Tuesday, March 29, 2011

गुस्ताखियाँ हाजिर हैं: मनमोहन-गिलानी की बातचीत का फ़ोन टेप Manmohan Gilani Phone Talks Leak - Gustaakhiyaan Haajir Hain


कल भारत और पाकिस्तान का मैच है। पर दुनिया में मैच से ज्यादा उस "मिलन" को लेकर बातें चल रही हैं जो मनु भाई और गिल्लू (गिलानी जी) के बीच होने वाली है। पर मैं आप लोगों को वो बातें बताने जा रहा हूँ जो इन दोनों के बीच मैच से पहले ही हो चुकी हैं। बात तब की है जब भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराया था। जैसे ही भारत जीता तो पाकिस्तान व भारत का सेमीफ़ाइनल भी तय हो गया। उस रात हमारे मनमोहन जी भी जागे हुए थे। वैसे तो उनकी रातों की नींद पिछले दो सालों से गायब है (जब से वे दूसरी बार सत्ता में आये हैं)। लेकिन वो रात खास थी। सोनिया जी ने उनके कान में "कुछ" फ़ूँक दिया था।

अगली सुबह उन्होंने वही किया जो सोनिया जी ने कहा था।

सुबह तड़के ही गिलानी जी के "पर्सनल" फ़ोन के घंटी बजी... ट्रिन ट्रिन....
गिलानी जी: हैलो...
मनमोहन जी: हैलो.. गिल्लू?
गिलानी जी: ओये मनु..तू? इस वक्त...इतनी सुबह....
मनमोहन जी: यार गिल्लू.. एक जरूरी गल है...
गिलानी जी: हाँ हाँ बता यार... कोई परेशानी है? हमने तो कल कोई बम भी नहीं फ़टवाया भारत में... फिर कैसे मेरी याद आ गई?
मनमोहन जी: यार.. बात दर असल यह है कि भारत कल ऑस्ट्रेलिया से क्वार्टर फ़ाइनल जीत चुका है और सेमीफ़ाइनल मोहाली में पाकिस्तान से है।
गिलानी जी: हाँ... तो?
मनमोहन जी: तू समझा नहीं गिल्लू? भाई मैं यहाँ आफ़त में हूँ.. कोई न कोई परेशानी आई रहती है..शशि थरूर, कॉमनवेल्थ से लेकर विकीलीक्स तक.... मुझे नींद ही नहीं आ रही है...
गिलानी जी: बता दोस्त मैं तेरे किस काम आ सकता हूँ। मैं भी यहाँ कम परेशान नहीं हूँ.. इन तालिबानियों को जितना भी खिलाओ पिलाओ... हर समय तंग करते रहते हैं...आर्थिक ढाँचा अस्त-व्यस्त हुआ पड़ा है। सारा बजट अमेरिका और चीन से हथियार लेने में निकल जाता है।
मनमोहन जी: वो सब छोड़... जनता का ध्यान इस समय भारत-पाक के मैच पर है। ये बिल्कुल सही समय है... एक काम करते हैं। मैच देखने का मैं तुझे न्यौता देता हूँ। तू बस आ जाइयो... पूरी दुनिया हमारी वार्त्ता पर नजर रखेगी...
गिलानी जी: और हम दोनों दोस्त फिर से ऐश करेंगे...भोली जनता का ध्यान आतंकवाद, भ्रष्टाचार से निकल कर "अमन की आशा" में ;लग जायेगा... बहुत खूब!! क्या चाल चली है ... मजा आ गया...
मनमोहन जी: हाँ.. तो फिर मैच पर "मिलन" पक्का?
गिलानी जी: हाँ हाँ बिल्कुल पक्का है जी... मिल बैठेंगे दो यार.. मैं.. तू.. और....
मनमोहन जी:.. अरे अरे..मैं नहीं पीता भाई....

कहकर फ़ोन काट दिया....
मनमोहन जी (सोचते हुए)... सोनिया जी न होती तो आज मेरा क्या होता....

आज फिर वार्त्ता हो रही है.. कल फिर होगी.. वार्त्ताओं का दौर जारी रहेगा। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने वार्त्ता का दाँव खेला। मिला कारगिल... हर बार वार्त्ता.. हर बार बातचीत... हर बार एक नई जगह..हर बार युद्ध... कभी बलूचिस्तान पर हमारे मनमोहन सिंह अपनी खिल्ली उड़वाते हैं... कभी कश्मीर पर चर्चा... इस बार कश्मीर में भारत या पाकिस्तान की जीत की खुशी में पटाखे फ़ोड़ने पर पाबंदी लगाई गई है.... हालात पिछले साठ बरसों से नहीं सुधरे...तो क्या अब भी चर्चाओं से मामला सुलझाने के आसार हैं? या ये केवल एक राजनैतिक दाँव है... 

28 हजार की क्षमता वाले इस मैदान में महज सात हजार टिकट बिके हैं। बाकि हैं वीआईपी पास..जनता????

जो भी हो.. कल 30 मार्च 2011 की तारीख इतिहास जरूर बनायेगी। एक खेल मैदान पर खेला जायेगा तो दूसरी ओर होंगे राजनीति के वे खिलाड़ी जो अपनी "विकेट" बचाने के लिये खेल रहे हैं। आप भी जरूर देखियेगा..दोनों खेल...देखें जीत किसकी होती है!!!

धूप-छाँव के नियमित स्तम्भ


गुस्ताखियाँ हाजिर हैं

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Thursday, March 24, 2011

फिर एक धमाका कर जाओ... 23 March 1931 Salute Shaheed Bhagat Singh, Sukhdev, Rajguru

एसेम्बली में वो एक धमाका..

ज़ालिम अंग्रेज़ों को चेता गया
सोई जनता को जगा गया...

तब देश हमारा परतंत्र था
अंग्रेज़ों के आतंक से त्रस्त था

पर तुमने वो धमाका किया क्यों?
अपने बचपन को
अपनी जवानी को
यूँ सस्ते में खो दिया क्यों?

क्या तुम्हें भविष्य का अंदाज़ा था
ये देश कितने दिन आज़ाद रहेगा
क्या तुमने मन में सोचा था (?)

तुम गलत थे भगत!!!
तुम गलत थे...

ये देश आज भी गुलाम है..
जहाँ सिर्फ़ पैसे को ही सलाम है..
यहाँ जनता गूँगी बैठी है...
यहाँ नेता बहरे बैठे हैं...
ताकत के गुरूर में
कुर्सी पर ऐंठे बैठे हैं...

सोने की चिड़िया की इस धरती पर
भुखमरी का ऐसा साया है...
जहाँ "ममता" नहीं निर्ममता है
और "माया", "राज" छाया...

23 मार्च का वो इंकिलाबी दिन
जब तुम हँसे देश रोया था..
आज तारीख भूल गया ये देश...
नहीं जानता क्या खोया था...

भगत तुम्हारी आज फिर
महसूस होती जरूरत है...
एक और एहसान कर जाओ...
सोई जनता जगा जाओ..


फिर एक धमाका कर जाओ...
फिर एक धमाका कर जाओ...
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Thursday, March 17, 2011

शहर धुँए में कैद है Shahar Dhuey Mein Qaid Hai - Poem

शहर धुँए में कैद है
दम घुट रहा है....
पर दुनिया की सबसे बड़ी
प्रदूषण - रहित बस सेवा
चलाने वाले इस शहर के पास
इस धुँए से बचने के लिये
कोई सी.एन.जी नहीं !!!

यहाँ दिन-दहाड़े कत्ल होता है
इन्सानियत का....
जो पैदा करता है जेसिकायें व राधिकायें
और रोज़ सहम जाता है शहर..
"रे बैन" का काला चश्मा लगा कर
घूमते हैं लोग...
नज़र चुराते हैं दूध पी रही बिल्ली की तरह..
जैसे कुछ दिख ही नहीं रहा हो
उस रंगीन चश्मे के पीछे...

फ़ुटऑवर ब्रिज और फ़्लाईऑवरों
से गुजरते वाहन..लोग...
तोड़ते हैं उम्मीदों का पुल..
मनों में घोला जाता है "तारकोल"
और रौंदी जाती हैं खुशियाँ
"रोडरोलर" के तले...
और तैयार हो जाती है ईर्ष्या व द्वेष
की एक मज़बूत सड़क..

"विकसित" देशों में शामिल होने की चाह लिये...
हर दिन होता है मानवता का खून...
रोज़ बढ़ाते हैं हम सीने में जल रही
उस आग का जी.डी.पी...
उसी "आग" के धुँए में घुट रहा है
"नैशनल क्राइम कैपिटल"
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Saturday, March 12, 2011

तस्वॊरों में देखिये: दिल्ली में हो रहे विकास की एक तस्वीर Development In Delhi In Pictures

आप सभी इस बात से वाकिफ़ हैं कि आजकल "Development" यानि विकास बहुत ज्यादा हो रहा है खासतौर पर मेट्रो शहरों में। इन्हीं मेट्रो शहर में से एक है हमारी दिल्ली जहाँ राष्ट्रकुल खेल या कहें कि भ्रष्टकुल खेलों की वजह से "विकास" की रफ़्तार कुछ ज्यादा ही अधिक है।
इसी तरह का विकास मेरे इलाके रानी बाग में भी शुरु हुआ। उसी विकास की दो तस्वीरें आप लोगों के समक्ष रख रहा हूँ।

रानी बाग में एक बहुत पुराना पीपल का पेड था जो कि विकास की भेंट चढ़ गया। बदले में मिला एक फ़ुट ऑवर ब्रिज। जिस जगह इस ब्रिज को बनाया गया है, इस ब्रिज का वैसे तो कोई खास इस्तेमाल होना नहीं है, फिर भी यदि कोई इसके सहारे सड़क पार करना भी चाहे तो आप नीचे की तस्वीर पर एक बार नज़र जरूर डालें।
ट्रांसफ़ॉर्मर पर खत्म होता फ़ुटऑवरब्रिज

गौर से देखने पर आप पायेंगे कि जहाँ पर ये ब्रिज खत्म हो रहा है उस जगह पर एक बड़ा सा ट्रांसफ़ॉर्मर पहले से ही मौजूद है। अब आप ही बतायें कि यदि कोई चाहे भी तो भी इसका प्रयोग किस तरह कर सकता है?

प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के पोस्टरों से लदा फ़ुटऑवर ब्रिज

एक बात और बताते जायें कि इसका उद्घाटन दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माननीय जयप्रकाश अग्रवाल जी अपनी पदयात्रा के दौरान कर चुके हैं। वे यहाँ से गुजरे और इसको चालू करते  चले गये।
शायद इसी को विकास कहते हैं।

विकास की एक और झलक आपको दिखाता हूँ। पिछले माह ही धूप-छाँव पर "विलुप्तप्राय: जीवों" के बारे में एक पोस्ट डाली थी। यदि आप ध्यान देंगे तो पायेंगे कि जीवों के विलुप्त होने का मुख्य कारण उनके रहने के स्थान का तेजी से  हो रहा क्षरण है। पिछले 20 दिनों से हमारे घर के आसपास एक बंदर का आतंक फ़ैला हुआ है। घर के पीछे जहाँ फ़ुटऑवरब्रिज बना हुआ है उसके साथ ही बहुत सारे पेड़ भी हैं। आजकल वे भी लगातार काटे जा रहे हैं। कहते हैं कि यहाँ से एक सड़क बनाई जायेगी जो गंतव्य स्थानों की दूरी को 15 मिनट तक कम कर देगी। एक तस्वीर उसकी भी देखते चलें। मेरा मानना है  कि इन पेड़ों की कटाई के कारण ही ये बंदर सड़क पार आ कर घरों में घुस रहा है।

मुख्य सड़क के पीछे काटे जा रहे पेड़

जंगलों की कटाई के कारण ही आजकल तेंदुओं के शहर में घुसने जिसे वाकये बढ़ते जा रहे हैं। पर हम "सभ्य" लोग इन सब बातों से बेखबर केवल एक ही राह पर चलते हैं जिसे हमने अपने लिये "विकास" का नाम दिया है और अपनी  "गुमराही" पर "गुमान" करते हुए खुशफ़हमी में जी रहे हैं।

"तस्वीरों में देखिये" जारी रहेगा....
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Friday, March 4, 2011

कर्नाटक क्रिकेट में कुम्बले और श्रीनाथ को राजनेताओं ने फ़ेंकी बाऊंसर और गुगली..Karnataka Cricket Ticket Distribution - Kumble Srinath Attacked By Politicians

पिछले कुछ समय से राजनेता किसी न किसी गलत कारणों से खबरों का हिस्सा बन रहे हैं। कॉमनवेल्थ, 2जी, एस-बैंड घोटाला तो कभी सीवीसी की नियुक्ति पर सवाल। कभी महाराष्ट्र से घोटालों की बू आती है तो कभी कर्नाटक। आंध्रप्रदेश में तेलंगाना जल कर धू-धू सुलग रहा है और राजनेता तसल्ली से रोटी सेंक रहे हैं। जगन मोहन रेड्डी बगावती तेवर अपनाये हुए हैं तो इसलिये कांग्रेस ने चिरंजीवी का हाथ थामा। "हाथ" तो करूणानिधि भी थाम रहे हैं। उन्हें शायद यह लग रहा है कि "हाथ" के सहारे वे आम आदमी का साथ पा लेंगे। केरल में लॉटरी घोटाले में कांग्रेस और लेफ़्ट गुत्त्थम-गुत्था हो रहे हैं। चुनाव आने वाले हैं तो हर तरफ़ सियासती रस्साकशी का माहौल है।

ऐसा बहुत कम होता है जब कांग्रेस और भाजपा जिन्हें देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियाँ माना जाता है, दोनों के सुर एक हों। ऐसा भी कम ही दिखाई पड़ता है जब राजनेताओं ने खेल संस्थाओं में गद्दी न हड़प रखी हो। अरूण जेटली डीडीसीए में, नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट में काबिज हैं तो राजीव शुक्ला बरसों से क्रिकेट बोर्ड में "कमाई" कर रहे हैं। और अपने शरद पवार को कैसे कोई भुला सकता है। लेकिन हाल ही में कुछ अलग देखने को मिला जब कुम्बले और श्रीनाथ कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष नियुक्त हुए तो भला नेता कैसे चुप बैठेंगे। उन्हें तो काटो मानो खून नहीं।

पिछले दिनों क्रिकेट खेल प्रेमियों पर टिकटों की बिक्री के समय बेंग्लुरु में लाठीचार्ज हुआ। इस मौके पर भाजपा और कांग्रेस ने विधानसभा में हंगामा किया। जी हाँ दोनों पार्टियाँ एक साथ..सही पढ़ा आपने। दोनों पक्ष के कुछ नेताओं ने कुम्बले और श्रीनाथ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये। भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे शिष्ट खिलाड़ियों में इन दोनों की गिनती की जाते तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल कर्नाटक में इस बार एक व्यक्ति को केवल एक पास दिया जाना था। भाजपा के एक विधायक ने कहा कि उन्हें विधायक के तौर पर केवल एक पास मिला है इसलिये वे अपने परिवार को साथ नहीं ले जा पा रहे। इन्हें कौन समझाये कि यदि आपको इतना ही शौक है तो आप टिकट क्यों नहीं खरीदते। ऊपर से उनका कहना यह भी है कि वे "आम आदमी" नहीं हैं। इन शब्दों से आपको इन नेताओं के आगे हम लोगों की औकात पता चल गई होगी। कॉंग्रेस विधायक कहते हैं कि कुम्बले और श्रीनाथ के रिश्तेदार उनसे पास के बदले में 5000 रूपये की माँग कर रहे हैं।

हाल ही में एक अखबार में छोटी सी कहानी पढ़ी थी। एक मंत्री जी थे जो ईमानदारी से काम करते थे। एक पैसा भी हेर-फ़ेर नहीं करते। एक दिन उनको कुछ हजार रूपये की जरूरत पड़ी। उनकी पत्नी ने कहा कि पार्टी फ़ंड से रूपये उधार ले लो और तीन दिन में लौटा देना। उन्होंने कहा कि पहले तुम ये लिख कर दे दो कि इन तीन दिनों में मुझे मृत्यु नहीं आयेगी उस सूरत में मैं उधार ले लूँगा। आज के राजनेता ऐसे नहीं हैं। शायद किसी की कलम से गलत कहानी लिखी गई।

खैर, आप ही बतायें कुर्सी के लालची ये सियासी दल इन दोनों खिलाड़ियों को कैसे जीने देंगे?
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Tuesday, March 1, 2011

राष्ट्रगान फिर फ़ँसा विवादों में-स्कूल ने बदले राष्ट्रगान के शब्द National Anthem Controversy Strikes Again

हाल ही में एक खबर पढ़ी। उत्तर प्रदेश के एक गाँव के स्कूल में "जन गण मन" को बदला गया। उसके कुछ शब्दों में हेर-फ़ेर किया गया। जब किसी ने इसकी शिकायत करी तो प्रशासन ने स्कूल के प्रधानाचार्य को नोटिस भिजवा दिया। स्कूल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने शब्दों को इसलिये बदला क्योंकि वे अंग्रेजी राजा किंग जॉर्ज पंचम के लिये कहे गये थे।

अम्बेडकर नगर जिले के एक गाँव के निजी स्कूल स्कूल के प्रबन्धक रघुनाथ सिंह स्कूल के बच्चों को जो राष्ट्रगान गवाते है उसमें ‘भारत भाग्य विधाता’ के स्थान पर ‘स्वर्णिम भारत निर्माता’ तथा ‘तव शुभ आशीष मांगे’ के स्थान पर ‘तव शुभकामना मांगे’ तथा ‘अधिनायक’ के स्थान पर ‘उत्प्रेरक’ शब्द गाया जा रहा है।
राष्ट्रगान के इस विवाद के बारे में कईं बार पढ़ा है। आइये जानते हैं कि आखिर माजरा है क्या। बात 1911 की है जब काँग्रेस ने रविंद्र नाथ टैगोर से अंग्रेज़ी राजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में गीत लिखने को कहा। काँग्रेस राजा को खुश करना चाहती थी क्योंकि उन्होंने बंगाल के विभाजन को रोकने में भूमिका निभाई थी। कहते हैं कि उसके कुछ समय के पस्चात के बाद रविंद्रनाथ ने "जन गण मन" लिख कर कांग्रेस को दिया। जिसे दिसम्बर में काँग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए जॉर्ज के समक्ष गाया गया था। बस इसी के बाद विवाद खड़ा होना शुरू हो गया।

पर वे शब्द हैं कौन से जो विवादित हैं?
जन गण मन अधिनायक जय हे: इस पंक्ति में "अधिनायक" (super hero) कह कर किसे संबोधित किया जा रहा है?
भारत भाग्य विधाता: यहाँ भारत का "भाग्य -विधाता" कौन है?
गाये तव जय गाथा: "तव" और "जय गाथा" शब्द भी विवादित माने गये हैं क्योंकि इस पंक्ति में किस की जीत की बात हो रही है?

रविंद्रनाथ के करीबी बताते हैं कि जब काँग्रेस ने गाना लिखने का आग्रह किया था उसके बाद कुछ दिनों तक वे काफ़ी परेशान रहे। फिर उन्होंने ये गीत लिखा जो उस "भाग्य विधाता" के नाम था जो भारत के साथ सदियों से रहा है और भारत को सभी कठिनाइयों से उबार रहा है। खैर अधिवेशन में खुद रविंद्रनाथ ने सर्वप्रथम इस राष्ट्रगान को गाया था।
और 24 जनवरी 1950 को ये गीत हमारा राष्ट्रगीत बन गया।

क्या सही है क्या गलत ये समझना तब अधिक कठिन हो जाता है जब इतिहास पुराना पड़ता चला जाता है और रह जाते हैं तो केवल कुछ तर्क। और चूँकि भारतीय इतिहास सबसे पुराना है और कईं तरह के बदलावों से गुजरा है इसलिये इसको समझने में और दिक्कतें आती हैं। बुद्धिजीवी अपने हिसाब से शब्दों की परिभाषा निकालते आये हैं और हम तक सही बात पहुँच नहीं पाती। चाहें वंदे मातरम हो या "जन गण मन" विवाद दोनों के साथ है... चलो फिर क्यों न हम "सारे जहाँ से अच्छा.." गुनगुना शुरु कर दें....

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..
वन्देमातरम.

वन्देमातरम पर विवाद (सम्बन्धित लेख)
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Wednesday, February 23, 2011

प्रेम का एक दिन या हर दिन प्रेम का...वेलेंटाइन डे स्पेशल Spread Love Every Day Valentines Day Special

हमारे देश में कईं सारे "दिवस" मनाये जाते हैं। जैसे गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, बाल दिवस, हिन्दी दिवस इत्यादि। ये सभी दिवस या तो हमारे गौरवशाली इतिहास को याद दिलाते हैं या फिर सामाजिक कर्त्तव्यों का अहसास कराते हैं। कईं वर्षों से प्रति वर्ष पूरा देश इन्हें मनाता आ रहा है। या यूँ कहें कि इन "दिवसों" के नाम पर छुट्टी मनाता आ रहा है। इसी तरह से ढेरों "जयन्तियाँ" थोक के भाव में हर महीने आ ही जाती हैं।

खैर पिछले आठ से दस साल से एक और "दिवस" हम भारतीयों की ज़िन्दिगी का हिस्सा बन गया है। जिसका नाम है "वेलंटाइन डे" अब अंग्रेज़ी के "डे" को हिन्दी में दिवस ही बोलेंगे। ये दिवस बाकि सब दिवसों का "बाप" बन कर आया है। सरकार गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर छुट्टी देती है और हम घर में सो कर बिता देते हैं। जबकि इस "वेलेंटाइन डे" पर छुट्टी करते हैं और बाहर घूमने जाते हैं। मैने बिना किसी कारण के इस "डे" को सबका "बाप" नहीं कहा है। एक आँकड़ा देखिये- 1200 करोड़। ये आँकड़ा इस वर्ष वेलेंटाइन डे पर होने वाले पूरे व्यापार का। हम भारतीयों ने 1200 करोड़ रूपये केवल इस "दिवस" को मनाने में खर्च किये। क्या इसको "फ़िजूलखर्च" कहा जा सकता है? ऐसा प्रश्न कईं बार उठता है। "प्यार" के नाम पर इस दिन का व्यापारीकरण किया गया और भारतीय बाज़ार में चुपचाप उतार दिया। ठीक उसी तरह जैसे कोई कम्पनी नया प्रोडक्ट बाज़ार में पेश करती है।

करीबन दस साल पहले जब ये "दिन" भारत के बाज़ार में आया तब किसी ने नहीं सोचा था कि "बाज़ार" में प्यार के दाम में इतना अधिक उछाल आ जायेगा कि बाकि सब ऐतिहासिक दिन पीछे छूट जायेंगे। नई पीढ़ी "प्रेम" के नये फ़ंडे को अपनाती चली गई और आज यह प्रोडक्ट 1200 करोड़ में बिकता है। आने वाले समय में ईद और दीवाली को टक्कर देने वाला है। एक "दिन" से ऊपर उठकर त्योहार की उपाधि पाने से इसे कोई नहीं रोक सकता।

ऐसा नहीं कि इस इन का विरोध किया जाना चाहिये। पर जिस चालाकी से बाज़ार प्रेम को बेच रहा है उस पर बहस होनी चाहिये। एक सप्ताह पहले से ही रेडियो और टीवी वाले इसके कार्यक्रम दिखाने शुरु होते है। इस बार मेरे पास दो मित्रों से एक जैसे एस.एम.एस. आये जिसमें कहा गया कि 14 फ़रवरी को भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव को फ़ाँसी लगाई गई इस लिये हमें ये दिन उनकी याद में भी मनाना चाहिये। ये पढ़कर दिल दुखी हुआ, जिन लोगों ने इस मैसेज को शुरु किया उनपर गुस्सा आया और जो इस"चेन" को आगे बढ़ते गये उनपर दया आई। आप ही बतायें शहीदों के बलिदान को किस तरह से "प्रेम" के बाज़ार में उछाला जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस तरह के मैसेज मोबाइल कम्पनियाँ ही जानबूझ कर शुरु करती हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाये जा सकें। लोगों की भावनाओं के साथ खेलने से उन्हें कोई परहेज नहीं होता।

एक और आँकड़े की मानें तो अमरीका में 14 फ़रवरी के आसपास अधिक तालाक होने शुरु हो गये हैं। पिछले दो सालों में 40 प्रतिशत का उछाल आया है। हमारे देश में भी तालाक की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पिछले कुछ वर्षों से एक नया शब्द चलन में है "ब्रेक अप"। यानि युवक युवती में कथित "प्यार" हुआ (शायद कुछ वेलेंटाइन डे साथ में बिताये) और फिर अलग हो गये। ऐसा क्यों? प्यार की कीमत क्यों लगाई जाने लगी है? राधा-कॄष्ण के प्रेम की साक्षी यह धरती आज इस एक दिन की मोहताज क्यों बन गई है? २६ जनवरी और १५ अगस्त को भारत-वर्ष से प्यार करें, १४ नवम्बर को बच्चों के साथ प्रेम बाँटें। हर दिन प्रेम का है, तो फिर 14 फ़रवरी का इंतज़ार क्यों करें।

प्रेम की इस संसार को ज़रूरत है.... पर प्रेम के व्यापारीकरण का क्या.....

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यों है..
ज़ख्म हर सर पे हर एक हाथ में पत्थर क्यों है....

हालाँकि वेलेंटाइन डे बीते 10 दिन के करीब हो गये हैं फिर भी मुझे लगा कि अपनी बात तो कभी भी कही जा सकती है।
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Sunday, February 20, 2011

जब विदेश मंत्री ने पढ़ा पुर्तगाली भाषण एक माइक्रोपोस्ट Foreign Minister read Portugal Minister's Speech : A Micropost

पिछले सप्ताह विदेश मंत्री ने जब संयुक्त राष्ट्र में पुर्तगाल के विदेशमंत्री का भाषण पढ़ा तो बेहद शर्म महसूस हुई। विदेश मंत्री किसी देश का चेहरा होता है। शर्म तब भी महसूस  हुई जब उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से कहा कि ये कोई "बड़ी" बात नहीं है। याद कीजिये अटल बिहारी वाजपेयी ने जब संयुक्त राष्ट्र ने हिन्दी में भाषण पढ़ा। ये बात सुनकर और पढ़कर जितना गौरव महसूस हुआ उतनी शर्म आज महसूस हो रही है। ऐसे मंत्री हमारा प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो किसी और का लिखा भाषण तो पढ़ते ही हैं ऊपर से भाषण देने से पहले एक बार उसकी "प्रूफ़ रीडिंग" भी नहीं करते। उन्हें यह पता ही नहीं होता कि वे क्या पढ़ रहे हैं। दु:खद शर्मनाक...
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Thursday, February 10, 2011

क्या आप जानते हैं? भारत की विलुप्तप्राय: प्रजातियाँ.....आइये, इनकी रक्षा करें India's Endangered Species.. Let us save them

आज दो सप्ताह बाद कोई पोस्ट ब्लॉग पर कर रहा हूँ। देरी से पोस्ट के लिये क्षमा चाहता हूँ पर क्या करें व्यस्तता चीज़ ही ऐसी है। आज का लेख राजनैतिक नहीं है, सामाजिक भी नहीं है वरन आज का लेख मेरे और आपके जीवन से जुड़ा हुआ है। पूरी जीवन संरचना जिस पर टिकी हुई है और भूगोलशास्त्री व जीव विज्ञानी जिस मुद्दे को सबसे अहम मानते हैं, उसी पर आधारित है आज का लेख। ज्यादा भूमिका न बाँधते हुए मुद्दे पर आते हैं।

क्या आप जानते है भारत में चीतों की कितनी संख्या है? 10, 20, 100 या 1000? जी नहीं...10 भी नहीं। बल्कि सरकारी विभाग की मानें तो भारत से चीता पूरी तरह विलुप्त हो चुका है। एक पेय पदार्थ की एड में जब "चीता भी पीता है" देखते हैं तब कभी यह ख्याल नहीं आया कि जिस चीते की ये बात कर रहे हैं वो भारत में है ही नहीं। एक भी नहीं!! ये रौंगटे खड़े कर देने वाली कड़वी सच्चाई है। आज हम चीते की बात जब उठा रहे हैं तब  उन जानवरों का भी जिक्र करेंगे जो अब चीते की राह पकड़ चुके हैं। चीते की रफ़्तार को पूरी दुनिया मानती है अब उसी रफ़्तार से इन जंगली पशु-पक्षियों का सफ़ाया भी हो रहा है।
चीता: केवल तस्वीरों में ही देखिये...

क्या आप जानते हैं भारत में  हमारे साथ कम से कम स्तनपायी(Mammals) जीवों की 397 प्रजातियाँ, पक्षियों की 1232, सरीसृपों (Reptiles) की 460, मछलियों की 2546 और कीट-पतंगों की 59, 353 प्रजातियाँ भी निवास करती हैं। भारत 18,664 तरह के पेड़-पौधों का घर भी है। भारत का कुल क्षेत्रफ़ल विश्व का 2.4 प्रतिशत ही है लेकिन जैव विविधता में भारत का योगदान 8 प्रतिशत है। 

किसी पारिस्थितिक प्रणाली (Ecological System) में पाई जाने वाली जैव विविधता से उसके स्वास्थ्य का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। जितनी स्वस्थ जैव विविधता (Bio-Dioversity) होगी उतना ही स्वस्थ इकोलोजिकल सिस्टम भी होगा। लेकिन चोरी छुपे शिकार और प्राकृतिक पर्यावास के छिनने से जानवरों के विलुप्त होना का खतरा पैदा हो गया है।

आज हम बात इन्हीं जीव-जन्तुओं की करेंगे जो अपना दर्द बोल कर नहीं समझा सकते।


पहला नम्बर है "Save Tiger" मिशन के बाघ का । भारत का राष्ट्रीय पशु सर्वाधिक संकटग्रस्त प्रजातियों में से एक हैं। खाल और विभिन्न अंगों की भारी कीमत के चलते इनका शिकार किया जाता है। देश में अब केवल 1411  बाघ ही बचे हैं।


एशियाई शेर: गुजरात के गिर वन में अब करीब 411  शेर बचे है। पर्यावरण क्षरण, जल प्रदूषण और शिकार के लिये जानवरों की कमी के कारण यह प्रजाति संकट में है।






काली गर्दन वाला सारस (Black Necked Crane): यह जम्मू कश्मीर का राज्य पक्षी है। जैविक दबावों, झीलों और दलदली क्षेत्रों के सूखने और बढ़ते प्रदूषण के चलते, अब अत्यन्त दुर्लभ है।


पश्चिमी ट्रैगोपैन (Western Tragopan): हिमालय के निकटवर्ती स्थानों में पाये जाने वाली एक दुर्लभ तीतर प्रजाति। शिकार और पर्यावास क्षरण (Habitat Degradation) के कारण संकट में है।


गिद्ध: यह प्रमुख रूप से मृत-पशु माँस पर निर्भर है। पशुओं में बड़े  पैमाने पर डाइक्लोफ़ेनेक दवा के इस्तेमाल के कारण आज इनकी संख्या 97 से 99 प्रतिशत तक कम हो गई है।


हिम तेंदुआ (Snow Leopard): हिमालय की ऊँचाईयों मे पाईजाने वाली बिल्ली की अत्यन्त फ़ुर्तीली प्रजाति। चोरी छिपे इसके शिकार और शिकार के लिये जानवरों कीकमी के कारण इसकी संख्या में भारी कमी आई है।

लाल पांडा (Red Panda): वृक्षों पर रहने वाला पूर्वी हिमालय का स्तनपायी जीव। वनों का सफ़ाया होने से इसके पर्यावास में हुई कमी के कारण आबादी में जबर्दस्त कमी आई है।


सुनहरा लंगूर (Golden langoor): ब्रह्मपुत्र नदी के आसपास पाया जाता है। अब इनकी संख्या तेजी से घत रही है।






भारतीय हाथी (Indian Elephant): राष्ट्रीय विरासत पशु। हाथी दाँत के लिये चोरी छिपे शिकार और पर्यावास के नष्ट होने कारण संकटग्रस्त। जंगलों में केवल 26000  हाथी बचे हैं।




एक सींग वाला एशियाई गैंडा (Indian One-Horn Rhino): कभी गंगा के मैदानी इलाकों में बहुतायत में था, लेकिन सींग की वजह से इसके अत्याधिक शिकार और प्राकृतिक पर्यावास के चलते आज जंगलों में करीब  2100 गैंडे ही बचे हैं।




दलदली क्षेत्र का हिरण (Swamp Deer): यह हिरण मूल रूप से भारत और नेपाल में पाया जाता है; पर्यावास क्षरण और अन्य नृविज्ञानी (Anthropogenic Pressure)  दबावों के कारण इनकी संख्या घटी है।


ओलिव रिडले कछुआ (Olive Ridle Turtle): भारत के पूर्वी तट पर पाया जाने वाला सबसे छोटा कछुआ। केवल ओड़िशा तट पर भारी संख्या में अंडे देता है। प्रजनन स्थलों की संख्या में कमी, मछलियों के जालों मेम फ़ँस जाने और समुद्री जल के बढ़ते प्रदूषण के कारण इनकी आबादी को खतरा हो गया है।



ये केवल 12 हैं। ऐसे न जाने कितने ही और जीव जन्तु हैं जिनके बारे में हम सोचते नहीं हैं। जो आज विलुप्त होने की कगार पर हैं। बाघ हमारा ध्यान खींच सकता है क्योंकि वह एक राष्ट्रीय पशु है परन्तु बाकि ग्यारह भी उतने ही आवश्यक हैं। हमारा कर्त्तव्य है कि हम इन्हें बचा कर रखे। ये हमारी धरोहर हैं। इनके न होने के बारे में हम सोच भी नहीं सकते।

आइये एक  मिशन में सब साथ दें। Save Tiger ही नहीं "Save All Endangered Species" का लक्ष्य बनायें। आइये इस नेक काज को लोगों तक पहुँचायें। भारत के कोने कोने तक यह जागृति लाना ही एकमात्र लक्ष्य है। जीव रहेंगे तो हम जिंदा रहेंगे। जीव से ही सृष्टि टिकी है और उसी से हमारा जीवन।

नोट: चीता विलुप्त हो चुका है। आईये बाकियों को सहेजें।


स्रोत: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा जारी 2011 का कैलेंडर।

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Wednesday, January 26, 2011

क्यों मनायें गणतंत्र दिवस, भाजपा की तिरंगा यात्रा और क्या है तिरंगे का इतिहास Republic Day, BJP Tiranga Yatra and History Of Indian National Flag

आप सभी को गणतंत्र दिवस की बधाई। हमारा देश आज 62वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। 26 जनवरी 1950 वो दिन है जब हमारा देश गणतंत्र घोषित हुआ था। पर आखिर गणतंत्र होने के मायने क्या हैं? क्या यह केवल परेड देखने और छुट्टी मनाने का एक और दिन है? नहीं। बिन्कुल नहीं। इसका मतलब है कि आप स्वतंत्र हैं अपनी खुद की सरकार चुनने के लिये। आपकी सरकार आपके लिये। संविधान बना, कानून बने। हमारे अधिकार और हमारे कर्त्तव्य हमें बताये गये। पर हम केवल एक ही बात का ध्यान रखते हैं। अधिकार!! पर हमारे कर्त्तव्यों का क्या? क्या आप और हम अपने कर्त्तव्यों के बारे में जानते हैं?

चलिये आप को एक ऐसे देश में ले चलते हैं जहाँ राष्ट्रगीत पर पाबंदी लगाई जाती हो? क्या आप ऐसा देश जानते हैं जहाँ राष्ट्रध्वज को फ़हराने के लिये अनुमति लेनी होती है? एक ऐसा देश बतायें जहाँ दुश्मनों के झंडे तो आप आसानी से फ़हरा सकते हैं पर अपना खुद का झंडा लहराने के लिये आपको मनाही है। जी हाँ आपने सही पहचाना यह हमारा अपना हिन्दुस्तान ही है। इस देश में आपको तिरंगा लहराने के लिये मना किया जाता है। भाजपा के तिरंगे मिशन को रोकने के लिये बहुत प्रयास किये गये। भाजपा यहाँ राजनीति कर रही है। ऐसा कुछ दल आरोप लगा रहे हैं। आरोप सही हैं या नहीं बात इसकी नहीं।जि:संदेह इस राजनीति का फ़ायदा भाजपा को पहुँचेगा। पर बात उस अधिकार की है जो हमारा गणतंत्र हमें देता है। श्रीनगर का लाल-चौक जहाँ पाकिस्तानी झंडे लहराये जाते हैं  वहाँ उन लोगों पर कोई केस नहीं होता। यासिन मलिक जैसे अलगाववादी नेता जो कश्मीर को भारत से अलग देखना चाहते हैं उन्हें कोई कुछ नहीं कहता। "गदर" में सनी देओल से जब हिन्दुस्तान मुर्दाबाद कहलाया जाता है तब सनी देओल डायलॉग मारते हैं:

"आपका पाकिस्तान जिन्दाबाद है इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन हमारा हिन्दुस्तान जिन्दाबाद है, जिन्दाबाद रहेगा।"
इस डायलॉग पर हो सकता है कि आप, मैं और हमारे नेता लोग भी ताली बजायें। लेकिन फिर क्यों नहीं हम इन अलगाववादियों को यह कहें कि आप जब पाकिस्तान का झंडा बुलंद करते हैं तब हमें कोई आपत्ति नहीं तो फिर लालचौक पर अपने ही देश का झंडा लहराने पर उन्हें आपत्ति क्यों?

खैर, मुद्दा नाजुक है। और हम में से अधिकतर इस बेहद संवेदनशील मुद्दे की शुरुआत से अनभिज्ञ हैं। इस पर कुछ कहना मेरे लिये ठीक नहीं। लेकिन मेरा विवेक कहता है कि जब आप देश के उस हिस्से में तिरंगा नहीं लहरा सकते तो उस हिस्से को देश का हिस्सा मानना ही गलत है। और जब हमारी सरकार उसे भारत का हिस्सा मानती है तो तिरंगा लहराना राजनीति नहीं अपना हक़ होना चाहिये।

मैथिली शरण गुप्त की कलम से निकली देशभक्ति की यह पंक्तियाँ:
"जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधान नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।"

कैसे बना हमारा राष्ट्र-ध्वज। आइये डालते हैं इतिहास के पन्नों पर कुछ नजर:


विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा.... ये बोल सुनते ही शरीर में रौंगटे खड़े होने लगते हैं और हम गर्व से कह उठते हैं कि तिरंगा हमें सबसे प्यारा है। खेलों के मैदान में दर्शक यही तिरंगा फ़ैला कर अपनी खुशी का इजहार करते हैं। १५ अगस्त को पतंगें चुनते हुए तिरंगों का खास ध्यान रखा जाता है। इतने खास तिरंगे के बारे में आइये थोड़ा जानते हैं।

२२ जुलाई १९४७ को आज के तिरंगे को मान्यता मिली। आज के तिरंगे को तो हम जानते ही हैं। तीन रंग बीच में अशोक चक्र। सबसे ऊपर केसरिया, फिर सफ़ेद और फिर हरा। लेकिन इससे पहले इस तिरंगे के कितने स्वरूप बदले हैं उसके लिये इतिहास में झाँकना होगा। सबसे पहले १९०४-०५ में स्वामी विवेकानंद की शिष्या सिस्टर निवेदिता ने एक झंडा प्रस्तुत किया। लाल और पीले रंगे के इस झंडे में वज्र और कमल के फूल भी थे। लाल रंग स्वतंत्रता संग्राम का तो पीला विजयी होने का प्रतीक था। वज्र शक्ति को तथा कमल शुद्धता को दर्शाता था। १८८२ में बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित आनंदमठ उपन्यास के गीत "वंदे मातरम" को बंगाली भाषा में लिखवाया। इस झंडे को काँग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में दिसम्बर १९०६ में प्रदर्शित किया गया।
सचिंद्रनाथ बोस का तिरंगा

उस समय और भी तरह तरह के झंडे बनाये जाने लगे। चूँकि हमारा देश का हर हिस्सा अपने आप में दूसरे से अलग है और उस समय भारत का कोई एक झंडा नहीं हुआ करता था तो हर कोई अपने सुझाव दे रहा था। उन्हीं में से एक था सचिंद्रनाथ बोस का तिरंगा जो उन्होंने ७ अगस्त १९०६ को बंगाल के विभाजन के विरोध में फ़हराया था। सबसे ऊपर था संतरी रंग, बीच में पीला व सबसे नीचे था हरा रंग। संतरी रंग की पट्टी में ८ आधे खिले हुए कमल के फूल थे। सबसे नीचे एक सूरज और एक चंद्रमा था व बीच में देवनागरी में वंदेमातरम लिखा हुआ था।
भीकाजी कामा द्वारा जर्मनी में फहराया गया तिरंगा

उसके बाद २२ अगस्त १९०७ को भीकाजी कामा ने एक और तिरंगे को जर्मनी में फ़हराया। इसमें हरा रंग सबसे ऊपर, बीच में केसरिया और सबस नीचे लाल रंग था। हरा रंग इस्लाम व केसरिया हिन्दू व बौद्ध धर्म का कहा गया। हरे रंग की पट्टी में आठ कमल थे जो ब्रिटिश हुकूमत के समय भारत के आठ प्रांतों को दर्शाते थे। लाल रंग की पट्टी पर चाँद और सूरज बने हुए थे। इस तिरंगे को भीकाजी के साथ मिलकर बनाया था वीर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा ने।

इसी तरह से गदर पार्टी ने अपना झंडा निकाला और बाल गंगाधर तिलक व एनी बेसेंट ने मिलकर अपने ध्वज का इस्तेमाल किया। देखिये इनकी झलक...
गदर पार्टी का तिरंगा
बाल गंगाधर तिलक व एनी बेसेंट का झंडा
सन १९१६ में पहली बार कांग्रेस ने एक ध्वज का निर्माण करने का फ़ैसला किया। ये कार्य सौंपा गया मछलीपट्टनम, आंध्रप्रदेश के लेखक पिंगली वेंकैया को। महात्मा गाँधी ने उन्हें ध्वज में "चरखा" इस्तेमाल करने की हिदायत दी। ये वो समय था जब चरखे के इस्तेमाल से लोग खादी को अपना रहे थे और उसी से एकता में बँध रहे थे। पिंगली वेंकैया ने खादी का ही ध्वज बनाया और उसमें लाल व हरे रंग की पट्टियों पर "चरखा" लगाया। परन्तु महात्मा गाँधी का मानना था कि लाल व हरा रंग तो हिन्दू और मुस्लिम समुदायों को प्रतिनिधित्व करते हैं इसलिये अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के लिये सबसे ऊपर सफ़ेद रंग भी जोड़ा जाये। उस झंडे को १९२१ में लाया गया जिसे सबसे पहले कांग्रेस के अहमदाबाद सम्मेलन में फ़हराया गया किन्तु ये झंडा कभी भी कांग्रेस का आधिकारिक झंडा न बन सका क्योंकि ये काफ़ी हद तक आयरलैंड के झंडे से भी मेल खाता था।
1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद सम्मेलन में फ़हराया गया झंडा कभी
1931 में कांग्रेस की कार्यकरिणी द्वारा गठित सात सदस्यीय कमेटी द्वारा पारित झंडा

देश में बहुत से लोग थे जो झंडे के साम्प्रदायिक व्याख्या से नाखुश थे। १९२४ के कलकत्ता के अपने अधिवेशन में अखिल भारतीय संस्कृत काँग्रेस ने झंडे में केसरिया रंग लाने की इच्छा जताई। उसी साल कहा गया कि गेहुँआ रंग हिन्दू संन्यासी व मुस्लिम फ़कीर दोनों का प्रतिनिधित्व करता है। सिख भी झंडे में पीले रंग को अपनाने की जिद करने लगे। इन सबके बीच १९३१ में कांग्रेस की कार्यकरिणी ने सात सदस्यीय कमेटी का गठन करने का निर्णय किया। जिसमें सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, मास्टर तारासिंह, काका कालेकर, डा. हर्दिकार व पट्टभी सीतारमैवा जैसे दिग्गज शामिल थे। इस कमेटी ने केसरिया रंग के झंडे का निर्माण किया जिसमें ऊपर चरखा बना हुआ था। ये विडम्बना है कि जिस दल के पटेल, नेहरू व आज़ाद सरीखे नेताओं ने केसरिया रंग की वकालत की उस भगवा रंग से कांग्रेस तब भी खौफ़ खाती थी और आज भी। संघ उस समय महज छह वर्ष पुराना ही था तो यह कहना कि उसके भगवा रंग से कमेटी प्रभावित हो गई होगी, बेमानी होगा। खैर कांग्रेस के लिये वो रंग साम्प्रदायिक हो गया और उस ने पटेल, नेहरू और मौलाना आज़ाद द्वारा पारित झंडे को भी मानने से इंकार कर दिया। ।

१९३१ में ही कराची में फिर कमेटी बैठी और पिंगली वैंकैया को फिर कमान सौंपी गई और केसरिया, सफ़ेद व हरे रंग का एक झंडा सामने आया जिसके बीच में चरखा बना हुआ था। इस झंडे से हम सब परिचित हैं।
1931 में झंडे में कराची में हुई बैठक के बाद किये गये परिवर्तन


दूसरी ओर सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की स्थापना उस झंडे के तले की जिसमें बाघ का चित्र बना हुआ था।
आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का तिरंगा
स्वतंत्रता दिवस के महज २४ दिन पहले आनन फ़ानन में एक कमेटी गठित की गई जिसकी अध्यक्षता डा. राजेंद्र प्रसाद को दी गई। इसमें सी. राजगोपालाचारी, सरोजिनी नायडू, अबुल कलाम आज़ाद, के.एम.मुंशी व बी.आर अम्बेडकर शामिल थे। तब चरखे का स्थान लिया सारनाथ के "चक्र" ने। इस चक्र का डायामीटर सफ़ेद पट्टी की ऊँचाई का तीन चौथाई था। इस झंडे को स्वीकृति मिली व यही झंडा आज का तिरंगा बना।
आज का तिरंगा
काश इस झंडे पर वंदेमातरम भी लिखा होता!!!
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Sunday, January 23, 2011

जीवन बुलबुला Life is the bubble Hindi poem

जीवन दरिया, बहता पानी,

जीवन आकाश, अनन्त अनादि,




जीवन प्राण, जीवन वायु,
जीवन रेत, जीवन खेत,
जीवन आशा, जीवन निराशा,
जीवन धूप, जीवन छाँव


जीवन रंग, जीवन संगीत,
जीवन गीत,जीवन मीत,
जीवन हार, जीवन जीत

जीवन डगर, जीवन मंज़िल
जीवन समंदर, जीवन साहिल

जीवन पंछी, जीवन उड़ान,
जीवन आस्था, जीवन विश्वास
जीवन वृक्ष, जीवन समर्पण

जीवन बुलबुला...
क्षणभंगुर!!
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Saturday, January 15, 2011

प्या़ज़ के बढ़ते दामों के बीच मजबूर मनमोहन को मिला अटल का सहारा और प्याज के जमाखोरों के खिलाफ़ एक छोटी सी अपील Manmohan Met Atal Onion Issue | An Appeal to All Against Onion Traders and Hubs

आज से करीबन बारह वर्ष पूर्व दिल्ली में भाजपा की सरकार को प्याज़ ने ऐसा रुलाया कि आजतक भाजपा ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा नहीं पाया है। इसलिये जब भी प्याज के दाम बढ़ते हैं तब राजनैतिक गलियारे में हलचल शुरु हो जाती है।

ऐसा नहीं है कि केवल प्याज़ की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। इजाफ़ा हर चीज़ के दामों में हुआ है। सभी सब्ज़ियाँ महँगी हुईं हैं। जो सब्जी पच्चीस रूपये में एक किलो होती थी वो अब 250 ग्राम रह गई है। लेकिन प्याज़ की बात ही कुछ और है। हमारे प्रणव मुखर्जी और मनमोहन जी को इसकी चिंता सता रही है।

पिछले बीस बरसों में जब से गठबँधन सरकारें शुरू हुई हैं तब से "मजबूर" होना एक रिवाज़ बन गया है। स्व नरसिंह राव जी। उन से "मजबूर" तमगा प्रधानमंत्री को मिलना प्रारम्भ हुआ। जो फिर श्री गुजराल और देवेगौड़ा जी को भी मिला। नरसिंहराव की सरकार में वित्त मंत्री की जिम्मेदारी सम्भालने वाले मनमोहन आज प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं। चाहें गुजराल हों या देवेगौड़ा या फिर मनमोहन सभी को काँग्रेस पार्टी ने मजबूरी में कुर्सी पर बैठाया। पार्टी भी मजबूर और पीएम साहब भी मजबूर।

देवेगौड़ा और मनमोहन के बीच देश की जनता ने अटल जी की भी सरकार देखी। जब अटल ने कुर्सी सम्भाली तब न तो पार्टी मजबूर थी और न ही प्रधानमंत्री। पर गठबँधन का नियम है-मजबूर प्रधानमँत्री मजबूत गठबँधन। बस यही उसूल तब भी चल निकला। ममता दीदी उस जमाने में भी सरकार में थीं, अब भी हैं। तब जयललिता ने अटल को गिराया अब करूणानिधि ने रुला रहे हैं।
तो आप लोग समझ ही गये होंगे कि हमारे प्रधानमंत्री कितने और क्यों मजबूर हैं? ये अब जगजाहिर है।

2004 में अटल और मनमोहन में कुछ इस तरह गीत-संवाद हुआ था-
अटल: तेरी दुनिया से दूर, चले होके "मजबूर" हमें याद रखना....
मनमोहन सिंह: जाओ कहीं भी सनम, तुम्हें इतनी कसम हमें याद रखना....


पवार की पावर, राजा की मनमानी से दो-चार होते दिखते "मनु" भाई उन्हीं बातों को याद करते जब राजनीति के बूढ़े शेर अटल बिहारी वाजपेयी के पास पहुँचे-

मनमोहन: अटल जी, ये आप ने कहाँ फ़ँसा दिया। मैं तो कहीं का नहीं रहा।
अटल: क्या हुआ मनमोहन जी? खैरियत?
मनमोहन: कहाँ की खैरियत??आप को तो सब पता है गठबँधन की सरकार क्या बला होती है!!
अटल जी: पर मनमोहन जी, मैंने तो कभी गठबँधन (शादी) किया नहीं था इसलिये फ़ँसा। आप तो अनुभवी व्यक्ति हैं।
मनमोहन: ज़िन्दगी की गाड़ी और राजनीति में फ़र्क होता है। राजनीति में आते ही मैं भी काला हो गया हूँ। कुछ उपाय सुझायें।
अटल: मैं तो ये सोच ही रहा था कि आप यदि वित्त विभाग में ही रहते तो अच्छा था कहाँ राजनीति के अखाड़े में टूट पड़े। देखिये मैं तो अब बीमार रहता हूँ तो राजनीति से भी दूर ही हो गया हूँ। एक सुझाव देता हूँ। बीमारी का नाटक कीजिये और संन्यास ले लीजिये।
मनमोहन: ये बात तो आपने दुरुस्त कही। पर...पर...पर....
अटल: आपकी गाड़ी "पर" पर क्यों अटक गई? आपको मेरी बीमारी तो नहीं लग गई? अगला शब्द कब बोलेंगे?
मनमोहन: अरे नहीं नहीं, मैं तो ये सोच रहा था कि मैडम बुरा तो नहीं मान जायेंगी?

प्रधानमंत्री मजबूर, सरकार मजबूर..पर क्या आप और हम मजबूर हैं? बात कर रहे थे प्याज़ की। मेरे एक मित्र ने मुझसे पूछा कि क्या प्याज़ इतना जरूरी है कि हम उसके बिना नहीं  रह सकते? क्या नवरात्रि में साल के अठारह दिन हम बिना प्याज़ का खाना नहीं खाते? क्या सावन के महीने में हम प्याज़ बंद नहीं करते? इन सभी सवालों का जवाब यदि "हाँ" है तो- यदि हम प्याज़ की खपत कम कर दें तो क्या इसकी कीमत कम नहीं होगी? जमाखोर कब तक गोदामों में प्याज़ रखेंगे? याद रखिये ये नेता ही जमाखोर हैं। यहीं आग लगाते और बुझाते हैं। प्याज़ नेताओं को रुला सकता है पर यदि "हम" एक हो जायें तो कुछ भी कर सकते हैं। आप सभी पाठकों से अपील है-प्याज़ के आगे, जमखोरों के आगे मजबूर न हों। मजबूत बनें।
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Tuesday, January 11, 2011

आईपीएल की अजब कहानी, क्रिकेटरों पर बरसा सोने का पानी- दादा के नाम छोटी सी पोस्ट Dada cricketing career over after IPL auction? A Micro-post

भारतीय हॉकी के महान खिलाड़ी धनराज पिल्ले ने एक बार कहा था कि उन्हें हॉकी ने इज्जत, मान दिया पर पैसा नहीं दिया। ये कहते हुए उनकी आँखें छलक आईं थीं लेकिन हॉकी के लिये उनका समर्पण व प्यार बरकरार रहा। आज आईपीएल में जब युवा क्रिकेटरों के ऊपर पैसे की बरसात होते देखा तो सोच रहा हूँ कि कहीं हमारे युवाओं में "लालच" न बढ़ जाये और हॉकी को जो थोड़े बहुत सितारे मिल रहे हैं वे खत्म न हो जायें। लेकिन एशियन गेम्स और कॉमेनवेल्थ की कामयाबी मुझे झुठला भी सकती है।

नीलामी में उगते सूरज को सलाम किया और जम कर धन वर्षा की गई। ब्लैक मनी को व्हाईट किये जाने की इस प्रथा को शुरु किये जाने वाले "जनक" के ऊपर केस चल रहा है और उसकी टीमें राजस्थान और पंजाब अब आईपीएल में दोबारा अपनी किस्मत आजमाने के लिये जम कर मैदान में कूद चुकी हैं। कमोबेश यही हाल भारतीय टीम को टीम इंडिया बनाने वाले "दादा" का रहा। गौरतलब है कि सौरव गांगुली एक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक हैं और उनकी गिनती कोलकाता के सबसे अमीर खानदानों में होती है। जिस खेल को उन्होंने अपनाया और पैसे के लिये नहीं बल्कि "पैशन" के लिये खेला उसी खेल में बाज़ार के "खिलाड़ियों" ने उन पर बोली भी नहीं लगाई। भारत को विश्वकप के फ़ाइनल तक पहुँचाने वाले कप्तान की किस्मत शायद उनके लिये ग़मों और मुश्किलों का "कप" भर रही है। एक भी खरीददार न मिलने का ग़म ज्यादा है या फिर चैपल प्रकरण के बाद टीम से दुखदाई विदाई का ये उनसे बेहतर कोई नहीं जानता।

लोग कहते हैं कि गाँगुली  में अहंकार है और उनमें "एटीट्यूड प्रॉब्लम" है। जानकारी के लिये बता दें कि इसी आईपीएल में सौरव गाँगुली की टीम में जगह बनाने वाला विश्व के दस सबसे अहंकारी खिलाडियों में जिसका नाम शामिल है वो युवा युवराज भी खेल रहा है। पिछले सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले खिलाड़ियों में से एक सौरव गाँगुली के साथ किस्मत ने कितना ही बड़ा खिलवाड़ क्यों न किया हो लेकिन उनके चेहरे पर निराशा के बादल नहीं आते। कहते हैं इज़्ज़त और मान खरीदा नहीं जा सकता। भारत की "दीवार" जिसे ऑफ़साईड का भगवान कहती थी और भारतीय क्रिकेट को ऊँचाइयों और बुलंदियों तक पहुँचाने वाले इस महान खिलाड़ी को पैसे से नहीं अपने खेल से इज़्ज़त मिलती है।

चलते चलते गीतों भरी गुस्ताखियाँ

सौरव गाँगुली: हम से क्या भूल हुई, जो ये सजा हमको मिली....
शाहरूख खान: अब तेरे बिन जी लेंगे हम...
जवान खून(आईपीएल के लिये): दिल चीज़ क्या है..आप मेरी जान लीजिये....
टीमों के मालिक: आईपीएल है एक जुआ, कभी जीत भी कभी हार भी....
बीसीसीआई: पैसा, ये पैसा.... न बाप बड़ा न मैया... सबसे बड़ा रुपैया...


धूप-छाँव के नियमित स्तम्भ


गुस्ताखियाँ हाजिर हैं




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Tuesday, January 4, 2011

एक चवन्नी की भूली-बिसरी दास्तान 25 paisa coins no more Refresh Your memory with some old photos

जैसा कि आप सभी जानते हैं कि जल्द ही चवन्नी हमारे बीच से चली जाने वाली है। इसलिये आज का यह लेख समर्पित है उन छोटे सिक्कों के नाम जिनके सहारे कभी हम अपनी ज़िन्दगी गुजारा करते थे।

किसी भी वस्तु के मोल-भाव के लिये सिक्कों का चलन राजा महाराजाओं के समय से रहा है। शुरू में एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु लेने का चलन था जो बाद में मुद्रा में बदल गया। हर राजा ने अपने राज्य में अलग किस्म के सिक्के चलाये। सोने की अशरफ़ी से लेकर चाँदी की मोहरें तो हमने नहीं देखीं पर एक-दो के पैसे जरूर देखें हैं।

अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल, बम्बई और मद्रास से सोने की मोहरें व चाँदी के सिक्के चालू किये जो रूपये के आठवें व सोलहवें हिस्से तक के थे। मद्रास से उन्होंने २ रूपये का सिक्का भी निकाला। 1 पाई, १/२, १/४, १.५, १, २ पैसे के सिक्के आम थे।

जब भी कोई व्यक्ति अपनी बात की सच्चाई बताना चाहता है तो वो एक ही बात कहता है : "मेरी बात सोलह आने सही है"। अंग्रेज़ी में : I am cent percent correct. सोलह आना मिलकर एक रूपया बनाते हैं, इसीलिये, चार आना से बिगड़कर चौ आना और फिर चवन्नी बनी। इसी तरह अठन्नी भी। पर एक समय ऐसा था जब इस एक आने के भी कईं हिस्से होते थे। 1/16, 1/8,1 /4 आना।

बाद में तांबे, एल्युमीनियम आदि दूसरे पदार्थों से भी सिक्के बनने शुरु हो गये। महँगाई बढ़ती चली गई और सिक्कों की कीमत घटती चली गई। लोगों ने सिक्के जमा करने की अपनी आदत बना ली। आज आलम यह है कि एक, दो, पाँच, दस, बीस पैसे के सिक्के गुजरे जमाने की बातें हैं। आज ये अंक तो वहीं हैं पर इनके पीछे की इकाई (Unit)  बदल गई है। पैसे रूपये में बदल चुके हैं। धीरे धीरे जब भिखारियों ने भी ये पैसे लेने बंद कर दिये तब सरकार की नींद टूटी । सरकार महँगाई पर काबू नहीं पा सकती इसलिये इन सिक्कों को ही बंद करने का फ़ैसला कर लिया। 30 जून को चवन्नी का आखिरी दिन होगा। जल्द ही अठन्नी को भी बंद करने का निर्णय लिया जा सकता है। आज़ादी के बाद जब इन सिक्कों को शुरु किया गया तब इन्हें "नये पैसे" कहा जाता था। अब ये "नये पैसे" पुराने हो गये हैं।

चवन्नी भी सरकार से यही कह रही है: सखी सैयां तो खूब ही कमात है.. महँगाई डायन खाये जात है....
आईये चवन्नी को अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि दें। आपको छोड़ जाते हैं चवन्नी और उसके साथियों की चंद तस्वीरों के साथ...

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Thursday, December 30, 2010

तस्वीरों में देखिये: पैरों में चप्पल पहन कर दिल्ली पुलिस कैसे करती है वी.आई.पी लोगों की सिक्युरिटी और दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर राजनैतिक दलों के बैनरों का मेला Delhi Police in Chappals For VVIP Security and Hoarding Mess At Delhi-UP Border

हाल ही में बुराड़ी, दिल्ली में कांग्रेस पार्टी का महाधिवेशन हुआ। पूरी दिल्ली और खासतौर पर रोहिणी से बस-अड्डे के रास्ते पर ढेरों बैनर व हॉडिंग लगे हुए नजर आये। तीन दिन तक चले इस महा-चिंतन में 10,000 से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किये गये। बुराड़ी शिविर व उसके आस-पास चप्पे-चप्पे पर इतने पुलिस वाले दिख रहे थे जितने खेल-गाँव की सुरक्षा में भी नहीं दिखे। करीबन दस किलोमीटर तक हर पचास मीटर पर एक या दो पुलिसकर्मी दिखाई दे जाते।
जेब में हाथ डाले खड़ा एक पुलिस-कर्मी


इन्हीं पुलिस वालों में से एक पर हमारी नज़र पड़ गई। वज़ीराबाद चौराहे पर पुल-निर्माण के नज़दीक ही ये महाशय हाथों को जेब में डाले खड़े हुए थे।

जुराब के ऊपर चप्पल
हालाँकि इनकी बीड़ी पीते हुए की फ़ोटो तो नहीं ले पाये पर इनके पैरों की तरफ़ नजर गई तो पता चला कि जूतों की जगह जुराब के ऊपर चप्पल पहने हुए थे। ये आलम है आला नेताओं की सुरक्षा में "तैनात" पुलिस वालों का।

दूसरी तस्वीर है दिल्ली-यूपी बॉर्डर की जिसे यूपी गेट भी कहा जाता है। दिल्ली में जो बैनर अथवा हॉर्डिंग लगाये जाते हैं वे अधिकतर फ़्लाई-ऑवरों पर या मेट्रो के साथ-साथ लगे हुए दिखाई देंगे। पर जैसे ही आप यूपी गेट से गाज़ियाबाद-इंदिरापुरम में दाखिल होंगे आपको ढेर सारे हॉर्डिंग नजर आयेंगे।

राजनैतिक पार्टियों के हॉर्डिंग के पीछे छिपे दिशा निर्देश
और ये सब लगे होंगे दिशा बताने वाले बोर्ड पर। ये सिलसिला आज का नहीं है। मैं कम से कम पाँच साल से देख रहा हूँ। लेकिन तस्वीर पाँच दिन पुरानी है। काँग्रेस पार्टी की जनसभा 10 दिसम्बर को थी (बैनर के मुताबिक) पर ये आज भी आपको टँगा हुआ दिख जायेगा। यही रस्ता आगे चल कर लखनऊ भी जाता है। बोर्ड पर Lucknow का "W" दिखाई दे जायेगा।


कोशिश रहेगी कि तस्वीरों के माध्यम से आप तक कोई खबर पहुँचाई जा सके। इसी कोशिश में शुरू हुई है ये श्रॄंख्ला।

"तस्वीरों में देखिये" के पिछले अंक:

वैष्णौं देवी श्राइन बोर्ड कैसे फ़ैला रहा है प्रदूषण 


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Friday, December 24, 2010

ये चिंगु-चिंगु क्या है? हिमालय की गोद में "चिंगु" का धँधा या फिर गोरखधँधा? Chingu Business in Himalayas

हाल ही में पटनीटॉप जाना हुआ। वहाँ प्राकृतिक व मनमोहक पहाड़ियों के अलावा आपको कुछ नहीं मिलेगा। कोई खास बाज़ार या मालरोड भी नहीं है जो हर हिलस्टेशन पर आपको आमतौर पर मिल जाते हैं। पर हम बात करेंगे चिंगु की।

पटनीटॉप में दो-तीन पार्क हैं और एक मंदिर है। बाबा नाग मंदिर। हजारों साल पहले कोई ब्रह्मचारी बाबा हुए हैं। उन्हीं का यह मंदिर है। टैक्सी वाले यहाँ जरूर आपको ले कर आते हैं। मंदिर के लिये 20-25 सीढ़ियाँ उतरनी थीं। और वहाँ पर थीं करीबन आठ से दस दुकानें। हमें देखते ही सबने चिल्लाना और आवाज़ लगाना शुरु कर दिया। "सर, हमारे यहाँ आइये, चिंगु देखिये".... "चिंगु  देखने के लिये यहाँ आयें.."। एक ने तो हमसे वादा ले लिया कि हम मंदिर दर्शन के बाद उसके यहाँ आयें। तब तक हमारे मन में चिंगु को देखने और उससे मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न हो चुकी  थी। हमने सोच लिया था कि चाहें दुकान से कुछ खरीदें या नहीं खरीदें, चिंगु से जरूर मिलेंगे।

दर्शन के पश्चात उसी दुकान पर हम पहुँच गये। हम अंदर घुसे उसके कुछ सेकेंड बाद उस दुकानदार ने दुकान पर पर्दा डाल दिया। तब तक भी चिंगु  से हम अनभिज्ञ थे। अब शुरु होती है चिंगु की कहानी। उसने कुछ इस तरह से बताना शुरू किया कि हम बस सुनते चले गये। उसने एक शॉल दिखाया। उसी को उसने चिंगु का नाम दिया। चिंगु एकतरह का शॉल होता है जो बहुत ही गर्म होता है और विशेष प्रकार की भेड़ से बनता है। उसने बताया कि पहले उस भेड़ को मारा जाता था पर अब उसको मारते नहीं हैं। उसके बच्चे के बाल उतार कर इस शॉल को बनाया जाता है। ये एक स्पेशल शॉल है जो सर्दियों में गर्म करता है और गर्मियों में बिस्तर पर चादर का काम कर सकता है। उसके ऊपर कुछ पानी के  छीँटे मारो और पंखा खोल दो। बस। कहानी मजेदार रूप ले चुकी थी और हम वहीं बैठे थे।

दुकानदारी एक कला है। आपको बेकार से बेकार चीज़ भी ऐसे बतानी है कि ग्राहक को लगे कि बस उसी के लिये ही यह चीज़ बनी है और उसके बिना ग्राहक का जीवन अधूरा है। अब आगे की कहानी सुनें- चिंगु हमें छह हजार में मिलने वाला  था। पर उसके साथ मिलने वाले थे चादर-तकिये के दो सेट। उसके साथ मिल रहा था एक मखमली कम्बल। उसके साथ थी एक लोई (एक तरह की शॉल)। ये चार-पाँच चीज़े एक "फ़ैमिली-पैक" बनाती है। छह हजार में इतना कुछ। और उसने एक सेमी-पश्मीना शॉल भी देने का वादा किया जो अंगूठी में से भी निकल जाती है। ये उसने हमें करके दिखाया। आँखें फ़टी की फ़टी रह गईं।

छह हजार में छह तरह के कपड़े इस महँगाई में सही सौदा है। पर कहानी अभी बाकी थी। इसका आभास हमें नहीं लग पाया। उसने और आगे बताना शुरू किया। उसने एक रजिस्टर निकाला जिस पर जम्मू-कश्मीर सरकार का कोई डिपार्टमेंट का नाम था। शायद जम्मू-कश्मीर का केवल नाम था, मैं पूरा पढ़ नहीं पाया। उस रजिस्टर में सैकड़ों लोगों की लिस्ट थी और उनके नाम-पते व फ़ोन नम्बर दर्ज थे। दरअसल असली बात तो आगे आनी थी। चिंगु को हमने 21 महीनें से लेकर पाँच साल तक के बीच में इस्तेमाल करना था जिसके बाद उस डिपार्टमेंट का ही एक आदमी हमारे घर आयेगा और हमसे यह शॉल ले जायेगा। वो ये देखने भी घर आयेगा कि हम इस शॉल का सही इस्तेमाल कर भी रहें हैं या नहीं। हम हैरान थे... शॉल वापस ले जायेगा!!! उसके साथ वापस होंगे 75% रूपये जो हमने शॉल को खरीदने में लगाये। यानि कुल 1500 रूपये में हमें पाँच आईटम मिलने वाले थे। और 21 महीने बाद हमें मिलेगा एक और कम्बल!!

कुछ समझ नहीं आ रहा था..बार बार उस रजिस्टर में नाम और जगह पढ़ीं। गुजरात, दिल्ली, चेन्नई, राजस्थान, यूके कोई ऐसी जगह नहीं जो नहीं लिखी हुई। हमने पूछा कि हम दिल्ली कैसे लेकर जायेंगे। जवाब मिला पार्सल हो जाता है। उसके 300 रूपये अलग से लगेंगे। और 600 रू उनके विभाग का रजिस्ट्रेशन चार्ज। उसने हमें बताया कि उनके ऑफ़िस सभी जगह पर हैं, उसने हमें लिस्ट दिखाई। हमें उस लिस्ट में कनॉट प्लेस दिखाई दिया पर उसमें पूरा पता नदारद था!!

इतनी आकर्षक स्कीम। कभी नहीं सुनी। लेकिन चिंगु वापस लेकर इन्हें क्या फ़ायदा होगा? यहीं हमने उससे पूछा। जवाब मिला कि चिंगु शॉल का कपड़ा 21 महीने के इस्तेमाल के बाद और निखर जाता है। उस शॉल से फिर एक कपड़ा बनेगा जिससे तीन शॉलें और बनेंगी और हर शॉल की कीमत होगी एक लाख रू से भी ज्यादा। कहानी ने चकरा दिया था। हमने यहाँ तक कहा कि हम घर में पूछ कर ही इतना बड़ा फ़ैसला करेंगे। तब वो दुकानदार हमें अपने फ़ोन से बात कराने को राजी हो गया, पर हमें दुकान से वापस नहीं जाने दे रहा था। कोई हमें अपना फ़ोन देने और एस.टी.डी कराने तक को राजी कैसे हो सकता है?

हम जैसे-तैसे वापस हॉटल आ गये। समझ नहीं पा रहे थे कि ये कैसा धँधा है? या फिर एक बहुत बड़ा गोरख धँधा। मैंने अपने फ़ोन पर ही इंटेरनेट पर चिंगु के बारे में जानना चाहा तो मुझे दो-तीन साईट और मिली जिन पर इस "खेल" का जिक्र था। वहाँ से पता चला कि यह "खेल" मनाली, शिमला में भी फ़ैला हुआ है। कुछ शिकायतें मिलीं जिन्हें चिंगु का फ़ैमिली-पैक पार्सल नहीं हो पाया। यही चिंगु हमें कटरा शहर में भी एक दुकान पर देखने को मिला। दुकानदार की रेट लिस्ट के मुताबिक चिंगु आपको छह हजार से साठ हजार या लाखों तक में भी मिल जायेगा। मुझे नहीं लगता कि ये क्वालिटी पर निर्भर करता है बल्कि इस पर कि ग्राहक कितना मालदार है।

हमने चिंगु नहीं खरीदा। हो सकता है कि आप भी कभी न कभी इस तरह की स्कीम से रू-ब-रू हुए हों। नहीं हुए तो हिमालय की इन हसीन वादियों का एक चक्कर काट आईये। कहीं न कहीं ये "चिंगु" आपको मिल ही जायेगा। क्या आप ये "चिंगु" अपने घर ले जाना चाहेंगे? यदि हाँ तो इसके बारे में अन्य लोगों को बतायें क्योंकि तीन ग्राहक बनाने पर आपको और भी बहुत कुछ मिलने की "गारंटी" मिलेगी। और यदि नहीं खरीदें तो मेरी तरह लोगों तक इस "आकर्षक" व सम्मोहित कर देने वाली स्कीम के बारे में जरूर बतायें। वैसे चिंगु खरीदना हो या नहीं, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर आप एक बार जरूर होकर आयें।


"धरती पर यदि स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है"

॥जय हिन्द॥




धूप-छाँव में पढ़िये दो नियमित स्तम्भ:
गुस्ताखियाँ हाजिर हैं
क्या आप जानते हैं?
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Tuesday, December 21, 2010

क्या आप जानते हैं? क्या है सीमा सड़क संगठन और ड्राईवरों को कैसे बना रहा है अपने शब्दों से जागरूक Border Roads Organization Slogans

संविधान के अनुसार सड़क निर्माण की जिम्मेदारी किसी भी राज्य की सरकार की होती है। हम सभी जानते हैं कि सीमा की सुरक्षा सर्वोपरि है और हमारी सेना इस कार्य में दिन-रात लगी रहती है। सीमा की सड़कों को देश की अन्य सड़कों से जल्दी से जल्दी जोड़ा जाये जिससे यातायात में सुविधायें बढ़ सकें एवं सीमावर्ती क्षेत्रों के मार्गों को सुगम बनाया जाये इसी के मद्देनजर सीमा सड़क संगठन या Border Roads Organization की स्थापना की गई।
सीमा सड़क संगठन (BRO) का लोगो

7 मई 1960 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसकी स्थापना की व इसके प्रथम चेयरमैन बने। आज इसके निदेशक, लेफ़्टिनेंट जनरल एम.सी बधानी हैं। यह संगठन उत्तर व उत्तर-पूर्वी राज्यों में तत्पर्ता से कार्य कर रहा है। इसे हिमालय की ठंड व राजस्थान की रेत और तपतपाती गर्मी से जूझना पड़ता है और पहाड़ी राज्यों के कठिन रास्तों से भी गुजरना होता है।

सीमा सड़क संगठन की वेबसाईट पर जारी ये संदेश पढ़िये:


"हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विषम क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण केवल कंक्रीट और सीमेन्ट से नहीं हुआ है बल्कि इसमे भारत के सीमा सड़क संगठन के वीर जवानों का खून भी शामिल है । कई वीरों ने कार्य करते हुए ड्यूटी के दौरान अपनी जान गवांई है । इन वीरो के लिए , जो सदा खतरों से खेलते हैं और मौत पर हंसते हैं, उनके  लिए ड्यूटी हमेशा पहले रही है । ये सभी वीर भारत के विभिन्न भागों से आते हैं और अपने देश की सुरक्षा के लिए न केवल हमेशा तत्पर रहते हैं बल्कि पड़ोसियों को खुशहाल बनाने में भी भरपूर योगदान दिया है ।"

हम सभी जानते हैं कि दिल्ली व अन्य किसी भी बड़े शहर में हर व्यक्ति अपनी जान हथेली पर लेकर सुबह घर से बाहर कदम रखता है। अपने आप को पायलट समझते कुछ ड्राईवर सड़कों पर घूम रहे होते हैं जिनसे बच पाना एक वीरता पुरस्कार से कम नहीं होता। सड़क किनारे आपको इस तरह के वाक्य अमूमन मिल जायेंगे जो आपको आगाह करते रहेंगे कि आप गाड़ी धीमे चलायें।

अभी अपनी जम्मू यात्रा के दौरान कुछ ऐसे ही वाक्य BRO की तरफ़ से लिखे हुए देखे। कुछ अलग लगे इसलिये आप के साथ साझा करने चाहे:

  • Keep Your Nerves On The Sharp Curves
  • This is the Highway, Don't Think it a Runway
  • Licence to Drive not to Fly
  • इतनी जल्दी क्या है प्यारे, रुक कर देख प्रकृति के नजारे
  • If Married, Divorce Speed
और ये सबसे अच्छा लगा:
  • रफ़्तार का शौक है तो पी.टी.ऊषा बनो!!!

॥जय जवान, जय हिन्द॥

"क्या आप जानते हैं"  के छोटे से स्तम्भ में लम्बा-चौड़ा लेख नहीं अपितु आप के लिये होगी रोचक एवं ज्ञानवर्धक जानकारी। चाहें इतिहास हो, विज्ञान, भूगोल, घर्म या अन्य कोई भी और विषय हो। यदि आप भी इन विषयों के बारे में कोई जानकारी बाँटना चाहें तो कमेंट अथवा ईमेल के जरिये जरूर सम्पर्क करें।
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Saturday, December 18, 2010

तस्वीरों में देखिये: वैष्णौं देवी श्राइन बोर्ड कैसे फ़ैला रहा है प्रदूषण और रात में साँझी छत से कैसा दिखता है कटरा का शहर Shrine Board Carelessness Causing Pollution?

हाल ही में वैष्णौं देवी जी के दर्शन करने का सौभाग्य मिला। भीड़ कम होने के कारण तसल्ली से दर्शन कर सके वरना आप जानते ही हैं कि पाँच घंटे की चढ़ाई और पाँच सेकंड के लिये भी दर्शन दुर्लभ होते हैं।

केवल दिल्ली में ही नहीं हर जगह ही विकास का चेहरा दिख रहा है। बाणगंगा से भवन की तरफ़ जाते हुए आप पुरानी बल्ब की लाइटों की जगह ट्यूब लाईट की नई दूधिया से नहाये हुए रास्तों से गुजरेंगे। हमारा ध्यान इस ’विकास’ की ओर नहीं जाता यदि हमें पहाड़ी पर पड़े हुए ये बल्ब दिखाई नहीं दिखते। उन्हीं पुराने बल्बों में से एक की यह झलक:

ऐसे एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों बल्ब यात्रा के दौरान आपको मिल जायेंगे। क्या इन बल्बों को उठाने के बारे में कुछ सोच रहा है श्राईन बोर्ड या फिर वैष्णौं देवी की यह पहाड़ी जो लोगों द्वारा फ़ेंकी गई प्लास्टिक की बोतलों व चिप्स के रैपरों से "शोभायमान" हो रही है अब बिजली के इन बल्ब से होने वाले रासायनिक प्रदूषण का भी स्वाद चखती रहेगी?

चलते चलते देखते चलिये दूसरी तस्वीर: कटरा का पवित्र शहर कुछ ऐसा दिखता है यह साँझी छत से।



अगले अंक में जानिये "सीमा सड़क संगठन" अपने शब्दों से कैसे कर रहा है लोगों को जागरुक
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Friday, December 10, 2010

तुम्हीं हो कल, आज हो तुम...

कोयल की कूक तुम्हीं से,
हर शे’र की बहर हो तुम।
खेतों का लहलहाना तुम से

सागर की लहर हो तुम॥

चाँद की चाँदनी तुम से,
कली का मुस्कुराना तुम
मिट्टी की सुगँध तुम्हीं से,
बहारों का हो आना तुम॥
 

हीरे की चमक तुम्हीं से
घटाओं का छा जाना तुम।
प्रेम का है स्पर्श तुम्हीं से
शाम का ढल जाना तुम॥

कविता का आगाज़ तुम्हीं से,
मधुर संगीत का साज़ हो तुम।
कविता पूरी होती तुम्हीं से,
तुम्हीं हो कल, आज हो तुम।
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Sunday, December 5, 2010

क्या आप जानते हैं? कनॉट प्लेस का इतिहास और सहारा के रेगिस्तान में कितने भारत समा सकते हैं? Connaught Place and Sahara Desert

आज बात करते हैं सहारा के रेगिस्तान की। अफ़्रीका के महाद्वीप में कईं देशों में फ़ैला यहा रेगिस्तान विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान है। ये इतना बड़ा है कि उत्तर अफ़्रीका के सभी देशों में यह फ़ैला हुआ है और एक तरह से यह पूरे यूरोप जितना बड़ा है|

अफ़्रीका के जिन 12 देशों में यह फ़ैला हुआ है वे हैं: अल्जीरिया, चाड, मिस्र, एरीत्रिया, लीबिया, माली, मौरिशियाना, मॉरोक्को, नाइजर, सूदान, ट्यूनिशिया व पश्चिमी सहारा। इसकी लम्बाई 4800 किमी है व यह 1800 किमी चौड़ा है। इसका अनुमानित क्षेत्रफल 94 लाख sq.km है जो कि भारत से करीबन तीन गुना अधिक है। यानि हमारे जैसे तीन देश सहारा में समा सकते हैं। अरब के रेगिस्तान से यह चार गुना बड़ा है। चीन का गोबी इसका सातवाँ हिस्सा है व दक्षिणी अफ़्रीका का कालाहारी रेगिस्तान भी इसका दसवाँ हिस्सा ही है।
नासा द्वारा अंतरिक्ष से लिया गया एक चित्र

लीबिया का रेगिस्तान
कैसे आता है भँवर?

जब भी कभी पानी का तेज बहाव किसी भी तरह की रुकावट से टकराता है, उसी समय उसमें कईं तरह के चक्कर बन जाते हैं और पहले से भी अधिक तीव्रता से घूमने लगता है। यही टकराव भँवर पैदा करता है। नदी में ये चट्टान के टकराने मात्र से उत्पन्न हो जाता है जबकि बड़े समुद्र में दो विपरीत दिशा से आने वाली विशाल लहरें इसकी उत्पत्ति का कारण बनती हैं।
यह एक पूर्णत: प्राकृतिक क्रिया है। नार्वे में विश्व के दो सबसे ताकतवर भँवर 37 किमी प्रति घंटा और 28 किमी प्रति घंटा के रफ़्तार से आते हैं।

चलते चलते:
आपने दिल्ली के कनॉट प्लेस के बारे में तो सुना ही होगा। ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया के तीसरे बेटे प्रिंस आर्थर को "ड्यूक औफ़ कनॉट" की उपाधि दी गई थी। कनॉट आयरलैंड में एक जगह का नाम हुआ करता था। उन्हीं के नाम पर आज के सी.पी का नाम रखा गया। इसके आर्किटेक्ट थे रॉबर्ट रसैल और इसका निर्माण 1929 से 1933 के बीच किया गया।
क्या आप जानते हैं कि इस नाम से देहरादून में ही नहीं बल्कि हांगकांग और लंदन में भी जगह हैं। राजनेताओं ने इसका नाम बदल कर राजीव चौक रख दिया। सरकारी कागज़ों में बेशक इसका नाम बदल दिया हो पर दिल्ली के दिल में बना यह लोगों के लिये अभी भी सी.पी ही है।

"क्या आप जानते हैं"  के छोटे से स्तम्भ में लम्बा-चौड़ा लेख नहीं अपितु आप के लिये होगी रोचक एवं ज्ञानवर्धक जानकारी। चाहें इतिहास हो, विज्ञान, भूगोल, घर्म या अन्य कोई भी और विषय हो। यदि आप भी इन विषयों के बारे में कोई जानकारी बाँटना चाहें तो कमेंट अथवा ईमेल के जरिये जरूर सम्पर्क करें। 
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