Wednesday, November 2, 2011

क्या आप जानते हैं अब तक के सबसे निर्मम हत्याकांड के बारे में? Passenger Pigeon Extinction Story

कहते हैं कि भगवान ने इस धरती पर सबसे समझदार जीव जो बनाया है वो है इंसान। पर आज जो मैं आपसे कहने जा रहा हूँ वो आपको अंदर तक झकझोर सकती है। यदि किसी भी पढ़ने वाले में थोड़ा सा भी दिल होगा तो आज का यह लेख आपको सकते में डाल सकता है। मैं चाहता हूँ कि आप इस लेख को ध्यान से पढ़ें।

चित्रों में मुसाफ़िर कबूतर
मानव जाति के प्रारम्भ से लेकर अब तक का सबसे निर्मम हत्याकांड मैं आज आपके समक्ष रख रहा हूँ। अब तक का सबसे निर्मम हत्याकांड.. एक "समझदार (?)" व सामाजिक (?) जीव कितना निर्दयी हो सकता है, कितना आसामाजिक है व इस धरती का सबसे शक्तिशाली जीव होने का किस तरह से फ़ायदा उठाया है ये आपको आज पता चलेगा। हम बेज़ुबान जानवरों व पक्षियों पर किस तरह से अत्याचार करते हैं उसका नमूना आज पेश करूँगा। मैं अपने लेख को सनसनीखेज़ करने के लिये ऐसा नहीं कर रहा हूँ.. मैं कोई टीवी पर टीआरपी बढ़ाने के लिये नहीं ऐसा कह रहा हूँ.. अपितु सच..सच और केवल सच...

क्या आपने मुसाफ़िर कबूतरों का नाम सुना है? ऑल इंडिया रेडियो पर मैंने अक्टूबर में इनके बारे में सुना। वो ऐसी जानकारी थी जिसने मेरे होश उड़ा दिया। विकिपीडिया व नेट पर खोजा तो बात 
मुसाफ़िर कबूतर का बच्चा
बिल्कुल सच थी। वही बात मैं आपके साथ बाँट रहा हूँ। उत्तरी अमरीका व कनाडा के पूर्वी हिस्से में आज से सौ साल पहले तक मुसाफ़िर कबूतर जिन्हें अंग्रेज़ी में Passenger Pigeon कहते हैं, पाये जाते थे।

क्या आप जानते हैं इनकी संख्या कितनी थी? पाँच सौ करोड़.... जी हाँ आपने सही पढ़ा.. पाँच सौ करोड़। ये पक्षी इसी हिस्से उड़ा करते थे। कहते हैं कि जब ये झुंड में उड़ा करते थे तब एक मील चौड़ा और 300 मील लम्बा झुंड बन जाता था....एक ऐसा झुंड जो सूर्य की किरणों को ढँक लेता था और धरती पर एक किरण भी नहीं पड़ने देता था। जब वे उड़ते थे तो ऐसा अँधेरा छा जाता था जिसे छँटने में चौदह घंटे से ज्यादा समय लग जाता था। चौदह घंटे तक आसमान में अँधेरा.. जैसे सूर्य ग्रहण लग गया हो.. ज़रा सोच कर देखिये.. पाँच सौ करोड़ पक्षी एक साथ आकाश में उड़ते हुए....

सिनसिनाती के चिड़ियाघर में मरने वाला अंतिम कबूतर
आज मुसाफ़िर कबूतरों की संख्या है शून्य... शून्य। कारण- जब यूरोप से लोगों का आगमन तेज़ हुआ और वे अपने रहने के लिये जगह बनाने लगे तब इन पक्षियों के जंगल काटे गये। 19वीं शताब्दी में गुलामों के लिये इन कबूतरों का सस्ता माँस मिलने लगा था। यह वो दौर था जब इनके घरौंदों को तेज़ी से तोड़ा व इन्हें काटा जाने लगा था। 1800 से 1870 तक इनका आँकड़ा धीरे धीरे कम हो रहा था किन्तु 1890 आते आते ये इतनी तेज़ी से विलुप्त हो गये कि पता ही नहीं चला। सिनसिनाटी चिड़ियाघर में 1 सितम्बर , 1914 को अंतिम पक्षी ने दम तोड़ दिया। यानि करीबन सौ वर्षों में पाँच सौ करोड़ मौतें....

इस सत्य घटना में आपको परेशान कर सकती है..आपके रौंगटे खड़े कर सकती है.. आपको दु:खी कर सकती है.. आपको शर्मिंदा कर सकती है..। जैसे मैं हूँ। मुझे जब इस घटना का पता चला तो मैं शर्मिंदा था स्वयं पर.. मानव जाति पर...अपने स्वार्थ व स्वाद हेतु कितना गिर सकता है इंसान इसका उदाहरण है यह घटना...इसके आगे मैं कुछ नहीं कह सकता.. स्तब्ध...

भारत से विलुप्त होने के कागार पर खड़ी हैं अन्य कुछ प्रजातियाँ भी..

साभार:
http://en.wikipedia.org/wiki/Passenger_Pigeon
http://www.eco-action.org/dt/pigeon.html

जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Saturday, October 29, 2011

झाँसी की रानी - सुभद्राकुमारी चौहान Jhansi Ki Rani ( By Subhadra Kumari Chahan)


पिछले कुछ वर्षों से बच्चों के पाठ्यक्रम से वे राष्ट्रभक्ति व जीवन से रूबरू कराने वाली शिक्षाप्रद कवितायें "लुप्त" हो गईं हैं। सोचा कि क्यों न उन्हें दोबारा पढ़ा जाये और ब्लॉग पर उतारा जाये। हालाँकि ये कवितायें इंटेरनेट पर काफ़ी जगह मिल जायेंगी परन्तु इन्हें पढ़ने का मज़ा ही कुछ और है। इसी कड़ी में आज की कविता समर्पित है रानी लक्ष्मी बाई को। सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा लिखित झाँसी की रानी-


जन्म: 19 नवम्बर 1835 , वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु: 17 जून 1858, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
पाठकों से विनती है कि ऊपर दी गईं जन्म व मृत्यु की तिथियों से रानी लक्ष्मीबाई की आयु का अंदाज़ा लगायें। रौंगटें न खड़े हों तो कहियेगा... ऐसी वीरांगना को शत शत नमन.....

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट-कुल-देवी भी उसकी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
वीर बुंदेलों सी विरदावली सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की,लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अब जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया,यह था संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
तेरा यह बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
आगे पढ़ें >>

Monday, October 24, 2011

लघुकथा- दीपावली एक त्यौहार या शहरों में बढ़ती औपचारिकता.. Deepawali- Festival Turning Into Formality In Metros

बेटा, दीवाली आ रही है.. कुछ मिठाई बनानी है। तुम्हें सामान की लिस्ट दे दूँ? शाम को लौटते हुए ले आना..

माँ तुम मिठाई घर में बनाओगी?

हाँ.. क्यों? अपने शहर में तो हम घर में ही बनाते हैं.. भूल गया.. तू जब छोटा था तो कैसे कईं कईं पकवान बनते देखता और आस-पड़ोस में सब के यहाँ बाँटने जाता था..

माँ...वो छोटा शहर था.. यह मेट्रो है मेट्रो.. यहाँ सारी सुख सुविधायें हैं.. तुम मिठाई का नाम बताओ.. हलवाई को बोल दूँगा, वो दे जायेगा। क्यों नाहक परेशान हो रही हो..

पर मैं परेशान नहीं हो रही.. ये तो हर साल की बात है..

सौ बातों की एक बात माँ.. मेरे पास इतना समय नहीं है। ऑफ़िस में काम का इतना बोझ रहता है कि सर दर्द से फ़ट जाता है ऊपर से तुम्हारा ये सामान।

तो बेटा मैं बहू को बोल देती हूँ...

वो भी तो कॉलेज पढ़ाने जाती है माँ.. क्या क्या करे वो बेचारी भी। तुम प्लीज़ बिना बात का क्लेश मत करो...

                                                      **************************
अरे तुमने सभी दोस्तों को ईमेल कर दिया न?

क्या? दीवाली का कार्ड?

हाँ...

हाँ और फ़ेसबुक पर भी अपडेट कर दिया..

ये काम बिल्कुल सही हो गया.. बड़ी सुविधा है इसमें.. कोई चिकचिक नहीं..तकनीक का फ़ायदा तो है भई..

सही कह रहे हो...

                                                    **************************

बेटा.. ज़रा अपने चाचा को फ़ोन लगाना घर पर..छह महीने हुए उनसे बात करे हुए..हाल-चाल जाने..

माँ.. उन्होंने कौन सा हमें पूछा है..?

पर बेटा.. दीवाली का मौका है.. एक बार बात करना तो बनता है..

सुबह से फ़ोन मिला रहा हूँ.. लग नहीं रहा है.. नेटवर्क प्रोब्लम लग रही है..रहने दो न माँ...

अच्छा चल.. शाम तक एक बार और मिला कर देख लियो..


                                                           **************************

अरे सुनो...शाम आठ बजे तक तो पूजा खत्म हो जायेगी...

हाँ तो..

वो रा-वन मूवी आ रही है शाहरूख खान की...

ह्म्म्म्म.. समझ गया..

वो नया मल्टीप्लेक्स भी तो खुल गया है सब्जी मंडी जहाँ हटी है...

हाँ.. सही कहती हो.. हमारे इलाके में भी डिवलेप्मेट हो रही है..

पर माँ का क्या करें?

माँ कहाँ जायेगी... उन्हें पूजा करने देते हैं... शायद उन्हें उनके राम मिल जायें..

और हमें .. "रा-वन (रावण)..."

हा हा हा....
                                                            ************************

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दु:ख भाग्भवेत..


दीपावली के पर्व पर आप सभी को ढेरों शुभकामनायें। आइये इस पर्व पर ये प्रण लें कि न केवल अपने घरों में अपितु अपनी आत्मा में भी प्रेम रूपी दीया जलायें।
हमारे देश में अनेकानेक सामाजिक बीमारियाँ हैं.. उन्हें एक एक कर के दूर करना होगा। आत्मा में लोकपाल बैठाना होगा। प्रेम, करूणा व दया की भावना जगानी होगी।
अपने घर, अपनी गली, अपना मोहल्ला, अपना शाहर, अपना राज्य और फिर अपना देश.. इन सभी को "आज" से बेहतर "कल" देना का प्रण करना होगा। 


आपके व आपके परिवार के लिये यह दीपावली खुशियाँ लेकर आये। ईश्वर आने वाले वर्ष में आपको शक्ति प्रदान करे व मंगलमय हो, यही कामना करता हूँ।


जय हिन्द
वन्देमातरम

आगे पढ़ें >>

Wednesday, October 19, 2011

क्या आप जानते हैं एक बार रक्तदान से आप कितनी जान बचा सकते हैं? Donate Blood Save Life

पिछले सप्ताह ही हमारी कम्पनी में रक्तदान शिविर लगा। सुबह से शाम तक लगे इस शिविर में 145 लोगों  ने रक्त दिया। हमारी कम्पनी में करीबन छह सौ लोग हैं। उस दृष्टि से यह आँकड़ा थोड़ा कम लगा। और वो भी तब जब कैम्पस में सैमसंग और बार्क्लेज़ जैसी कम्पनियों के हजारों लोग हैं। बहरहाल...

रक्तदान को महादान कहा गया है। इसके कईं फ़ायदे हैं। पर क्या क्या फ़ायदे हैं ये जानने की जिज्ञासा हुई। इंटेरनेट खंगाला तो कुछ फ़ायदे नज़र आये। उन्हें आपके साथ बाँट रहा हूँ। चूँकि ये इंटेरनेट से हैं इसलिये त्रुटि हो सकती हैं। हालाँकि धूप-छाँव पर डालने से पहले मैंने कुछ वेबसाईटों पर जाँच करी है इसलिये अस्सी फ़ीसदी तो सही होनी चाहियें।

ये देखा गया है कि खून में लोहे की मात्रा हृदय के रोगों को बढ़ाती है। रक्त में मिलने वाला लोहा कोलेस्ट्रॉल के ऑक्सीडेशन के काम आता है। और यही प्रक्रिया आर्ट्रीज़ (Arteries) के लिये हानिकारक होती है। रक्त में लोहे की मात्रा अधिक होने से कॉलेस्ट्रॉल के ऑक्सीकरण की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। नियमित रक्तदान से रक्त में लोहे की मात्रा संतुलित रहती है और इसलिये हृदय रोग की संभावनायें भी कम होती हैं।

शरीर से रक्त के निकाले जाने से रक्त में RBC कम हो जाते हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिये शरीर में अस्थि-मज्जा (Bone Marrow) द्वारा तुरंत नये RBC का निर्माण होता है। इससे रक्त साफ़ व ताज़ा रहता है

हीमोक्रोमाईटिस एक तरह की जैविक बीमारी है जिसमें शरीर के Tissue में खराब पाचन के कारण लोहा जमा होता चला जाता है। इस स्थिति में शरीर के अंग खराब हो सकते हैं। हालाँकि भारतीयों में यह विकार कम पाया जाता है। लेकिअन यदि इंग्लैंड जैसे देश में देखें तो आप पायेंगे कि 300-400 लोगों में से एक व्यक्ति इस बीमारी का शिकार है।

एक सामान्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्त दान कर सकता है। एक बार में 450 मिली तक रक्तदान किया जाता है। और ऐसा माना गया है कि इससे 650 कैलोरी इस्तेमाल होती हैं।

और सबसे बड़ा फ़ायदा यह कि इससे किसी की जान बच सकती है।

चलते चलते...
  • क्या आप जानते हैं कि आपका दिया गया रक्त तीन भागों में बँट जाता है और तीन लोगों को चढ़ाया जा सकता है। ये तीन भाग हैं Red Blood Cells, प्लेटलेट्स व प्लाज़्मा (Plasma)|
  • क्या आप जानते हैं कि वैज्ञानिक अभी तक प्रयोगशाला में रक्त नहीं  बना सके हैं। रक्त का निर्माण पूर्णत: प्राकृतिक है और हमारे शरीर में ही हो सकता है।
  • हम में से पच्चीस फ़ीसदी लोगों को हमारे जीवन काल में एक बार रक्त की आवश्यकता पड़ती है

तो फ़िर ये हिचकिचाहट क्यों? रक्तदान कर के देखिये.. अच्छा लगता है...


जय हिन्द
वन्देमातरम


अधिक जानकारी के लिये:
http://www.mayoclinic.org/donate-blood-rst/know.html
http://sankalpindia.net/drupal/health-benefits-donating-blood
http://en.wikipedia.org/wiki/Blood_donor#Benefits

दो अन्य वेबसाईट से चुराये गये दो पोस्टर...
आगे पढ़ें >>

Friday, October 14, 2011

क्या आप जानते हैं - कुतुब परिसर में खड़े लौहस्तम्भ को किस राजा ने बनवाया था? Qutub Complex, Iron Pillar History - Incredible India

अतुल्य भारत की पिछली कड़ी में कुतुब मीनार का जिक्र किया गया था। उसी कुतुब मीनार की चार दीवारी में खड़ा  हुआ है लौह स्तम्भ।

कुतुब परिसर में स्थित लौह स्तम्भ
दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तम्भ सात मीटर ऊँचा है। इसका वजन लगभग छह टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1600 वर्ष पूर्व बनवाया। मुझे यह जानकर हैरानी हुई थी कि आज का यह लौह स्तम्भ प्रारम्भ से यहाँ नहीं था। गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तम्भ विदिषा (विष्णुपदगिरी/उदयगिरि - मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने जैन-मंदिर परिसर के सत्ताईस मंदिर तोड़े तब यह स्तम्भ भी उनमें से एक था। मंदिर से तोड़े गये लोहे व अन्य पदार्थ से से उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई। 



संस्कृत में अंकित कुछ वाक्य
कहते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस स्तम्भ को भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था और इसे एक पहाड़ी-विष्णुपदगिरि पर खड़ा करवाया। इस पर लिखी गईं संस्कृत की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि बाह्लिक युद्ध के पश्चात उन्होंने यह स्तम्भ बनवाया। उनके काल में यह स्तम्भ समय बताने का भी कार्य करता था। विष्णुपदगिरि पहाड़ी पर स्थित इस स्तम्भ पर सूर्य की किरणें जिस ओर पड़तीं थीं उनकी गणना से समय पता लगाया जाता था।

ऐसा माना जाता है कि तोमर-साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तम्भ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तम्भ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन 1052 के तोमर राजा अनन्गपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

सन 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तम्भ को नुकसान पहुँचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

इस लौह स्तम्भ की खास बात यह है कि इसमें कभी ज़ंग नहीं लगा है। एक आम लोहा बारिश, सर्दी व गर्मी की लगातार बदलती ऋतुओं के कारण आसानी से ज़ंग खा जाता है किन्तु इसे हमारे इतिहास के बेहतरीन कारीगर व वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण ही कहा जायेगा कि यह लौह स्तम्भ आज विश्व में शोध का विषय बन गया है।

पंडित बाँकेराय द्वारा संस्कृत से किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद
नोट: मैंने यह लेख लिखने से पहले लौह स्तम्भ पर ज़ंग न लगने के कारण को जानना चाहा। परन्तु यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाया। हिन्दी में यदि विज्ञान की पढ़ाई की होती तो शायद कुछ बता पाता। इसलिये आप सब के समक्ष मैं विकीपीडिया के लेख की कुछ पंक्तियाँ जस की तस यहाँ चिपका रहा हूँ। इसके लिये मैं माफ़ी माँगता हूँ किन्तु मेरे पास और कोई चारा नहीं था.. :-( इतना समझ पाया हूँ कि लोहे में फ़ॉस्फ़ोरस का मिश्रण भी इसके ज़ंग-रहित होने का एक कारण है...

In a report published in the journal Current Science, R. Balasubramaniam of the IIT Kanpur explains how the pillar's resistance to corrosion is due to a passive protective film at the iron-rust interface. The presence of second-phase particles (slag and unreduced iron oxides) in the microstructure of the iron, that of high amounts of phosphorus in the metal, and the alternate wetting and drying existing under atmospheric conditions are the three main factors in the three-stage formation of that protective passive film.[1

Lepidocrocite and goethite are the first amorphous iron oxyhydroxides that appear upon oxidation of iron. High corrosion rates are initially observed. Then, an essential chemical reaction intervenes: slag and unreduced iron oxides (second phase particles) in the iron microstructure alter the polarization characteristics and enrich the metal–scale interface with phosphorus, thus indirectly promoting passivation of the iron[14] (cessation of rusting activity)

The next main agent to intervene in protection from oxidation is phosphorus, enhanced at the metal–scale interface by the same chemical interaction previously described between the slags and the metal. The ancient Indian smiths did not add lime to their furnaces

The most critical corrosion-resistance agent is iron hydrogen phosphate hydrate (FePO4-H3PO4-4H2O) under its crystalline form and building up as a thin layer next to the interface between metal and rust. Rust initially contains iron oxide/oxyhydroxides in their amorphous forms. Due to the initial corrosion of metal, there is more phosphorus at the metal–scale interface than in the bulk of the metal. Alternate environmental wetting and drying cycles provide the moisture for phosphoric-acid formation. Over time, the amorphous phosphate is precipitated into its crystalline form (the latter being therefore an indicator of old age, as this precipitation is a rather slow happening). The crystalline phosphate eventually forms a continuous layer next to the metal, which results in an excellent corrosion resistance layer.[17] In 1,600 years, the film has grown just one-twentieth of a millimetre thick.[18]

साभार - विकीपीडिया

जय हिन्द
वन्देमातरम

आगे पढ़ें >>

Monday, October 10, 2011

अलविदा "जग"जीत.... श्रद्धांजलि....Ghazal Maestro Jagjit Singh

पिछले पैंतालीस दिन.. पहले शम्मी कपूर, फिर नवाब पटौदी..फिर स्टीव जॉब्स और अब हमारी पीढ़ी को ग़ज़ल के मायने सिखाने वाले जगजीत सिंह... ये सभी हस्तियाँ अपने अपने क्षेत्र के "लीजैंड" थे। परन्तु न जाने क्यों जगजीत सिंह जी के जाने का दु:ख सबसे अधिक हुआ है...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते..
वक्त ने ऐसा गीत क्यों गाया....

शायद इसलिये क्योंकि हम जैसे नौसिखिये संगीत प्रेमियों को ग़ज़ल सुनवा देना ही बहुत है...  वो पीढ़ी जो ग़ज़ल से दूर भागती है उस पीढ़ी में यदि ग़ज़ल प्रेमी बचे हुए हैं तो वो शायद जगजीत सिंह जी की वजह से ही मुमकिन हुआ है...

न जाने ऐसे कितने ही लोग हैं जिनके लिये ग़ज़ल मतलब जगजीत... जगजीत सिंह मतलब ग़ज़ल.. ग़ज़ल कैसे लिखी जाती है... कितनी मात्रायें होती हैं.. सुर क्या होता है... कोई परवाह नहीं... जगजीत सिंह को सुन लेना ही बहुत है....
उनकी आवाज़ में जो ठहराव था.. जो कशिश थी... वो शायद किसी और में नहीं.... उनकी आवाज़ ऐसी थी जिसे सुनो तो उसी में डूब जाओ..

सोमवार सुबह जैसे ही उनकी मृत्य का समाचार सुना.. मानो पैरों तले जमीन खिसक गई... रोने का मन किया... ईश्वर भी न जाने कैसे कैसे खेल खेलता है... और हम.. जब ये मालूम है कि यदि जीवन है तो मृत्यु भी अटल है.. फिर भी क्यों...???

चाहें रोमांटिक मूड हो या ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा... उन्होंने सभी तरह की ग़ज़ल गाईं...

होठों से छू लो तुम..मेरा गीत अमर कर दो..., "तुमको देखा तो ये ख्याल आया", "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो","झुकी झुकी सी नज़र..", "होश वालों को खबर क्या.."
"सरकती जाये है रूख से नकाब..आहिस्ता..आहिस्ता.." आदि न जाने ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर होठों पर स्वयं ही हल्की सी मुस्कान आ जाती है....

दूसरी ओर...
"ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो...भले छीन लो मुझसे..",
"कोई फ़रियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे..." जैसे दर्द भरे नगमें भी उन्हीं की आवाज़ की गवाही देते हैं...
इनमें "ये दौलत भी ले लो..." ग़ज़ल तो ऐसी है कि इसके बिना जगजीत सिंह पर बात करना.. हमारा ग़ज़ल सुनना.. सब बेकार व बेमानी लगता है... "मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन.. वो काग़ज़ की कश्ती..वो बारिश का पानी..."

ग़ज़ल की समझ कभी नहीं रही... और यदि जगजीत सिंह जी फ़िल्मों के लिये गाने नहीं गाते तो शायद हमारी पीढ़ी निदा फ़ाज़ली, फ़िराक गोरखपुरी जैसे शायरों के शे’रों को सुनने व पढ़ने से महरूम रह जाती..... किसने शे’र लिखे पता नहीं.. पर गाये.. जगजीत सिंह साहब ने....

जगजीत सिंह जी... आप भारत के रत्न हैं... आपको मेरी छोटी सी श्रद्धांजलि...

इक आह भरी होगी.. हमने न सुनी होगी..
जाते जाते तुमने.. आवाज़ तो दी होगी...
इस दिल पे लगा के ठेस ... जाने वो कौन सा देश.. ..
कहाँ तुम चले गये...
आगे पढ़ें >>

Friday, October 7, 2011

पूर्वोत्तर के बच्चों के लिये वरदान है रानी बाग का आर्य समाज मंदिर Arya Samaj Mandira, Rani Bagh, North-East Children

रविवार दो अक्टूबर को दिल्ली में रानी बाग स्थित आर्य समाज मंदिर में जाना हुआ। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहाँ पर उत्तर-पूर्व से आये छोटे-बड़े अस्सी से नब्बे बच्चे पढ़ते हैं। इन्हें वैदिक शिक्षा तो दी ही जाती है साथ ही डीएवी अथवा एस.एम आर्य पब्लिक स्कूल के माध्यम से सीबीएसई की भी पढ़ाई भी कराई जाती है। दसवीं या बारहवीं तक की इस मुफ़्त शिक्षा की मदद से बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो पाते है। पूर्वोत्तर में हो रहे धर्म परिवर्तन व आतंकवाद से जूझते यह बच्चे यहाँ आकर अपनी पढ़ाई करते हैं।

रविवार को जब इन बच्चों को शाम का नाश्ता मिला तो जब तक सभी तो नाश्ता नहीं मिल गया तब तक किसी ने भी उसे खाना शुरू नहीं किया। इन बच्चों से मिलना ही हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। छोटे छोटे मासूम बच्चों के मुँह से "धन्यवाद" या "थैंक्यू" सुना तो मन प्रसन्न हो गया।

उसके बाद हम लोग रानी बाग से सटे सैनिक विहार के आर्यसमाज मंदिर गये। यह कन्या कुटुम्ब है अथवा यहाँ पर भी पूर्वोत्तर की साठ से सत्तर कन्यायें अपनी वैदिक व सीबीएसई की शिक्षा ग्रहण करती हैं।


आर्य समाज मंदिर की तीन तस्वीरें आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।




वहाँ लिखे एक पोस्टर से पंक्तियाँ चुरा रहा हूँ:


धर्म: दूसरों को बिना दु:ख दिये सुख उत्पन्न किया जाने वाला कर्म ही धर्म है।


मानवता: आत्मा को प्रतिकूल लगने वाला व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये। जो व्यवहार आपको स्वयं अच्छा नहीं लगता वही आप
दूसरों के साथ कैसे कर सकते हैं?
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप स्वयं के लिये चाहते हैं।


सत्य: जो पदार्थ व ज्ञान जैसा है उसे वैसा ही जानना, मानना और आचरण करना ही सत्य है।

वह दौर जिसमें सरकारें व मीडिया पूर्वोत्तर को घास भी नहीं डालतीं व उस क्षेत्र को भारत का नहीं समझतीं हैं उस दौर में यह मंदिर उत्तर-पूर्व के बच्चों के लिये वरदान के समान हैं।


।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
आगे पढ़ें >>

Sunday, October 2, 2011

दो अक्टूबर: परिवर्तन संसार का नियम है.. आत्मविश्लेषण. 2nd October.. Time to Introspect

नोट: लेख लम्बा है पर मैं चाह कर भी छोटा नहीं कर पाया।

प्रिय मित्रों,

कुछ साल पहले तक घर घर में एक कैलेंडर अथवा पोस्टर लगा रहता था जिस पर लिखा होता था - परिवर्तन संसार का नियम है। जब बड़े हुए और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी करी तो पता चला कि भगवान कृष्ण का यह वचन आज का मैनेजमेंट फ़ंडा बन गया है। "Embrace Change" और "Change is Good" जैसे जुमले हर मैनेजमेंट गुरु की ज़ुबान पर चढ़े हुए हैं। गनीमत यह है कि अमरीका अथवा ब्रिटेन ने इस "सत्य" का पेटेंट नहीं करवाया।

आज दो अक्टूबर है। गाँधी और शास्त्री का जन्मदिन है... समय आत्मविश्लेषण का है। समय पिछले एक वर्ष में हुई घटनायें व परिवर्तनों को जानने व समझने का है। पिछले वर्ष जो एक सिलसिला प्रारम्भ किया था उसी को आगे ले जाने का है।

क्या देश व दुनिया में परिवर्तन हुआ है?

मुझे याद है पिछले वर्ष भी मैंने देश में हो रहे कथित "डिवलेप्मेंट" पर चिंता व्यक्त की थी। कहीं खाली जमीन दिखी नहीं कि "डिवलेप्मेंट" की बातें शुरू हो गईं। जब तक उस जमीन पर गगन चुम्बी इमारतें व मॉल नहीं बन जाते तब तक हम, बिल्डर व सरकार तीनों ही साँस नहीं लेते। फिर चाहें जमीन का वो हिस्सा कितना ही उपजाऊ क्यॊं न हो। इसी "विकास" का नतीजा रहा भट्टा पारसौल का गाँव। ग्रेटर नोएडा में हुए इस हड़कम्प की गूँज आज तक विभिन्न कोर्टों में चल रही है। कभी राहुल गाँधी भट्टा पारसौल पहुँचते हैं तो कभी फ़रीदाबाद व गुड़गाँव के लोग राहुल बाबा के खिलाफ़ नारेबाजी करते हैं। अजब सी राजनीति होने लगी है। कभी सिंगूर की जमीन तो कभी ओड़ीशा में पोस्को का प्लांट। हर ओर केवल जमीन की जंग है। महाभारत काल में हुई जमीन की जंग इसके आगे छोटी पड़ती नज़र आती है। इससे स्पष्ट समझ आ जाता है कि डिवलेप्मेंट पर हमारी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। तेलंगाला के मुद्दे को हर पार्टी गरमा कर रखना चाहती है। चाहें जगन रेड्डी हो...टीआरएस हो..तेदेपा हो..भाजपा अथवा कांग्रेस.. सभी तेलंगाना चाहते हैं... वोट बटोरना चाहते हैं..

न जाने कितने और राज्यों के टुकड़े निकल कर आने बाकि हैं अभी भारत में से...

राजनैतिक दलों का वोट के लिये नीतियों में बदलाव करना भी जस का तस है। तमिलनाडु विधानसभा में अम्मा और "करूणा" के सागर करूणानिधि ने राजीव के हत्यारों का समर्थन कर फ़ाँसी रोकनी चाही तो चहीं जम्मू कश्मीर में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। भाजपा को छोड़ सभी दल अफ़्ज़ल गुरू को बचाने में लगे हैं। हालाँकि राज्य में कांग्रेस थोड़े पसोपेश में है। परन्तु अब्दुल्लाओं व मुफ़्तियों का रूख स्पष्ट है। समझ यह नहीं आता कि प्रधान मंत्री के हत्यारों व संसद और देश के गद्दारों का कोई हिमायती कैसे हो सकता है? वोटों की खातिर राष्ट्रभक्ति को दाँव पर कैसे लगाया जा सकता है। वैसे खबर पंजाब से भी थी कि अकाली दल आतंकवादी भुल्लर की सजा माफ़ कराना चाहता है पर अपबे सहयोगी भाजपा के दबाव के कारण कुछ कर नहीं पाया। यहाँ भी कोई परिवर्तन नहीं। कोई बदलाव नहीं।

पिछले दो दशकों से आरक्षण की आग लगातार भड़की हुई है। राजनैतिक दल इसे शांत करना भी नहीं चाहते।  आरक्षण की लकड़ी से जितनी आग भड़केगी उतना ही वोट का चूल्हा जलता रहेगा। आरक्षण नामक बैसाखी ने देश को अपंग बना दिया है। मायावती ने हाल ही में कभी मुसलमानों, कभी अगड़ों तो कभी जाटों को आरक्षण देने की माँग रखी। मतलब यह कि आरक्षण पर भी इस देश में कोई परिवर्तन नहीं आया है। न ही कोई अन्ना और न ही कोई रामदेव आगे आया है।

जमीन से बात शुरू हुई थी तो जमीन पर ही खत्म करना चाहूँगा। बात करते हैं कर्नाटक में हुए अवैध खनन की व बेल्लारी के रेड्डी बँधुओ की। दक्षिण भारत में पहली बार बनी भाजपा की सरकार की नैया "जमीन" ने ही डगमगा दी। पूर्व मुख्यमंत्री येद्दुयरप्पा पर "जमीन" के इतने आरोप लगे कि उनको अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। पर हक़ीकत यह भी कि कर्नाटक एकमात्र राज्य नहीं है जहाँ अवैध खनन हो रहा है। कोर्ट की नज़र जरा भी टेढ़ी हुई तो आंध्र से हो रहे अवैध निर्यात, ओड़ीशा व झारखंड में भी चल रहे खनन पर रोक लगाई जा सकती है और कईं "बड़ी मछलियाँ" भी इस जाल में फ़ँस सकती हैं।


राजनीति को छोड़ कर यदि समाज की बात करें तो कभी कभार लगता है कि शायद हम सभ्य समाज का हिस्सा ही नहीं है। गलियों से निकलो तो लोगों ने अपने घर के बाहर कूड़ा डाला होता है। नगर निगम की गाड़ी मुफ़्त में कूड़ा उठाने आती है उसके बावजूद लोग कूड़ा फ़ैलाते हैं, सड़क पर पान खा कर थूकते हैं। ऐसे लोगों से निवेदन है कि कृपया अपने घर में सोफ़े पर बैठ कर फ़र्श पर थूकें।

पिछले एक सप्ताह में दिल्ली में दो-तीन ऐसी घटनायें हुईं जो ये दर्शाती है कि हमारी "सोच" व "स्टेटस" में कितना परिवर्तन हुआ है। गुड़गाँव टोल पर आधी रात में टोलकर्मी की हत्या। वजह मात्र 27 रूपये। दिल्ली-नोएडा टोल पर टवेरा द्वारा एक पुलिसकर्मी को उड़ा देना। कारण - पुलिसवाला तेज़ आती टवेरा को रोकने को कह रहा था। और दो दिन पूर्व ही रात को 18-19 साल का एक एक युवक (बच्चा ?) तेज़ गाड़ी चलाता हुआ फ़ुटपाथ से टकराया और मारा गया। आप ही बतायें कि विचारों व सामाजिक दृष्टि से हम कितने बीमार हैं?

ये सब घटनायें होती हैं तो दिल दुखी होता है कि आखिर हम जा कहाँ रहे हैं? क्या इसी को कहते हैं "डिवलेप्मेंट"? क्या यही है जीडीपी की "ग्रोथरेट"? वैसे पैसा ही खुशी का पैमाना होता तो आज पश्चिम भी सुखी होता। देश में केवल भ्रष्टाचार ही एक मात्र मुद्दा नहीं.. अन्नाओं व बाबाओं व गुरूओं को आगे आना ही होगा। 

परिवर्तन कहाँ कहाँ ?

यदि भगवान कृष्ण की मानें तो परिवर्तन तो संसार में होगा ही। पर यह परिवर्तन अच्छा होगा या बुरा...? पिछले एक वर्ष में इस देश ने भ्रष्टाचार के कईं केस झेले हैं। किन्तु बाबा रामदेव का कालेधन का आंदोलन और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के विरूद्ध भूख हड़ताल ने देश में कुछ परिवर्तन अवश्य किया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि सभी नेताओं व जनता का हृदय परिवर्तन हो गया है। पर हाँ यह अन्ना के अनशन का असर था कि दिल्ली सरकार व नगर निगम ने सिटीज़न चार्टर की पन्द्रह सितम्बर से शुरूआत कर दी। अब हर काम करने से पहले सरकार व निगम के अधिकारी हमें उस काम में लगने वाले समय के बारे में बता दिया करेंगे।  

हम सरकारी लोकपाल व जनलोकपाल की बातें करते हैं किन्तु जब हमें यह पता चले कि 55 प्रतिशत भारतीयों ने अपने "कर कमलों" के द्वारा रिश्वत दी है तो पैरों तले जमीन खिसकते देर न लगेगी। जब जनता ही भ्रष्ट है तो "ऊपर"वाले क्या करेंगे। हम सुविधा के नाम पर "एजेंटों" को पैसा खिलाते हैं। ट्रैफ़िक पुलिस को तो पचास रूपये के "पत्ते" से "पटा" लेते हैं।

पिछले एक वर्ष में ही फ़ेसबुक व ट्विटर ने जो धमाल मचाया है उससे सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रान्ति आई है। इसी का नतीजा रहा कि अन्ना का अनशन इतना कामयाब हो पाया। लोगों में जागरूकता आ रही है। सूचना तेज़ गति से लोगों तक पहुँच रही है। पर इससे थोड़ा बच कर रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि गलत सूचना भी उतनी ही तेज़ गति से चलेगी।

एक भ्रष्टाचार ही नहीं अपितु और भी अन्य क्षेत्र हैं जहाँ हमें सुधार की जरूरत है। विदेश नीति पर मैं कुछ नहीं कहूँगा। चीन के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। आप सब जानते ही हैं। बंग्लादेशियों का गैरकानूनी तरीके से भारत में दाखिल होना...आदि आदि...
लेख के पहले हिस्से में भी मैं कुछ बीमरियों के बारे मैं पहले ही बता चुका हूँ जिनसे देश जूझ रहा है।

जिस देश में जीडीपी की दर आठ से नौ प्रतिशत है वह देश यदि महिला उत्पीड़न, भुखमरी व कुपोषण में कभी सौ देशों के नीचे तो कभी डेढ़ सौ देशों से भी नीचे रहे तो यह उस देश के लिये डूब मरने जैसा है। स्वयं को सबसे अधिक विकासशील कहे जाने वाले देश की हालत इतनी बदतर है यह सोचा भी नहीं जा सकता। यह देश किस हक़ से संयुक्त राष्ट्र में अपनी सीट चाह रहा है यह चिंतन करने वाली बात है। इसमें गर्व करने वाली कोई बात नहीं है।

धूप-छाँव, मैं और मेरा दायित्व?

अक्टूबर २०१० वह दौर था जब मैंने धूप-छाँव पर दोबारा लिखना शुरू किया था। करीबन दो साल के लम्बे अंतराल के पश्चात दोबार अपने ब्लॉग पर लिखना एक सुखद अनुभव रहा। इस बार राजनैतिक व सामाजिक लेखों के अलावा "क्या आप जानते हैं" व "तस्वीरों में देखिये" जैसे स्तम्भ शुरू किये। इसके अलावा राजनीति पर चुटकी लेने के लिये "गुस्ताखियाँ हाजिर हैं" जैसी श्रूंख्ला भी लिखनी शुरू की। समय बीतता गया और "भूले बिसरे गीत" व "अतुल्य भारत" जैसी श्रूंख्लायें भी आरम्भ हो गईं। राजनीति के लेखों से ऊब का नतीजा रहा है इन सभी स्तम्भों की शुरुआत। कभी कभी देश में हो रही राजनीति देखकर मन खिन्न हो जाता है। और इन स्तम्भों के लिये "मसाला" ढूँढते हुए मेरा स्वयं का भी भरपूर ज्ञानवर्धन हुआ।

पिछले वर्ष से अब तक कुछ परिवर्तन हुआ है पर कुछ और बदलाव की इच्छा है। कहीं पढ़ा कि कोई व्यक्ति सही अथवा गलत नहीं होता। सभी अलग तरह के व्यक्ति हैं। सभी की सोच व विचार अलग हैं। यह तो हमारी परवरिश व हमारे साथ हुई घटनायें हैं जिनके प्रभाव से हम किसी व्यक्ति को अच्छा व बुरा समझ लेते हैं।

कबीर दास जी कहते हैं कि बुरा जो देखन मैं चला तो मुझसे बुरा न कोए।

हम किसी दूसरे को सुधार नहीं सकते.. कोई अच्छा मित्र हो तो एक या दो बार सलाह जरूर दे सकते हैं..पर स्वयं को सुधारने का जिम्मा तो हम पर ही है। यदि अपनी बात करूँ तो मुझमें कुछ बुरी आदते हैं। थोड़ा बहुत जो इस बुद्धि को समझ आया वह यह है कि कभी किसी बात पर चिड़चिड़े न हो। मेरी सबसे बुरी आदत यह है कि जो चीज़ मुझे अच्छी नहीं लगती या कोई मेरे मुताबिक नहीं बोलता या करता तो मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ। मैं ये मान नहीं पाता कि दूसरा व्यक्ति मुझसे अलग है। आगे गाड़ी धीरे चल रही है.. मुझे परेशानी है... किसी ने रेड लाईट पार कर दी.. मुझे तक़लीफ़ है...छोटा भाई या बहन मेरे कहे अनुसार काम नहीं करता तो मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ.. उन्हें डाँट देता हूँ.... और भी कईं छोटी छॊटी बातें होती हैं जो हमार खून जलाने का काम करती हैं। उससे किसी का भला नहीं होता बल्कि स्वयं का शरीर ही खराब होता है।

क्रोध मनुष्य का व बुद्धि का शत्रु है। इस वर्ष यही वाक्य को समझ कर आगे बढ़ने का प्रयास करना है। अभी तक धर्म व अध्यात्म ही एक तरीका नज़र आ रहा है जिससे स्वयं में सुधार हो सकता है। हमारे ग्रंथों में गीता-रामचरितमानस में न जाने कितनी ही अनगिनत बातें हैं जो हम उनसे सीख सकते हैं। कोई भी व्यक्ति परफ़ेक्ट नहीं होता। थोड़ी बहुत गुंजाईश हमेशा रहती है, रहेगी। जीवन से सीखना जिसने जारी रखा वही सफ़ल है। जीवन में कुछ करने की इच्छा है। रूका हुआ पानी केवल सड़ता है जबकि बहता पानी स्वयं भी प्रफ़ुल्लित रहता है और उसके राह में आने वाले पेड़-पौधों को भी खुशियाँ देता है। जिस किसी से भी अच्छी बात सीखने को मिले सीख लो। कईं ऐसी बातें पढ़ने को मिल जाती हैं..कुछ मित्र ऐसी बातें कह जाते हैं कि दिल में घर कर जाती हैं..उन सभी का धन्यवाद जिनसे मैंने तिनका भर ही सीखा हो... 

लेखों के जरिये तो यह सफ़र जारी रहेगा ही पर आने वाले वर्ष में जमीनी स्तर पर भी कुछ सामाजिक कार्य करने की इच्छा है।

अगले कुछ माहों में धूप-छाँव पर भी आप धर्म व अध्यात्म से जुड़े कुछ लेख पढ़ सकेंगे। मैं अभी इन सब बातों में बहुत छॊटा हूँ इसलिये त्रुटि की पूरी सम्भावना है।

जैन धर्म में एक दिन होता है जब लोग अपनी गलतियों के लिये क्षमा माँगते हैं। यदि कोई भूल हुई हो या मेरे कारण किसी का भी दिन दुखा हो तो उसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

देश व दुनिया में कब परिवर्तन होगा पता नहीं.. सही ..गलत..कुछ नहीं पता... पर स्वयं में अपनी बुद्धि के अनुसार बदलाव की चाह लिये...
स्वयं में, देश में, लोगों में....परिवर्तन के इंतज़ार में.. अगला साल क्या रंग लेकर आयेगा पता नहीं....

घरों में से "गीता-सार" भी न जाने कहाँ खो गया है...

रामचरितमानस के उत्तरकांड की सूक्तियों के साथ लेख समाप्त करता हूँ।


परहित सरस धरम नहीं भाई ।
परपीड़ा सम नहीं अधमाई ॥



परोपकार के समान कोई धर्म नहीं..दूसरों को पीड़ित करने के समान कोई पाप नहीं...





फ़िल्म सफ़र का यह गाना आज गुनगुनाने का मन कर रहा है...




नदिया चले, चले रे धारा,
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आँधी से, तूफ़ान से डरता नहीं है
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा

पार हुआ वो रहा जो सफर में
पार हुआ वो रहा जो सफर में
जो भी रुका, घिर गया वो भंवर में
नाव तो क्या, बह जाए किनारा
नाव तो क्या, बह जाए किनारा
बड़ी ही तेज समय की है धारा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा


जय हिन्द
वन्देमातरम

आगे पढ़ें >>

Tuesday, September 27, 2011

भूले बिसरे गीत: एस.डी बर्मन के जन्मदिन पर समर्पित आज का यह अंक Old Hindi Movies Songs SD Burman Special

एक अक्तूबर 1906 को कोमिल्ला (अब बांग्लादेश) में एक बच्चे का जन्म हुआ जो हिन्दी फ़िल्म जगत में सचिन देव बर्मन (1 अक्टूबर 1906 - 31 अक्टूबर 1975) के नाम से जाना गया। बर्मन दा ने सौ से भी अधिक बॉलीवुड और बंगाली फ़िल्मों में अपना संगीत दिया।।

वे हिन्दी और बंगाली फ़िल्म संगीत प्रेमियों के चहेते बने रहे। एस.डी बर्मन ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, गीता दत्त, मन्ना डे, किशोर कुमार, हेमन्त कुमार, आशा भोंसले, शमशाद बेग़म, मुकेश व तलत महमूद सभी के साथ काम किया। 

उन्होंने बीस फ़िल्मों में स्वयं भी गाने गाये हैं। इस बार के भूले-बिसरे गीत में हैं उनके जन्मदिन पर उन्हीं के गाये हुए गीत। उनकी आवाज़ में गजब सा जादू था, कशिश थी जिसे सुनते ही हर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाता है।

एस.डी. बर्मन उन शख़्सियतों में शामिल थे जिन्हें अवार्ड मिलते ही उस अवार्ड की महत्ता बढ़ जाती है।

1934: गोल्ड मैडल, बंगाल ऑल इंडिया म्यूज़िक कॉंफ़्रेंस, कोलकाता
1958: संगीत नाटक अकादमी
1958: एशिया फ़िल्म सोसायटी अवार्ड

राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड

  • 1970 :  पार्श्वगायक (सफ़ल होगी तेरी आराधना :  आराधना)
  • 1974: संगीत निर्देशन (ज़िन्दगी ज़िन्दगी)

1969: पद्मश्री अवार्ड

फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड:

  • 1954: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : टैक्सी ड्राईवर
  • 1973: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : अभिमान
  • 1959: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : सुजाता (नामांकित)
  • 1965: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : गाईड (नामांकित)
  • 1969: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : आराधना (नामांकित)
  • 1970: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : तलाश (नामांकित)
  • 1974: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : प्रेम नगर (नामांकित)


सफ़ल होगी तेरी आराधना

फ़िल्म: आराधना (1969)
संगीत: सचिन देव बर्मन
गीत: आनन्द बख़्शी




वहाँ कौन है तेरा
फ़िल्म: गाईड (1965)


मेरे साजन हैं उस पार 
फ़िल्म: बन्दिनी (1963)




।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।

आगे पढ़ें >>

Thursday, September 22, 2011

हमें क्यों आवश्यकता पड़ती है एक "स्पेशल" दिन की? (माइक्रोपोस्ट) Why Do We Celebrate Hindi Divas? Why Not Everyday? (Micropost)

हर वर्ष सितम्बर माह की चौदह तारीख को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। आखिर इन "दिवसों" की आवश्यकता क्या पड़ती है? क्यों नहीं हर दिन हम हिन्दी को अपनी आत्मा में संजो कर रख सकते? क्यों हम अंग्रेज़ों की तरह साल में एक दिन का इंतज़ार करते हैं कुछ करने के लिये। हमारे देश को व देश के लोगों को विदेशियों की आदतें कॉपी करने में आनन्द आता है। हम यह नहीं सोचते कि विदेशी को कर रहे हैं वे अच्छा है अथवा बुरा।

अग्रेज़ों के यहाँ रिश्ते आज हैं और कल नहीं। इसलिये अपने प्रेमी से प्रेम का इज़हार करने के लिये वैलेंटाईन डे बनाया। हर साल ही प्रेमी और प्रेमिका बदलते रहते हैं वहाँ। वैसे तो पति-पत्नी भी एक वर्ष साथ रह जायें वही बहुत है। उनके लिये परिवार आवश्यक नहीं इसलिये मदर्स डे व फ़ादर्स डे जैसे दिन बना डाले। चलो एक दिन तो अपने माता-पिता के पास वे जायेंगे। और हम उस श्रवणकुमार की कहानी भूल जाते हैं जो अपने अँधे माता पिता को सभी धामों की यात्रा कराता था।  क्यों नहीं श्रवणकुमार की याद में कोई दिवस मनाया जाता? है न ग्लोबलाइज़ेशन का कमाल!! देश को भूलो परदेस को याद रखो....

उसी तरह हम हिन्दी भी भूल रहे हैं। अंग्रेज़ी व अन्य विदेशी भाषायें इस कदर हम पर हावी हैं कि कुछ लोग अपने दो-तीन साल के बच्चे के साथ भी अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं। मैक-डॉनैल्ड जैसे विदेशी रेस्टोरेंट में जाकर धड़ल्ले से अंग्रेज़ी में रोब जमाते हैं। और ऐसे व्यवहार करते हैं कि जैसे हिन्दी बोलना पाप हो गया हो। हिन्दी बोलने वाला बच्चा हीन भावना का शिकार हो रहा है। 

आजकल छठीं कक्षा से फ़्रेंच व जर्मन भाषायें सिखाने का चलन शुरू हो गया। अभिभावक यह समझते हैं कि चूँकि ये भाषायें उनके बच्चे का "विकास" करेंगी इसलिये वे अपने बच्चों को जर्मन व फ़्रेंच सिखा रहे हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि वे संस्कृत न पढ़वा कर बच्चे को बौद्धिक विकास से दूर कर रहे हैं। हमारे ग्रन्थों में व नीतियों में ऐसी गूढ़ बातों का  उल्लेख है जो हम जर्मन व स्पेनिश में नहीं सीख सकते। जर्मन व स्पेनिश जैसी भाषायें तो आप एक साल का कोई भी कोर्स करके सीख जायेंगे..पर संस्कृत कब सीखेंगे? आपको यह जानकर अचरज हो सकता है कि चीन का विश्वविद्यालय संस्कृत सिखा रहा है और विद्यार्थियों में रूचि भी है। और हम.... ग्लोबलाइज़ेशन का जमाना है...

आज हिन्दी इतनी उपेक्षित हो चुकी है कि यह "एक दिन" की मोहताज बन गई है। सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक संस्कृत अब केवल पंडितों की भाषा बन कर रह गई है। उसका तो एक "दिवस" भी मुझे नहीं पता। क्या आपको पता है "संस्कृत दिवस" कब मनाया जाता है? बहरहाल प्रश्न जस का तस ही रह जाता है। "’हिन्दी दिवस" की आवश्यकता क्यॊं है? यदि हम प्रति दिन हिन्दी को अपनी आत्मा बना कर रखें तो शायद ....


वैसे क्या आप जानते हैं अमरीका के लोग "इंग्लिश डे" कब मनाते हैं?

जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Sunday, September 18, 2011

दो खेल, दो कहानियाँ, दो वर्तमान...पर अंजाम केवल एक.. मौत... Death Of Cricket and hockey But different reasons

एक खेल जीना चाह रहा है पर हर पल मौत से जूझ रहा है और दूसरा अपने ऐश-ओ-आराम में इतना खो गया है कि जीना भूल गया है। एक खेल गरीबी की बीमारी से जूझ रहा है तो दूसरे खेल को वो हर सुविधा मुहैया कराई जा रही है जिसकी उसे आवश्यकता है। एक खेल में खिलाड़ियों की आत्मा बसती है तो दूसरे खेल में खिलाड़ी अपनी आत्मा का सौदा करते हैं। एक हमारा राष्ट्रीय खेल है तो दूसरा राष्ट्र का खेल है।

उपर्युक्त पंक्तियों में हॉकी का दर्द सुनाई दे जायेगा। यह खेल हमारा राष्ट्रीय खेल है जिसे मेजर ध्यानचंद जैसे खिलाड़ी ने अपने पसीने सींचा और परगट सिंह व धनराज पिल्लै ने इसका ध्यान रखा। वो मेजर ध्यानचंद जिसके हॉकी पर लोग शक करते थे कि कहीं उन्होंने अपनी स्टिक में कुछ लगा तो नहीं रखा? आखिर गेंद उनकी स्टिक से हटती क्यों नहीं? परन्तु यह खेल हर पल घुटता गया। इतना उपेक्षित हो गया कि खिलाड़ी खून के आँसू पीते चले गये और एक दिन ऐसा आया जब धनराज पिल्लै जैसा शख्स चीख पड़ता है और कराह कर कहता है कि-हॉकी ने मुझे इज़्ज़त दी, शोहरत दी पर पैसा नहीं दिया।

हॉकी के खिलाड़ी इस खेल को जी रहे हैं। इस खेल को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं। किसी के पास प्रैक्टिस करने के जूते नहीं तो कोई एक ही जोड़ी जूतों से सारे गेम खेल रहा है और उन्हीं से प्रैक्टिस भी कर रहा है। ऐसी एकेडमी नहीं जहाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधायें हों व कोच हो। काफ़ी प्रयासों व कठिन परिश्रम के पश्चात जब यही हॉकी टीम एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीम बन कर भारत लौटती है तो इस टीम को महज पच्चीस हजार रूपये का "पुरस्कार(?)" दिया जाता है। खेल मंत्रालय इतने में ही खुश दिखाई देता और खिलाड़ियों की पीठ थपथपाता है। खिलाड़ियों में गुस्सा साफ़ दिखाई देता है जब वे इस पुरस्कार को लेने से ही मना कर देते हैं। मौका देखकर पंजाब सरकार पच्चीस लाख रूपये का ईनाम घोषित करती है तो अजय माकन जी को भारी दबाव के चलते उसी दिन पुरस्कार की राशि डेढ़-डेढ़ लाख रूपये प्रति खिलाड़ी कर देनी पड़ती है। अजय माकन जी हॉकी इंडिया और आईएचएफ़ का विवाद ही सुलझाने में ही लगे हुए हैं।

वैसे खेलों में सुधारों के लिये एक अच्छा बिल पेश किया था इन्होंने पर सत्ता और फ़ेडरेशनों के ठेकेदारों ने इसे सिरे से नकार दिया। विजय कुमार मल्होत्रा, अजय चौटाला जैसे नेता बिदके जो कईं वर्षों से अपने अपने फ़ेडरेशनों के मालिक बने बैठे हैं तो दूसरी ओर फ़ार्रूख अब्दुला को फ़ेडरेशन के अध्यक्ष की अधिकतम आयु सत्तर वर्ष करना रास नहीं आया। वे कहते हैं कि अभी तो वे "जवान" हैं इसलिये वे अध्यक्ष पद सम्भाल सकते हैं। उन्हें कौन समझाये कि एक आम इंसान भी साठ बरस में रिटायर होता है और पैसठ की उम्र में जज भी कुर्सी छोड़ देते हैं। पर नेता जी को कौन समझाये। और हमारे शरद पवार जी। वे तो चूहे की तरह "मैडम जी" की धमकी देने लग गये। भई वाह!

यह कैसी बेचारगी है? किसी भी देश के राष्ट्रीय खेल की ऐसी बुरी हालत शायद ही होगी। क्यों नहीं इसके पुनरुत्थान के लिये प्रयास किये जाते? क्यों नहीं कोई कॉर्पोरेट जगत से आगे आता है? हॉकी को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है। आईपीएल की तर्ज पर क्यों नहीं हॉकी में भी कोई टूर्नामेंट शुरू किया जाता? कुछ वर्ष पूर्व ऐसा टूर्नामेंट ईएस्पीएन की तरफ़ से शुरू किया गया था पर लोगों की जागरूकता व सरकार की उदासीनता के कारण बंद कर दिया गय। स्कूलों से ही इस खेल में बच्चों का ध्यान लगाने की आवश्यकता है। इस समय हॉकी ऐसे मरीज की तरह है जो "कोमा" में है परन्तु अपनी इच्छा शक्ति के बल पर वापिस जीना चाह रहा हो। 

दूसरी ओर एक ऐसा खेल है जिसमें हर खिलाड़ी को औसतन तीस लाख रूपये सालाना दिया जाता है। प्रति मैच उन्हें एक से दो लाख के बीच अलग से मिलता है। इस खेल के खिलाड़ियों के पास सुविधाओं की कमी नहीं है।एड जगत इन्हें सर-माथे बिठाता है। पर ये खिलाड़ी देश से पहले अपने क्लब के बारे में सोचते हैं। ये "बिगड़ैल" खिलाड़ी हैं जिन्हें खेलों से अधिक पार्टियाँ  प्यारी हैं। और हालत ये हो गई है कि विश्व चैम्पियन टीम रैंकिंग में पाँचवें नम्बर की टीम है। पर फिर भी इस टीम के खिलाड़ियों को डेढ़ लाख से ज्यादा मिलता है। किसी की टाँग टूटी है, किसी का हाथ, किसी आँख, किसी का कान, किसी की उंगली तो किसी की कमर। वैसे अंतर्राष्ट्रीय मैच यह नहीं खेलेंगे परन्तु जहाँ पैसा होगा वहाँ ये ज़रुर जायेंगे। क्रिकेट भी बदहाल हो चुकी है। यहाँ केवल पैसा रह गया है पर खेल खत्म हो चुका है। इस पर मैं विस्तार से कुछ नहीं कहूँगा।

दो विभिन्न शैली के खेल हैं, दोनों की कहानी अलग, दोनों का इतिहास अलग, दोनों के प्रति नेताओं व कॉर्पोरेट व फ़िल्म जगत के करोड़पतियों-अरबपतियों व्यवहार अलग, दोनों का "आज" अलग। लेकिन यकीन मानिये यदि दोनों ही खेलों पर ध्यान नहीं दिया तो दोनों का ही आने वाला "कल" एक ही होगा। एक खेल गुमनामी के अँधेरों में धकेल दिया जायेगा तो दूसरा खेल सब कुछ  होते हुए भी बेमौत मार दिया जायेगा।


जय हिन्द
वन्देमातरम


आगे पढ़ें >>

Thursday, September 15, 2011

यूनेस्को की लिस्ट में शामिल हुमायूँ का मकबरा और कुतुब मीनार : अतुल्य भारत Humayun's Tomb, Qutub Minar Unesco List

अतुल्य भारत के पिछले अंकों में यूनेस्को की लिस्ट में भारत के 28 में से तीन स्थलों के बारे में बताने के बाद आज हम दिल्ली के दो स्थलों के बारे में जानेंगे।

हुमायूँ का मकबरा
पहला है हुमायूँ का मकबरा। हाल ही में जब ओबामा भारत आये तब वे भी इस मकबरे के दर्शन करने गये थे। हुमायूँ का मकबरा ताजमहल के बनने से करीबन एक शताब्दी पहले बन कर तैयार हुआ। इस मकबरे में नये तरह उपकरण लगाये गये व शाही बाग के बीचो बीच बनाया गया। यह मक़बरा 1570 में निर्मित हुआ व इसकी सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए यूनेस्को ने इसे 1993 में अपनी लिस्ट में शामिल किया। हुमायूँ की विधवा बेगम हाजी ने इसे 1569-1570 में बनवाया। इसके निर्माण में इसके वास्तुकार मिर्ज़ा गियात ने अहम भूमिका निभाई। अपनी दो गुम्बददारी छतरियों के कारण यह मुगल शैली अपने आप में अद्भुत है। यहाँ हुमायूँ के मकबरे के अलावा 150 अन्य शाही लोगों की भी कब्र हैं।


जल में मकबरे का प्रतिबिम्ब

इस मकबरे में दो गेट के साथ चार बाग हैं। यह दोनों गेट एक दक्षिण की ओर है अथवा दूसरा उत्तर की ओर। यहाँ अनगिनत जल संग्रह हैं। गुम्बद की ऊँचाई 42.5 मीटर है। इसमें संगमरमर लगाये गये हैं व छतरियों से इसे सजाया गया है। दिल्ली के अन्य बेहतरीन स्मारकों जैसे अक्षरधाम मंदिर, लाल किला, इंडिया गेट व  बहाई मंदिर आदि ऐतिहासिक व सांस्कृतिक स्थलों को छोड़ कर हुमायूँ के मकबरे में ओबामा के जाने के दो अर्थ हो सकते हैं। एक, वे इस मकबरे के अद्भुत सौंदर्य का दर्शन करना चाहते थे या फिर अपना कोई राजनैतिक कारण रहा होगा।

कुतुब मीनार

दूसरा स्मारक है कुतुब मीनार। दक्षिणी दिल्ली में स्थित कुतुब मीनार के इर्दगिर्द अन्य स्मारक भी हैं। लाल पत्थरों से निर्मित इस मीनार की ऊँचाई करीबन 238 फ़ीट है। ज़मीन पर इसका डायामीटर 47 फ़ीट का है जो सबसे ऊपर जाकर मात्र 9 फ़ीट का रह जाता है। इस स्थल का निर्माण तेरहवीं शताब्दी में शुरु हुआ व अलग अलग चरणों में हुआ। अलई दरवाज़ा, अलई मीनार और फिर कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद जो भारत की सबसे पहले बनाई गईं मस्जिदों में शुमार है। इल्तुमिश का मकबरा व लोहे का स्तम्भ भी इसी क्षेत्र में आते हैं।

लौह स्तम्भ किस धातु से बना हुआ इस पर कईं वैज्ञानिक शोध करते आये हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह स्तम्भ अद्भुत है क्योंकि इस पर जंग नहीं लगता जिस प्रकार अन्य साधारण लोहे की किसी वस्तु पर लगता है। इस्लामिक तानाशाही व लूट-पाट की निशानी है यह क्षेत्र जो कहा जाता है हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करके बनाया गया। तुग़लक, लोदी, अब्दाली, गज़नवी व अन्य अनगिनत लुटेरे हमारे यहाँ आये और लूट कर चले गये। 

अलई दरवाज़ा
खैर, इस लौह स्तम्भ की ऊँचाई तेईस फ़ीट है व इस पर संस्कृत भाषा में लिखा गया है। कहा जाता है कि इसे चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज काल में बनाया गया। इतिहास के अनुसार कुतुब मीनार के निर्माण का आरम्भ कुतुब्बुद्दीन ऐबक ने सन 1192 में किया जिसे बाद में इल्तुमिश (1211-36) व अलाउद्दीन खल्जी (1296-1316) ने पूरा किया। बाद में इसमें अन्य शासकों ने भी लगातार बदलाव किये।  यूनेस्को ने इसे इस्लामिक वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए विश्व घरोहरों की श्रेणी में शामिल किया।
आगे पढ़ें >>

Sunday, September 11, 2011

अमर सिंह को पहुँचे तिहाड़, दिल्ली पर आतंकी हमला और पाकिस्तान व चीन क्या कर रहे हैं राजस्थान की सीमा पर? China-Pakistan At Rajasthan Border, Amar singh sent to Tihar, Delhi Bomb Blast - Where are terrorists?

राजनैतिक दृष्टि से पिछला सप्ताह काफ़ी उथल-पुथल का रहा। वैसे तो पिछले दो-तीन वर्षों में कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता जब पक्ष व विपक्ष शांत रहे हों। दिग्विजय सिंह जी ने रामदेव को ठग की उपाधि तक डाली। बेल्लारी बँधुओं को कर्नाटक में हो रहे अवैध खनन के मामले में जेल भेज दिया है। अन्ना की टीम अपनी अगली रणनीति के लिये मीटिंग कर रही है। लेकिन तीन मुद्दे महत्त्वपूर्ण रहे जिनमें से दो पर तो मीडिया की नज़र गई पर एक खबर ऐसी थी जो पर्दे के पीछे रह गई। 


पहली खबर रही अमर सिंह को तिहाड़ भेजने की। आज के हालात ऐसे हैं जिसमें या तो तिहाड़ में 800 लोगों के लिये एक ऑडिटॉरियम बनवा देना चाहिये या फिर संसद में तिहाड़-एक्स्टेंशन खोल देना चाहिये। "वोट के बदले नोट" का केस जो वर्ष 2008 में चर्चा का विषय रहा। अमर सिंह के ऊपर आरोप है कि उन्होंने भाजपा के तीन सांसदों को सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिये घूस दी। उन्होंने अदालत में अर्जी दी कि उनकी दोनों किडनी खराब चल रही हैं और वे काफ़ी बीमार हैं। जज ने उनकी ये अपील खारिज कर दी और उन्हें अदालत में दोपहर 12.30 बजे तक हाजिर होने का आदेश दिया। उनके साथ भाजपा के दो पूर्व सांसद भी जेल भेज दिये गये। जिन तीन सांसदों को रिश्वत दी गई थी उनमें से एक आज भी सांसद हैं इसलिये बिना लोकसभा सेक्रेट्री के आदेश के उन्हें जेल नहीं भेजा सकता था।

यदि आपको याद हो तो यह एक स्टिंग ऑप्रेशन था जिसे भाजपा ने आईबीएन के साथ मिलकर किया था। भाजपा के तीनों सांसदों ने जानबूझ कर रिश्वत ली और कैमरे में कैद करना चाहा। भाजपा ने संसद में रूपयों  की गड्डी उछालीं और यह उम्मीद करी की आईबीएन स्टिंग ऑप्रेशन की  वीडियो जनता को दिखायेगा। लेकिन इस चैनल ने यह कहकर वीडियो दिखाने से मना कर दिया कि तस्वीरें साफ़ नहीं थीं। अब  इसे क्या कहा जाये मुझे नहीं मालूम। और इन सब में हैरानी की बात यह रही सीबीआई ने सत्ता पक्ष के एक भी नेता पर आरोप नहीं लगाये।   मतलब यह कि अमर सिंह ने रिश्वत दी,  भाजपा सांसदों ने रिश्वत ली, चैनल ने सब रिकॉर्ड किया पर इन सबसे जिस सरकार का फ़ायदा होना था उस सत्ता पक्ष में कोई आरोपी नहीं।

दूसरा मुद्दा रहा दिल्ली में हुआ बम विस्फ़ोट। तेरह लोग मारे गये और सौ के करीब घायल हुए। सरकार की ओर से वही रिकॉर्डेड बयान जो शायद उन्होंने पहले भी कईं बार यही बयान दिये होंगे। सुन सुन कर कान भी पक गये हैं। माना कि हर बम विस्फ़ोट नहीं रोका जा सकता। पर होने के बाद आतंकवादी पकड़े तो जा सकते हैं? लेकिन नहीं, चार दिन में एक  भी आतंकवादी पकड़ा नहीं गया। सारी एजेंसियाँ अपने हिसाब से केस देख रही हैं। दिल्ली के पिछले कितने ही बम विस्फ़ोटों में एक भी आरोपी को नहीं पकड़ा जा सका है। क्या कर रही हैं सुरक्षा एजेंसियाँ? और यदि एक आध कोई अफ़्ज़ल या नलिनी जैसा पकड़ा भी जाता है तो उसे सजा नहीं होती। क्योंकि यदि फ़ाँसी हो गई तो किसी को अल्पसंख्यक वोट नहीं मिलेंगे तो किसी को अपने राज्य के। यह कैसा ’वोट’तंत्र है?


दस साल पहले अमरीका में आतंकी हमला हुआ। उसके दस साल में एक भी नहीं। और जिसने हमला किया वो  लादेन भी मारा गया। लेकिन हमारे देश में दस साल पहले संसद पर हमला हुआ। वह संसद जिससे देश चलता है। भारत की आन-बान-शान की धज्जियाँ उड़ा दी गईं। उस हमले के दस साल के अंदर इस  देश में 38 हमले हो चुके हैं। लेकिन किसी को सजा नहीं हुई। अफ़्ज़ल और कसाब जेल में कबाब खा रहे हैं। पर कैद में होते हुए भी आज़ाद हैं। यह कैसा कानून है? यह कैसा संविधान?

यह दोनों खबरें मीडिया में चर्चा में रहीं लेकिन सप्ताह के आरम्भ में एक ऐसी घटना घटी जो इक्के-दुक्के समाचार-पत्रों में ही नज़र आईं वो भी केवल एक ही दिन।

राजस्थान के बाड़मेर में एक गाँव है मुनाबाओ। यह गाँव पाकिस्तान के बॉर्डर पर स्थित है। पाकिस्तान इसी बॉर्डर के नज़दीक ही रेलवे स्टेशन बना रहा है। आप कहेंगे कि इसमें हर्ज ही क्या है? नियम के अनुसार किसी भी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के 150 गज के दायरे के अंदर कोई भी देश निर्माण नहीं कर सकता है। जबकि पाकिस्तान जो रेलवे स्टेशन बना रहा है वो केवल दस मीटर की दूरी पर है। जी हाँ, केवल दस मीटर। 2006 में उन्होंने इस सीमा पर ट्रैक बिछाना शुरु किया था जो अब सीमा के बेहद नज़दीक आ गया है। अब चौकाने वाली एक और बात यह है कि ये सब काम एक चीनी कम्पनी कर रही है। 

अब आप लोगों को सब समझ आ गया होगा। चीनी ड्रैगन ने पश्चिमी सीमा पर भी अपना कब्जा कर लिया है। सीमा सुरक्षा बलों की हर हरकत पर चीन की नज़रें हैं। हम चारों ओर से घिर चुके हैं। भारत ने अपनी शिकायत दर्ज कराई है पर...। इन सबसे क्या मिलेगा भारत को? श्री एस.एम.कृष्णा जैसे विदेश मंत्री हमारे पास हैं। कौन सा आरोपी पाकिस्तान की जेल में है कौन सा राजस्थान की यह उन्हें नहीं पता। सरबजीत को पाकिस्तान ने क्यों पकड़ रखा है यह उन्हें नहीं पता। हीना रब्बानी खार उनसे पहले हुर्रियत नेताओं से क्यों मिलीं यह भी उन्हें नहीं पता। सरकार के प्रधानमंत्री हों या राहुल बाबा या सोनिया जी सभी लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं और हमारे कृष्णा साहब तो किसी दूसरे देश का ही भाषण पढ़ देते हैं तो कहाँ विरोध जतायें हम? ऐसे विदेश मंत्री के दरवाजे पर खटखटायें? ठोस विदेशी नीतियों की कमी है हमारे पास या फिर इच्छा शक्ति की?

चलते-चलते: सोनिया जी वापिस आ गई है। "मैडम आईं राहत लाईं" का नारा लगा रहे होंगे कांग्रेसी नेता। देखते हैं अगला सप्ताह क्या नये रंग लेकर आता है।
चीन पाकिस्तान से बड़ा शत्रु है... 

जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Tuesday, September 6, 2011

कांग्रेस सरकार, टीम अन्ना, देशद्रोह व कुछ "सुविचार" Congress Government, Anti-Team Anna Campaign

टीम अन्ना को इस आंदोलन से कुछ हासिल नहीं हुआ.. न सरकारी लोकपाल बिल वापिस हुआ.. न वो तारीख बताई गई जब तक जनलोकपाल बिल पास होगा.. ऊपर से दस तरह के "दिखावटी" बिल और आ गये सरकार के पास...अब अगर  कुछ होगा तो संसद में बहस... इस आंदोलन से हार केवल टीम अन्ना की हुई है...और अब सरकार के वार पर वार.. देखें आगे क्या होता है.. अन्ना ने कहा आधी लड़ाई जीते हैं... मुश्किल लगता है...

हाल ही में किरण बेदी, प्रशांत भूषण व ओमपुरी पर संसद की अवहेलना का आरोप लगाया गया। सांसद संसद की गरिमा की दलील देने लगे। किरण बेदी कहती हैं "सांसद विश्वासघाती हैं" तो क्या गलत कहा है? प्रशांत भूषण जब कहते हैं कि "सांसद पैसा लेकर  सवाल पूछते हैं" तो क्या गलत कहते हैं? क्या सांसदों पर पहले कभी घूस का आरोप नहीं लगा है? बकायदा सुबूत हैं उसके। और जब आवेश में ओमपुरी के मुँह से सांसदों को अनपढ़ और गँवार कहा गया तो वो इस देश की जनता की आवाज़ थी। आज हर सोशल नेटवर्किंग साईट पर नेताओं के खिलाफ़ नारे पढ़े जा सकते हैं। वैसे सांसद जब संसद में बहस करते हैं तब अनपढ़-गँवार नहीं बल्कि पढ़े लिखे गँवार जरूर लगते हैं।

(ये मैंने क्या लिख दिया......!!)

अब पढ़ते हैं अन्य "सुविचार"...

  • हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी कहते हैं शहीद ओसामा बिन लादेन के शोक में प्रार्थना सभा की जाये। आगे बयान आता है कि कश्मीर की आज़ादी ही एकमात्र रास्ता है।
  • मीरवाईज़ उमर अफ़्ज़ल गुरू की फ़ाँसी पर कहते हैं कि यदि उमर व फ़ारूख अब्दुल्ला को अफ़्ज़ल की फ़िक्र है तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिये।
  • अरूंधति रॉय भी काफ़ी बार माओवादियों के समर्थन में खुलकर बोल चुकी हैं। हुर्रियत नेताओं के साथ एक ही मंच पर आकर कश्मीर की आज़ादी का गुणगान कर चुकी हैं। उनके हिसाब से कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नहीं क्योंकि वो कभी भारत में था ही नहीं।
  • उमर अब्दुला का हालिया बयान आया है कि यदि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा यदि अफ़्ज़ल गुरू की फ़ाँसी माफ़ करने की अर्जी दे तो क्या हिन्दुस्तान चुप बैठेगा। बातों बातों कईं बार अलगाववादियों का साथ दे चुके हैं और कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानने से आनाकानी करते रहते हैं।
  • जामा मस्जिद के शाही इमाम कहते हैं  कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन मुस्लिम-विरोधी है और मुसलमानों को इसमें शामिल नहीं होना चाहिये। वे न जाने कितनी बार हिन्दुस्तान विरोधी नारे लगा चुके हैं।
  • दिग्विजय सिंह ओसामा को "जी" कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट करते हैं। वैसे ये महाशय बहुत ज्ञानी हैं.. अन्ना की टीम का पूरा "सच" बस यही जानते हैं.. बाबा रामदेव को महाठग घोषित कर दिया है इन्होंने.. पिछले दस वर्षों में इन्हें बाबा रामदेव नहीं दिखाई दिये पर बस इसी साल ये नींद से जागे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यदि रामदेव सही राजनीति खेल पाते तो इनके आकाओं के पसीने छूट जाते।


और भी न जाने कितने ही ऐसे "सच्चे देशभक्त" महानुभाव हैं जो अपनी ज़ुबान से  "सुविचार" बोल चुके हैं। लेकिन उन पर कोई आरोप नहीं लगाये जाते..कांग्रेस सरकार कुछ नहीं कहती...क्यों? क्या माओवादियों को समर्थन देना..  अलगाववादियों का साथ देना देशद्रोह नहीं?

केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण को खरी खोटी सुनाने वाला सत्ता पक्ष उमर अब्दुल्ला के बयान पर क्यों चुप्पी साध लेता है? हुर्रियत नेताओं को नज़रबंद रखा जाने का  दिखावा क्यों किया जाता है? पाकिस्तान की विदेश मंत्री हमारे मन्त्रियों से मिलने से पहले हुर्रियत नेताओं से मिलती हैं वो भी नई दिल्ली में..  सरकार की नाक के ठीक नीचे..यही हुर्रियत नेता श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडे लहराते हैं और जश्न मनाते हैं..


कमाल है.. फिर भी आँखें मींच लेती है सरकार...

काले धन के साढ़े तीन लाख करोड़ नजर नहीं आते लेकिन केजरीवाल के नौ लाख जरूर खलते हैं.. सरकार की गरीबी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है...

आप ही बतायें देशद्रोह बड़ा है या संसद की अवहेलना? संसद देश की है। सरकार को संसद की गरिमा नज़र आती है परन्तु देश की मिटती साख और देश के विरूद्ध आग उगलते शब्द नज़र नहीं आते।

वैसे उमर अब्दुल्ला और अरूँधति रॉय पर सरकार चुप रहेगी। नई दिल्ली व श्रीनगर में हुर्रियत नेताओं के देश विरोधी बयान पर सरकार आँखें मूँद लेगी। बुखारी और मीरवाईज़ उमर और अफ़्ज़ल गुरू पर हो रही राजनीति भी उन्हें दिखाई नहीं देगी। कारण आप और मैं दोनों जानते हैं...

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वे कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होता...


एक अंतिम प्रश्न:  एक बार मान लेते हैं कि संसद जनता से बड़ी है.. सांसद हमारे कर्ताधर्ता हैं.. मंत्री व प्रधानमंत्री राजा हैं तो जिस अफ़्ज़ल ने संसद पर.. हमारे "महान", "सच्चे", "देशप्रेमी" सांसद, कर्त्तव्यनिष्ठ मंत्रियों पर हमला करवाया उसकी फ़ाँसी पर क्या आपत्ति है?


पहले भी कहा है आज फिर दोहराऊँगा, कसाब तो अपने देश पाकिस्तान के लिये हिन्दुस्तान आया.. उसको मारने से पहले अपने देश के गद्दार अफ़्ज़ल को फ़ाँसी दो।



नोट: आज का यह लेख नहीं.. भड़ास है.. जो कईं हिन्दुस्तानियों के दिलों में है... आज लिखते हुए दिमाग नहीं लगा पाया..



वन्देमातरम।
जय हिन्द।
आगे पढ़ें >>

Thursday, September 1, 2011

खुसरो के गीत से जब बोल चुराये गुलज़ार ने तो निकला यह बेमिसाल गीत Amir Khusrau, Gulzar, Beautiful Lyrics Film Ghulami

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश
ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है..
सुनाई देती है जिसकी धड़कन
हमारा दिल या तुम्हारा दिल है

फ़िल्म गुलामी का यह गीत अपने आप में एक मिसाल है। इसके गीतकार हैं गुलज़ार साहब। गुलज़ार ने फ़िल्म इंडस्ट्री को इतने नायाब गीत दिये जितने शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिये। एक से बढ़कर एक सदाबहार गीत। उन्हीं में से एक है आज का यह गीत। इस गीत के शुरुआती बोल फ़ारसी के हैं और गुलज़ार ने इसे खूबसूरती से अमीर खुसरो के एक सूफ़ी गीत से "चुराया"।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत को सुनकर इस गीत को गुनगुनाने से अपने आप को कोई नहीं रोक सकता।
फ़ारसी के शब्दों के बिल्कुल सटीक अर्थ बताने तो कठिन हैं, परन्तु प्रयास किया है। किसी को इससे बेहतर कोई अर्थ पता हो तो अवश्य बतायें।
इंटेरनेट पर खोजने पर अंग्रेज़ी भाषा में इसका मतलब लिखा हुआ आपको अवश्य मिल जायेगा।

ज़िहाल- ध्यान देना/गौर फ़रमाना
मिस्कीं- गरीब
मकुन- नहीं
हिज्र- जुदाई
भावार्थ यही निकलता है कि मेरे इस गरीब दिल पर गौर फ़रमायें और इसे रंजिश से न देखें। बेचारे दिल को हाल ही में जुदाई का ज़ख्म मिला है।

विडियो





खुसरो का वह गीत जिससे गुलज़ार को प्रेरणा मिली थी।

अमीर खुसरो ने एक गीत (तकनीकी तौर पर इसे क्या कहेंगे मैं नहीं बता सकता) लिखा जिसकी खासियत यह थी कि इसकी पहली पंक्ति फ़ारसी में थी जबकि दूसरी पंक्ति ब्रज भाषा में। फ़िल्म के गीत की तर्ज पर ही खुसरो के इस गीत को भी पढ़ें। गजब के शब्द.. कमाल की शब्दों की जादूगरी।

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)
दुराये नैना बनाये बतियां | (ब्रज)
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, (फ़ारसी)
न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह, (फ़ारसी)
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं, (फ़ारसी)
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां || (ब्रज)

चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह | (फ़ारसी)
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां || (ब्रज)

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ | (फ़ारसी)
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां || (ब्रज)

चाहें अमीर खुसरो हों जिनके सूफ़ी गीत आज भी उनके चाहने वालों की पहली पसंद हैं और चाहें गुलज़ार जो पिछले पाँच से छह दशकों से एक के बाद एक नायाब गीत हमें दे रहे हैं.. दोनों का ही अपने क्षेत्र में कोई मुकाबला नहीं।


यदि किसी को खुसरो के गीत के बोल के अर्थ पता हो तो हमारे साथ अवश्य बाँटें।
आगे पढ़ें >>