Monday, January 30, 2012

आईये फिर से गुनगुनायें - मिले सुर मेरा तुम्हारा Mile Sur Mera Tumhara Republic Day Special

क्या आपको "मिले सुर मेरा तुम्हारा" का वीडियो याद है? कैसे भूल सकते हैं हम वो गीत। ऐसा गीत जिसने पूरे भारत को एक सुर में बाँध दिया था। ऐसा गीत जिसमें कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लेकर उत्तर-पूर्व की अनुपम सुंदरता, सभी का समागम था। जिसमें न कोई मजहब था, न ही कोई जाति। बस एक ही उद्देश्य और एक ही भाषा - राष्ट्रप्रेम की भाषा। उसमें भारत में बोले जाने वाली सभी भाषाओं की पंक्तियाँ तो थीं पर सुर था केवल प्रेम का।

1988 के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रथम बार इसे दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया। लोक सेवा संचार परिषद ने दूरदर्शन और संचार मंत्रालय के सहयोग से इस गीत का निर्माण किया। इसे लिखा था पीयूष पांडेय ने और इसके निर्माता थे आरती गुप्ता, कैलाश सुरेंद्रनाथ व लोक सेवा संचार परिषद। इस गीत को संगीतबद्ध किया था अशोक पाटकी और Louis Banks ने। एक ही पंक्ति को चौदह भाषाओं में गाया गया था। वे भाषायें थीं- हिन्दी, कश्मीरी, उर्दू, पंजाबी, सिन्धी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, बंगाली, असमी, उडिया, गुजराती व मराठी। गीत में शामिल थे अभिनेता कमल हसन, अमिताभ बच्चन, मिथुन, जीतेंद्र, हेमा मालिनी, शर्मिला टैगोर, ओम पुरी, दीना पाठक, मीनाक्षी शेषाद्री, गायिका लता मंगेशकर,  कार्टूनिस्ट मारियो मिरांडा, खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण, नरेंद्र हिरवानी, वेंकतराघवन, अरूण लाल, सैयद किरमानी, नर्तिका मल्लिका साराभाई व अन्य।

एक समय ऐसा भी आ गया था जब इसे राष्ट्रगान के बराबर दर्जा दिया जाने लगा था। मुझे याद है कि बोल समझ आते नहीं थे पर हम गुनगुनाते अवश्य थे।

राष्ट्रप्रेम और अनेकता में एकता का प्रतीक यह गीत क्या आज भी सामयिक है? जहाँ कभी केरल व तमिलनाडु लड़ते हैं, कभी तेलंगाना की आग लगती है, कभी महाराष्ट्र और बिहार में युद्ध छिड़ता है तो कभी एक समाज और कभी दूसरा समाज किसी न किसी कारण से सड़कों पर दिखाई देता है। इस विषय कुछ कहा नहीं जा सकता।

गणतंत्र दिवस राष्ट्र का गौरव है। इस वर्ष हम 63वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं। तो क्यों उन दागों को याद करें जो हमारे इतिहास का हिस्सा हैं? क्या हम सभी बैर नहीं भुला सकते? क्या जो भूत में बीत गया उसे याद रखना आवश्यक है? क्या हम फिर से एक ही सुर में सुर मिला सकते हैं? क्या दोबारा वही गीत गुनगुना सकते हैं। हाँ, हम ऐसा कर सकते हैं... मन में विश्वास हो तो यह मुमकिन है। प्रेम और करूणा का भाव हो तो हम भारत के इस दौर को स्वर्णिम इतिहास बना सकते हैं। भविष्य हमें आशा भरी निगाहों से देख रहा है। वर्तमान को सुधारें, भविष्य को सँवारें।

मिले सुर मेरा तुम्हारा


विकीपीडिया से लिये गये बोल


[hi] milē sur merā tumhārā, tō sur banē hamārā
sur kī nadiyān̐ har diśā sē, bahte sāgar men̐ milē
bādalōn̐ kā rūp lēkar, barse halkē halkē
milē sur merā tumhārā, tō sur banē hamārā
milē sur merā tumhārā
[ks] Chaain taraz tai myain taraz, ik watt baniye saayen taraz
[pa] tērā sur milē mērē sur dē nāl, milkē baṇē ikk navān̐ sur tāl
[hi] milē sur merā tumhārā, tō sur banē hamārā
[sn] mun̐hin̐jō sur tun̐hin̐jē sān̐ piyārā milē jad̤ahin̐, gīt asān̐jō madhur tarānō baṇē tad̤ahin̐
[ur] sur ka darya bahte sagar men mile
[pa] bādalān̐ dā rūp laikē, barsan haulē haulē
[ta] Isaindhal namm iruvarin suramum namadhagum
Dhisai veru aanalum aazhi ser aarugal Mugilai
mazhaiyai pozhivadu pol isai
Nam isai
[kn] nanna dhvanige ninna dhvaniya, sēridante namma dhvaniya
[te] nā svaramu nī svaramu sangamamai, mana svaranḡa avatarinchē
[ml] eṉṯe svaravum niṅṅkaḷoṭe svaravum, ottucērnnu namoṭe svaramāy
[bn] tōmār śūr mōdēr śūr, sriṣṭi kōruk ōikōśūr
[as] sriṣṭi hauk aikyatān
[or] tuma āmara svarara miḷana, sriṣṭi kari chālu ekā tāna
[gu] maḷē sur jō tārō mārō, banē āpṇō sur nirāḷō
[mr] mājhyā tumchyā juḷtā tārā, madhur surānchyā barastī dhārā
[hi] sur kī nadiyān̐ har diśā sē, bahte sāgar men̐ milē
bādalōn̐ kā rūp lēkar, barse halkē halkē
milē sur merā tumhārā, tō sur banē hamārā



बीस साल बाद २६ जनवरी २०१० को Zoom TV द्वारा इसी गीत को दोबारा रिकॉर्ड किया गया और नाम रखा गया : "फिर मिले सुर मेरा तुम्हारा"। परन्तु यह गीत उतना सम्मान व प्रसिद्धि नहीं पा सका जितना पसंद पहले वाला गीत किया गया। अब का गीत 16 मिनट से अधिक का है जबकि पिछला गीत छह मिनट का था। इस गीत को भी Louis Banks ने संगीत दिया।



फिर मिले सुर मेरा तुम्हारा





जय हिन्द
वन्दे मातरम

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Wednesday, January 25, 2012

आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस के सही मायने? Republic Day - What does this mean to Bharat

पिछले एक वर्ष में भारत बदला है। गणतंत्र दिवस आने वाला है। पर आखिर क्या हैं गणतंत्र दिवस के सही मायने? क्या आज का भारत गणतंत्र है? क्या यह वही भारत है जिसे ध्यान में  रखकर संविधान लिखा गया होगा?

इस समय स्कूलों में दाखिले की होड़ लगी हुई है। किराने की दुकान पर एक महाशय फ़ोन पर बात कर रहे थे और अपने बच्चे का स्कूल में दाखिला हो जाये इसके लिये ढाई लाख रूपये देने को तैयार थे परन्तु स्कूल चार लाख माँग रहा था। आज की तारीख में यह साफ़ नजर आ रहा है कि स्कूल पैसे लेने को तैयार बैठे हैं और अभिभावक देने को। ये वही अभिभावक हैं जो रामदेव या अन्ना के साथ खड़े दिखाई देते हैं क्योंकि बाबू लोग और नेता अपनी जेब गर्म कर रहे हैं। किन्तु फिर यही अभिभावक अपने बच्चे के दाखिले के लिये ढाई लाख रूपये देते हैं। पर स्कूल का क्या? पढ़ाई जैसे बुनियादी अधिकार को पैसे खरीदते बेचते यह लोग ज्ञान की देवी को "सुविधाओं" के हाथों बेच देते हैं। यह किस प्रकार की व्यवस्था है? इस व्यवस्था में मध्यम वर्ग की व्यथा है। मध्यम वर्ग व्यवस्था को दोष देता है। उसे पता है कि स्कूल में पढ़वाना और बच्चे का भविष्य बनाना है। किन्तु यह कैसा भविष्य है जिसकी नींव ही भ्रष्टाचार के तंत्र में लिप्त है? यह व्यवस्था आखिर बन कैसे गई? क्या शिक्षा के तौर तरीके का बदलाव इसे ठीक कर सकता है? क्या सिलेबस कम या ज्यादा करने से सुधार होगा? क्या लोकपाल इसमें सुधार कर सकता है? क्या स्कूल इसी तरह से पैसे माँगते रहेंगे? और क्या लोग भी पैसा देने को राजी होते रहेंगे? क्या रिश्वत देना और लेना दोनों ही जुर्म नहीं होते? क्या ऐसा नहीं है कि स्कूल इसलिये लेता है क्योंकि अभिभावक पैसा देने को तैयार बैठा है? स्कूल को यह ज्ञात है कि एक नहीं तो दूसरा सही, दूसरा नहीं तो तीसरा सही। इस पर सरकार या टीम अन्ना किस तरह से रोक लगा सकती है यह विचारनीय है।

आपके और मेरे और सभी के ही ऑफ़िस में मेडिकल के बिल दिये जाते हैं। वर्ष में १५००० रूपये के बिल देकर हमें कर में कर (टैक्स) में छूट मिल जाती है। इसके लिये कैमिस्ट से हमें बिल "बनवाने" पड़ते हैं। नकली बिल। कैमिस्ट भी दो प्रतिशत की दर से जितने का बिल आप बनवाना चाहो, बनवा सकते हो। यहाँ हम किसे दोष दे सकते हैं? एक मुश्त सैलरी पाने वाले उस कर्मचारी को जो एक एक रूपया बचाना जाता है ताकि इस महँगाई में जीविका चलाई जा सके? या आप दोष देंगे उस कर प्रणाली (Tax System) जो हमें ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती है। यह अलग किस्म का भ्रष्टाचार है। हमारे छोटे से छोटे कार्य में भी भ्रष्टाचार का तंत्र इस कदर हावी है कि हमें "गलत" व "सही" का एहसास ही नहीं हो पाता चाहें यह "सिस्टम" के कारण हो अथवा हमारे निजी स्वार्थ के कारण। यह भ्रष्टाचार रग रग में बस चुका है। क्योंकि सारा सिस्टम ही ऐसा है। क्या लोकपाल इस बीमारी का इलाज कर सकता है?

और भी कईं वाकये हमारी ज़िन्दगी में होते हैं - ट्रफ़िक पुलिस वाले को सौ की जगह पचास "खिलाने" की बात आये या फिर रेल में टिकट पक्की करने के लिये टिकट चैकर को "खिलाने" की बात हो। कहीं भी लोकपाल काम नहीं आ सकता। क्योंकि अधिकतर जगहों पर "देने" वाले तैयार बैठे हैं। पैसे न सही तो चोरी पकड़े जाने पर "ऊपर" के लोगों की जानपहचान निकालना गर्व की बात समझी जाने लगी है।

भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी हैं कि लोकपाल का छिड़काव ऊपर की पत्तियों तक तो पहुँच जायेगा किन्तु इसकी जड़ों तक नहीं पहुँच सकता। और जब तक यह जड़ रहेगी तब तक पौधा पनपता रहेगा। लोकपाल उस एलोपैथी की दवाई की तरह है जो बीमारी को केवल ऊपर से ठीक करती है, जड़ से समाप्त नहीं। ऐसा नहीं कि अन्ना के लोकपाल से सुधार नहीं होगा। होगा.. पर वो केवल दिखावटी सुधार होगा। डर कर सुधार होगा। मन व आत्मा से नहीं। वहाँ तो अशुद्धि की परत जमी रह जायेगी।

भारत को गणतंत्र हुए ६२ साल हो गये हैं। इन ६२ सालों में हमने जो सोचा, जिस सोच से आगे बढ़े थे वो सोच पीछे रह गई है। गणतंत्र का अर्थ होता है हमारा संविधान - हमारी सरकार- हमारे कर्त्तव्य - हमारा अधिकार। हमारा संविधान हमें बोलने का व अपने विचार रखने का अधिकार देता है। सरकार इसका विरोध करती है। फ़ेसबुक, ट्विटर आदि सोशल साईट इसका उदाहरण हैं। यह कैसी स्वतंत्रता? यह कैसा गणतंत्र? यह साईटें सीधे जनता की आवाज़ है। यह मीडिया "बिकाऊ" नहीं है। इन पर रोक लगाना तानाशाही के बराबर है। मनमोहन सिंह को सोनिया जी की गोद में बिठाकर तस्वीर बनाने को जायज़ क्यों नहीं ठहराया जा सकता? जहाँ तक मेरा ज्ञान है राष्ट्रपति और राष्ट्रपिता को छोड़ कर किसी का भी कार्टून बनाया जा सकता है। क्या सरकार तभी कुछ कदम उठाती है जब उस पर अथवा किसी वर्ग पर उंगली उठे। और वो भी तब जब चुनाव हों। क्या सलमान रुश्दी व तस्लीमा नसरीन स्वतंत्र नहीं? यह कैसा गणतंत्र?

क्या हमें अपने विधेयक बनवाने अधिकार नहीं? जनलोकपाल और बाबा रामदेव के आंदोलन को बर्बरतापूर्वक समाप्त करना विचारों के अधिकारों का हनन नहीं? संविधान के कानूनों के दाँवपेंच में सरकार जनता का उल्लू सीधा करने में कामयाब रहती है। किन्तु मामला एक तरफ़ा नहीं है। हम अपने वोट के अधिकार को अनदेखा कर देते हैं। हमें अपने कर्त्तव्य याद रखने चाहियें। हमें अधिकार याद रहते हैं किन्तु कर्त्तव्य भूल जाते हैं। हर नागरिक को जागरुक होना पड़ेगा। हर अधिकारी अपना कर्त्तव्य निभाये और जनता के अधिकारों को पूरा करे। इसी तरह जनता यदि अपने कर्त्तव्यों को पहचाने तो ही कुछ हो सकता है। आज अजब सा विरोधाभास है। गणतंत्र दिवस उस संविधान के लिये है जिसके तहत जनता और सरकार दोनों में विश्वास पैदा होता है पर पिछले एक वर्ष में इतना सब हुआ कि जनता का सरकार व राजनैतिक दलों के ऊपर से विश्वास उठ गया है। यह चिन्ता का विषय है। पर इसमें अच्छाई यह भी कि शायद नेता व दल इन कुछ समझेंगे। और क्या हम भी समझेंगे? हमारे अधिकार समझाने के लिये चुनाव आयोग 25 जनवरी को  "National Voters Day" का आयोजन कर रहा है। अब भी नहीं समझे तो कब समझेंगे?

व्यवस्था की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है। व्यवस्था में लगातार सुधार की गुंजाईशा है।  एक आंदोलन की आवश्यकता है। जागरुकता की आवश्यकता है। मजहब व जाति से ऊपर उठकर देशधर्म अपनाने की आवश्यकता है। प्रेम की आवश्यकता है। यह देश असल में गणतंत्र तभी हो पायेगा जब हर नागरिक अपना कर्त्तव्य निभायेगा और दूसरे के अधिकारों की पूर्ति होगा। और तभी हम सर उठाकर स्वयं को गणतंत्र घोषित कर सकेंगे।

जय हिन्द
वन्देमातरम


गणतंत्र दिवस पर अन्य लेख:

क्या आप जानते हैं कि गणतंत्र दिवस पर कौन से वर्ष से मुख्य अतिथि को बुलाया जा रहा है और राजपथ पर परेड की शुरूआत कब हुई? Republic Day Parade & Chief Guests - Did you know?



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Friday, January 20, 2012

वैदिक गणित, भाग -३, निखिलंसूत्र और ऊर्ध्वतिर्यग्भाम Vedic Mathematics - Multiplication using Nikhilam-Sutra And Urdhvatiryagbhyam Sutra

वैदिक गणित के पिछले अंक:
वैदिक गणित की एक नई श्रूंख्ला - भाग एक Vedic Mathematics Series - Learn Un-Conventional ways of Multiplication Division

वैदिक गणित की श्रृंखला, भाग-दो ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम का एक उदाहरण Learning Unconventional Methods - Vedic Mathematics Part -2

वैदिक गणित के पहले दो अंकों में हमने जाना कि कितनी सरलता से हम बड़े अंकों का गुणा (Multiply) कर सकते हैं। हमने उन Theorems की लिस्ट भी देखी जिनकी सहायता से हम बड़ी से बड़ी कैलकुलेशन भी सेकंड में कर सकेंगे। वेद ज्ञान का सागर है और इसी सागर की एक बूँद है वैदिक गणित। वैदिक गणित के सोलह सूत्रों को जानने की कोशिश जारी रहेगी।

आज इस अथाह सागर की एक बूँद से लेकर आये हैं Multiplication के ही कुछ Shortcuts. इसमें निखिलंसूत्र और ऊर्ध्वतिर्यग्भाम की सहायता से हम Shortcuts को समझेंगे।

निखिलंसूत्रं के कुछ टिप्स :

मान लीजिये आपने 7 का square निकालना है:

चूँकि 7 के लिये 10 को Base माना जायेगा अत: 10 में से 7 जितना कम होगा उसे 7 से उतना ही घटायेंगे.. उदाहरण से समझ आ जायेगा।

(7 - 3)/(3*3) = 4/9 = 49
6^2 = (6-4)/(4*4) = 2/16=(2+1)/6  = 36
8^2 = (8-2)/(2*2) = 6/4 = 64


12^2 = (12 + 2)/(2*2) = 14/4 = 144
14^2 = (14+4)/(4*4) = 18/16 = (18 + 1) / 6 = 196

इन सभी उदाहरणों में क्योंकि 10 को base माना गया है इसलिये "/" के दाईं और एक ही अंक आयेगा और दाईं संख्या में जो अंक दहाई का होगा यानि 10th place का होगा उसको बाईं संख्या में जोड़ दिया जाता है।

19^2 = (19 + 9 )/ (9 * 9 )= 28/81 = (28 + 8) /1 = 361

आगे जानते हैं एकादिकेन पूर्वेण की सहायता से 5 पर समाप्त होने वाली किसी भी संख्या का Square कैसे निकाला जाता है:
करना केवल इतना है कि "/" के बाद के अंक हमेशा 25 रहेंगे और इसके पहले के अंक के लिये 5 से पहले जो संख्या है उसमें एक जोड़ कर उसी संख्या से Multiply करना होगा।
15 के लिये 1 को 2 से और 65 के लिये 6 को 7 से।


15 ^ 2 = (1 * 2) / 25 = 225
25 ^ 2 = (2 * 3)/25 = 625
35 ^ 2 = (3 * 4) / 25 = 1225
75 ^ 2 = (7 * 8)/25 = 5625

135 ^ 2 = (13 * 14)/25 = 182/25 = 18225
195 ^ 2 = (19 * 20)/25 = 38025


इसी तरह हम उन संख्याओं को भी Multiply कर सकते हैं जिनके आखिरी के अंकों का जोड़ 10 बनता है और पहले का अंक बराब्रर है। जैसे:

27 * 23 | इसमें 7 + 3 = 10 और पहला अंक 2 ही है। इसलिये:
(2 * 3)/ (7 * 3) = 6 / 21 = 621

96 * 94 = (9 * 10)/(6 * 4) = 90/24 = 9024
98 * 92 = (9 * 10) / (8 * 2) = 9016
87 * 83 = (8 * 9) / (7 * 3) = 72/21 = 7221
114 * 116 = (11 * 12 )/ (4 * 6) = 132/24



ऊर्ध्वत्रियाक सूत्रं

10th place के दोनों अंकों को गुणा करें, (Top-Left * Right-Bottom) + (Bottom-Left * Top-Right) और दोनों संख्याओं के आखिरी अंकों को गुणा करें एवं कुछ इस प्रकार लिखें:

12
11
_________
1 : 1 + 2 : 2 = 1:3:2 = 132


21
14
____________
2 : 8 + 1 : 4  = 2 : 9 : 4 = 294


37
33
___________________

9 : 9 + 21 : 21 = 9  : 30 : 21
यहाँ हमें बीच चाली संख्या का 10th place का अंक सबसे पहली वाली संख्या में जोड़ना है और इसी तरह सबसे दाईं ओर वाली संख्या का अंक बीच वाले में जोड़ना है।
9 : 30 : 21 = 9 + 3 : 0 + 2 : 1 = 1221

73
76
___________________
49 : 42 + 21 : 18 = 49 : 63 : 18 = 56:4:8 = 5548

बड़ी संख्या के Multiplication का हल केवल चंद सेकंड में!!!

इसके पीछे की Algebraic Equation:
(ax^2 + bx + c) by (dx^2 + ex + f)

= adx^4 + (ae + bd)x^3 + (af + be + cd )x^2 + (bf + ce)x + cf for x = 10

109
111
_____________________________________
1 : 1 : 10 : 9 : 9 = 1 : 2 :0 :9 :9 = 12099

582
231
___________________________________
10 : 15 + 16 : 5 + 24 + 4 : 8 + 6 : 2
= 10 :31:33:14:2 = 13:4:4:4:2 = 134442

785
362
__________________________________________
21 : 42 + 24 : 14 + 48 + 15 : 16 + 30 : 10
= 21 : 66 : 77 :46 : 10 = 28:4:1:7:0 = 284170


अगलें अंक में हम जानेंगे कि बड़े बड़े rectangle (चतुर्भुज) का क्षेत्रफ़ल (Area) कैसे निकालें। Sq. ft and Sq. inches will be calculated without calculator :-)
और हम जानेंगे निखिलं सूत्रं के द्वारा किस तरह Division किया जा सकता है।


आपको यह प्रयास कैसा लगा कृपया टिप्पणी अवश्य करें।

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Monday, January 16, 2012

क्या आप जानते हैं कि गणतंत्र दिवस पर कौन से वर्ष से मुख्य अतिथि को बुलाया जा रहा है और राजपथ पर परेड की शुरूआत कब हुई? Republic Day Parade & Chief Guests - Did you know?

क्या आप जानते हैं कि गणतंत्र दिवस पर कौन से वर्ष से मुख्य अतिथि को बुलाया जा रहा है और राजपथ पर परेड की शुरूआत कब हुई?
विजय चौक (राजपथ, दिल्ली, भारत)

हमारा देश 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र घोषित किया गया। "घोषित" शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहा हूँ क्योंकि संविधान लिखा तो गया पर उसके साथ कितना खिलवाड़ हुआ यह हम अच्छी तरह से जानते हैं। बहरहाल, हम बात करते हैं मुख्य अतिथियों की। साल 1950 से ही विदेशी प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपति व राजाओं को बुलाने का रिवाज़ रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी कि 1950 से 1954 के बीच गणतंत्र दिवस का समारोह कभी इर्विन स्टेडियम, किंग्सवे, लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में हुआ था न कि राजपथ पर। 1955 से ही राजपथ पर परेड की शुरूआत हुई। प्रति वर्ष विदेशी रणनीति के तहत विभिन्न देशों से सम्बन्ध बनाने हेतु अलग लग गणमाननीय प्रतिनिधियों को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया जाने लगा। वर्ष 1950 से 1970 के दौरान Non-Aligned Movement और Eastern Bloc के सदस्य देशों के प्रतिनिधियों की मेजबानी करी गई तो शीत-युद्ध के पश्चात पश्चिम देशों को न्यौता दिया गया।

ये गौर करने की बात है कि पाकिस्तान और चीन से युद्ध से पहले इन दोनों देशों के प्रतिनिधि गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हो चुके हैं। पाकिस्तान के कृषि मंत्री तो 1965 में अतिथि बने थे और उसके कुछ समय पश्च्चात ही पाकिस्तान से हमारा युद्ध हुआ। हर बार धोखा ही मिला है पाकिस्तान और चीन से। एक से अधिक बार बुलाये जाने वाले देशों में पड़ोसी राज्य भूटान, श्रीलंका और मोरिशियस के अलावा रूस, फ़्रांस व ब्रिटेन रहे हैं। ब्राज़ील और NAM सदस्य जैसे नाईजीरिया, इंडोनेशिया और यूगोस्लाविया भी एक से ज्यादा बार परेड का हिस्सा बन चुके हैं।

फ़्रांस से सबसे अधिक चार बार अतिथि भारत आये हैं। भूटान, मौरिशियस व रूस के के प्रतिनिधि तीन बार परेड में अतिथि बने हैं।
नीचे कुछ अतिथियों के नाम और देश के नाम हैं:


वर्ष        अतिथि का नाम    देश
1950 राष्ट्रपति सुकर्णो इंडोनेशिया (प्रथम अतिथि)
1951 -
1952 -
1953 -
1954 राजा जिग्मे डोरजी भूटान
1955 गवर्नर जनरल  गुलाम मुहम्मद   पाकिस्तान राजपथ पर परेड के पहले अतिथि
1956 -
1957 -
1958 मार्शल ये यिआनयिंग चीन
1959 -
1960 राष्ट्रपति किल्मेंट वोरोशिलोव सोवियत संघ (रूस)
1961 रानी एलिज़ाबेथ II ब्रिटेन
1962 -
1963 राजा नोरोडोम सिहानाउक कम्बोडिया
1964 -
1965 कृषि मंत्री राणा अब्दुल हमिद पाकिस्तान
1966 -
1967 -
1968 प्रधानमंत्री एलेक्ज़ेई कोसिजिन सोवियत संघ
राष्ट्रपति टीटो                 यूगोस्लाविया
1969 प्रधानमंत्री तोदोर ज़िवकोव बुल्गारिया
1970 -
1971 राष्ट्रपति जूलियस तन्ज़ानिया
1972 सीवोसगूर रामगुलम मोरिशियस
1973 मोबुतु सेसे सेको ज़ायरे
1974 राष्ट्रपति टीटो यूगोस्लाविया
रत्वत्ते बंदरनायके श्रीलंका

1975 केन्नेथ कौंडा ज़ाम्बिया
1976 फ़्रांस
1977 पोलैंड
1978 आयरलैंड
1979 ऑस्ट्रेलिया
1980 फ़्रांस
1981 मैक्सिको
1982 स्पेन
1983 नाइजीरिया
1984 भूटान
1985 अर्जेंटीना
1986 ग्रीस
1987 पेरू
1988 श्रीलंका
1989 वियतनाम
1990 मौरिशियस
1991 मालदीव्स
1992 पुर्तगाल
1993 ब्रिटेन
1994 सिंगापुर
1995 राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ़्रीका
1996 ब्राज़ील
1997 त्रिनिदाद.तोबैगो
1998 फ़्रांस
1999 नेपाल
2000 नाइजिरिया
2001 अल्जीरिया
2002 मौरिशियस
2003 ईरान
2004 ब्राज़ील
2005 भूटान
2006 सऊदी अरब
2007 राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन रूस
2008 राष्ट्रपति निकोलस सर्कोज़ी फ़्रांस
2009 कज़ाकिस्तान
2010 कोरिया
2011 राष्ट्रपति सुसिलो बम्बांग युधोयोनो इंडोनेशिया
2012 प्रधानमंत्री यिन्गलक शिनवात्रा थाईलैंड


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Thursday, January 12, 2012

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये। जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥ Blaming others is excusing ourselves. Kabir Doha

कबीर का जन्म करीबन छह सौ वर्ष पूर्व 1398 में हुआ। कुछ विद्वान मानते हैं कि वे 120 वर्ष तक जीवित रहे व 1518 में उन्होंने देह त्यागा। हालाँकि कुछ स्थानों पर उनका जन्म 1440 में भी बताया गया है। सही जन्म तिथि के बारे में किसी को नहीं पता है। ये वो समय था जिसे देश में भक्ति काल से भी जाना जाता है। पेशे से जुलाहे कबीर की गिनती विश्व में महान कवि व संत के रूप में होती है। इनके दोहे बच्चे बच्चे की जुबान पर होते हैं। भारत में धर्म की बात हो और कबीर का नाम न आये ऐसा हो नहीं सकता।

पवित्र गुरू ग्रंथ साहिब में कबीर के पाँच सौ से ऊपर दोहे हैं। कबीर के दोहों की खासियत यह है कि इनके शब्द सरल होते हैं। हमारे आसपास की वस्तुओं व घटनाओं को ध्यान में रखकर वे दोहे लिखा करते थे। शब्द सरल हैं पर अर्थ जटिल परन्तु इतने शुद्ध कि अगर हम सब अपने जीवन में उन्हें उतार लें तो ये धरती स्वर्ग बन जाये। 


उनके जीवन के बारे में अनेक कथायें हैं। कहते हैं कि एक बार संत रामानन्द गंगा के किनारे स्नान करने हेतु गये थे। सीढियाँ उतर ही रहे थे कि तभी  उनका ध्यान कबीर पर गया और कहते हैं कि सही गुरू मिले तो जीवन साकार हो जाता है। विवेकानन्द को रामकृष्ण परमहंस मिले थे कबीर को रामानन्द मिले।

वर्ष 2012 का आगमन हो चुका है। पिछले माह दिसम्बर से वैदिक गणित की श्रृंख्ला आरम्भ करी थी। हमारी संस्कृति, धर्म व जीवन के मूल्यों का ज्ञान हमें जीवन जीना व आध्यात्म की सीख देता है। आने वाले कुछ दिनों में सूक्तियाँ एवं अनमोल वचन भी आप धूप-छाँव पर पढ़ सकेंगे।

चूँकि मैं भी कबीर के दोहों से अनजान हूँ व हिन्दी में थोड़ा कच्चा हूँ इसलिये यदि किसी को इन दोहों व इनके शब्दार्थ/भावार्थ में त्रुटि दिखाई दे तो कृपया अवश्य बतायें।

आज का दोहा है:


बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोये।
जो मन खोजा आपना, तो मुझसे बुरा न कोये॥

कहते हैं मानव की सबसे बड़ी गलतफ़हमी है कि हर किसी को लगता है कि वो गलत नहीं है। यह दोहा हमारा व्यवहार हमें बता रहा है। जब भी हम दुखी होते हैं तो हमें लगता है कि हम फ़लाने व्यक्ति के कारण दुखी हैं.. उसने ऐसा कैसे कर दिया.. या ऐसा क्यों नहीं किया... या उसको वो करना चाहिये था। या परिस्थितियों को रोते हैं.. काश ऐसा हो जाता.. काश वैसा हो जाता.. वगैरह वगैरह। यह अमूमन हम सब करते हैं। यह मानवीय व्यवहार है। अपने दुख का दोषी किसी व्यक्ति अथवा परिस्थिति को ठहराना। कभी क्रोध आ जाये तो हम उसका दोष भी किसी दूसरे को देते हैं। और हमें हमेशा लगता है कि हम सही हैं। हमसे कभी भूल नहीं हो सकती। ये हमारा अहं ही है जो हमे इस तरह सोचने पर मजबूर कर देता है। अपनी गलतियों का कारण हम दूसरों में खोजते हैं। नतीजा, हम किसी दूसरे की आलोचना करते हैं और उसे ही भला बुरा कहने लगते हैं।

कबीर कहते हैं कि क्यों व्यर्थ में हम किसी दूसरे में दोष ढूँढने लगते हैं? वे कहते हैं कि हमें अपने अंदर झाँक कर देखना चाहिये। यदि कहीं कोई कमी है तो वो "मुझमें" है। मैं किसी दूसरे व्यक्ति में गलतियाँ क्यों ढूँढू? यदि मैं किसी के साथ निभा नहीं पा रहा हूँ तो बदलाव मुझे करना है। 

हाँ मैं यह जानता हूँ कि हर व्यक्ति चाहें वो हमेशा अच्छा लगे या बुरा, उसका प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर पड़ता है। जिस व्यक्ति की आपसे नहीं निभती वही आपका व्यवहार की परीक्षा होती है कि आप उससे किस प्रकार बर्ताव करते हैं। किन्तु सब आपके हाथ में ही है। आपको अपने जीवन को किस ओर ले कर जाना यह कोई दूसरा निर्धारित नहीं करता। गाड़ी आपकी है, ड्राईवर आप हैं, मंजिल आपने चुननी हैं, रास्ता आपने बनाना है।

कोई भी व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता। बस मतभेद होते हैं।

अंग्रेजी में एक कहावत है : "Blaming others is excusing ourselves.".




आपको यह प्रयास कैसा लगा टिप्पणी अवश्य करें। दोहे तुलसी के हों, अथवा कबीर के, अथवा मनु-स्मृति या चाणक्य एवं विदुर नीति - धार्मिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक ज्ञान सभी में है और इस ज्ञान के बिना जीवन अधूरा है।


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Sunday, January 8, 2012

आखिर क्यों बार बार होता है कश्मीर और भारत के नक्शे को लेकर विवाद? US Foreign Ministry shows POK in Pakistan? Why does this happen every now and then?

हाल ही में अमरीका के विदेश विभाग की एक वेबसाईट में पाकिस्तान-अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा दिखाया गया। इस मुद्दे पर भारत ने तुरंत अपनी नाराज़गी व्यक्त की और अमरीका को माफ़ी माँगनी पड़ी व नक्शा ठीक करना पड़ा। अधिक जानकारी यहाँ से लें:

पर क्या आपको नहीं लगता कि विश्व को हम यह समझाने में नाकाम रहे हैं कि पाकिस्तान-अधिकृक कश्मीर "हमारा" है। पर बात यह भी कि क्या सचमुच वो हमारा है या फिर हम केवल नक्शे में उस हिस्से को अपना समझकर निहारते रहते हैं। कश्मीर के इतिहास में मैं नहीं जाना चाहता। पर वर्तमान में पीओके में हमारा राज नहीं है, यह एक कड़वी सच्चाई है। जो आज़ादी से पहले भारत का हिस्सा था वहाँ हमारी विधानसभा, लोकसभा की कोई सीट नहीं है यह भी सच है। आज की तारीख में वही पाकिस्तान और भारत का बॉर्डर है। पीओके में लश्कर आदि आतंकवादी संगठनों के कैम्प लगे हुए हैं जिन्हें हम छू भी नहीं सकते क्योंकि वहाँ पाकिस्तान का कब्जा है।

यदि ऊपर की सभी बातें सही हैं और वर्तमान की सच्चाई है तो फिर हम किस हक़ से पीओके को अपना कहते हैं? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पाकिस्तान पीओके रखे और हम अपना कश्मीर। इस मसले का हल आखिर है क्या? कभी वार्त्ता, कभी युद्ध तो कभी पीठ पीछे आतंकवादी हमला। सत्य कटु होता है और सत्य यही है कि हम अपना पड़ोसी तो नहीं बदल सकते। वह ढोंग करता रहेगा और हम सहते रहेंगे।

हर बार कोई न कोई साईट नक्शा "गलत" बनाती है तो कभी कोई संगठन या पुस्तक और फिर उसके पश्चात हम हटवाते रहते हैं और यह भी चाहते हैं कि साईट/संगठन या प्रकाशक हमसे माफ़ी माँगे। आखिर वे नक्शा गलत बनाते ही क्यों हैं? दरअसल विश्व वही स्थिति देख रहा है जो वर्तमान की है। या तो हम इतनी हिम्मत कर सकें कि छाती ठोंक कर बोलें पीओके हमारा है और लशकर के कैम्पों को नष्ट कर दें। पाकिस्तान की पूरे विश्व में पोल खोलें। चीन और पाकिस्तान दोनों के खिलाफ़ बोलने का साहस कर सकें। पर यदि यह सब नहीं कर सकते तो शांति पूर्वक पीओके पाकिस्तान को दे देना चाहिये। अरूणाचल व सिक्किम में भी चीन ने हमारी जमीन हड़प ली है और हम हाथ पर हाथ धरे बैंठे हैं।

कुछ वर्ष पश्चात फिर हम चीन और पाकिस्तान से वार्त्ता कर रहे होंगे। कभी अरूणाचल के नक्शे की तो कभी सिक्किम की तो कभी राजस्थान व कश्मीर बॉर्डर की।

चलते चलते यह नक्शा भी देख जाईये.. यह www.blogger.com द्वारा प्रकाशित नक्शा है जिसमें पीओके को पाकिस्तान में दिखाया गया।



यह गौरतलब है कि ब्लॉगर.कॉम गूगल की वेबसाईट है। किस किस को बोलेगी सरकार? जब अपनी ही विदेश नीति व इच्छा शक्ति में खोट है तो विदेशियों को कहने -सुनाने का हमारा कोई अधिकार नहीं बनता। मैं अपने ब्लॉग के माध्यम से सरकार को अपील करना चाहूँगा कि वह गूगल से कहलवाकर इस नक्शे को भी बदलवायें।



जय हिन्द
वन्देमातरम
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Wednesday, January 4, 2012

अकड़ किस बात कि प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है - फ़िल्म : तीसरी कसम (भूले बिसरे गीत) Spiritual Song From Teesri Kasam (1966)- Old Songs Series, Raj Kapoor-Mukesh


भूले बिसरे गीत में आज फ़िल्म तीसरी क़सम के मेरी पसन्द के दो गीत। हालाँकि फ़िल्म के अन्य गीतों में "चलत मुसाफ़िर मोह लियो रे" और "सजनवा बैरी हो गये हमार" गीत भी बेहतरीन हैं पर आज यही दो गीत..
ये गीत मुझे इसलिये भी पसन्द हैं क्योंकि इनके शब्दों में सच्चाई है, सफ़ाई है, शुद्धता है। ज़िन्दगी का व समाज का आईना है। बिना बात की अकड़ लिये हम किसी न किसी बात पर अहंकार ले आते हैं। खास तौर पर "सजन रे झूठ मत बोलो" तो दिल के बेहद करीब है....
चाहें राजा हो या प्यादा खेल समाप्त होने पर सभी को एक ही डब्बे में जाना होता है।
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है
फ़िल्म - तीसरी क़सम (1966)
संगीतकार: शंकर जयकिशन
गीतकार: शैलेंद्र
गायक: मुकेश

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना हैन हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है
तुम्हारे महल चौबारे, यहीं रह जाएंगे सारे 
अकड़ किस बात कि प्यारे
अकड़ किस बात कि प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ...

भला कीजै भला होगा, बुरा कीजै बुरा होगा 
बही लिख लिख के क्या होगा
बही लिख लिख के क्या होगा, यहीं सब कुछ चुकाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ...

लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया
बुढ़ापा देख कर रोया
बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है
न हाथी है ना घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है
सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ...
दुनिया बनाने वाले,  क्या तेरे मन में समाई 
फ़िल्म - तीसरी क़सम (1966)
संगीतकार: शंकर जयकिशन
गीतकार: शैलेंद्र
गायक: मुकेश

दुनिया बनाने वाले,  क्या तेरे मन में समाई 
काहेको दुनिया बनाई, तूने काहेको दुनिया बनाई

काहे बनाए तूने माटी के पुतले,
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला
गुप-चुप तमाशा देखे, वाह रे तेरी खुदाई
काहेको दुनिया बनाई, तूने काहेको दुनिया बनाई  ...

तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर,
तूफ़ां ये प्यार का मन में छुपाकर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आँसू भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्या सूझी तुझको, काहेको प्रीत जगाई
काहेको दुनिया बनाई, तूने काहेको दुनिया बनाई  ...

प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया, हंसना सिखाया,
रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाए
मीत मिलाके तूने सपने जगाए
सपने जगाके तूने, काहे को दे दी जुदाई
काहेको दुनिया बनाई, तूने काहेको दुनिया बनाई ...
जय हिन्द
वन्देमातरम
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Saturday, December 31, 2011

नव वर्ष २०१२ का आगमन - अलविदा २०११ New Year Poetry Welcome 2012 -- New Year Special

कुछ खड़े कर के सवाल
कुछ यादों को समेट
देते हुए थोड़े संदेश
जा रहा है बीता वर्ष

कहीं है आँसू,
कहीं है हर्ष

याद आयेंगे हमें
पटौदी के नवाब,
हज़ारिका लाजवाब
शम्मी कपूर "राजकुमार"
देव आनन्द सदाबहार...
ग़ज़ल जीत, 
जगजीत...
भीमसेन की मधुर तान
याद रखेगा हिन्दुस्तान

साल भर विश्व ने
देखी कईं क्रांतियाँ..
अमरीका में बजा
विरोध का बिगुल
मिस्र-लीबिया-पाकिस्तान
जनता ने ढहाये किले
खत्म हुए कईं हुक्मुरान...

एक क्रान्ति ऐसी ही
भारत में भी छाई है
अन्ना की आँधी ने
दिल में आस जगाई है..
उम्मीद की किरण धूमिल
है जरूर
पर जनचेतना हो ऐसी
कि टूटे नेताओं का गुरूर
भ्रष्टाचार और काले धन पर
अन्ना और रामदेव ने
नेताओं को है घेरा...
मंत्रियों ने ढँका हुआ है
मुखौटे से अपना चेहरा...


रोडरेज के किस्से भी
हो रहें आम हैं..
ऐसा लगता है मानों
झगड़ना ही हमारा काम है
गुस्से को क्यों हम लोग
चलते हैं नाक पर रख कर
"कर्त्तव्यों" पर ध्यान नहीं..
वो रहता है केवल "हक़" पर..

वर्तमान से सीख कल को बुनें
आओ समाज एक नया चुनें
जहाँ परोपकार की आशा हो
प्रेम की बोलें भाषा हो..
न द्वेष हो न ईर्ष्या
और न ही अहंकार
न बदले की भावना से
मचा हुआ हो हाहाकार...
रोजाना
एक शुभ काम करें,
किसी दुखी के चेहरे पर
खिलखिलाती मुस्कान भरें....
लोकपाल का बिल सदन में,
चाहें न पास हो...
एक लोकपाल का हर दिल में
होता फिर भी वास हो...

ये युग हमारा है,
ये समाज हमारा है
वो कल हमारा था
ये आज हमारा है...
समाज के उत्थान से ही
व्यक्ति का उत्थान है
हम बनाते आज है
हम बनाते समाज हैं

आओ फिर एक समाज बुनें
वर्तमान से सीख कल को बुनें
आओ समाज एक नया चुनें


आइये आप और मैं एक प्रण करें। किसी रोते हुए बच्चे को हँसायें.. किसी बुजुर्ग का सहारा बनें...तभी स्वस्थ समाज की स्थापना हो पायेगी और फिर किसी लोकपाल की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
बचपन में किताबों के आरम्भ में "गाँधी जी का जन्तर" आता था। हम कोई भी कार्य करें तो बस यही सोचें कि क्या किसी के चेहरे पर इससे मुस्कान आयेगी? क्या यह कार्य उस व्यक्ति के लिये लाभदायक होगा जो तुमने अब तक का सबसे दुखी चेहरा देखा हो?


********************************************************************
थोड़ा हँस लें...

कुछ घटनाओं पर यदि गाने बजाये जायें तो क्या होंगे..मसलन...

कांग्रेस-भाजपा के रिश्तों पर: 
--कल भी, आज भी, आज भी, कल भी.. कुछ रिश्तें नहीं हैं बदलते कभी...

सोनिया जी जैसे ही कांग्रेस की मीटिंग में आती हैं सभी खड़े हो जाते हैं : 
--"तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो.. तुम्हीं हो...."

साल 2011 और अन्ना:
--"बन्दे में था दम.. वन्देमातरम.."

आडवाणी जी "कुर्सी" के बारे में सोचते हुए:
--"तेरा पीछा न.. मैं छोड़ूँगा सोणिये..भेज दे चाहें...."

राहुल बाबा सुबह सुबह घर से निकलते हुए:
--"नन्हा मुन्ना राही हूँ.. देश का सिपाही हूँ..."

ममता दीदी को प्रणब दादा कैसे मनाते होंगे?:
--"कोई हसीना जब रूठ जाती है तो....और भी..."

जनता के थूकने, रोडरेज, भ्रष्टाचार, दुराचार आदि के आचरण पर.. यानि हम पर:
--"हम तो भई जैसे हैं, वैसे रहेंगे...."


नववर्ष 2012 आपके एवं आपके समस्त परिवार के लिये शुभकारी हो।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:


जय हिन्द
वन्देमातरम


आज से तीन वर्ष पूर्व मैंने यह लिखा था 
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Tuesday, December 27, 2011

वैदिक गणित की श्रृंखला, भाग-दो ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम का एक उदाहरण Learning Unconventional Methods - Vedic Mathematics Part -2

वैदिक गणित से बड़े अंकों का गुणा कितनी तेज़ी से हो जाता है यह हमने पिछले भाग में जाना। "वेद" का अर्थ होता है ज्ञान। हमारे चारों वेद ज्ञान के अथाह समन्दर हैं जिससे हम ज्ञान की असंख्य बूँदें निकाल सकते हैं। इस सागर में डुबकी लगा सकते हैं व जीवन-ज्ञान अर्जित कर सकते हैं। इन्हीं वेदों में छिपा है वैदिक गणित भी। गणित की जटिलता को बड़ी सरलता से समाप्त करता है यह गणित। हमने जो उदाहरण पिछले भाग में जाना था वह "निखिलं नवतश्चरम दशत:" था।

मेरे मित्र अभिषेक ने जानना चाहा था कि क्या 73*77 को हम जल्दी से गुणा कर सकते हैं?
आइये पहले जानते हैं कि आज के अंग्रेज़ी माध्यम से हम किस तरह से Multiply करते हैं:

    7 3
   *7 7
--------
   51 1
5 11  *
-----------
5621

अब जानते हैं वैदिक गणित का हल:
7 3
7 7
--------------------------
(7*7 बायें के दोनों अंक का गुणा =  49)
(Top-left * Right Bottom) + (Top-Right*Bottom Left) = 7*7 + 7*3 = 70
अंतिम दोनों अंकों का गुणा = 3 * 7 = 21

4 9 0
   7 2 1
------------------------
5621

Algebra की दृष्टि से:

मान लीजिये ये दो संख्यायें हैं: ax+b, cx+d
यानि (ax+b) * (cx+d) = acx^2 + (ad + bc)x + bd

और अब x=10 मानिये और 73*77 का उत्तर निकालिये

इसे ऊर्ध्वतिर्यग्भ्याम कहते हैं।

निखिलं नवतश्चरमं दशत: सूत्र का एक उदाहरण और देते चलें:

मान लीजिये आपको 18 का square निकालना है:
(यहाँ "/" का अर्थ Divide से नहीं है)

18 * 18 = (18 + 8) / (8*8)  = 26/64 = (26+6)/4 = 324 (उत्तर)


इसी तरह:

या 12*12 = (12+2)/(2*2) = 14/4 = 144 (उत्तर)

ऊपर दिये गये उदाहरणों में 18 व 12 संख्यायें 10 से क्रमश: 8 व 2 अधिक हैं इसलिये उनमें 8, 2 जोड़े हैं।

इसी तरह नीचे दिये गये उदाहरणों में संख्यायें 100 से कम हैं।
या 92*92 = (92 - 8)/(8*8) = 84/64 = 8464
96*96 = (96-4)/(4*4) = 92/16 = 9216

989*989 = (989-11)/(11*11) = 978/121 = 978121 (उत्तर) 
कितना समय लगा??? पाँच सेकंड? या पाँच मिनट.. कैलकुलेटर से भी जल्दी है यह!!!!

988*988 = (988-12)/(12*12)= 976/144 = 976144

आने वाले अंकों में हम हर सूत्र को विस्तार में जानेंगे।

वैदिक गणित के सोलह सूत्र इस प्रकार हैं:

१. एकाधिकेन पूर्वेण Recurring Decimals
२. निखिलं नवतश्चरमं दशत: (Multiplication/Division)
३. ऊर्ध्वतिर्यग्भ्यां (Multiplication/Division of Quadratic Numbers)
४. परावर्त्य योजयेत (Division, Partial Fractions)
५. शून्यं साम्यसमुच्चये (Simple Equation, Cubic Equations, Quadratic Equations Find x types)
६. (आनुरूप्ये) शून्यमन्यत (Factorization)
७. संकलनव्यवकलनाभ्यां (Factorization/H.C.F)
८. पूरणापूरणाभ्यां Biquadratic equations, Multiple Simultaneous equations (Three equations, three variables)
९. चलनकलनाभ्यां
१०. यावदूनम (Squaring, Cubing etc)
११. व्यष्टिसमष्टि
१२. शेषाण्यंकेन
१३. सोपान्त्यद्वयमन्तयं
१४. एकन्यूनेन पूर्वेण
१५. गुणितसमुच्चय:
१६. गुणकस्मुच्चय: (Factorization and Differential Calculus)

ऊपर दिये गये सूत्रों की मदद से हम Multiplication, Division, Partial Fractions, Square, Cube, Quadratic Equations, Simple equations, Cubic equations, factorization, H.C.F, Differential Calculus, Square root, Cube roots, Pythagoras Theorem, Analytical Conics व Apollonius' Theorem जैसे जटिल Topics से गुजरेंगे।

आशा है आपको यह प्रयास पसंद आयेगा। चूँकि मैं भी नया ही सीख रहा हूँ तो चूक होने पर क्षमा कीजियेगा। सहयोग मिलता रहा है तो हम मिलकर इस प्राचीन गणित को फिर से जीवित कर सकेंगे। आप भी बच्चों को ये "तेज़" गणित सिखायें।

भाग एक : वैदिक गणित की एक नई श्रूंख्ला - भाग एक Vedic Mathematics Series - Learn Un-Conventional ways of Multiplication Division

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Sunday, December 25, 2011

अटल बिहारी वाजपेयी जी की पाँच बेहतरीन कवितायें...आओ मन की गाँठें खोलें....Atal Bihari Vajpayee Birthday

पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्मदिन है। आज उनकी कवितायें पढ़ने का मन किया...।
उनकी कविताओं में उनका अनुभव झलकता है। राजनीति से कभी बेचैन दिखाई पड़ते हैं तो कभी आज के हालात पर दुखी। जीवन और मृत्यु का संघर्ष दिखाई देता है तो मौत से ठन जाने की बातें करते हैं। अदम्य साहस... ऊँचाई एकाकी होती है....

"आओ मन की गाँठें खोलें" से वे प्रेम से रहने और मन मुटाव दूर करने की सीख दे जाते हैं..शायद इसीलिये वे राजनीति में भी अपने प्रतिद्वंदियों के चहेते बने रहे...

1. आओ फिर से दिया जलाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियां गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ


2. ऊँचाई

 ऊँचे पहाड़ पर,
पेड़ नहीं लगते,

पौधे नहीं उगते,
न घास ही जमती है।

जमती है सिर्फ बर्फ,
जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और,
मौत की तरह ठंडी होती है।
खेलती, खिलखिलाती नदी,
जिसका रूप धारण कर,
अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है।

ऐसी ऊँचाई,
जिसका परस
पानी को पत्थर कर दे,
ऐसी ऊँचाई
जिसका दरस हीन भाव भर दे,
अभिनंदन की अधिकारी है,
आरोहियों के लिये आमंत्रण है,
उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं,


किन्तु कोई गौरैया,
वहाँ नीड़ नहीं बना सकती,
ना कोई थका-मांदा बटोही,
उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है।

सच्चाई यह है कि
केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती,
सबसे अलग-थलग,
परिवेश से पृथक,
अपनों से कटा-बँटा,
शून्य में अकेला खड़ा होना,
पहाड़ की महानता नहीं,
मजबूरी है।
ऊँचाई और गहराई में
आकाश-पाताल की दूरी है।

जो जितना ऊँचा,
उतना एकाकी होता है,
हर भार को स्वयं ढोता है,
चेहरे पर मुस्कानें चिपका,
मन ही मन रोता है।

ज़रूरी यह है कि
ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो,
जिससे मनुष्य,
ठूँठ सा खड़ा न रहे,
औरों से घुले-मिले,
किसी को साथ ले,
किसी के संग चले।

भीड़ में खो जाना,
यादों में डूब जाना,
स्वयं को भूल जाना,
अस्तित्व को अर्थ,
जीवन को सुगंध देता है।

धरती को बौनों की नहीं,
ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है।
इतने ऊँचे कि आसमान छू लें,
नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें,

किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं,
कि पाँव तले दूब ही न जमे,
कोई काँटा न चुभे,
कोई कली न खिले।


न वसंत हो, न पतझड़,
हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़,
मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।


मेरे प्रभु!
मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,
ग़ैरों को गले न लगा सकूँ,
इतनी रुखाई कभी मत देना।


3. कौरव कौन, कौन पांडव


कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|



4. मौत से ठन गई।

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।


मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

5. आओ मन की गाँठें खोलें.

यमुना तट, टीले रेतीले, घास फूस का घर डंडे पर,
गोबर से लीपे आँगन में, तुलसी का बिरवा, घंटी स्वर.
माँ के मुँह से रामायण के दोहे चौपाई रस घोलें,
आओ मन की गाँठें खोलें.
बाबा की बैठक में बिछी चटाई बाहर रखे खड़ाऊँ,
मिलने वालों के मन में असमंजस, जाऊं या ना जाऊं,
माथे तिलक, आंख पर ऐनक, पोथी खुली स्वंय से बोलें,
 
आओ मन की गाँठें खोलें.
सरस्वती की देख साधना, लक्ष्मी ने संबंध ना जोड़ा,
मिट्टी ने माथे के चंदन बनने का संकल्प ना तोड़ा,
नये वर्ष की अगवानी में, टुक रुक लें, कुछ ताजा हो लें,
आओ मन की गाँठें खोलें.

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Friday, December 23, 2011

बेल्लारी जिले के हम्पी में स्थित हैं विजयनगर साम्राज्य के प्राचीनतम मंदिर Hampi Temples & Monuments, Bellary District, Karnataka - Incredible Bharat

आज अतुल्य भारत में सैर करेंगे राजनैतिक दृष्टि से सबसे "संवेदनशील" माने जाने वाले भाजपा शासित राज्य की। घबराइये नहीं लेख में कोई राजनीति नहीं है। बहुत साफ़-सुथरा लेख है। पर बात यहाँ होगी अवैध खनन के मामले में भाजपा के गले की हड्डी बने बेल्लारी जिले की। बेल्लारी जहाँ भाजपा ने रेड्डी बँधुओं से नाता तोड़ा और उपचुनाव हारा, वो भी जमानत जब्त करवा कर!!

बात होगी विजयनगर की। बात है हम्पी की।

उत्तरी कर्नाटक के बेल्लारी जिले में स्थित एक गाँव है जिसका नाम है हम्पी। विजयनगर साम्राज्य के अवशेषों के बीच में स्थित है हम्पी। विजयनगर साम्राज्य के समय से ही यह इलाका धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रहा है। यहाँ पर है विरुपक्ष मंदिर और कईं स्मारक। हम्पी के इसी मंदिर और अवशेषों के लिये यूनेस्को ने इसे अपनी पुरातत्व विरासत में शामिल किया है। जुलाई 2011 में जिला प्रशासन ने इस गाँव व मुख्य सड़क को तुड़वा दिया है।

हम्पी का नाम पड़ा है तंगभद्रा नदी के नाम पर। दरअसल तंगभद्रा का प्राचीन नाम था पम्पा। और पम्पा से कन्नड़ में आया हम्पे और फिर बना हम्पी। कईं वर्षों तक इसे विरुपक्षपुरा के नाम से भी जाना जाता रहा है।

रामायण में हम्पी का जिक्र किष्किंधा के तौर पर होता है। जहाँ वानर राज बालि व सुग्रीव का राज्य माना गया। विजयनगर के महत्त्वपूर्ण इलाके के लिये हम्पी जाना जाता है। यह साम्राज्य 1336 से 1565 तक अस्तित्व में रहा। यह दक्षिण भारत का अंतिम हिन्दू साम्राज्य था। तालिकोट के युद्ध में बीजापुर, गोलकोंडा व अहमदनगर के मुस्लिम राज्यों ने विजयनगर को हराया।

हम्पी अपने वास्तुकला के लिये जाना जाता है। इस पूरे क्षेत्र में बड़े बड़े पत्थर हैं जिनसे हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। भारत के पुरातत्व विभाग को इस क्षेत्र से मंदिर व प्राचीन अवशेष मिले हैं।

बैंग्लोर से 353 किमी दूर तंगभद्रा नदी के किनारे बसा है हम्पी गाँव। यहाँ पर लोगों की खेती व विरुपक्ष मंदिर से आय होती है। कर्नाटक सरकार प्रति वर्ष नवम्बर माह विजयनगर उत्सव मनाती है। चूँकि इस क्षेत्र में भारी तादाद में खनिज पदार्थ पाये जाते हैं इसलिये कईं वर्षों से यहाँ खनन चल रहा है। और "बेल्लारी बँधु" आंध्र व कर्नाटक सरकारों से मिलीभगत कर "अवैध खनन" कर रहे हैं। विश्व की विरासत में से एक हम्पी और तंगभद्रा नदी पर बना बाँध दोनों ही सरकारी उपेक्षा झेल रहा है।

हम्पी में हिन्दू मंदिर बहुत हैं। विरुपक्ष मंदिर, हज़ारा राम मंदिर, कृष्णा मंदिर व विट्ठल मंदिर इनमें प्रमुख हैं।

न जाने क्यों कब तक हम्पी जैसे अनेकानेक किले, मंदिर व अन्य धरोहरें सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ जायेंगे। रही सही कसर हम पूरी कर देते हैं। कभी किलों में थूक कर तो कभी चट्टानों पर "आई लव यू" की घोषणा कर।

हम्पी के चित्र:


विरूपक्ष मंदिर

360 डिग्री तक फ़ैला हम्पी का विहंगम दृश्य

विट्ठल मंदिर

हम्पी के मंदिर


भारत में अनेक पर्यटन स्थल हैं, इस श्रृंख्ला का एकमात्र मक़सद उन स्थलों को सभी तक पहुँचाना ताकि पर्यटकों व सरकार तक इन स्थलॊं की पीड़ा पहुँचाई जा सके व पर्यटन भारतीय अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत स्तम्भ बन सके।


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स्रोत : विकीपीडिया

जय हिन्द
वन्देमातरम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी
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Tuesday, December 20, 2011

कर्म करो तुम ज्ञान से, श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म । कर्म योग ही धर्म है, धर्मयोग ही कर्म ॥ - रूस द्वारा भग्वद्गीता पर पाबन्दी Russia Bans Bhagvad Geeta Text

रूस में गीता पर कोहराम मचा हुआ है। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें उग्रवाद को बढ़ावा दिया गया है। भाई को भाई से लड़वाया गया है। लड़ाई की शिक्षा दी गई है।

मेरा मत:
श्रीकृष्ण ने गीता का पाठ उस अर्जुन को दिया जो युद्ध क्षेत्र में अपने हथियार डाल देता है। यदि हमारे सैनिक पाकिस्तान व चीन के सामने युद्ध के मैदान में हाथ खड़े कर दें..तो? वे गोली चलाने से घबराने लगे तो?
यह शिक्षा उस अर्जुन को दी गई जो अपने कर्त्तव्य से दूर भाग रहा था। उस अर्जुन को जिसमें संदेह ही संदेह भरा हुआ था। जिसे अपने कर्म का ध्यान नहीं था..जिसे अपने धर्म का ज्ञान नहीं.. जो कर्मयोग से भटक गया था। 

कृष्ण कहते हैं:

कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फ़लेषु कदाचन.. अर्थात कर्म करो फल की इच्छा न करो...

वे कहते हैं कि यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि: भवति भारत.. जब जब धर्म की हानि होती है तब तब वे जन्म लेते हैं।

कृष्ण आत्मा व परमात्मा का ज्ञान देते हैं। वे मुक्ति की बात करते हैं। वे कर्म करने की बात करते हैं। वे धर्म का पालन करने की बात करते हैं। परमात्मा आदि से अनादि तक है। शरीर नश्वर है। जीवन व मृत्यु तो बस आत्मा के लिये एक पड़ाव है। वे कहते हैं कि कर्म का त्याग न करो अपितु त्याग भाव से कर्म करो। वे निराकार परमात्मा को समझाने की कोशिश करते हैं। वे कहते हैं कि "वे" अजन्मा हैं.. वे आदिकाल में भी थे आज भी हैं और हमेशा रहेंगे... वे आत्मा के काल-चक्र को समझाते हैं। वो आत्मा जो शरीर को केवल वस्त्र की तरह पहनता है। आत्मा को कर्म करने के लिये शरीर धारण करना होता है चाहें मनुष्य का हो अथवा पशु का। आत्मा अपने पिछले कर्म व इच्छाओं के कारण ही शरीर का त्याग करता है या नया शरीर धारण करता है। कर्मानुसार ही फल की प्राप्ति होती है।


वे कहते हैं कि तीन तरह के कर्म होते हैं: कर्म, अकर्म व विकर्म। कर्म तो कर्म है ही, विकर्म होता है वह कर्म जो किसी इच्छा के लिये किया जाये और अकर्म होता है वह कर्म जिसे करने के पश्चात आप उसके फल की इच्छा नहीं करते अपितु परमात्मा जो भी देता है उसे मान लेते हैं। अकर्म ही श्रेष्ठ है। कोई भी कार्य अथवा कर्म करते हुए कब "मैं" का भाव आ जाये तो उस कर्म का लाभ ही क्या? कोई भी कार्य करें तो परमात्मा के लिये ही हो।

और भी गूढ़ बातें इसमें कहीं गई हैं जो मुझ जैसे मूढ़ को कम ही समझ आती है। लेकिन इतना समझ आता है कि जीवन जीने की सीख देती है यह पुस्तक। इस पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये अथवा नहीं इसमें मैं कुछ नहीं कहना चाहता। करें तो अच्छा न करें तो भी अच्छा। यदि हम इस पुस्तक को पढ़ लें व इसकी बारीकियों को व शिक्षाओं को अपने जीवन शैली में उतार लें तो शायद धरती स्वर्ग बन जाये या यूँ कहें कि लोकपाल की आवश्यकता ही न पड़े जिसके कारण आज राजनीति में हड़क्म्प मचा हुआ है। इस पुस्तक पर पाबन्दी लगायें या न लगायें लेकिन इस पुस्तक की आवाज़ व सत्यता को कोई समाप्त नहीं कर सकता। गीता का ज्ञान केवल द्वापर युग तक ही सीमित नहीं है वो उससे पहले भी था आज भी है और प्रकृति के अंत तक रहेगा।

मुझे रूस के लोगों से कोई शिकायत नहीं क्योंकि शायद वे इस ब्रह्म सत्य को समझ ही नहीं पा रहे हैं। पश्चिम से लोग आत्मिक व आध्यात्मिक ज्ञान हेतु भारत आते हैं तो उसका कारण भारत की आधात्मिकता की जड़ें भग्वद्गीता में होना ही है। मुझे उनपर क्रोध नहीं आ रहा है, वे बैन करना चाहें तो कर सकते हैं।

पूरी गीता में कहीं भी "हिन्दू" धर्म की बात नहीं कही गई है। क्योंकि तब कोई मजहब था ही नहीं। "हिन्दू" शब्द ही नहीं था। केवल मानवता थी, कर्म था, धर्म था। उसमें जिस धर्म की बात कही गई है उसे हम मजहब या रिलीजन से न तोले। धर्म का शाब्दिक अर्थ किसी भी भाषा में मिलना कठिन है। यहाँ धर्म का आशय पिता का धर्म, पुत्री का धर्म, पत्नी का, माँ का, सेवक का धर्म, राजा का धर्म आदि धर्मों से है।

अर्जुन युद्ध क्षेत्र के मध्य में क्षत्रिय धर्म से भटक जाता है। उसे दुशासन या दुर्योधन का अधर्म दिखाई नहीं देता। वो मोहवश अपना गांडीव छोड़ देता है और तब श्रीकृष्ण उससे कहते हैं:


कर्म करो तुम ज्ञान से, श्रेष्ठ ज्ञान है धर्म ।
कर्म योग ही धर्म है, धर्मयोग ही कर्म ॥

जय हिन्द
वन्देमातरम

नोट: जल्दबाजी में लिखा गया लेख है, त्रुटि सम्भव है।
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Sunday, December 18, 2011

क्या आप जानते हैं में इस बार कुछ रोचक जानकारियाँ Interesting Facts - Did You Know?

क्या आप जानते हैं की श्रृंख्ला में आज हैं कुछ रो़चक तथ्य:

  • ऑस्ट्रेलिया ही एकमात्र महाद्वीप है जिसमें एक भी सक्रिय ज्वालामुखी नहीं है।
  • मनुष्य के पैर में छब्बीस हड्डियाँ हैं।
  • जितनी ऑक्सीजन हम साँस के द्वारा लेते हैं उसका 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा हमारा दिमाग इस्तेमाल करता है।
  • हमारी धरती पर एक मिनट में छह हजार बार बिजली गिरती है।
  • जब 1878 में पहली बार फ़ोन डायरेक्ट्री बनी थी तब उसमें केवल पचास नाम थे। एक शोध के मुताबिक हमारे देश में नलों से ज्यादा मोबाईल हैं। मतलब यह कि जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी के पास पीने को शुद्ध पानी नहीं उसमें आप मुफ़्त बात अवश्य कर सकते हैं।
  • आर्कटिक महासागर विश्व का सबसे छोटा महासागर है।
  • अंग्रेज़ी भाषा का सबसे पुराना शब्द है "Town"।
  • 111,111,111 x 111,111,111 = 12,345,678,987,654,321
  • अफ़्रीकी हाथी के मुँह में केवल चार दाँत होते हैं।
  • गिरगिट की जीभ उसके शरीर से दो गुनी लम्बी होती है।
  • व्हेल मछली उलटी दिशा में नहीं तैर सकती।
  • हाथी अपनी सूँड में पाँच लीटर तक पानी रख सकता है।
  • टिड्डे का खून सफ़ेद रंग का होता है।
  • न्यूटन की उम्र तेईस वर्ष की थी जब उन्होंने  पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की खोज करी थी।

  • मगरमच्छ को रंगों की पहचान में कठिनाई होती है।
  • हैरानी की बात यह है कि मगरमच्छ अपनी जीभ नहीं हिला सकता है।
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जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, December 13, 2011

वैदिक गणित की एक नई श्रूंख्ला - भाग एक Vedic Mathematics Series - Learn Un-Conventional ways of Multiplication Division

भारत का इतिहास व इसकी सभ्यता सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक मानी जाती है। कोई वस्तु जितनी पुरानी होती जाती है उतने ही उसके टूटने व खराब होने के आसार बढ़ते जाते हैं। परन्तु आज भी भारत यदि अपने स्वाभिमान के साथ टिका हुआ है तो उसका कारण इस देश का इतिहास ही है। जब हम देखते हैं पश्चिम के लोग आध्यात्मिकता के लिये भारत का रूख करते हैं तो गर्व का अनुभव होता है। आध्यात्मिकता ही आज एकमात्र रास्ता है पृथ्वी व विश्व के टिके रहने का। हिन्दू धर्म में आध्यात्मिकता की जो बातें हैं व सीख है उससे पूरा विश्व आकर्षित होता है। भारतीय इतिहास ने राम व कृष्ण को देखा है जो मर्यादा में भी रहते हैं और आदि व अनन्त का रहस्य भी बताते हैं। हमने चरक व सुश्रुत को भी देखा है जिन्होंने शल्य चिकित्सा यानि चीरफ़ाड़ के ऑप्रेशन में महारत हासिल की। आज की भाषा में बात करूँ तो वे उस समय के बहुत बड़े सर्जन थे। हजारों वर्ष पूर्व के सर्जन!! हमने वीर शिवाजी को देखा है, हमने लक्ष्मी बाई जैसी वीरांगना को भी देखा जो महज तेईस बरस में अंग्रेजों को दाँतों तले उंगलियाँ दबाने पर मजबूर किया। हमने भगत सिंह को देखा, हमने मोहनदास करमचंद गाँधी को भी देखा, हमने स्वामी दयानन्द व राजा राम मोहन राय को देखा जिन्होंने हिन्दू धर्म की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया। ऐसा ही शायद ही किसी धर्म में होता हो जब वे स्वयं अपनी गलतियों से सीखें व उसे सुधारने का प्रयास करें। ऐसे साधुओं को मेरा प्रणाम। हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया। मुगलों, तुगलकों, लोदियों व अंग्रेज़ों का डटकर सामना किया।

हमारे देश में गर्व करने के लिये व सीखने के लिये इतना सब कुछ है फिर भी जब हम पश्चिम का मुँह ताकते हैं तो हैरानी होती है। दरअसल बात यह है कि हम अपना इतिहास भूल चुके हैं। या यूँ कहें कि इतिहास जानते ही नहीं। बराक ओबामा जब कहते हैं आज का विज्ञान भारत के इतिहास में दिये गये वैज्ञानिक उपलब्धियों पर टिका हुआ है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं है। हमने शून्य दिया इस पर हमें गर्व होना चाहिये। जब हमने चिकिसा प्रणाली दी तब गर्व होना चाहिये। जब हमने Trigonometry का सिद्धांत दिया तब गर्व होना चाहिये। मैंने जब नारद पुराण के कुछ पन्ने पलटे तो मैं दंग रह गया कि उसमें ज्योतिष सिखाया गया है और उसमें Trigonometry की Pythagoras Theorem भी है और Heights & Distances के उदाहरण भी। हमें अपने वेदों व उपनिषदों पर गर्व होना चाहिये जिन्होंने आज के विज्ञान की नींव रखी। हमें अपने पूर्वजों पर गर्व होना चाहिये। हमें गीता पर गर्व होना चाहिये जो आज के आध्यात्मिकता की नींव है।

आज से धूप छाँव पर वैदिक गणित का आरम्भ कर रहा हूँ। मैंने अभी हाल ही में इसे पढ़ना शुरू किया और मैं शुरू के कुछ पन्ने पढ़ कर ही हैरान हो गया हूँ। मैं चाहता हूँ कि इस बेहतरीन तकनीक को सभी के साथ बाँटा जाये और सरकार से बार बार अनुरोध करूँगा कि छोटे बच्चों को इसकी शिक्षा दी जाये। ये विदेशी तकनीकों से बिल्कुल अलग है और बेहद सरल है। इसके किसी भी Calculation के लिये आपको केवल पाँच तक का ही पहाड़ा (Table) आने की जरूरत है।

वैदिक गणित सोलह सूत्रों से बना है।

आज एक उदाहरण से इस श्रृंख्ला का प्रारम्भ कर रहा हूँ।

मान लीजिये आपको 8 x 7 निकालना है।
आप कहेंगे कि इसका जवाब 56 है। बिल्कुल सही। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि केवल 5 तक का ही Table आने की आवश्यकता है।

8 और 10 में 2 का अंतर है व 7 और 10 में 3 का अंतर है। इन्हें कुछ इस तरह से लिखें:

8   -  2
7   -  3

अब 8 में से 3 को (8-3 = 5)या फिर 7 में से 2 (7 - 2 = 5) को घटायें।
और 2 * 3 निकालें...(2*3=6)  और कुछ इस तरह से लिखें:

8 2
7 3
(8-3)     (2*3)
5 6

जवाब आपके सामने है: 56

इसी तरह से
7 x 6 = 42

7 3
6 4
(6-3)         (3*4)
3 12 (अब इसमें से 1 को 3 में जोड़ें)

उत्तर : 42


इसे आप 100 के Base तक ले जा सकते हैं.. मसलन
99 * 88

99 1
88 12

(88-1) (1*12)
87 12

= 8712

इस प्रश्न का उत्तर निकालने के लिये आपको ज्यादा से ज्यादा 5 सेकंड लगेंगे... वहीं यदि आप किताबी तरीके से इसका उत्तर निकालने का प्रयास करें तो??? शर्त लगा सकता हूँ तीन से चार गुना अधिक समय लगेगा..
जो आपने ऊपर सूत्र जाना है वह है निखिलं नवतश्चरम दशत: । जगद्गुरू स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थ जी महाराज (1884-1960) का धन्यवाद जिन्होंने वैदिक गणित को सोलह सूत्रों में पिरो कर हम तक पहुँचाया है।

यह तो अभी शुरूआत है। जैसे जैसे मैं आगे के पन्ने पढूँगा मैं आपके साथ बाँटता रहूँगा।

जय हिन्द
वन्देमातरम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी।
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Saturday, December 10, 2011

हमसफ़र मेरे हमसफ़र...आज भूले बिसरे गीत का है खास अंक Evergreen Songs From Films Purnima, Humraaz, Yakeen & Mere Humsafar

आज दस दिसम्बर है.. आज से दो वर्ष पूर्व  जीवन में एक खास पड़ाव आया था... इसलिये इस दिन का मेरे लिये खास महत्त्व है..
आज के भूले बिसरे गीत के अंक में शामिल हैं मेरी पसंद के खास गीत..

ये गीत पुराने होते हुए भी नये से क्यों लगते हैं? ये गाने श्वेत श्याम युग के हैं... ये गाने दादा के जमाने हैं.. ये गीत सदाबहार हैं...

हमसफ़र मेरे हमसफ़र पंख तुम परवाज़ हम
ज़िन्दगी का गीत हो तुम, गीत की आवाज़ हम
फ़िल्म : पूर्णिमा, कल्याणजी आनंद जी




तुम  अगर  साथ  देने  का  वादा  करो (फ़िल्म : हमराज़)

तुम  अगर  साथ  देने  का  वादा  करो
मैं  यूँ ही  मस्त  नगमे  लुटता  रहूँ
तुम  मुझे  देख  कर  मुस्कुराती  रहो
मैं तुम्हे  देख  कर  गीत  गाता  रहूँ

कितने  जलवे  फिजाओं  में  बिखरे  मगर
मैंने  अब  तक  किसी  को  पुकारा  नहीं
तुमको  देखा  तो  नज़रें  यह  कहने  लगीं
हमको  चेहरे  से  हटना  गवारा  नहीं
तुम  अगर  मेरी  नज़रों  के  आगे  रहो ,
मैं हर  एक  शय  से  नज़रें  चुराता  रहूँ

तुम  अगर  साथ  देने  का  वादा  करो

मैंने  ख्वाबों  में  बरसों  तराशा  जिसे
तुम  वही  संग-ए -मर्मर  की  तस्वीर  हो
तुम  न  समझो  तुम्हारा  मुक़द्दर  हूँ  मैं
मैं  समझता  हूँ  तुम  मेरी  तकदीर  हो
तुम  अगर  मुझको  अपना  समझने  लगो
मैं बहारों  की  महफ़िल  सजाता  रहूँ ,
तुम  अगर  साथ  देने  का  वादा  करो


गर तुम भुला न दोगे (फ़िल्म: यकीन 1969)








गर  तुम  भुला  न  दोगे
सपने  यह  सच  ही  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे 
गर  तुम  भुला  न  दोगे
सपने  यह  सच  ही  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे 

मालिक  ने  अपने  हाथों 
जिस  दम  हमे  बनाया
डाली  दिलों  में  धड़कन
और  दिल  से  दिल  मिलाया
फिर  प्यार  का  फ़रिश्ता
दुनिया  में  लेके  आया 

गर  तुम  भुला  न  दोगे
सपने  यह  सच  ही  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे 

जीवन  के  हर  सफ़र  में
हम  साथ  ही  रहेंगे 
दुनिया  के  हर  डगर  पर
हम  साथ  ही  चलेंगे
हम  साथ  ही  जियेंगे
हम  साथ  ही  मरेंगे 
गर  तुम  भुला  न  दोगे
सपने  यह  सच  ही  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे
हम  तुम  जुदा  न  होंगे 

किसी राह में किसी मोड़ पर
यूँ ही चल न देना तू छोड़ कर... मेरे हमसफ़र



और भी गीत शामिल हो सकते थे पर सभी को एक अंक में शामिल करना मुमकिन नहीं था...

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, December 6, 2011

अहम ब्रह्मास्मि ! Aham Brahmasmi

आत्मा
परमात्मा
आदि अनन्त
साधु व संत
सप्तरंगी छँटा
वादियों में घटा
खग विहग
वर्षा सावन
वन उपवन
पवित्र पावन

मरूभूमि की रेत
सरसों के खेत
खेत में फ़सल
वायु व जल
गीत संगीत
पूनम का चाँद
अमावस की रात

सुख दुख
आज कल
काल चक्र
अच्छा बुरा
अच्छा क्या?
बुरा क्या ?

तेरा मेरा
अपना पराया
तुझमें समाया
खुशी गम
माया व भ्रम...

धूप छाँव
राह  मंज़िल
समंद्र व साहिल
मस्जिद मंदिर
पंडित काज़ी
एक ही जहाज
एक ही माझी

कंस रावण
दुर्योधन दुशासन
कृष्ण या राम
एक ही नाम
ॐकार निराकार

पुरुष प्रकृति
साकार आकृति

रे सर्वज्ञ !
रे सर्वेश्वर !
अर्धनारीश्वर..
क्यूँ है मौन
मैं हूँ कौन ?
मृत्यु जीवन
सत्य अटल
एक सत्य
सत्य असत्य
अग्नि नभ
तुझमें सब
अंतरिक्ष नक्षत्र
ब्रह्म सर्वत्र
तुझमें संसार
मुझमें संसार
तू मैं
मैं तू

अहम ब्रह्मास्मि !

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