झोंकते! हॉकी को जिंदा रखने का रास्ता इसी बोर्ड के पास है। यदि क्रिकेट बोर्ड हॉकी संघ को अपनी कमाई का १० फ़ीसदी हिस्सा भी दे दे तब भी हॉकी का कायकल्प किया जा सकता है। पर वे ऐसा करेंगे क्यों? उनका स्वार्थ पूरा नहीं होता है इसमें। आज हॉकी में सभी खिलाड़ी इसलिये हैं क्योंकि वे खेल को चाहते हैं, जबकि क्रिकेट में इसलिये क्योंकि वे पैसे और नाम को चाहते हैं। हॉकी संघ पर भी राजनेताओं की बजाय पूर्व खिलाड़ियों को काबिज होना पड़ेगा तभी बात बनेगी।

एक बात और सोचने वाली है कि हमारे स्कूल हॉकी को बढ़ावा क्यों नहीं देते? क्रिकेट सिखाने के लिये कोच नियुक्त किये जाते हैं, उनपर पैसा खर्च किया जाता है तो फिर हॉकी व फ़ुटबॉल क्यों नहीं सिखाया जा सकता। बचपन से ही यदि क्रिकेट के साथ साथ हॉकी भी सीखने को मिलेगी तो क्यों हॉकी आज की तरह तरसेगी? यदि बचपन से ही हमें हॉकी सिखाया जाये तो ध्यानचंद फिर पैदा हो सकते हैं और हम फिर से आने वाली पीढ़ी को गर्व से कह सकते हैं कि हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। यदि ऐसा न हुआ तो हॉकी की शवयात्रा यूँ ही जारी रहेगी।
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Sunday, June 28, 2009

हिन्दयुग्म की "बैठक" पर कृषि/जिन्सों पर नियमित लेख

सूचना तंत्र में आई क्रांति के बाद अंग्रेजी में कृषि व अन्य जिंसो की जानकारी देने वाली अनेक साईट/ब्लाग मिल जाएंगे लेकिन हिन्दी में इस जानकारी की कमी अभी अखरती है। बैठक पर हम इसी के तहत ये विशेष स्तंभ जनवरी २००९ से शुरू किया गया है...हमारा प्रयास रहेगा कि पाठकों (जिनमें किसान,विद्यार्थी, व्यापारी व निवेशक शामिल हैं)को कृषि व अन्य जिंसों के देश व विदेश में उत्पादन, आयात, निर्यात, भाव चक्र, भविष्य के रुझान के बारे में विस्तृत और ठोस व विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराई जाए। फ़िलहाल, इस स्तंभ के नियमित लेखक हैं अनुभवी पत्रकार राजेश शर्मा...

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राजेश शर्मा : संक्षिप्त परिचय


राजेश तीन दशकों से पत्रकारिता में हैं...
वर्ष 1976 से नैशनल न्यूज सर्विस (एनएनएस) आर्थिक पत्रकारिता में, वर्ष 1982 में यूएनआई की हिन्दी सेवा-यूनीवार्ता-में आथिर्क डेस्क पर कार्य। बाद में आर्थिक समाचार पत्र व्यापार भारती में समाचार सम्पादक का पद संभाला।
अप्रैल 1987 में मुंबई से जन्मभूमि समाचार पत्र समूह के दिल्ली कार्यालय में संवाददाता। समूह के विभिन्न पत्रों जिनमें व्यापार गुजराती व हिन्दी, राजकोट से फूलछाब, भुज से कच्छमित्र शामिल हैं को समाचार प्रेषण का कार्य। कुछ समय के लिए संसद की कार्यवाही व समाचार संकलन का कार्य किया।
अप्रैल 2000 से स्वतंत्र पत्रकारिता में। इस समय दिल्ली से प्रकाशित हिन्दी दैनिक अमन व्यापार, भीलवाड़ा से प्रकाशित टैक्सटाईल वल्र्ड, वेबसाईट इंडिया स्टैट डॉट काम, एक विदेशी समाचार एजेंसी आदि के लिए कार्यरत
ईमेल: rajeshsharma1953@gmail.com

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Saturday, April 11, 2009

दूर रहो इससे ये पार्टी अछूत है!!!

इस देश में दो सबसे बड़ी राजनैतिक दल हैं। एक है कांग्रेस जिसको सौ वर्ष से अधिक का अनुभव हो चुका है और दूसरी है भाजपा जिसको अस्तित्व में आये ३० वर्ष के करीब हो गये होंगे । क्योंकि हमारे इस कथित लोकतंत्र में कितने ही दल हो सकते हैं तो जाहिर तौर पर हर दल इन बड़ी पार्टियों में से किसी एक के साथ जुड़ना पसंद करता है। हालाँकि इस बीच कुछ दल ऐसे भी हैं जो कभी संप्रग, कभी राजग तो कभी कखग में रहे। यदि इतिहास में झाँकें तो पायेंगे कि हर दल पहले काँग्रेस में ही शामिल था। यही कांग्रेस जनता दल बनी, फिर उसके टुकड़े हो गये और न जाने कितने ही। इन सब के बीच एक पाटी और आई और वो थी भाजपा। चूँकि अधिकतर दल काँग्रेस के विभाजन से ही बने इसलिये यदा-कदा उससे जुड़ते रहते हैं। खून जो सबका एक है!!

अधिकतर दल भाजपा को साम्प्रदायिक दल मानते हैं इसलिये उससे दूर भागते रहते हैं। आखिर ये साम्प्रदायिकता होती क्या है? मनमोहन सिंह जी को बाबरी मस्जिद तोड़ी गई, ये याद रहता है। गुजरात के दंगे याद रहते हैं। कंधमाल याद रहता है। क्यों? क्योंकि ये दोनों घटनायें भाजपा से जुड़ी हुई हैं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुईं। गुजरात के दंगे क्यों हुए इसको कोई नहीं देखता। गोधरा की बोगी याद नहीं रहती। लक्ष्मणानंद की हत्या याद नहीं रहती। खैर मैं कोई इन दंगों का बचाव नहीं कर रहा बल्कि प्रधानमंत्री की याद्दाश्त पर हैरान हूँ कि उन्हें ८४ के दंगे भी याद नहीं रहे। किसके राज में हुए यह भी याद नहीं रहे। यदि आप पिछली बुरी बातें भूल जाते हैं तो ये अच्छी बात है लेकिन फिर सब कुछ भूलो भई!! गुजरात याद रखते हो तो ८४ भी याद रखना सीखो।

मदरसों को सीबीएसई का सर्टीफिकेशन दिलवाना, आंध्रप्रदेश में किसी एक धर्म के नाम पर आरक्षण की बात उठाना क्या ये साम्प्रदायिकता में नहीं आता है? क्या बांग्लादेशियों को राशन कार्ड और पहचान पत्र बनवाना गैर-साम्प्रादायिक हो जाता है? ये वही बांग्लादेशी हैं जो आज लाखों की संख्या में दिल्ली में घुसे हुए हैं। हमारे देश के लोगों को मूल-भूत सुविधायें मुहैया नहीं होती और हम वोट की खातिर और बोझ उठाने को तैयार हैं। ये वही बांग्लादेशी हैं जो पूर्वोत्तर के आतंकवादी संगठन में शामिल होकर हमारे ही देश को नुकसान पहुँचा रहे हैं। क्या ये वोटों की राजनीति नहीं है? बुश के खिलाफ़ फ़तवा जारी करने वाला कांग्रेस के साथ हो सकता है। अफ्जल गुरु की फाँसी का मामला लटकता जा रहा है। सिमी पर रोक के मामले में केंद्र सरकार का ढुलमुल रवैया जग-जाहिर है। और पोटा को हटाया जाना, यह कह कर कि यह किसी एक धर्म को नुकसान पहुँचाने के लिये बनाया गया है। यदि वो कानून होता तो आज कसाब का केस खत्म हो चुका होता। पर पता नहीं कांग्रेस को पोटा समाप्त करने से क्या मिला। पर उसके अलावा आतंकवाद विरोधी एक भी कानून क्यों नहीं बनाया गया? और जब वही कानून पूरे थे तो मुम्बई की घटना के बाद अक्ल क्यों आई?

मुम्बई में जब एनएसजी कमांडो नरीमन हाऊस को आजाद करा चुके थे तो वहाँ खड़े लोगों ने "भारत माता की जय" और "वंदेमातरम" के नारे लगाने शुरु कर दिये। तो टी.वी पर कुछ "धर्म निरपेक्ष" लोगों ने इस तरह के नारों को सम्प्रदाय से जोड़ कर कहा कि ये नारे साम्प्रदायिक हैं। महज वोटों के लिये वंदेमातरम को सम्प्रदाय से जोड़ने वाले ये लोग कतई देशभक्त नहीं हो सकते।

एक और जो गम्भीर मुद्दा है वो है धर्मांतरण का। क्या जबरन धर्म बदलवाना गलत नहीं है? धर्मपरिवर्तन लालच और मजबूरी में किया जाता है। लालच पैसे का, रोटी का, मजबूरी भूख की, प्यास की। भाजपा शासित राज्यों ने जब इसके विरोध में कानून बनाया तो केंद्र सरकार ने कुबूल नहीं किया, क्या कारण हो सकता है इसका? क्या ये सब बातें किसी सम्प्रदाय का साथ देने की ओर इशारा नहीं करते। कांग्रेस का हाथ किसी एक सम्प्रदाय के साथ।
लेकिन कांग्रेस साम्प्रदायिक नहीं है। कांग्रेस तो धर्म-निरपेक्ष है। आंध्र प्रदेश में उनकी सरकार ५ प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का हवाला देती है। क्या अब भी कांग्रेस अपने आप को धर्म निरपेक्ष कहेगी?

कांग्रेस को राजनीति करनी आती है सौ वर्षों का अनुभव जो ठहरा लेकिन अछूत तो एक ही पार्टी है!!!
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Thursday, January 1, 2009

नव वर्ष की औपचारिकतायें

नव वर्ष की औपचारिकतायें

आगे बढ़ते हुए कहीं हम ये भूल न जायें

साल के आखिरी दिन
किये जाते हैं नये साल से वायदे
खाईं जाती हैं कसमें,
एक दूसरे पर मर मिटने की
शराब सिगरेट न पीने की
सड़क पर न थूकने की
समय पर काम करने की
दूसरों से न लड़ने की
और हर वो काम न करने की
जिसे हम लोग "बुरा" समझते हैं
भेजें जाते हैं ईमेल और स्क्रैप,
बधाई संदेशों का लग जाता है तांता
एस.एम.एस के जरिये,
हर कोई लगा रहता है
औपचारिकतायें निभाने में,
और कहता फिरता है
"नया साल खुशियाँ लाये"
पर ये होता है सिर्फ
साल के पहले और अंतिम दिनों के लिये,
बाद में भुला दिये जाते हैं
किये गये हर वादे
और हर बार की तरह
"नव वर्ष" भी भूल जाता है सब कुछ
निभा जाता है चंद "औपचारिकतायें",
और दे जाता है
सुनामी, अकाल, भूकम्प, बाढ़
और कुछ बम धमाके, आतंकी हमले
दु:ख, शोक, आँसू,
नव वर्ष हम सब को
इन सब से लड़ने की शक्ति दे...

जय हिन्द
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Monday, December 29, 2008

जय हिन्द, जय हिन्दी, जय हिन्दयुग्म!!!

२८ दिसम्बर को हिन्दयुग्म ने अपना वार्षिकोत्सव मनाया। मैं भी इस आयोजन का साक्षी बना। हिन्दी भवन, दिल्ली में आयोजित इस समारोह में ’हंस’ सम्पादक राजेन्द्र यादव के अलावा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गणितज्ञ प्रो॰ भूदेव शर्मा, अंतर्राष्ट्रीय खेल कमेंटेटर प्रदीप शर्मा और कपार्ट, ग्रामीण विकास मंत्रालय के सदस्य डॉ॰ सुरेश कुमार सिंह अतिथि के तौर पर उपस्थित थे। डा. श्याम सखा ’श्याम’ ने मंच संचालन किया। दोपहर २.३० बजे से जो समा बँधा वो शाम ६.३० बजे तक चला। हिन्दयुग्म के कवियों ने काव्यपाठ किया और पाठकों को सम्मान मिला। हॉल पूरी तरह से खचाखच भरा हुआ था। १५० से ऊपर लोग वहाँ आये हुए थे। हिन्दयुग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी (bharatwasi001@gmail.com) ने हिन्दी ब्लॉगिंग करना सिखाया। कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाई और हर अतिथिगण हिन्दयुग्म की इस पहल और कार्यों का कायल हो गया। हर किसी ने युग्म की मदद करने का वायदा किया। राजेंद्र जी ने जब कहा कि वे खुद ब्लॉगिंग करना सीखना चाहते हैं तो इससे बढ़कर और बात क्या हो सकती थी? युग्म को आगे बढ़ाने में जितने भी कार्यकर्ता लगे हुए हैं, हर किसी के लिये हर्ष का दिन है। मैं भी आज खुश हूँ। १८ महीने पहले पिछले वर्ष अप्रेल में हिन्दयुग्म से जुड़ा था। आज मुझे गर्व महसूस हो रहा है कि वो भाषा जिसे मैं समझता था कि बाकि भाषाओं के मुकाबले पिछड़ रही है, आज उसी भाषा के लिये मैं काम कर रहा हूँ और हिन्दयुग्म लोगों को ये रास्ता दिखा रहा है।

अधिक जानकारी के लिये: http://kavita.hindyugm.com/2008/12/celebration-of-hind-yugm-annual.html
जय हिन्द, जय हिन्दी, जय हिन्दयुग्म!!!
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Saturday, December 20, 2008

हिन्द-युग्म: 28 दिसम्बर 2008 को हिन्द-युग्म मनाएगा वार्षिकोत्सव (मुख्य अतिथि- राजेन्द्र यादव)

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राजस्थान की गोलमा: लोकतंत्र का मजाक, विडम्बना या मजबूरी

कल राजस्थान में मंत्रियों ने शपथ ली। जिन्होंने शपथ ली उनमें एक राज्यमंत्री हैं गोलमा देवी। बात उनकी इसलिये करनी पर रही है क्योंकि पढ़ाई के मामले में पिछड़े राज्यों में से एक राजस्थान की यह राज्यमंत्री कभी स्कूल नहीं गई। ये पूर्ण रूप से अशिक्षित हैं। शपथ पढ़ नहीं पाई। हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाया। ये शर्मनाक है। ये लोकतंत्र की विडम्बना है जो ऐसे अनपढ़ लोग हमारे मंत्री बने बैठे हैं। जरा थोड़ा पीछे जाते हैं। किरोड़ी लाल मीणा साहब इससे पहले भाजपा में थे। भाजपा ने उन्हें टिकट देने से इनकार कर दिया। जनाब बागी हो गये और अपने साथ अपनी पत्नी और दो अन्यों को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़वा दिया। और कमाल की बात ये कि ये चारों ही चुनाव जीत गये। अब कांग्रेस को तो पूरे १०० विधायक मिले नहीं, तो उन्हें निर्दलियों का साथ लेना था। सो पेशकश की गई किरोड़ी लाल जी से। इन्होंने खुद तो मंत्री पद नहीं लिया पर अपनी पत्नी को जरूर दिलवा दिया। ये लोकतंत्र की मजबूरी है क्या? लोगों ने ऐसा क्या देखा गोलमा देवी में? क्या लोग अभी भी नहीं समझे कि हमें समझदार और शिक्षित व्यक्ति नेता के रूप में चाहिये? क्या उम्मीदवार और मंत्री बनने के लिये कितनी शिक्षा कम से कम होनी चाहिये,ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जाना चाहिये? ये नेता लोग तो करेंगे नहीं। इनका अपना खुद का नुकसान जो होगा। कांग्रेस और गहलोत सरकार की यह कैसी मजबूरी? सरकार बनाना इतना जरूरी कि गोलमा देवी को मंत्री पद दे दिया? मुझे कांग्रेस सरकार से ज्यादा गुस्सा लोगों पर आ रहा है। क्या गहलोत सरकार के पास और कोई रास्ता नहीं बचा था? क्या लोगों को अपने क्षेत्र व प्रदेश की तरक्की नहीं चाहिये? हमें अब ये जागरूकता फैलानी चाहिये ऐसे लोग हमारे नेता न बनें। फ़ैसला हमें लेना है।
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Sunday, November 16, 2008

सच ही कहा था हरिवंश राय ने!!!

डा. हरिवंशराय बच्चन-हिंदी काव्य में एक ऐसे स्तम्भ जिसको हर कोई मानता है। उन्होंने एक कविता लिखी थी मधुशाला। ७५ साल हुए उन बातों को। और आज अचानक कहीं से आवाज़ उठी कि इस कविता की कुछ लाइनें एक धर्म के खिलाफ हैं। या यूँ कहें कि कट्टरपंथियों और धर्म के ठेकेदारों उसके खिलाफ बोल रहे हैं। पिछले शनिवार को अखबार में पढ़ा तो दंग रह गया। निम्न पंक्तियों पर बैन की बात उठी है।


सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मस्जिद को यहाँ कुछ लोगों ने शाब्दिक अर्थ में ले लिया और नाराज़ हो गये हैं। क्या बेतुकी बात है। क्या उन्हें ७५ सालों से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था? या अब तक सोये हुए थे। ये लोग बच्चन की बात समझ ही नहीं पाये। अगर समझ जाते तो ऐसी बचकानी हरकतें नहीं करते। हरिवंश राय आगे लिखते हैं:

बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला!!!!

क्या खूब लिखा था... और क्या सच बोला था। अगर उपर्युक्त पंक्ति को पढ़कर हिंदू भी भड़क जायें तो आप समझ सकते हैं कि क्या बवाल उठेगा। मुझे समझ में नहीं आता कि इतना उल्टा सोचने का समय कैसे मिल जाता है। बच्चन साहब ने सच लिखा था, मंदिर मस्जिद बैर ही करा रहे हैं। पर उनकी इस अद्भुत और अद्वितीय कलाकृति पर हि सवाल उठ जायेंगे यकीन मानिये मैंने तो नहीं सोचा था।

वैसे अभी हाल ही में एक शख्स ने आर्य समाज और दयानंद सरस्वती की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश पर बैन का प्रश्न उठाया। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस अपील को खारिज कर दिया। १२५ बरसों से जिस ग्रंथ ने धार्मिक सद्भाव बिगड़ने नहीं दिया तो वो अचानक कैसे आग भड़का सकती है। ऐसी बेतुकी अपीलें इस देश में आये दिन उठती रहती हैं। कोई है जो इन सवालों के जवाब दे सके।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।


जय हिंद
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तस्लीमा नसरीन फिर देश के बाहर

सच कड़वा होता है। और इसका स्वाद तस्लीमा नसरीन चख रही है और भुगत भी रही है। तस्लीमा फिर देश के बाहर हैं। अभी अगस्त में ही तो वापस आई थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ और मुस्लिम समाज की कुरीतियों को लिखना बहुत महँगा पड़ रहा है। सरकार कट्टरपंथियों की गुलाम है। यूँ तो इस सरकार से देश के आंतरिक हालात सम्भल नहीं रहे हैं। राज ठाकरे जो असलियत में करता है उस पर बैन नहीं, पर फिल्म पर जरूर बैन लगता है। तस्लीमा को छह महीने की किसी गुप्त शर्त पर भारत में रखा गया। और अब जाने को बोल दिया गया है। आंतरिक सुरक्षा और धर्म निरपेक्षता का हवाला दे कर। इस देश में कलम भी सुरक्षित नहीं। लेखकों को इसके खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिये। एक लेखिका को सच बोलने की सज़ा पहले उसके अपने देश बांग्लादेश में दी गई और अब हमारे देश हिंदुस्तान में। एक तरफ हम कहते हैं कि मेहमान भगवान है दुसरी तरफ हम इस तरह से निकाल देते हैं। क्या सरकार चंद लोगों की गुलाम बन चुकी है? उन्हीं के हाथों की कठपुतली बन चुकी है। कांग्रेस सरकार महज अपना वोट बैंक कायम रखना चाहती है। हर धर्म में कुरीतियाँ होती हैं और उन्हें दूर करने के लिये समय समय पर लोग आते रहे हैं। दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना इसी उद्देश्य करी थी। गलत रीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने पर यदि इस तरह बेइज़्ज़ती उठानी पड़ती है तो हर कोई सच बोलने से डरेगा। जो बांग्लादेशी भाग कर सीमा लाँघ कर गैर कानूनी तरह से भारत में घुस आते हैं उनको खिलाफ ये सरकार कुछ नहीं करती। उनके वोटर कार्ड बनाये जाते हैं। क्योंकि वे लोग सरकार और पार्टी को वोट देंगे। लेकिन जो बांग्लादेशी सच्चा है उसको देश से निकाला जाता है फिर उसी वोट की खातिर। ये सरकार बिक चुकी है। इसे केवल अपने वोटों से मतलब है। तस्लीमा को देश में ही सुरक्षा क्यों नहीं दी जाती इस पर सरकार को जवाब देना चाहिये। आप भी माँगिये!!!

जय हिंद!!
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Sunday, November 2, 2008

लोकतंत्र की हार

सोचा था कि कविता लिखकर ही ब्लॉग पर पोस्ट करूँगा पर इस देश के हालातों ने मुझे फिर ये लेख लिखने पर मजबूर कर दिया। देश में बहुत ही अफरातफरी सा माहौल है। अंग्रेज़ी में कहते हैं : chaos| एक ओर मंदी मंदी का शोर है, दूसरी ओर बम धमाकों का, तीसरी कहानी ’राज’ की नीतियों पर चल रही है जिसे लोग क्षेत्रवाद कहते हैं, चौथी कहानी पुरानी है मुस्लिम तुष्टिकरण की और आखिरी नई नई कहानी है कथित "हिन्दू आतंकवाद" और मिलिट्री के लोगों की धमाकों में शामिल होने की। इतनी सारी कहानियाँ ... एक साथ.. आम आदमी का दिमाग खराब करने के लिये काफी है.. ऐसे में कविता लिखना, बहुत कठिन लगता है मुझे तो।

पहले बात करते हैं राज ठाकरे की। इस बात को ज्यादा नहीं छुऊँगा। दो हफ्ते पहले रेलवे की परीक्षा के दौरान जो हरकत मनसे के लोगों ने करी वो गलत थी। मुझे उनका विरोध का कारण जायज़ लगा पर विरोध का तरीका नहीं। आप कहेंगे कि मैं क्षेत्रवाद के पक्ष में कैसे? दरअसल लालू प्रसाद जब केवल यादवों की भर्ती के लिये परीक्षा करवायेंगे और यूपी अथवा हरियाणा के यादवों की नहीं बल्कि केवल बिहार के यादवों के लिये... तो विरोध लाज़मी है। मैं भी करता.. यहाँ लालू क्षेत्र और जातिवाद दोनों फैला रहे हैं... केंद्र मंत्री जो ठहरे...जो करेंगे किसी को पता नहीं चलेगा... मीडिया भी इसके लिये दोषी है को सही कारण लोगों तक नहीं पहुँच रहा है.. कर्नाटक और उड़ीसा से भी ९९ फीसदी जब बिहारी चुने जायेंगे तो मुझे नहीं लगता कि विरोध करने में कोई दोराय बचती है। और भी गुल खिलाये हुए हैं हमारे रेल मंत्री जी ने.. पर वो बात अभी नहीं एक और चिंता बाकि है...

देश में जब भाजपा यह कह रही थी कि हर मुसलमान आतंकी नहीं पर हर आतंकी मुसलमान। दूसरा यह कि केंद्र सरकार अफज़ल को अब तक बचाये हुए है केवल वोटों के लिये। तब अचानक ही साध्वी प्रज्ञा पकड़ी जाती हैं मालेगाँव के बम ब्लास्ट में। कहा जाता है कि उनका हिन्दू संगठनों से ताल्लुकात हैं। मुम्बई की पुलिस ने साध्वी को पकड़ते ही नार्को टेस्ट शुरु करवा दिया। जबकि यह टेस्ट तभी होता है जब पक्के सुबूत न हों। कांग्रेस को बहाना मिला और उसने हिन्दू संगठनों पर बैन की बात करी। दसियों धमाके करने वाली सिमी का समर्थन करने वाले मंत्री एक साध्वी के पकड़े जाने पर हिन्दू संगठनों का विरोध करने लगे। एक व्यक्ति के पकड़े जाने से यदि संगठन बुरा हो जाता है तो.....
साध्वी के साथ पकड़े गये हैं सेना के अफसर भी.. इसका मतलब तो यह हुआ कि सेना पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाये!!!

यहाँ से दो बातें हो सकती हैं - एक ..साध्वी और अफ़सर बेकुसूर हैं.. मतलब साफ है महाराष्ट्र सरकार फँसा रही है..यानि राजनैतिक दल अनैतिकता के रास्ते पर धड़ल्ले से चलने लगे हैं और सरकारी तंत्र का गलत फायदा उठाने से बाज नहीं आते। ये हालात भारत में राजनैतिक भविष्य बयां कर रहे हैं...

दो.. साध्वी और सेना के अफसर कुसूरवार हैं, इसका अर्थ यह हुआ कि केंद्र की नीतियों से अब कथित "हिन्दू आतंकवाद" पैदा हो गया है जो अब तक कभी नहीं था। बम विस्फोट कभी नहीं करवाये गये। ये चिंता का विषय है जब हर धर्म के लोग हिंसा और बम ब्लास्ट करने पर उतर जायेंगे। ऐसा क्यों हो रहा है... इस मुद्दे पर मुझे नहीं लगता कि प्रधानमंत्री या केंद्र कुछ सोच रहा है वरना हिंदुस्तान के मंदिर कहे जाने वाले संसद पर हमले का आरोपी जिंदा नहीं होता। सेना में आक्रोश फैला हुआ है शायद इसलिय सेना के अफसर भी सरकार के विरूद्ध कार्य कर रहे हैं। यदि मिलिट्री भी बम विस्फोट में शामिल है और यदि ऐसा रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हमारा देश भी पाकिस्तान बन जायेगा...

खैर...खरबूजा चाहें चाकू पर गिरे या चाकू खरबूजे पर.. कटना खरबूजे को ही होगा... चाहें साध्वी कसूरवार हो अथवा बेकसूर.. हार लोकतंत्र होगी..राजतंत्र की होगी..भारत सरकार की होगी...हमारी होगी..हिन्दुस्तान की होगी!!!

दुखी मन से (सुखी है "मनसे"..?? )
जय हिन्द!!
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Thursday, October 2, 2008

कविता से लेख तक का सफर

आज न तो किसी सामाजिक मुद्दे पर लिखने का मन है और न ही किसी राजनैतिक अथवा धार्मिक विषय पर। आज लिख रहा हूँ अपने ब्लॉग में पिछले एक साल के सफर के बारे में। मैंने जुलाई,२००७ से सक्रिय रूप से ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा। प्रति माह दो पोस्ट तो हो ही जाती हैं। व्यस्त कार्यक्रम में इतना काफी है। अगर आप मेरे इस ब्लॉग में पिछले वर्ष की पोस्ट को देखेंगे तो पायेंगे कि उनमें अधिकतर कवितायें रहीं। कवि मन बहुत सुंदर होता है। अपने आसपास के वातावरण को इतनी खूबसूरती से अपने शब्दों में पुरो लेता है कि आप मुग्ध हो जाते हैं। मैंने दहेज पर लिखा, आने वाले १५० वर्ष बाद के समय के बारे में लिखा, जो हिन्दयुग्म पर भी छपी थी। रक्षाबंधन, १५ अगस्त, कंजकें आदि त्योहारों पर लिखा। कवितायें लिख कर संतुष्टि सी होती थी। मैंने सीरियस और सामाजिक कवितायें जैसे मौत, क्यों दुनिया को जन्नत मनाते नहीं और किसान भी लिखी। इन कविताओं में दुख भी था, गुस्सा भी और निराशा भी। वर्ष का अंत आते आते समुद्र पर दो कवितायें लिखीं जो मेरी समझ में मेरी सबसे अच्छी कविताओं में से एक रहीं। क्षणिकायें लिखने का भी प्रयास किया।
मैं जो कुछ लिखता, संतुष्टि मिलती थी।


अब रूख करते हैं २००८ का। त्योहारों, प्रकृति की कविताओं से दूर मैं लिख रहा हूँ सामाजिक बीमारियों पर। समाज, धर्म और राजनीति-ऐसा लगने लगा कि इन तीनों को आप अलग कर ही नहीं सकते हैं। मैंने जब जब समाज पर लिखा, राजनीति उसमें जरूर रही। कभी धर्म पर लिखा...उसमें भी राजनीति। और राजनीति को आप जानते ही हैं...समाज को धर्म के नाम पर बाँटने का काम कर रही है। और ये किसी एक पार्टी या संगठन का काम नहीं है।

जब मैं भारतीयों को झूठे और मतलबपरस्त कहता हूँ तो उसमें हम सब आ जाते हैं। रियालिटी शो के द्वारा भारत के टूटे जाने के बारे में कहता हूँ तो यहाँ अपने आप उन चैनलों पर उंगली उठती है जो केवल पैसा कमाना चाहते हैं। लोगों के थूकने का भी जिक्र किया। ठाकरे और लालू की राजनीति भी मतलब परस्ती से भरी हुई है।
और रिजर्वेशन की राजनीति हमारे समाज का हिस्सा बन चुकी है। टीवी चैनलों में दिखाये जा रहे धारावाहिकों का बच्चों पर क्या असर होता है ये कहने की कोशिश की। चीन तिब्बत और भारत के विषय में कहा। मैंने अश्लील कौन में हमारी कमज़ोर मानसिकता पर भी सवाल उठाये।

ज़रा बाकि के लेखों पर नज़र दौड़ायें:

जहाँ बात बात पर कानून को जम कर जाता है तोड़ा
स्वार्थ व झूठ से भरे ४ वर्ष
माँ, तितली कैसी होती है?
मीडिया, अंधविश्वास और कलियुगी धर्म
क्यों जल रहा है जम्मू?
वंदेमातरम को राष्ट्र्गीत का दर्जा : कितना सही?
कोसी से कंधमाल तक...कहानी राजनीति की...
आतंक का है जोर, क्योंकि सरकार है कमजोर

एक दो जो कवितायें लिखीं वे स्वतंत्रता दिवस पर और सरकार के सरबजीत और अफजल से तुलना के बाद लिखी।

और भी लिख सकता था। लेख कोई भी रहे हों, केंद्र में बिंदु केवल एक रहा। मेरा भारत। भारत का, समाज का हर ओर से हनन हो रहा है। केवल आर्थिक पहलू पर हम ध्यान दे रहे हैं बाकि सब जाये भाड़ में। लेकिन बात ये नहीं। हाँ, मैं दुखी हूँ। मुझे लगता है कि ब्लॉग हमारी भड़ास निकालने का पर्याय बनता जा रहा है इसलिये मैं भी उसी ओर जा रहा हूँ। जितनी कवितायें पिछले वर्ष अंतिम ५ महीने में लिखी उतनी १० महीनों में अब तक नहीं लिखी गई हैं। लेख केवल भड़ास का माध्यम है।

गोपालदास "नीरज" के शब्दों में कविता:

आत्मा के सौन्दर्य का, शब्द रूप है काव्य
मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य ।


समाज और राजनीति से अब मन खराब सा लगने लगा है। ऊपर के लेखों में आप पायेंगे कि निराशा है भारत से... भारतीय कहने वाले लोगों से...अपने आप से। एक लेख तो मैं १५ दिन पहले लिख चुका था पर ब्लॉग पर नहीं डाल पाया। वो मेरे पास ही है। धर्म, समाज और राजनीति में कौन सच्चा और कौन झूठा समझ नहीं आ रहा है। खिचड़ी सी पक चुकी है हमारे देश में!!!

पिछले वर्ष इन दिनों मैंने तीन कवितायें प्रकाशित करी थी और आज एक लेख। कारण अब स्पष्ट होने लगा होगा। तुकबंदी कोई भी कर सकता है पर कवि बनना बहुत कठिन है।

वापस कविता का रूख करने में प्रयासरत...
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Saturday, September 13, 2008

आतंक का है जोर, क्योंकि सरकार है कमजोर

आज लिखने के लिये कुछ और ही सोचा था। पर ये बिल्कुल न सोचा था कि रात होते होते ये लिखना होगा। दिल्ली में शनिवार शाम को बम धमाके हुए। हर जगह हाई-अलर्ट घोषित कर दिया गया। ये सब आम लगने लगा है। बैंगलुरू, जयपुर, अहमदाबाद, सूरत और अब दिल्ली। हमें आदत हो गई है इन सब की। अब कुछ अजीब नहीं लगता है। सवाल ये नहीं कि क्या संवेदनशीलता समाप्त हो रही है पर सवाल ये है कि आतंकी बार बार ऐसा करते हैं। क्या उन्हें अब किसी का डर नहीं है? होगा भी क्यों? जब उन्हें पता है कि उन्हें पकड़ा तो जायेगा पर केस चलेगा...फाँसी की सज़ा भी होगी पर सरकार खामोश बैठेगी रहेगी..सरकार को आतंकवादियों को पकड़ना ही नहीं है.. सिमी पर प्रतिबंध लगाया गया पर सरकार ने कोई ठोस सबूत नहीं दिये.. नतीजा.. सिमी से प्रतिबंध हटने तक की नौबत आ गई.. पोटा हटाया गया... आतंकविरोधी कोई कानून है ही नहीं.. सरकार में शामिल रामविलास पासवान और बाहर की यूनिवर्सिटी में लेक्चर देने वाले रेलमंत्री लालू प्रसाद तो सिमी के समर्थन में उतर आये हैं। क्या केवल इसलिये क्योंकि अल्पसंख्यकों का गुट है? यही सिमी अब इंडियन मुजाहिद्दीन बना हुआ है और देश में देशद्रोहियों का काम कर रहा है। ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सबसे बड़े देशद्रोही और आतंकवादी तो ये नेता ही हैं जो समर्थन कर रहे हैं। अफज़ल, जिसे देश का मंदिर कहे जाने वाले संसद पर हमला करने के जुर्म में वाजपेयी सरकार ने पकड़ा था वो अब भी फाँसी नहीं चढ़ा है। गुजरात में आतंविरोधी कानून बनाया गया जो गवर्नर ने भी पास कर दिया पर केंद्र सरकार इस बार भी चुप है। कांग्रेसी सरकार चाहती ही नहीं कि मोदी सरकार कुछ काम करे। केंद्र का कहना है कि ये कानून पोटा के समान है। न खुद कुछ करो और न ही कुछ करने दो। मोदी ने १० दिन पहले चेताया भी था कि दिल्ली निशाने पर है...पर सरकार...
ये सब बातें साबित करती हैं कांग्रेस सरकार आतंकियों की गुलाम है। इस कमजोर सरकार ने एक भी कदम आतंकवादियों के खिलाफ नहीं लिया। ऐसे चुप रह कर काम नहीं चलेगा। मेरी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अपील है कि कुछ कदम आतंक रोकने के लिये भी उठायें तो बेहतर होगा। लोगों को उस डील का लोभ दिखाकर वोट न माँगियेगा जिस डील के नियमों को आप लोगों से छुपा रहे हैं। लोग आपसे कुछ और भी चाहते हैं। कोई कानून तो हो जिससे आतंकवादियों के मन में डर बैठे। कुछ तो करिये कि लोग कमजोर कहना छोड़ें।
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Saturday, August 30, 2008

कोसी से कंधमाल तक...कहानी राजनीति की...

जम्मू की आगअभी बुझी भी नहीं थी कि कोसी की बाढ़ और कंधमाल के दंगों ने देश को झकझोर के रख दिया है। जम्मू में हम केंद्र और राज्य सरकार का आतंकवादियों के प्रति नर्म रूख और जम्मू के लिये लापरवाही को देख ही चुके हैं। अब पहले बात करते हैं कोसी की। ये नदी नेपाल में हिमालय से निकलती है और बिहार में भीम नगर के रास्ते से भारत में दाखिल होती है। इसके भौगोलिक स्वरूप को देखें तो पता चलेगा कि पिछले २५० वर्षों में १२० किमी का विस्तार कर चुकी है। हिमालय की ऊँची पहाड़ियों से तरह तरह से कंकड़ पत्थर अपने साथ लाती हुई ये नदी निरंतर अपने क्षेत्र फैलाती जा रही है। उत्तर प्रदेष और बिहार के मैदानी इलाकों को तरती ये नदी पूरा क्षेत्र उपजाऊ बनाती है। ये प्राकृतिक तौर पर ऐसा हो रहा है। इसके मूल व्यवहार से छेड़खानी अपनी मौत को बुलावा देने बराबर है। पर इंसान ने कभी प्राकृति को नहीं समझा है। नेपाल और भारत दोनों ही देशों में इस नदी पर बाँध बनाये जा रहे हैं। परन्तु पर्यावरणविदों की मानें तो ऐसा करना नुकसानदेह हो सकता है। चूँकि इस नदी का बहाव इतना तेज़ है और इसके साथा आते पत्थर बाँध को भी तोड़ सकते हैं इसलिये बाँध की अवधि पर संदेह होना लाज़मी हो जाता है। कुछ साल..बस। कोसी को बिहार का दु:ख क्यों कहा जाता है ये अब किसी से नहीं छुपा है। इस समय जो हालात बिहार में है वे निस्संदेह दुखदायी हैं। हमारी सरकार इस बाबत कोई कदम क्यों नहीं उठाती? क्यों हम प्रकृति से खिलवाड़ करते रहते हैं? नेपाल में बाढ़ आयेगी तो वो कोसी का पानी अपने देश में क्यों रखेगा? इसलिये नेपाल को दोष देने की बजाय हमें अपनी गलतियों को देखना जरूरी है।

हमने बहाँ बाँध बनवाये, और लोगों को लगने लगा कि कोसी अपना पुराना भयावह रूप अब कभी नहीं दिखायेगी। किन्तु ऐसा नहीं है। ये बात उन्हें पता नहीं थी और सरकार ने भी उन्हें आगाह नहीं किया, जिसके फलस्वरूप लोग वहाँ पक्के मकान बनाकर रहने लगे। और बाढ़ आई तो बेघर हो गये। रही सही कसर केंद्र की कांग्रेस सरकार ने तब पूरी कर दी थी जब उसने सरकार बनाते ही वाजपेयी सरकार के उस प्रोजेक्ट पर विराम लगा दिया था जो नदियों को जोड़ने का काम करता। कांग्रेस राजनीति खेल गई और इस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। कोसी में बाढ़ आती रही है, और आती रहेगी ये बात समझ लेनी चाहिये और इसके लिये कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। चाहें नदियों को जोड़ें या लोगों को पक्के घर बनाने से रोकें।


अब चलते हैं उड़ीसा के कंधमाल। यहाँ पानी की नदी नहीं, खून की नदी बह रही है। जैसा कि जम्मू में हो रहा है। राजनीति यहाँ भी खूब खेल खेल रही है। १९९९, ग्राहम स्टेंस की हत्या। राज्य में थी गिरिधर गमांग की कांग्रेसी सरकार। जो मामला नहीं संभाल सकी। इल्जाम लगाया गया केंद्र में बैठी वाजपेयी सरकार पर। गमांग साहब ने तो मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए संसद में जाकर वाजपेयी सरकार को गिराने में अहम भूमिका निभाई। ये सभी जानते हैं कि ईसाई मिश्नरियों का एक ही मकसद है। किसी भी तरह से धर्म परिवर्तन करवा कर ईसाई धर्म अपनाने पर मजबूर करना। ये सदियों से ऐसा होता आया है, जब अंग्रेज़ आये थे, तब से। लक्ष्मणानंद नाम का एक विहिप कार्यकर्त्ता जो लोगों को ऐसा करने से रोकता था। कहा जाता है कि नक्सलियों ने मार डाला। आतंकवाद कोई धर्म नहीं देखता। कहीं इस्लामी आतंकवाद है तो कहीं नक्सल, कहीं बोडो, कहीं लिट्टे। हर किसी में अलग अलग धर्म। कंधमाल में नक्सल आतंकवादियों में ९९ फीसदी ईसाई। अब आगे कुछ कहने को नहीं रह जाता। लक्ष्मणानंद की हत्या हुई। हिन्दू कट्टरपंथियों को ये रास नहीं आया। हिंसा भड़क उठी। राज्य सरकार ने केंद्र से फोर्स माँगी, केंद्र ने मना कर दिया। जब स्थिति बदतर हुई तब केंद्र सरकार जागी। तब पोप भी जागे। ईसाई कांवेंट स्कूल बंद करवाये गये। कांग्रेस सरकार कहती है कि राज्य सरकार से स्थिति नहीं सम्भाली जा रही है। उड़ीसा में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून है। यही कानून मध्य प्रदेश में भी है। राजस्थान में बन जाता यदि कांग्रेस सामर्थित उस समय की गवर्नर प्रतिभा पाटिल ने दस्तखत कर दिये होते। कांग्रेस सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी है, इसलिये राजनीति के खेल में माहिर है।


कुछ नहीं बदलेगा...न कंधमाल..न जम्मू..न श्रीनगर...इन विवादों का कोई अंत नहीं है...
धर्म समाप्त हो जाये, ऐसा मुमकिन नहीं...राजनीति चाणक्य काल के भी पहले से है (महाभारत से पहले से), वो भी समाप्त नहीं होगी..धर्म से राजनीति...वो भी नहीं...
खत्म होगा तो ये देश...खत्म होंगे तो हम..



नोट: कंधमाल की उपरोक्त जानकारी निम्न लिंक से प्राप्त हुई है।
http://indiagatenews.com/india-news/bjp-could-not-digest-naxalite-theory-of-murder.php/
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Sunday, August 17, 2008

वंदेमातरम को राष्ट्र्गीत का दर्जा : कितना सही?

आनन्द मठ : बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यही वह बांग्ला उपन्यास है जिसका एक गीत राष्ट्रगीत बन गया। लेकिन इसके राष्ट्रगीत बनने के बाद से अब तक यह विवादों से घिरा रहा है। वैसे हमारे देश में कोई भी ऐसी घटना या व्यक्ति नहीं जिस पर विवाद न हुआ हो। चाहें मोहनदास करमचंद गाँधी हों या "जन गण मन"। हमारा इतिहास ही ऐसा रहा है। आज भी बदस्तूर जारी है। वैसे आज बात करेंगे वंदेमातरम की। अगस्त में ही ये उपन्यास पढ़ना शुरू किया और जैसे जैसे पढ़ता गया वैसे वैसे सोचता रहा कि आखिर मुस्लिम समुदाय इससे नाराज़ क्यों है? जब सरकार इसको स्कूलों में गाने को कहती है तो चारों ओर से आवाज़ें क्यों उठती हैं? इंटेरनेट पर काफी खोजबीन की तो कुछ बातें पता चली। आगे हम आनन्दमठ के कुछ आंश भी पढ़ते रहेंगे।

आइये जानने की कोशिश करते हैं इसके कुछ शुरुआती अंशों से:

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समुद्र आलोड़ित हुआ, तब उत्तर मिला-तुमने बाजी क्या रखी है?
प्र्त्युत्तर मिला,मैंने ज़िन्दगी बाजी पर चढ़ाई है।
उत्तर मिला, जीवन तुच्छ है,सब कुछ होमना होगा।
और है ही क्या? और क्या दूँ?
तब उत्तर मिला, भक्ति।

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यह उपन्यास १८८२ में प्रकाशित हुआ, किन्तु वंदेमातरम १८७५ में लिखा जा चुका था। ये कहानी है संन्यासी विद्रोह की जो १७६५-७० के बीच प्रकाश में आया। आइये जानते हैं इसकी पृष्ठभूमि को। १७५७ में सिराजुद्दोला नाम का नवाब बंगाल पर राज करता था। यही वो समय भी था जब अंग्रेज़, ईस्ट इंडिया कम्पनी) के नाम से कलकत्ता के रास्ते भारत में घुसना चाहते थे। नवाब अंग्रेज़ को खिलाफ था और उनके खिलाफ लोगों को एकत्रित करता था। परन्तु किसी हिन्दू को ऊँचा दर्जा दिये जाने के विरोध में मीर जाफर नाम के एक दरबारी ने नवाब के खिलाफ बगावत कर दी। उसी साल पलासी का युद्ध हुआ। मीर जाफर अंग्रेज़ों से जा मिला और सिराज को बंगाल छोड़ना पड़ा। आगे कुछ सालों तक मीर जाफर और उसका जमाई मीर कासिम बंगाल में नवाब बन कर रहे। ये वो समय था जब नवाब अंग्रेज़ों की कठपुतलियाँ बन कर रहते थे। राज नवाब का, पैसा अंग्रेज़ों का। अंग्रेज़ ही लोगों से कर लिया करते थे। एक तरह से उन्हीं का ही कब्जा हो गया था। उसी का नतीजा था संन्यासी विद्रोह। कहते हैं कि १८५७ पहली क्रांति थी अंग्रेज़ों के खिलाफ पर लगता है कि उससे पहले भी कईं क्रांतियाँ संन्यासी विद्रोह के रूप में कलकत्ता ने देखी हैं।

संन्यासी समूह उन लोगों का समूह था जो इकट्ठे हुए थे अंग्रेज़ों के खिलाफ। सब कुछ छोड़ कर भारत माँ को आज़ाद कराने में जान की बाजी लगा रहे थे। १७६५ के आसपास ही बंगाल में सूखा पड़ा और वहाँ लाखों की तादाद में मौतें हुईं। जनता में आक्रोश फूट पड़ा था। और वो आक्रोश था नवाबों पर। ’नजाफी’ हुकूमत के खिलाफ।

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वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् |

महेंद्र गीत सुनकर विस्मित हुए। उन्होंने पूछा- माता कौन?

उत्तर दिये बिना भवानंद गाते रहे:

शुभ्र ज्योत्स्ना पुलकित यामिनीम्
फुल्ल कुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम् ||

महेंद्र बोले-ये तो देश है, माँ नहीं।
भवानंद ने कहा, हम लोग दूसरे किसी माँ को नहीं मानते, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। हम कहते हैं, जन्मभूमि ही हमारी माता है। हमारी न कोई माँ है, न बाप, न भाई, न बन्धु, न पत्नी, न पुत्र, न घर, न द्वार- हमारे लिये केवल सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम् शस्यश्यामलां ....

महेंद्र ने पूछा-तुम लोग कौन हो?
भवानन्द ने कहा-हम संतान हैं।
किसकी संतान।
भवानन्द बोले-माँ की संतान।
.....
.....
.....
देखो, जो साँप होता है, रेंगकर चलता है, उससे नीच जीव मुझे कोई नहीं दिखाई पड़ता। पर उसके भी कंधे पर पैर रख दो तो वह भी फ्न उठाकर खड़ा हो जाता है। देखो, जितने देश हैं, मगध, मिथिला,काशी, कांची, दिल्ली, कश्मीर किस शहर में ऐसी दुर्दशा है कि मनुष्य भूखों मर रहा है और घास खा रहा है, जंगली काँटे खा रहा है. दीमक की मिट्टी खा रहा है, जंगली लतायें खा रहा है! किस देश में आदमी सियार, कुत्ते और मुर्दा खाते हैं?.... बहू-बेटियों की खैरियत नहीं है...राजा के साथ सम्बंध तो यह है कि रक्षा करे, पर हमारे मुसलमान राजा रक्षा कहाँ कर रहे हैं? इन नशेबाज़ मुसट्टों को निकाल बाहर न किया जाये तो हिन्दू की हिन्दुआई नहीं रह सकती।

महेंद्र ने पूछा, बाहर कैसे करोगे?
-मारकर

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शायद यह वाक्य हमारे मुस्लिम समुदाय को अच्छे नहीं लगे। हो सकता है। किन्तु ये वाक्य कब और किस परिस्थिति में कहे गये ये जानने की जरूरत भी तो है। इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा। आगे के कुछ पन्नों में भारत माँ को देवी का दर्जा दिया गया है। इस्लाम में मूर्ति पूजा की खिलाफत है। और इस्लाम में केवल खुदा ही पूजा जाता है। इसी उपन्यास में मुसलमानों के घर जलाने की बात भी कही गई है। शायद यह बात भी वंदेमातरम के खिलाफ जा रही है।

अब जानते हैं कि संतान दल में किस प्रकार से प्रतिज्ञा ली जाती है-

तुम दीक्षित होना चाह्ते हो?
हाँ, हम पर कृपा कीजिये।
तुम लोग ईश्वर के समक्ष प्रतिज्ञा करो। क्या सन्तान धर्म के नियमों का पालन करोगे?
हाँ।
भाई-बहन?
परित्याग करूँगा।
पत्नी और पुत्र?
परित्याग करूँगा।
रिश्तेदार, दास-दासी त्याग करोगे?
सब कुछ त्याग करूँगा।
धन, सम्पत्ति, भोग, सब त्याग दोगे?
त्याग करूँगा।
जितेंद्रिये बनोगे और कभी स्त्रियों के साथ आसन पर नहीं बैठोगे?
नहीं बैठूँगा, जितेंद्रिये बनूँगा।
रिश्तेदारों के लिये धन नहीं कमाऒगे, उसे वैष्ण्वों के धनागार में दे दोगे?
दे दूँगा।
कभी युद्ध में पीठ नहीं दिखाऒगे?
नहीं।
यदि प्रतिज्ञा भंग हुई तो?
तो जलती चिता में प्रवेश करके या कहर खा कर प्राण दे दूँगा।
तुम लोग जात-पात छोड़ सकोगे? सब समान जाति के हैं, इस महाव्रत में ब्राह्मण-शूद्र में कोई फर्क नहीं।
हम जात-पात नहीं मानेंगे। हम सब एक ही माँ के संतान हैं।
तब सत्यानंद ने कहा, तथास्तु, अब तुम वंदेमातरम गाओ।


इसमें संन्यासी/संतान व्रत की कर्त्तव्यनिष्ठा और समर्पण का पता चलता है कि किस प्रकार जन्मभूमि पर ये वीर सेना अपने प्राणन्योछावर करने को तत्पर थी।
बंकिमचंद्र के इस उपन्यास में कुछ हद तक मुसलमानों (नजाफी हुकूमत) और काफी हद तक अंग्रेज़ों दोनों के खिलाफ कहा गया है। उन्होंने ये सब १८वीं सदी की घटनाओं को ध्यान में रख कर किया, किन्तु चाह केवल इतनी कि मातृभूमि को कोई आँच न आये।

यही गीत आगे चल कर एक क्रांतिकारी गीत बन गया। जब १८९५ में पहली बार इसका संगीत दिया गया तब बंकिमचंद्र (१८३८-१८९४) इस दुनिया में नहीं थे। हर तरफ वंदेमातरम की ही गूँज सुनाई दी जाने लगी। अंग्रेज़ों ने इस उपन्यास पर प्रतिबंध तक लगा दिया। १९३७ में टैगोर ने इस गीत का विरोध भी किया क्योंकि उनका मानना था कि मुसलमान "१० हाथ वाली देवियों" की पूजा नहीं करेंगे। १९५० में राजेंद्र प्रसाद ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया। इस गीत के केवल पहले दो छंद ही गाये जाने की बात कही जाने लगी क्योंकि आगे की पंक्तियों में भारत को ’दुर्गा’ तुल्य माना गया। हालाँकि मुस्लिम बिरादरी में इस गीत को कुछ लोगों ने अपनाया भी है। और सिख व ईसाइ समुदाय भी इसको मान रहा है। इस उपन्यास की क्रांतिकारी विचारधारा ने सामाजिक व राजनीतिक चेतना को जागृत करने का काम किया।

मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश करी है कि मैं वंदेमातरम पर हो रहे विवाद और आनन्दमठ (संन्यासी विद्रोह) की कहानी को आप तक पहुँचा पाऊँ। अब मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ कि वे (१८वी सदी के घटनाक्रम को ध्यान में रखकर) सच्ची देशभक्ति व समर्पण अथवा त्याग के प्रतीक इस गीत को राष्ट्रगीत मानें या नहीं।

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम
शस्यश्यामलां मातरम्......।
शुभ्र ज्योत्सना-पुलकित यामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्
सुखदां, वरदां मातरम्।।
वन्दे मातरम्.....
सप्तकोटिकण्ठ-कलकल निनादकराले,
द्विसप्तकोटि भुजैधर्ृत खरकरवाले,
अबला केनो मां तुमि एतो बले!
बहुबलधारिणीम् नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम्॥ वन्दे....
तुमी विद्या, तुमी धर्म,
तुमी हरि, तुमी कर्म,
त्वं हि प्राण : शरीरे।
बाहुते तुमी मां शक्ति,
हृदये तुमी मां भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गड़ी मन्दिरे-मन्दिरे।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण धारिणीं,
कमला कमल-दल-विहारिणीं,
वाणी विद्यादायिनीं नमामि त्वं
नमामि कमलां, अमलां, अतुलाम,
सुजलां, सुफलां, मातरम्
वन्दे मातरम्॥
श्यामलां, सरलां, सुस्मितां, भूषिताम्
धरणी, भरणी मातरम्॥
वन्दे मातरम्..

जय हिन्द।

यहाँ भी देखें:
http://en.wikipedia.org/wiki/Vande_Maataram
http://en.wikipedia.org/wiki/Anandamatha
http://en.wikipedia.org/wiki/Sannyasi_Rebellion
http://en.wikipedia.org/wiki/Nawab_of_Bengal
http://en.wikipedia.org/wiki/Bankimchandra_Chattopadhyay
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Wednesday, August 13, 2008

स्वतंत्रता दिवस पर उठते सवाल

देश में हड़तालें हैं,
चक्का जाम हैं,
सड़कें बंद हैं,
रेल बंद है,
बसें फूँकी जाती हैं..
टायर जलायें जाते हैं
पुतले फूँके जाते हैं
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है..

स्कूल में गोली चलती है
बच्चे आत्महत्या करते हैं
एम.एम.एस बनते हैं,
ये देश के भविष्य हैं(?)
स्कूल कालेज की
दुकान लगती है,
सरेआम विद्या बिकती है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

कानून तोड़े जाते हैं
दुकानें जलाई जाती हैं
दंगे-फसाद आम हैं
आतंकवाद है,
हर राज्य में वाद-विवाद है
६१ सालों का आरक्षण खास है
सब निकालते भडास हैं
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

इज्जत पर परमाणु करार है
नोटों पर बनती सरकार है
आतंकवादियों पर रूख नरम है
देश तोड़ना भाषा का करम है
राज ठाकरे का ’राज’ है
ये नेताओं के हाल हैं
ये कैसा तंत्र है (?)
’नोट’ या ’वोट’ तंत्र है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है...
ये देश स्वतंत्र है...

३० प्रतिशत अशिक्षित हैं
खाना खिलाने वाला किसान
मजबूर है
बिना छत के मजदूर हैं
पीने को पानी नहीं
नदियों के पानी पर लडाई है
एकता की होती बड़ाई है
६१ सालों में बुराइयाँ
जस की तस हैं
ढीठ देश आज भी
बेबस है,
कमजोर है
जाने देश किस ओर है
सबसे बड़ा लोकतंत्र है!!!
ये देश स्वतंत्र है???
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Saturday, August 9, 2008

क्यों जल रहा है जम्मू?

जम्मू जल रहा है। वहाँ बंद है, आगजनी है, कर्फ्यू तोड़े जा रहे हैं।




हालात बेकाबू हैं। लोग कहते हैं कि ४० दिनों से जम्मू में हालात खराब हैं। पर ये कहानी ४० दिनों की नहीं है। इसके लिये हमें ६० वर्षों के इतिहास को खंगालना होगा।
वो हर घटना की चिंगारी पर गौर करना होगा जो परिणाम स्वरूप ज्वाला बन कर उभरी है। वो हर जख्म का कारण ढूँढना होगा। आइये समझने की कोशिश करें जम्मू की इस जलन को।



जम्मू और कश्मीर शुरू से ही दो अलग मजहबों का एक राज्य रहा है। ये एक ऐसा राज्य है जहाँ मुस्लिम हिंदुओं से ज्यादा तादाद में हैं। अगर जम्मू की बात करें तो यहाँ ६७% हिंदू हैं और कश्मीर में ९५ फीसदी मुस्लिम। ये जगजाहिर है कि कश्मीर घाटी में हमेशा से ही पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी नारे लगते रहे हैं व गतिविधियाँ होती रही हैं। यहाँ पाकिस्तान के झंडे भी लहराये जाते हैं। लेकिन कभी इन पर रोक नहीं लगी। बीते ६० सालों से किसी भी सरकार ने इसे समझने की कोशिश नहीं करी। हर किसी के लिये ये चुनाव का मुद्दा रहा। हर कोई अपनी रोटियाँ सेंकता रहा। पर जम्मू की दिक्कत फिलहाल ये नहीं, ये तो देश की सरकार को देखना है कि किस तरह से देशद्रोहियों से निपटा जाये। घाटी में जो देशद्रोह फैला हुआ है उसका मूल कारण क्या है...

ये गौरतलब है कि माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड की ओर से करोड़ों रूपया सरकार के खाते में जाता है। बोर्ड जब भी कहीं जमीन लेता है तो उसका किराया सरकार को जमा करवाता है। बोर्ड ने तीर्थ यात्रियों की सुविधाऒं के लिये अनेकानेक कार्य करे हैं। ये सब सुविधायें तभी हो पाईं जब बोर्ड का गठन हुआ। ये भी बात है कि जम्मू के लोग घाटी के लोगों से ज्यादा कर अदा करते हैं। केंद्र और राज्य सरकार वहीं से ज्यादा पैसा खाती हैं। इतना ही नहीं नौकरी के एक ही पद के लिये श्रीनगर के लोगों को ज्यादा वेतन दिया जाता है और सरकारी नौकरियाँ भी ज्यादा होती हैं। घाटी के किसान को ज्यादा सब्सिडी मिलती है और जम्मू के किसान को कम। यही भेदभाव प्राकृतिक आपदाओं में मुआवज़ा देते हुए भी किया जाता रहा है। आज के समय के युवा नेताओं पर नजर डाली जाये तो फारूख अब्दुल्ला के बेटे उमर अब्दुल्ला व महबूबा मुफ्ती के अलावा आपको वहाँ और कोई याद नहीं आयेगा। क्या ये केवल इत्तफाक है कि ये दोनों श्रीनगर का प्रतिनिधित्व करते हैं? आपमें से बहुत कम लोग जम्मू के किसी प्रसिद्ध नेता का नाम जानते होंगे। इसका कारण क्या है? हम कश्मीर की समस्या को सुलझाते रहे हैं पर कभी जम्मू की समस्या पर हमारा ध्यान नहीं गया। क्या ये सालों पुराना राजनेताओं के द्वारा किया गया भेदभाव है या ये अंजाने में हो रहा है?

अब रूख़ करते हैं उस घटना का जिसने वर्षों के इस शीत-युद्ध को सतह पर लाने का काम किया। २६ मई २००८ को केंद्र व राज्य सरकारें ये निर्णय लेती हैं कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को १०० एकड़ की जमीन दी जाये। इस जमीन पर हिंदू तीर्थ यात्रियों के लिये अस्थाई तौर पर रहने की व अन्य सुविधायें दिये जाने की बात होने लगी। मुस्लिम बहुल व कश्मीर घाटी के इलाकों में इस निर्णय के बाद हिंसा फ़ैल गई व उन्होंने खुले तौर पर इसका विरोध किया। इस विरोध में वहाँ के युवा नेताओं ने भी पूरा साथ दिया। ये सरकार को अच्छी तरह से मालूम था कि चुनाव में यही इलाका इनकी मदद करेगा। तब घाटी के मुस्लिम नेताओं के दबाव में आकर सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया। ये वो कदम था जिसने आज की परिस्थिति को जन्म दिया।




जम्मू के लोग जो ज्यादातर हिंदू हैं ये बात पचा नहीं पाये। जो जमीन उनकी सुविधा के लिये थी उसे मना कैसे कर दिया। फिर चाहें हिन्दू हों अथवा वहाँ का प्रतिनिधित्व करने वाले मुसलमान दोनों ही की तरफ़ से सरकार के जमीन वापसी के फ़ैसले का विरोध होना शुरू हुआ। ये अब से ४० दिन पहले की बात है। लेकिन मीडिया में इसका जिक्र अभी ८-१० दिन पहले ही आना शुरू हुआ। क्योंकि इससे पहले केंद्र सरकार खुद को बचाने में लगी हुई थी कि इसकी तरफ़ किसी का ध्यान ही नहीं गया। देश २०२० तक ६% बिजली देने वाले परमाणु करार और सरकार में ही उलझा रह गया और वहाँ स्थिति बद से बदतर होती चली गई। जिक्र तब आना शुरू हुआ जब हुर्रियत कांफ़्रेंस के नेता यासिन मलिक भूख हड्ताल पर जाते हैं....वो बंदा जो पाकिस्तान समर्थक है उसका इंटर्व्यू चैनलों पर दिखाया जाता है। जो नहीं जानते उनके लिये बताना चाहूँगा कि हुर्रियत का मतलब है "आज़ादी"। और ये पार्टी पाकिस्तान की २६ पार्टियों के समर्थन से घाटी में काम करती है। जिक्र तब शुरू हुआ जब श्रीनगर को खाना-पीना, पेट्रोल, डीज़ल मिलना जम्मू की ओर से बंद हो गया। हाइवे बंद कर दिये गये और ट्रकों को वहीं पर रोक दिया गया। उससे पहले स्थिति का जायज़ा नहीं लिया गया। प्रधानमंत्री जी महज औपचारिकता के नाते इतने समय के बाद सभी पार्टियों की मीटिंग बुलाते हैं पर अभी तक कोई फैसला इस मुद्दे पर नहीं लिया गया है।

क्या कारण है कि घाटी इस जमीन का विरोध कर रही है? क्या वे नहीं चाहते कि वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड की तरह ही अमरनाथ श्राइन बोर्ड तरक्की के लिये काम करे? क्या कारण रहा कि जो फैसला राज्य की कांग्रेस सरकार व केंद्र की कांग्रेस सरकार ने मिल कर किया वे उसी पर कायम न रह पाये? क्या कारण है कि जो माँगे घाटी के लोगों की सरलता से मानी जाती हैं वो जम्मू के क्षेत्र की नहीं सुनी जाती? देखना ये है कि केंद्र जो "नोटों" के सहारे टिका हुआ है अपने वोटबैंक यानि कश्मीर घाटी का साथ देता है या नहीं? क्या इस बार जम्मू को उसका हक़ मिलेगा या फिर वोटों की भेंट चढ़ जायेगा? जम्मू की पुरानी कुंठा इस कदर फूटेगी शायद ये सरकारों को अंदाज़ा नहीं था... पर शायद ये जरूरी था..(??)

--९ अगस्त
सर्वदलीय दल जो रवाना हुआ है जमीन विवाद सुलझाने के लिये उसमें सैफुद्दीन सोज़, फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती शामिल हैं। तीनों श्रीनगर से हैं... जम्मू से कौन शामिल हुआ है? मेरा सवाल है केंद्र से कि जम्मू का एक भी प्रतिनिधि बैठक में ले जाने की जहमत क्यों नहीं उठाई गई? कौन बतायेगा जम्मू का नजरिया?
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Monday, July 28, 2008

'आवाज़' से रचता ब्लोगिंग में इतिहास

पिछले वर्ष हिन्दयुग्म ने संगीत के क्षेत्र में एक शुरूआत की, जिसका नाम रखा गया-आवाज़। वो आवाज़ जिसके माध्यम से नये संगीतकारों, गीतकारों व गायकों को एक मंच मिल सके जिससे ये सभी प्रतिभावान चेहरे लोगों के सामने आ सकें व अपनी कला प्रदर्शित कर सकें।

पहले इस ब्लाग का मकसद था कविताओं व कहानियों का पोडकास्ट। ऐसा प्रयोग शायद ही कभी किसी ब्लाग या किसी साइट ने किया हो। उसके पश्चात इसका दायरा बढ़ने लगा। सुबोध साठे व ऋषि जैसे गायक व संगीतकार आगे आये। दिसम्बर २००७ में शुरू हुए आवाज़ के मंच पर हर सप्ताह नये चेहरों की प्रतिभा सामने आने लगी। फरवरी २००८ में हिन्दयुग्म ने अपना पहला एल्बम पहला सुर प्रगति मैदान में लांच किया। ये भी ब्लागिंग के इतिहास में पहली मर्तबा हुआ होगा कि कोई ब्लाग संगीत एल्बम रिलीज़ कर रहा हो। इस एल्बम के गीतों की खास बात यह रही कि ये गीत इंटेरनेट पर ही बनाये गये हैं। कोई व्यक्ति उत्तर भारत का होता तो कोई दक्षिण का तो कोई विदेश से काम करता। इस तरह का विचार और प्रयोग भी अपने आप में अनूठा है।
ये गीत इतने पसंद आये कि ये DU-FMअमरीका के डैलास में भी सुने गये। दिल्ली में १०२.६ FM पर भी इसके गीतों का प्रसारण हुआ वो हिन्दयुग्म के सदस्यों का इंटरव्यू भी आया।

पहला सुर की कामयाबी के बाद आजकल आवाज़ पर नयी श्रृंख्ला का आरम्भ हुआ है। इसमें पहले वाले गीतकार व संगीतकार तो हैं ही बल्कि नये संगीतकार भी जुड़े हैं। ये पहले से बड़ा कदम है व लोगों द्वारा लगातार सराहा जा रहा है। इसका अंदाज़ा लगातार बढ़ती टिप्पणियों से लगाया जा सकता है। 'आवाज़' पर १६ साल के संगीतकार भी हैं व संजय पटेल जैसे सलाहकार भी।

अभी रविवार को ही इंटेरनेट पर कवि सम्मेलन हुआ। ये भी अपने आप में अलग व अनूठा प्रयास कहा जा सकता है। इसकी शुरआत रविवार को ही हुई। और अब खबर ये है की पहला सुर के गीतों को वोडाफोन ने अपनी कालर ट्यून की लिस्ट में भी जगह दे दी है। क्या ये 'आवाज़' की सफलता का प्रंमाण नहीं!!

जिस तरह की कामयाबी हिन्दयुग्म की आवाज़ को प्रथम वर्ष में ही मिल गई है उससे इसके भविष्य का अंदाज़ा लगया जा सकता है जो निःसंदेह उज्ज्वल होगा। इंटेरनेट पर हिन्दी ब्लागिंग में हिन्दयुग्म ने अपने पाठकगण व कविता/कहानियों के दम पर पहले ही तहलका मचाया हुआ है और अब संगीत के क्षेत्र में 'आवाज़' भी धूम मचा रही है। अब इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये 'आवाज़' ब्लागिंग के क्षेत्र में हर पल नया इतिहास रच रही है।
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Sunday, July 20, 2008

मीडिया, अंधविश्वास और कलियुगी धर्म

अनुरोध : किसी को ठेस पहुँचाना मेरा मकसद नहीं। ये लेख निष्पक्ष हो कर पढें।
धर्म पर मैं पहले भी काफी बार लिख चुका हूँ। कभी धर्म का मतलब जानना चाहा (http://tapansharma.blogspot.com/2007/01/blog-post_4643.html) तो कभी धर्म व क्षेत्रवाद से भारत को टूटने से बचाने पर जोर दिया (http://tapansharma.blogspot.com/2008/03/un.html)। इस बार थोड़ा और आगे बढ़ेंगे।

हम २१वीं सदी में जीते हैं। आज मीडिया पर भी कहूँगा और धर्म को व्यवसाय बनाने वाले लोगों के बारे में भी कहना चाहूँगा। पिछले कुछ समय से टीवी पर साई बाबा की खबरें खूब जोर शोर से दिखाई जा रही हैं। कभी कुछ चमत्कार दिखाया जाता है, कभी कुछ। कभी उनकी आकाश में तस्वीर बनती दिखाई जाती है, तो कभी उनकी एक आँख खुली हुई होती है(http://www.orkut.co.in/CommMsgs.aspx?cmm=141335&tid=5224298292176437798)। ऐसे ही अनगिनत करिश्में रोजाना हम इंडिया टीवी, आजतक और IBN जैसे हिन्दी चैनलों पर देख सकते हैं। मेरा कहना है कि ऐसा पहले क्यों नहीं हुआ? अब ही क्यों हर दिन नये नये खेल हो रहे हैं? हर रोज साईं बाबा का ही जिक्र क्यों? क्या चाहते हैं उनके अनुयायी? मीडिया का इस्तेमाल कर क्या बेच रहे हैं उस महान संत को?मेरी शिकायत है धन के लालची व टी आर पी के चक्कर में फँसे चैनलों से व बाबा के उन समर्थकों से जिन्होंने धर्म को बेच दिया। उस संत महात्मा को तो पता भी न होगा कि उसके नाम का कैसा दुरुपयोग हो रहा है!!!ये २१वीं सदी है(?)

ये तो बात हुई मीडिया की धर्म बेचने वालों से साठ-गाँठ की। आजकल रात को ११ बजे के बाद न्यूज़ के चैनलों पर एक ही खबर होती है। कहीं पर खौफ होता है तो कहीं काल, कपाल, महाकाल के चर्चे, कहीं कब्रिस्तान दिखाया जाता है तो कहीं श्मशान पर तप करते अघोरी। अगर हम २१वीं सदी में हैं तो खबरिया चैनलों को चाहिये कि ऐसे अंधविश्वासों को बढ़ावा न दे। परन्तु होता इसके उलट ही है। इन चैनलों को पता है कि लोग यही सब देखना पसंद करते हैं, अगर ये सच दिखायेंगे तो इन्हें डर है कि कहीं टी.आर.पी न गिर जाये। इन्हें "भूतों" को बेचना है, चुडैलों से लोगों को डराना है। इंडिया टीवी ने कुछ साल पहले नकली बाबाओं को पकड़ा था, लेकिन लगता है कि भूतों ने अब इनके स्टूडियो में डेरा जमा लिया है। इन चैनलों ने अपनी सारी सीमायें तोड़ दी हैं।

डेरा की बात चली है तो बात करते हैं बाबा राम रहीम के डेरे की भी। मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि आत्मिक ज्ञान देने वाले संतों के शिष्य इतने लड़ाके कैसे हो सकते हैं? हैरानी की बात ये है कि ये बाबा भी अपने शिष्यों को शांत नहीं कराते हैं। क्या ये ज्ञान फर्जी बाँटा जाता है? क्या ये संतों का ड्रामा भर है? क्या ये पंजाब हरियाणा में फैल रहे दंगे फ्सादों को बंद नहीं करवाना चाहते? क्या चाहते हैं बाबा? लोगों को प्रेम का ज्ञान बाँटने वाले ये बाबा हिंसक कैसे हो जाते हैं? क्या लोग ही नहीं सुनते उनकी? सारा ज्ञान बेकार? डेरा से निकल कर अहमदाबाद पहुँचें तो पायेंगे कि एक और बाबा के भक्तों का बडा वर्ग गुस्से में बैठा है। यहाँ आग भड़की है आसाराम बापू के आश्रम में हुई २ बच्चों की मौतों के बाद। लोग आक्रोश में हैं और उनसे भिड़ रहे हैं बापू के शिष्य। उस पर इस संत का बयान ये कि "गुरु पर हमला होगा तो शिष्य चुप क्यों बैठेंगे?" । यानि सीधा सीधा आज्ञा दे दी है कि जो करना है करो। तोडफोड करनी है करो। मीडिया ने कुछ समय पहले ६-७ बाबा लोगों का पर्दाफाश भी किया था, किन्तु उन बाबाओं के (अंधे) भक्तों ने ये सब मानने से इंकार किया। हम २१वी सदी में हैं!!

एक दोहा पढ़ा था कभी, "गुरू गोविंद दोऊ खडे काके लागू पाये, बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताये"। गुरु को ईश्वर का दर्जा दिया गया है। ईश्वर प्रेम सिखाता है। किन्तु क्या ईश्वर इतना निर्दयी हो गया है कि अब दंगे फसाद करवाने लगा है। ये धर्म है जो हत्यारा है मासूमों का, ये धर्मगुरू हैं कातिल ईश्वर के!!!इन्होंने धोखा दिया है करोडों लोगों के विश्वासों को। ये खूनी हैं उस आत्मा के जो मिलना चाहती है परम-आत्मा से...ये २१वीं सदी भी है, यहाँ झूठा मीडिया भी है जो कभी अँधविश्वास से दूर रहने का ढोंग करता है तो कभी उसी अँधविश्वास की थाली लोगों को परोसता है। यहाँ करोडों (अँध) विश्वासी लोग भी हैं जिन्हें पता ही नहीं चल पाता है कि उनके साथ कैसा विश्वासघात हो रहा है। और यहाँ ऐसे (सद?)गुरू भी हैं जो फायदा उठाते हैं ऐसे लोगों का... ये कलियुग है..ये कलियुगी धर्म है...यहाँ कलियुगी धर्मात्मा हैं..ये २१वीं सदी है..(???)!!!
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Saturday, June 28, 2008

जहाँ बात बात पर कानून को जम कर जाता है तोड़ा

आगे की लाइन कहते हुए शर्म आती है पर सच कड़ुआ होता है। गुज़रे जमाने की सिकंदर-ए-आजम फिल्म से रफी साहब का गाया हुआ एक गीत है जिसकी तर्ज पर इस लेख का शीर्षक चुना गया है। वो भारत देश है मेरा।
इस देश में असत्य है, हिंसा है और अधर्म भी है। शायद इसीलिये आज के गीतकार ऐसे गीत नहीं लिख पा रहे हैं। बात गीत की नहीं, बात आज हिंसा की होगी। बात बात पर कानून के उल्लंघन की होगी। जो हम सब करते हैं। जाने अनजाने करते हैं। क्योंकि हम सब इस "गैरकानूनी" समाज का एक हिस्सा हैं।

सोच तो काफी दिनों से रहा था इस विषय पर सवाल उठाने की पर आज मौका मिला। मुद्दे पर आते हैं। भूमिका इतनी है कि इस देश में जो कानून तोड़ता है उसको सर पर बैठाया जाता है। और ये कानून बार बार तोड़ा जाता है। खेल में कहावत है कि रिकार्ड टूटने के लिये बनते हैं पर राजनीति के इस सामाजिक अखाड़े में कानून टूटने के लिये बनते हैं। बजट के महीने में पहुँचें तो पायेंगे कि हमारी केंद्र सरकार ने किसानों के कर माफ़ कर दिये। जिन किसानों ने टैक्स नहीं भरा था उनका सारा कर माफ कर दिया गया। करीबन ७१ हजार करोड़ रूपये का। किसान गरीब होते हैं। माना। पर तकलीफ हाथों में हो और इलाज पैरों का हो तो क्या होगा? उनके पास पैसे नहीं हैं। खेती के नवीनतम साधन नहीं हैं। जो अनाज वो बेचते हैं उनको उसके उचित दाम नहीं मिलते। समस्या जस की तस है। न चाहते हुए भी कानून की नजर से देखें तो किसान गुनाहगार हैं। लेकिन उन्हें गुनाहगार बनाने वाली सरकारें किसानों को और दलदल में फँसा रहीं हैं।

रूख करते हैं राजधानी दिल्ली का। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ अवैध निर्माणों को तोड़ने का आदेश दिया था। कईं मकान ऐसे थे जो जरूरत से ज्यादा ऊँचे थे। किसी की दुकान आगे थी। काफी कारण रहे। पर इन सबको नज़रअंदाज़ कर सरकार नित नये कानून बना रही है। जो कालोनियाँ गलत तरीके से बसाई गईं थीं उन्हें कानूनी जामा पहनाया जा रहा है। मतलब चाहें आपने जितने भी अवैध मकान या दुकान बनाये हों पर जब तक आपके पास वोट की ताकत है आप निश्चित रहें। जम कर कानून तोड़ें। नेता आपका सदैव साथ देंगे। यहाँ हमारी ही गलती है। पर खुद पर इल्जाम लगाने में तकलीफ होती है। कैसे कहें कि यहाँ जनता सरासर गलत है। चलिये ये तो मुनष्य की प्रकृति है, अपनी गलती देख पाना हमेशा ही मुश्किल रहा है।

बैंसला साहब की करतूतों के बिना इस लेख का अंत मुमकिन नहीं है। वे कहते रहे कि अहिंसक आंदोलन कर रहे हैं। रेल की पटरियों को तोड़ना उनके लिये हिंसा नहीं है। बसें जलाई जानी भी उनके लिये हिंसा नहीं। मुझे समझ में नहीं आता है कि एक तरफ हम सरकार को कोसते हैं कि जनता की सुविधाओं के अनुसार बसें नहीं चलाईं जाती दुसरी ओर जनता स्वयं के काम आने वाली चीज़ को खुद ही आग लगाती हैं। दुकानें तोड़ी जाती हैं। अजीब विरोधाभास है। कारण क्या है? क्यों गुस्से की आग से जल रहा है भारत? खैर अंत में बैंसला साहब की बातें मान ली गईं। इन्हीं की तरह हाल ही में सिखों ने दंगा फसाद खड़ा किया। कभी शिवसेना, पवार की एन.सी.पी, राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना कभी अलग अलग घर्मों के संगठन आदि रोज नये कारनामों को अंजाम देती हैं। लेकिन होता क्या है? कानून को बनाने वाले कानून को तोड़ते हैं और उसकी धज्जियाँ उड़ाई जाती है। अब तो हमें भी इस सबकी आदत हो गई है।

ऐसे अनगिनत ही वाकये हैं जब नियमों को ताक पर रखा गया है। अभी ट्रैफिक के नियमों की बात तो करी ही नहीं। जनता ही कानून का उल्लंघन करने में सबसे आगे होती है और पुलिस, नेताओं को हम दोषी करार देते हैं क्योंकि हम अपने आप में झाँकने से डरते हैं। बात फिल्मों से शुरू की थी, खत्म भी उसी से करना चाहूँगा। मनोज कुमार ने एक फिल्म बनाई थी-"पूरब और पश्चिम"। अब तक ज्यादातर फिल्में जो देशभक्ति की बनीं हैं वे किसी न किसी युद्ध पर अथवा आतंकवादी हमले पर आधारित रहीं हैं। परन्तु ये अपने आप में अलग फिल्म थी। इसमें कोई आतंकवादी नहीं था। इसी में एक गाना था- है प्रीत जहाँ की रीत सदा। अब न तो ऐसी फिल्में बनती हैं और न ही ऐसे गाने। क्योंकि कहते हैं कि फिल्में समाज का आइना होती हैं। जब समाज वैसा नहीं रहा तो गाने कैसे बनेंगे?
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Sunday, June 15, 2008

स्वार्थ व झूठ से भरे ४ वर्ष

आप सोच रहे होंगे कि ४ साल किस बात के? दरअसल कल यानि १४ जून २००८ को इस कार्पोरेट जगत के चार साल पूरे हुए। कहने को तो जनवरी २००४ से काम करना शुरू किया था परन्तु चूँकि डिग्री जून में मिली थी इसलिये पहले ६ महीने गिनती में नहीं आ सकते। खैर मुद्दा ये नहीं है। आप लोगों ने एक फिल्म देखी होगी कारपोरेट| मैंने नहीं देखी, अभी देखनी है। कहते हैं उसमें इस जगत की कईं परतें खोली हुई हैं। मुझे भी इस धंधे में चार बरस पूरे हुए। लेकिन मेरा दायरा आईटी की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तक ही सीमित होगा। उम्मीद है अब तक आप आगे की भूमिका समझ चुके होंगे।

चलिये शुरू करते हैं मेरी पहली कम्पनी से। काम अच्छा, बहुत अच्छा। लोग अच्छे। बहुत बढ़िया तरीके से सब कुछ चल रहा था। आज की तारीख में मुफ्त में लस्सी और शीतल पेय (कोल्ड ड्रिंक) कौन सी कम्पनी पिलाती है? हर शुक्रवार को हिन्दी फिल्म दिखाई जाती थी। लेकिन एक दिन अचानक अफवाह उड़ती है कि १०० लोगों को निकाल दिया गया है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यकायक सब खत्म। जो नये छात्र कालेजों से अरमान लेकर आते हैं कि बड़ी कम्पनी में काम करेंगे उन इंजीनियरों को मना कर दिया जाता है। उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था। ऊपर वालों ने कहा कि प्रोजेक्ट नहीं चल रहे थे। लेकिन यदि ऐसा था तो लोगों को कम्पनी में आने का न्योता ही क्यों दिया? क्या ये कम्पनी की दूरदर्शिता की कमी थी या कुछ और? क्योंकि ये सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। क्या मंशा रही थी कम्पनी की? ये भी अफवाह थी कि कम्पनी भूमि में निवेश करना चाहती है इसीलिये साफ्टवेयर में ध्यान नहीं दे रही। पता नहीं क्या सच है क्या झूठ? कहते हैं कि अगर व्यापार करना है तो मालिक को भावुकता का त्याग करना पड़ता है। शायद ऐसा ही तब हुआ होगा। लेकिन लोगों के भविष्य को अँधकार में घकेल कर!! आज की तारीख में ये हाल काफी कम्पनियों में सुनने को मिल रहा है। शायद भावनायें व संवेदनायें कहीं खो गईं हैं स्वार्थ के सागर में?

लेकिन अभी तो स्वार्थ का एक सिरा ही देखने को मिला है। अब जानते हैं इंजीनियरों की राय। जहाँ ज्यादा पैसा देखा वहाँ कूद पड़े। फलानी कम्पनी यदि अमरीका भेजती है तो अपनी नौकरी छोड़ने में मिनट नहीं लगती है। पैसा किसे बुरा लगता है? फिर नमकहलाली व वफादारी जैसे शब्द अब कहानियों में ही सुनने को मिलते हैं। ये खेल इमोशंस से नहीं खेला जाता है, इन चार वर्षों ने ये बात तो घूँट घूँट कर पिलाई है मुझे। वो दौर गया जब लोग एक ही कम्पनी के होकर रह जाते थे और अपनी सारी उम्र उसी में लगाते थे। आज की तारीख में ऐसे आदमी को मूर्ख कह कर पुकारा जाता है। यदि आकड़ों की मानें तो एक इंजीनियर औसतन हर ७ महीने में कम्पनी बदलता है। कारण जो भी रहें। क्या है इस बेरूखी का राज़? क्यों नहीं हो पाते लोग संतुष्ट अपनी नौकरी से? क्या पैसा सचमुच बड़ा हो गया है? या लोगों की इच्छायें भानुमति का पिटारा बनती जा रहीं हैं? लेकिन ये भी कहा जाता है कि कम्पनी नहीं छोड़ी जाती बल्कि मैनेजर छोड़ा जाता है। लोगों की अपने मैनेजर से नहीं बनती है? क्या रवैया होता है काम करवाने का? क्या माहौल होता है काम का? किस तरह की चिंताओं से गुजरना होता है? काम का बोझ? कारण बहुत हो सकते हैं पर लगता है शाहरूख खान ने इन्हीं आकड़ों से प्रेरित होकर "विश" का एड बनाया है। थोड़ा और 'विश' करो।

चलिये स्वार्थसागर से बाहर आते हैं। ये बात आईटी के लोगों को पता होगी शायद। चूँकि ज्यादातर काम विदेश से आता है। तो जिस तरह का काम आता है उन्हें वैसे ही बंदे चाहिये होते हैं। लेकिन यदि न हों तो? कोई चिंता नहीं। एक नकली रिज़्यूम बनाओ और भेज दो। नकली काम दिखाया जाता है। नकली अनुभव होता है। सब कुछ दिखावा। जब काम आयेगा तब की तब देखी जायेगी। मैं इस तरह का शिकार हो चुका हूँ। जो काम मैंने कभी किया नहीं था उसमें ८ महीने बताये गये!!! इसी झूठ पर टिकी होती है कम्पनी की आय!!

ये मेरा अनुभव था ४ सालों का। कहाँ कहाँ सिफारिश चलती है वो नहीं बताऊँगा। क्योंकि वो तो पुरानी रीत चली आई है। हमारी नस नस में समाई है और आगे भी रहेगी। आई टी की कमोबेश हर कम्पनी में यही हाल हैं। ये हो सकता है कि कुछ लोग मेरी बातों पर आपत्ति करें परन्तु ये मेरी व्यक्तिगत राय थी। जो मैंने देखा मैंने सबके सामने रखा। अभी तो चार ही साल पूरे करें हैं आगे क्या क्या देखने को मिलेगा ये वक्त ही बतायेगा।
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