Wednesday, February 20, 2008

रंगीन होती भारत की सड़कें

जब आप इस शीर्षक को पढ़ेंगे तो सोचने लगेंगे कि तपन ये किस बारे में लिख रहा है। होली आने में तो अभी करीबन एक महीना है क्योंकि तभी सड़कें रंगों से सराबोर होती हैं तो ये किस बारे में बात कर रहा है?

होली में हम रंग हम पिचकारी से डालते हैं परन्तु यहाँ जो आए दिन सड़कों पर लाल-लाल रंग हम डालते हैं उसका क्या? मुद्दे पर आता हूँ। मैं बात कर रहा हूँ पान तम्बाकू खाने वालों के मुँह से निकलने वाले लाल रंग से रंगे हुए थूक का!!
कभी कोई रिक्शे वाला पान चबाये हुए रिक्शा चलाते चलाते सडक पर थूक देता है और लीजिये जनाब सड़क पर एक दिलचस्प डिज़ाईन तैयार। और कभी कोई व्यक्ति अपनी मस्ती में मगन सड़क किनारे चलते हुए, अपनी बाईं ओर गर्दन करता है और मुँह से पीक निकालता है और फुटपाथ, "थूक बाथ" बन जाता है| अब वो ये नहीं देखता कि पीछे से कोई आ रहा है या नहीं।

वाह!! पूरा सीन नज़रों के सामने तैर गया। अब तो चलते हुए सिर्फ ट्रैफिक का ही नहीं थूक वर्षा का भी ख्याल रखना होता है। ये तो बात हुई रिक्शे चलाने वाले व पैदल चलने वालों की। कहते हैं कि कार खरीदने का मतलब ये नहीं कि अक्ल भी खरीद ली गई। जब कार का शीशा नीचे होता है या ट्रैफिक सिग्नल पर कार का दरवाज़ा खुलता है तो आपने किसी सज्जन को सड़क रंगीन करते ज़रूर देखा होगा।

चाहे किसी भी तबके के लोग हों, चाहें अनपढ़ हों अथवा ऊँचे स्थान पर बैठे पढ़े लिखे मूर्ख लोग, सब के सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। अब मुँह में पान डाला है तो थूकना तो पड़ेगा ही।

ज़रा इन सज्जनों से कहें कि अगर पान खाने का इतना ही शौक है तो अपने घर के फर्श पर क्यों नहीं थूकते? दरअसल हम अपने घर को ही अपना समझते हैं। जब हमारे हक की बात आती है तो हम कभी दिल्ली हमारी है, मुम्बई हमारी है, ऐसे नारे देते हैं और जब अपनी ड्यूटी की बात आती है तो हम पीछा छुड़ाते हैं। कि ये काम सरकार का है। फलाना काम निगम वाले देखेंगे। हम लोग कभी भी अपने देश को,प्रदेश को, शहर को अपना समझते ही नहीं है। वरना किसी भी तरह से गंदा करने की सोचते ही नहीं। सड़कों पर कूड़ पड़ा रहता है। हम अपने घर का निकला कूड़ा घर के बाहर ही डाल देते हैं। चलो घर से तो निकला कम से कम। आगे की ज़िम्मेदारी सरकार की है। हम ये क्यों करें?

पूरे शहर को अगर कैन्वास पर उतारा जाये तो एक ज़बर्दस्त माडर्न आर्ट बन जाये।

हमारी सोच इतनी अविकसित है और हम क्या सोच कर अमरीका, यूरोप से बराबरी करते हैं। अरे अगर बराबरी करनी है तो सफाई में बराबरी करो, वहाँ लोगों की तरह ही कानून के नियमों का पालन करो। हम लोग अमरीका जा कर नहीं थूकेंगे, यहाँ वापस आकर वहाँ की तारीफ करेंगे और फिर यहाँ आकर वही काम करते हैं। हद है बेशर्मी की। अपने हक को माँगने वालों कभी अपने फर्ज़ की तरफ भी ध्यान दो। सरकार और शिक्षकों का ये फर्ज़ बनता है कि बच्चों को डिग्रियाँ बाँटने के अलावा उनको नैतिक शिक्षा भी दें ताकि अगली बार कोई थूकने से पहले हर कोई सोचे कि वो अपने घर पर, व अपनी मातृभूमि पर थूक रहा है जिसे हम हिन्दुस्तानी माँ का दर्जा देते हैं।
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Saturday, February 9, 2008

हँसी मनोरंजन में टूटता भारत

पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा था झूठे, मतलब परस्त - हम भारतीय!! जिसमें मैंने भारतीयों की क्षेत्रवाद व नस्लवाद के प्रति पाक-साफ़ दिखने वाली छवि पर कुछ प्रश्न किये थे। आज थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। कुछ ऐसी बातें जो हमारी एकता पर सवाल करती हैं, कुछे ऐसी बातें जिनसे हमारे भारत के शरीर पर पड़ती झुर्रियाँ, मकानों में दरारें व घर-परिवार में दीवार खिचती दिखाई देती है। जिसकी झलक आप खेल में, चुनावों में, यहाँ तक कि टीवी के कार्यक्रमों में भी देख सकते हैं। मैं यहाँ ये साफ़ के देना चाहता हूँ कि कारण और भी हैं परन्तु मैं फिलहाल एक को ही ध्यान में रख कर लिख रहा हूँ।
करीबन १२-१३ साल पहले २ कार्यक्रम शुरू हुए थे। एक था दूरदर्शन पर आने वाला "मेरी आवाज़ सुनो" व ज़ी पर अभी भी धूम मचाने वाला "सा रे ग म" जो आजकल "सारेगमप" के नाम से जाना जाता है। मंशा थी कि जनता में से बेहतरीन आवाज़ें आगे लाना ताकि हमारे देश में संगीत कोने कोने तक फैले और नई प्रतिभाओं को आगे आने का मौका मिल सके। सब बढ़िया तरीके से चल रहा था। कुछ ३-४ वर्ष पूर्व अचानक ही मनोरंजन जगत में इस कार्यक्रम को टक्कर देने के लिये सोनी ने इंडियन आइडल की शुरुआत की। उसी दौरान क्रांति आई और संगीत के ऐसे ही कुछ और कार्यक्रम शुरू हुए। लेकिन बदले हुए अंदाज़ में। इन प्रोग्रामों को "रियालिटी शो" का नाम दिया गया। चूँकि अब नलों से ज्यादा मोबाइल हो गये हैं तो क्यों न लोगों को मैसेज करना भी सिखाया जाये। ये बीडा उठाया समाचार चैनलों ने जो हर रोज़ किये जाने बेतुके सवालों पर पोल करते हैं और लोगों के मैसेज इंबोक्स में ज़ंग लगने से रोकते हैं। कम्पीटीशन इस कदर बढ़ गया कि अब इन शो में जजों के होने या न होने का कोई मतलब नहीं रह गया और लोगों से फोन की सहायता से वोट माँगे जा रहे हैं। हाँ भई, भारत देश में लोकतंत्र जो है।
मजाक में कही जाने वाली एक कहावत है : इस देश में क्रिकेट और राजनीति पर इस विषय में शून्य ज्ञान रखने वाले भी १ घंटे तक बिना रुके बोल सकते हैं। अब इसमें संगीत को भी जोड़ देना चाहिये। अब ज़रा वोट माँगने के तरीके पर गौर फरमायें। मैं राजस्थान के सभी लोगों से अपील करूँगा कि मुझे वोट करें। यहाँ राजस्थान की जगह आप पंजाब, हरियाणा, आँध्र, तमिलनाडु, उप्र, कश्मीर, असम, बंगाल कोई भी राज्य लगा सकते हैं। ये सभी जानते हैं कि इस तरह की वोटिंग से हमारे मन में उस प्रतियोगी के लिये अलग जज़्बात उभरते हैं और हम ये भूल जाते हैं कि हम प्रदेश के लिये नहीं, देश के लिये चुनना होता है। और यहाँ शुरू होता है देश का बिखराव। यहाँ राज्यों के हिसाब से ही नहीं वरन् धर्म और मजहब के आधार पर भी वोटिंग होती है। मैं किसी को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता पर २-३ वर्ष पूर्व एक ऐसे ही शो में काज़ी व रूपरेखा के चुने जाने पर बवाल हुआ था। उत्तर पूर्व से एक के बाद एक संचिता, देबोजीत, अनीक,प्रशांत का आगे आना, व तीन क्षेत्रों में पिछड़ने के बाद इशमीत का उत्तर क्षेत्र(जिसमें उनका अपना राज्य पंजाब आता है) में आगे आना, व और भी कईं ऐसे किस्से हुए हैं। मैं इनकी प्रतिभाओं पर संदेह नहीं कर रहा हूँ।हजारों लाखों लोगों में से चुने गये हैं तो कुछ तो दम होगा ही। जिनमें एक खराब परन्तु कईं बार ऐसा हुआ है जब उम्मीदवार केवल इसलिये आगे है क्योंकि उसके क्षेत्र के लोगों ने वोट करे थे। खराब प्रदर्शन भी उस उम्मीदवार को खेल में बनाये रखता है। जिस मकसद से "मेरी आवाज़ सुनो" व "सारेगम" प्रतियोगितायें होतीं थीं वो मकसद अब खत्म होता जा रहा है या यूँ कहें कि वो मकसद ही बदल गया है।
उम्मीदवार खुद फोन व सिम खरीद कर लोगों में बाँटते फिर रहे हैं। फोन कम्पनी करोड़ों कमा रही है। यही हाल चैनलों का है। लोग बावलों की तरह वोट करते हैं।
ये कहाँ का संगीत है? ये किस बात का मनोरंजन है? इसलिये तो इन कार्यक्रमों को शुरू नहीं किया गया था? पैसे की खनक ने पायल और तबले की आवाज़ों को दबा दिया है। रूपये और पैसे की दौड़ में कहीं हम भारत की एकता को तो नहीं बेच रहे हैं? ये बात हमें समझनी चाहिये। चैनल व सरकार दोनों से अनुरोध है कि अगर आप तक मेरी बात पहुँचे तो कृपया जनता के वोटों को बंद कराइये। मैं जानता हूँ चैनल व मोबाइल कम्पनी दोनों को घाटा होगा पर संगीत व भारत की अखंडता के लिये यदि नोटों व वोटों को भुला दें तो यही सभी के लिये हितकारी होगा।
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Tuesday, February 5, 2008

हिंदयुग्म : प्रगति मैदान में हुआ 'पहला सुर' का भव्य विमोचन

हिंद युग्म को आज हिंदी ब्लागों में ज्यादातर पाठक जानते हैं। ये अपने आप में एक अलग व अनूठे प्रोजेक्ट की तरह है जिसका मकसद लोगों में हिंदी के खोये हुए अस्तित्व, मान-सम्मान को वापस लौटाना है। हिंद युग्म की कोशिश रही है कि ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी में लिखें, हिंदी को पढें, हिंदी में बोलें। इसके अलावा भारत अथवा विश्व में जितनी भी प्रतिभायें छुपी हुई हैं, उनको आगे आने का मार्ग भी इसी मंच द्वारा दिया जा रहा है। यहाँ कवि, कहानीकार, संगीतकार, गीतकार, गायक, चित्रकार सभी का समान तरह से स्वागत होता है। इसी के चलते हिंद युग्म ने उससे जुड़े हुए सभी संगीतकार, गीतकार, गायकों के द्वारा गाये हुए गीतों की एक एल्बम निकालने का निर्णय लिया। और अभी रविवार, ३ फरवरी को प्रगति मैदान में इस एलबम का विमोचन (रिलीज़) भी हुआ।
ज्यादा जानकारी हेतु पढें :
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_7922.html

यदि आप दिल्ली में हैं और पुस्तक मेले में जा रहे हैं तो एक बार हिंद-युग्म के इस प्रयास को और सार्थक बनाने हेतु उसके स्टैंड पर अवश्य जायें और इससे जुड़ी सारी पुरानी व भविष्य में होने वाली गतिविधियों के बारे में जानें।
स्टैंड का पता-
हॉल नं॰ १२, स्टैंड नं॰ एस १/१० (वाणी प्रकाशन के स्टॉल के ठीक सामने, एन बी टी के स्टॉल के बगल में)
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Thursday, January 31, 2008

झूठे, मतलब परस्त - हम भारतीय!!

अभी हाल ही में क्रिकेट के क्षेत्र में एक विवाद पैदा हुआ जो क्रिकेट के जानकारों और इस खेल से अनभिज्ञ, दोनों ही तरह के लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा। मुद्दा था हरभजन सिंह ने साइमंड्स को नस्लवादी टिप्पणी करी या नहीं करी। आरोप संगीन था। प्रथम बार में इस आरोप के साबित होने पर देश भर में हड़कम्प मच गया। देश के समाचार परोसने वाले सभी तेज चैनलों में होड़ लग गई कि ऐसे कैसे कोई बिना सुबूत के आरोप लगा सकता है। बात भी सही थी। कानून सुबूत माँगता है। चैनलों का बस चले तो दिन को ४८ घंटों का कर दें और फिर भी इनके मसाले खत्म नहीं होंगे। खैर ये बात फिर कभी उठायेंगे।

अब ज़रा मुद्दे पर फिर रोशनी डालें। अभी हाल ही में मैं रिक्शे में जा रहा था कि एक कार वाला पीछे से होर्न मारने लगा। अब रिक्शे और कार की गति में अंतर तो होता ही है। थोड़ देर लगी उसको साइड होने में। अब जैसे ही कार बगल से गुजरी, उस कार वाले ने रिक्शा वाले को "बिहारी" कह कर सम्बोधित किया। अब चाहें वो रिक्शे वाला हरियाणा से हो, या उत्तर प्रदेश से या राजस्थान से आप उसे "बिहारी" ही कहेंगे। आप चाहें किसी भी महानगर में हों, आपको ये दृश्य नजर आ ही जायेगा। और दलील ये कि बिहार वालों को बिहारी ही तो कहेंगे। बात सही है। पर कम से कम कहने से पहले पूछ तो लिया जाये कि वो बंदा है कहाँ का? दरअसल हम लोगों ने ये नियम बना लिया है, कोई भी मजदूर हो, हम उसे बिहारी ही बोलेंगे। ये आम शब्द है और एक तरह से ये जताने का तरीका है कि मजदूर हम से नीचे दर्जे के लोग हैं। क्या इसे हम सही आचरण कहेंगे? क्या ये जातिवाद व क्षेत्रवादी टिप्पणी नहीं है?

और तब क्या सही है जब ठाकरे साहब उत्तर भारतीय लोगों को बुरा भला बोलते हैं। जब बिहार के लोगों को पीटा जाता है। यही हाल कमोबेश पूर्वी भारत में है। और उत्तर पूर्वी लोगों को बाकि क्षेत्र से अलग समझा जाता है। मीडिया में भी उस तरफ़ के लोगों की खबर न के बराबर होती है। और जब करूणानिधि जैसे नेता द्रविड प्रदेश का नारा देते हैं और हिंदीभाषियों के खिलाफ बोलते हैं। और हमारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के आधार पर आरक्षण देना। ये तो जातिवाद कतई नहीं है!!

हम ही ने ठाकरे, करूणानिधि जैसे नेता बनाये हैं, तो हम किस मुँह से कहें कि हम नस्लवाद के खिलाफ हैं। हम तो क्षेत्रवाद और जातिवाद के कट्टर समर्थक हैं। शर्म आनी चाहिये हमें और मीडिया वालों को भी, जिन्होंने खबर को गलत तरीके से पेश किया। कड़वी सच्चाई यही है कि हम सदियों से जाति व क्षेत्र में भेद करते आये हैं और कर रहे हैं। मैं नस्लवाद और जाविवाद व क्षेत्रवाद में कोई अंतर नहीं समझता। क्या आप समझते हैं?

भज्जी ने नस्लवादी टिप्पणी करी या नहीं, सवाल ये नहीं है। सवाल ये है कि हम किस मुँह से विदेश में साफ झूठ बोल रहें हैं कि हम इन सब के खिलाफ हैं। हम लोग झूठे व मतलब परस्त हैं, हमें जब जो अपने मतलब का लगता है हम करते हैं।

जो मुझे लगा मैंने कहा। सवाल उठाना मेरा फर्ज था। जवाब ढूँढना हम सब का।
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Wednesday, January 2, 2008

"नया साल मुबारक"

अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से नये वर्ष का आगमन हो गया है। मेरी शुभकामनायें हैं कि आप और आपका परिवार सदैव खुश रहें।

साल आता है,
चला जाता है,
और हम फिर खो जाते हैं
नये साल के स्वागत में।

भूल जाते हैं वो नरसंहार-
जिसके हम अब आदी हो गये हैं।
भुला दिये जाते हैं अकाल और बाढ़ से
मरे सैकड़ों लोग,
छोड़ दिया जाता है उन्हें भूखा
रोटी को तरसते लोगों को मिलती है
लाठियाँ, हड़ताल, जेल, बंद।
कभी आरक्षण में जलता है वर्ष,
कभी नंदीग्राम का संग्राम देखता,
कभी हैदराबाद, लखनऊ, बनारस से
दहलता है वर्ष।

फिर भी हम जश्न मनाते हैं
झगडों, दंगों, आतंक, द्वेष के संगीत पर,
और डूब जाते है इस कदर
कि साल की शुरुआत में,
ये देश होता है शर्मसार
गवाह होती है कभी मुम्बई, दिल्ली,
और मुजरिम होते हैं हम-
पर जश्न लगातार जारी है!!

जश्न तो तब होगा
जब "भारत एक है" का नारा
बेमानी नहीं लगेगा,
भारत तो सोने कि चिड़िया कहना
दिखावा नहीं लगेगा,
उस पल जो नया साल आयेगा
जश्न तब होगा
और मैं और आप गर्व से कह सकेंगे
"नया साल मुबारक"
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Saturday, December 22, 2007

समुन्द्र पर सवाल-जवाब

१)
मीलों दूर तक
फैले हुए समुन्द्र की
अनगिनत विशाल लहरें,
आपस में टकराती हुई,
लड़ती, झगड़ती हुई,
किनारे की ओर
तड़पती हुई आती हैं,
फिर टकराकर चली जाती हैं,
कुछ वहीं दम तोड़ देती हैं
कुछ फिर इकट्ठे होकर
पुराने वेग से दौड़ कर आती हैं
फिर वही तेजी, फिर वही शोर,
जाने कहाँ से ये लहरें
इतनी ताकत लेकर आती हैं?

२)
ये लहरों की तड़प,
ये टकराव,
ये तो बस है
चन्द्रमा का आकर्षण
जो खीच लेता है
लहरों को अपनी ओर,
और ऊँची,
और ऊँची उठती हैं,
चाँद का आलिंगन करने को,
नई जान आ जाती है
विशाल सागर में,
ऊँचा उठता है छू लेने को आकाश,
फिर भी पूछते हो
कि ये ताकत कहाँ से लाता है!!
ये प्रेम ही तो है...
ये प्रेम ही तो है...
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Friday, December 7, 2007

ये यादें

कभी हलकी सी मुस्कान होठों पर,
कभी आँखें नम कर जाती हैं
कभी सपने दिखलाती हैं दिन में,
कभी मन भारी कर जाती हैं..
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब आँखों के सामने ही
सब होता हुआ सा दिखता है,
जब रात के सन्नाटे में,
कुछ सुना हुआ सा लगता है,
गाल पर खारा पानी
टपटपा जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब भरी महफिल में भी
कुछ सूना सूना सा लगने लगे,
जब अपनों के बीच में भी,
अजनबी सा लगने लगे,
तब शायद बे-प्रीत होने लगती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

सालों का साथ जब
पल भर ही रह जाता है,
कितने दूर कितने पास,
ये सवाल मुश्किल हो जाता है,
वो हर पल भारी कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब रोने का बहाना नहीं मिलता,
जब हँसने का मन नहीं करता,
तब अपने आप से खुद को
दूर कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

क्यों दिलों का मिलना होता है?
क्यों ये बिछड़ना होता है?
क्यों ये विरह के पल,
मन को खाने लगते हैं?
क्यों ये खूबसूरत आकाश,
काटने को दौड़ता है?
ऐसे ही अनगिनत यक्ष प्रश्न,
अब हर वक्त मेरे सामने
खड़े कर जाती हैं
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!
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Monday, December 3, 2007

क्यों दुनिया को जन्नत बनाते नहीं?

मेरी इस रचना को ग़ज़ल कहें या कविता, ये मुझे नहीं पता। जो भी हो, मुझे आपकी टिप्पणी की उम्मीद रहेगी।
और इस रचना के माध्यम से उठाये गये सवालों को आप कितना सही मानते हैं अवश्य बताइयेगा|


दिवाली और ईद दोनों में लोग, एक दूसरे को गले लगाते हैं,
तो मुसलमान मनाते दिवाली नहीं, क्यों हिंदू ईद मनाते नहीं?

गर इंसां को है ये पता, कि सबका मालिक एक है,
क्यों मंदिर में मुसलमां, क्यों मस्जिद में हिंदू जाते नहीं?

गर धर्म सिखाये कत्ले-आम, मजहब सिखाये आतंक फैलाना,
क्यों नहीं मारते मजहब को पत्थर, क्यों धर्म को तुम जलाते नहीं?

जिसने बनाया इंसां को, उस खुदा की है ये दुनिया सारी।
तो मंदिर - मस्जिद छोड़ कर, क्यों औरों का घर बसाते नहीं?

जब धर्म अधर्म सिखाता है, और मजहब आग लगाता है,
क्यों मानते हो उस धर्म को, क्यों मजहबी आग बुझाते नहीं?

तोड़ डालो ये मंदिर मस्जिद, मालिक ने तो ये न चाहे थे,
पूरी कायनात में वो ही समाया है, क्यों दुनिया को जन्नत बनाते नहीं?
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Sunday, November 25, 2007

मेरे बाद-

कभी कभी सोचता हूँ
मेरे बाद कैसे रहोगे?
क्या वही हँसी मजाक होगा,
क्या वैसे ही चुटकुले होंगे?

क्या मैं भुला दिया जाऊँगा,
या हर बात में याद आऊँगा?
सिहरन उठती है पूरे शरीर में,
डर लगता है,
घबरा जाता हूँ जब
बिछड़ने का ख्याल
मन पर हावी होने लगता है!!

क्या इतिहास हो जायेगा
मेरा आज,
क्या भुला दिये जायेंगे
मेरे सब काज,
मेरी आवाज़ अब
नहीं गूँजेगी यहाँ पर,
नहीं गुनगुनाये जायेंगे
मेरे गीत यहाँ पर|

पर लोगों को
आदत हो जायेगी,
मेरे बिना रहने की,
मेरे बिना खाने की,
बिना मेरे घूमने की|

दो चार दिन काम के बहाने
याद आ जाया करूँगा शायद,
पर वक्त से रह जायेगी
बस एक शिकायत-

वक्त जब हँसाता है,
तो रोने क्यों देता है?
जब परायों को अपना बनाता है
तो बिछड़ने क्यों देता है?

बड़ा छलिया है ये वक्त,
मेरी बात ही नहीं सुनता,
आवाज़ देता हूँ,
दो पल तो ठहर कमबख्त

पर क्या कभी रुका है
किसी के लिये ये वक्त?
क्या ऐसे ही चलता रहेगा
ये बेईमान वक्त?
मेरे बाद भी!!
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Sunday, November 4, 2007

कंजकें

ज्यादा भूमिका नहीं बाँधूँगा। लड़कियों का कम होना चिंता का विषय है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि अनपढ़ तो अनपढ़ हैं ही, सभ्य समाज या शहर में बसने वाले और आधुनिक कहे जाने वाले समाज में भी बेटियों को कुछ नहीं समझा जाता।
उन्हें या तो पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है, या बेटों से कम तवज्जो दी जाती है। आधुनिक भारत के सभ्य व आधुनिक समाज के मुँह पर ये जोरदार तमाचा है। तमाचा जोर का लगे उसके लिये आपकी टिप्पणी आवश्यक है।

अरे पिंकू बेटे,
ज़रा बाहर जा,
गुप्ता आँटी की
निक्की को बुला ला।

पिंकू दौड़ा दौड़ा गया,
वापिस आया, माँ से बोला,
निक्की मेहता अंकल के गई है,
१५ मिनट में आने का है बोला।

नवरात्रि के इस त्योहार में
हर घर में कंजकें जीमी जायेंगी,
पर लगता है कि इस बार भी
निक्की ही सब के घर जायेगी।

जब पालने में बेटी होती है,
तो उसका गला दबाया जाता है।
पर "देवी" से आशीर्वाद मिल जाये,
इसलिये नवरात्रि में पूजा जाता है।।

ये सभ्य लोगों का समाज है,
जो बेटी नहीं पाल सकता,
न जाने किस बात का डर है
जो बेटियों को हाशिये पर है रखता।

पंजाब जैसे समृद्ध प्रदेश में भी,
लगातार बेटियाँ हो रही है कम।
जब बेटे की शादी के लिये लड़की ढूँढेंगे,
शायद तब निकलेगा सबका दम।।

तब समझेगा ये समाज,
बेटियों की अहमियत को,
जब तरसेगा आदमी,
पत्नी,बहन, भाभी और माँ को।

भयावह सा लगता है जब,

सोचता हूँ जीवन,
इन रिश्तों के बिना,

हकी़क़त सा लगने लगा था ये दु:स्वप्न,

जो इस बार मैंने कंजकों को,
पिछली बार से आठ कम गिना!!!
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Friday, October 19, 2007

सात क्षणिकायें : क्षणिकाओं में मेरा पहला प्रयास

हिंद-युग्म (www.hindyugm.com) पर आज कल क्षणिकाओं का दौर है। क्षणिका विधा ने मुझे बहुत प्रभावित किया है।
अगर आप बड़ी कवितायें नहीं पढ़ सकते तो ये छोटी छोटी पंक्तियाँ आपका ध्यान आकर्षित करती हैं
देखें मैं इसमें कितना सफल हो पाया हूँ। आपकी टिप्पणियाँ मुझे बतायेंगी कि मुझे आगे किस तरह से लिखना होगा।

१)
कीचड़ के खेल में,
इतना सन चुका हूँ मैं,
कि अब इसमें,
मजा आने लगा है।

२)
एक कुत्ता दूसरे से बोलाः
आदमी का झूठा न खाया कर,
वरना एक दिन
जानवर बन जायेगा!!

३)

ज़िन्दगी से इतना
सीख चुका हूँ मैं,
कि इंसान की परिभाषा
भूल चुका हूँ मैं!!

४)
ये कविता भी,
न जाने कहाँ से आई है,
जब ये नहीं थी,
कितना सुखी था मैं!!

५)
दोस्त चले गये,
मेरे दुश्मन
तू तो न जा,
मैं तन्हा हो जाऊँगा।

६)
माँ,
छोटे से शब्द में
स्नेह का
अथाह सागर!!

७)
पिता,
वात्सल्य की अग्नि
से जलती
चूल्हे की ताप!!

धन्यवाद|
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Monday, October 15, 2007

कदम दर कदम

कदम दर कदम चलते ही चले,
फ़ासले दरमियाँ बढ़ते ही चले...

हम रुके उस मोड़ पर, सोचा के साथ ले चलें,
आप ही तो दूर से, सलाम कर चले.....

वक्त ने भी कैसी करवटें हैं खाईं,
जो कल तलक तो संग थे, बैर हो चले....

मालूम है कि रुख हवा का किस तरफ को है,
न जाने कयूँ हम तेरा इंतज़ार कर चले...

अपनी किस्मत थी जो कुछ पल का साथ रहा,
आप भी क्या खूब थे, सपने भी साथ ले चले...

कदम दर कदम चलते ही चले,
फ़ासले दरमियाँ बढ़ते ही चले...
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Sunday, October 14, 2007

हिंद-युग्म पर अगस्त माह में प्रकाशित:दहेज़ का चलन

यूँ तो ये कविता हिंद युग्म पर पहले ही प्रकाशित हो चुकी है, और हो सकता है आप में से कुछ ने पहले पढ़ी हुई हो।परन्तु फिर भी मैं यहाँ भी इसे पोस्ट कर रहा हूँ ताकि मेरे द्वारा रचित कवितायें एक ही जगह मिल जायें।

http://merekavimitra.blogspot.com/2007/08/blog-post_20.html

जी, हमारा लड़का आई.ए.एस है,
2 साल बाहर भी रहकर आया है
इतना खर्चा हुआ,
पढ़ाया-लिखाया
इस काबिल बनाया...
अब आप ही बतायें
पैंतालीस तो, बनते ही हैं न..

लड़की के पिता ने कुछ सोचा, फ़िर बोला
आपने बात तो बिलकुल सही कही है
पर इतना पैसा लगाने की
हमारी औकात नहीं है
लड़की तो हमारी भी इंजीनियर है
पर हम पैंतीस तक ही लगा सकते हैं

लड़के के पिता अपनी बात पर कायम,
कहा,
नहीं नहीं, पैंतालीस से कम
में ये रिश्ता नहीं होगा

लड़की के पिता गिड़गिड़ाये
आखिर में चालीस पर बात मना पाये
मैं भी वहाँ खड़ा था
मिठाई बँटी,
मैंने भी खाई..
पर मन में कुछ और ही चल रहा था...

लड़के को बिकते देखने का
मेरा पहला तजुर्बा जो था...

लड़की के पिता की
आखिर ऐसी क्या मजबूरी है
जो दहेज के लालची लोगों से
रिश्ता कर रहे हैं

बात पता चली,
पड़ोस में पिछले दिनों
एक लड़की की शादी,
एन.आर.आई. खानदान में जो हुई थी

बस,
सारा माजरा समझते देर न लगी
लड़के और लड़की में रिश्ते की
ये तो बस औपचारिकता है
असली रिश्ता तो लालच और घमंड में
कब का हो चुका है...

धन्य है ये समाज,
मेरा समाज हमारा समाज
बुद्धिजीवियों के इस समाज में
पढ़े लिखे दूल्हों का बाज़ार लगता है
हर शख्स बिकता है...हर रिश्ता बिकता है
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Sunday, September 30, 2007

बचपन यादें इंतज़ार ईश्वर और मैं

२ अक्टूबर २००७:
आज सूर्य की २५ परिक्रमायें पूरी कर ली हैं । यकीन नहीं होता। हर पल इतनी तेज़ी से भागा है पर वक्त पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। ये भागता रहता है और हम हाँफ़ते रह जाते हैं। इन पच्चीस बरसों में खोना पाना चलता ही रहा। ज़िंदगी के इस सफ़र में रिश्ते बनते गये, दोस्त बनते चले गये, छूटते गये। कुछ से थोड़े समय का साथ मिला, कुछ आज भी मेरे साथ हैं। परिवार का साथ हमेशा रहा। बुज़ुर्गों का साथ छूटा पर उनका आशीर्वाद आज भी मेरे साथ है। शायद उनकी दुआओं का ही असर है जो आज का तपन आपके सामने है।मित्रों की सलाह, उनका साथ और परिवार का प्रेम सब को मेरा धन्यवाद व प्रणाम।।
इन सब के बीच एक परमात्मा भी है, जिसमें सारे ब्रह्मंड समाये हुए हैं, जिसमें हम हैं, जिसका अंश हम सब में है, जिसके बिना ये जीवन मुमकिन नहीं हैं। शत शत नमन।
आज तक अगर मुझसे कोई भूल हुई हो या आपमें से किसी का दिल दुखाया हो तो मैं क्षमापार्थी हूँ। आपका साथ व आशीर्वाद मिलता रहे बस यही आशा है।
आज मेरे मन में जो भाव उमड़े हैं उन्हें ३ कविताओं में शामिल करने का प्रयास किया है। कही कुछ कमी रह गई हो तो क्षमा कीजियेगा। कविताओं में त्रुटि हो सकती है पर भाव आप तक पहुँचे बस यही चाहता हूँ। मेरा मानना है कि आपके मन में भी ये भावनायें कभी न कभी ज़रुर जगी होंगी|

१)बातें भूल जाती हैं यादें याद आती हैं...

जीवन के ये पच्चीस बरस..
कुछ इस तरह से गुजरे,
पलक झपकते ही पल में
एक उम्र गुजरी हो जैसे।।

वो कल ही की बात थी, जो बारिश में नाँव चलाया करते थे,
पिठ्ठू गरम, पकड़म पकड़ाई, खूब चिल्लाया करते थे।
कभी विष अमृत, कभी पोशम पा, कभी ऊँच नीच का पापड़ा,
आँख मिचौली खेलते, कोकलाची गाया करते थे।।

मम्मी पापा के खेल खिलौने,
दादी नानी की कहानियाँ याद आती हैं,
वो ममता भरी गोद याद आती है,
वो मीठी मीठी लोरियाँ याद आती हैं।
नानी का वो खटोला याद आता ही
जिस पर अब मेरी टाँगें भी नहीं आती हैं।

पापा की पीठ पर चढ़ना याद आता है,
बहन से बात बात पर लड़ना याद आता है।
गर्मियों की छुट्टियों में खट्टे मीठे फ़ालसे,
छत पर तारे गिनना याद आता है,
सुबह सैर पर जाना, पार्क में खेलना,
कँधे पर बस्ता टाँगे स्कूल जाना याद आता है

उन बातों को याद करके, दिल आज भी झूम उठता है,
आँखें नम हो जाती हैं
क्या यही ज़िन्दगी है?
ऐसा लगता है मानो, बचपन जाते ही,
ज़िन्दगी खत्म हो जाती है।

ये आज की ही बात है, जब खुद को टटोलता हूँ,
बचपन तलाशता हुआ, समाज को देखता हूँ,
लोग हँसना भूल गये हैं,रोना आता है,
पाना भूल गये हैं, बस खोना आता है|

दूध पी कर बड़े होगे, समझदार बनोगे,
जब छोटे होते थे तो समझाया जाता था
समझदारों की दुनिया से जब वास्ता पड़ा,
ऐसा लगा मानो..
बहलाया जाता था, फ़ुसलाया जाता था।

इन खोखले विचारों की दुनिया में,
जज़बातों का कोई मोल नहीं,
यहाँ झूठी दिखावाट का बाज़ार लगता है,
ईमान व सच्चाई का कोई मोल नहीं।

जीवन के इस मोड़ पर खड़ा मैं,
पल पल का जब हिसाब लगाता हूँ
मेरा बचपन मुझको लौटा दे
ईश्वर से बस यही गुहार लगाता हूँ।
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२) तुम्हारा इंतज़ार है...

जीवन के इस मोड़ पर,
अब एक साथी तलाशता हूँ,
वो खड़ा रहे हर दम साथ,
ऐसा हमसफ़र चाहता हूँ।

जिसका साथ पा कर मैं,
छू लूँ सारे आसमां..
जो रहे संग मेरे हमेशा,
पूरे करे मेरे अरमां।।

एक अज़ीज़ दोस्त बन कर रहे,
हर गलती पर मुझे सुधारे,
गमों की धूप को झेल लें
वो मेरे सहारे, मैं उसके सहारे।

मैं जानता हू शब्द के,
रास्ते अनेक होते हैं
गर मेरी आवाज़ पहुँचे उस तक......
इंतज़ार नहीं होता है अब उसका
मेरे नयन उसकी राह तकते हैं।
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३) तू है आसमां में, तेरी ये ज़मीं है...

तेरी दुनिया में आया हूँ,
तुझे ये शीश झुकाता हूँ।
मानव जन्म मिला जो मुझको
तेरा शुक्र मनाता हूँ।।

भूले से भी कभी किसी से,
न करें कभी बर्ताव बुरा।
कर्म हमेशा नेक करें
सब के लिये निकले दुआ।

यही विनती करता हूँ मैं तुझसे
मुझे हमेशा इंसान बनाये रखना,
ज़िन्दगी रहे या मौत भी मिल जाये कभी
हाथ सर पर हमेशा बनाये रखना||

आभारः तपन शर्मा
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Saturday, September 8, 2007

मौत???

आज की तारीख में भारत दो हिस्सों में बँट चुका है। एक भारत तरक्की कर रहा है। व्यापार, आई.टी व दूसरे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है।यहाँ आगे बढ़ना, मतलब देश में खूब पैसा आ रहा है। बहुत खुशी होती है जब मध्यम वर्गीय परिवार का कोई आदमी कार, ए.सी खरीदता है। आज से १० साल पहले तक शायद ऐसा नहीं सोचा जा सकता था, पर आज सब मुमकिन है। हम वैज्ञानिक दृष्टि से और सुदृढ होते जा रहे हैं। ऊँची-ऊँची गगन चुम्बी इमारतों, फ़्लाइओवरों,आलीशान होटलों की चकाचौंध, बार, डिस्को, लम्बी गाड़ियाँ, इन सब को देख कर यकीन हो जाता है कि भारत के नाम का डंका आज पूरी दुनिया में क्यों बज रहा है?
लेकिन एक सच और भी है। और वो कड़वा सच है, जो हमारी पोल खोलता है। हमसे कहता है कि क्यों स्वयं को धोखे में रख रहे हो? और भी बहुत कुछ है करने को। एक कार खरीदने को देश की तरक्की नहीं कहते। देश की तरक्की होती है, समाज से। पर हमारा समाज ही संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त है। आगे बढ़ने की चाहत हमे वो कदम भी उठाने पर मजबूर कर देती है, जो न्यायसंगत नहीं होता, जिस कदम से किसी दूसरे के अरमानों का खून होता है।
जो किसी की लाश से होकर गुजरता है। जिस देश में दुनिया के बड़े रइस हैं, उस देश की ७०% जनता को पीने का पानी नहीं है, खाने को रोटी नहीं है, काम करने को रोजगार नहीं है, पहनने को एक जोड़ी कपड़ा नहीं है।फ़िर भी हम तरक्की कर रहे हैं। ये कैसी विडंबना है़!! न जाने क्यों मुझे लगता है हम पैसे की दौड़ में अपने सिद्धांतों का खून करते जा रहे हैं। संस्कृति की नींव खोखली होती जा रही हे।
इस कविता में हो सकता है मैं निराशावादी होऊं, इसके मैं आपसे माफ़ी माँगना चाहूँगा और आगे की कविताओं में आशावादी बनने का प्रयास करूँगा। आपको जैसा भी लगे, या जो आपके मन में इस बारे में बात हो, तो कृपया मुझे बतायें। आपकी टिप्पणियाँ मुझे आगे बढ़ने में मदद देती हैं।


अपनी जवानी में,
मैं हँसता था,
ठहाके लगाता था..
सबसे कहा करता था
देखना,
मेरे बच्चे मेरा नाम
रोशन करेंगे,
सब मिलजुलकर,
प्यार से,
एक ही घर में रहेंगे..

लहलहाते खेतों को देखकर,
मेरा मन आनन्दित होता,
सब के घर में रोटी होगी,
न भूखे सोयेगा कोई बच्चा,
ये सोच कर मैं,
चैन की नींद सोता।

आज़ादी के लिये,
लक्ष्मी बाई और् सरोजिनी को
लड़ते हुए देखकर,
मैं निश्चिन्त था,
भारत की स्त्री,
इस पुरूष समाज में,
अपनी पहचान बनायेगी,
ये सोचकर

संस्कृति की सीख,
जो दी है,
मैंने अपने बच्चों में,
वो उसका मान करेंगे,
कुछ बातें सीख,
अपने ग्रंथों से,
विश्व में अपना नाम करेंगे।

आज साठ साल की,
दहलीज़ पर मैं खड़ा,
उम्र के इस पड़ाव पर,
सोचता हूँ उन दिनों को-

और कराह उठता हूँ-
बहुओं की चीखों से,
उदास होता हूँ-
किसानों की मौतों से,
दिल रोता है-
शहीदों की लाशें देख कर,
विवश महसूस करता हूँ-
नेताओं के गोरखधन्धों पर,
डरता हूँ- लोगों को
खून का प्यासा देखकर,
सहम जाता हूँ-
लोगों की आँखों में
वहशियानापन देखकर,
खून खोलता है-
प्रकृति का विनाश देख कर..
दर्द होता है-
मासूम बच्चे को भूख से
बिलखते देखकर..

सारे सपने,
बिखरते दिखाई देते है..
जब धर्म के नाम पर,
लोग भगवान बाँटते
दिखाई देते हैं..

क्या सोचा था...
क्या पाया...
पाश्चात्य की होड़ में,
अपनी संस्कृति,
अपनी भाषा, अपना पहनावा,
सब गुमराह हो गये,
और पश्चिम के रंग में
ढलता पाया..

ए मालिक,
दे दे तू मेरे बच्चों में
बस इतनी सी समझ,
न भागें पैसे की तरफ़,
दें जज़्बातों पर भी ध्यान,
तोड़ें लालच व
द्वेष की मोटी परत,

मेरे मालिक..
मुझ बूढ़े पर,
एक रहम कर,
साठ साल की उम्र में,
मुझे इन रोगों से मुक्त कर..

काश! कोई मेरी आवाज़ सुन ले..
काश! कोई नई रोशनी कर दे..
काश! कोई दवा दे दे..

इन चीख, चिल्लाहट,
रूदन, तड़प,
बिलखना, मारना,
पीटना, भागना
भूख, लाचारी,
इन सब से,
सिर फ़टा जाता है..
और आगे कितना रुलायेगा भगवान?
ये "भारत" तुझसे
मौत चाहता है..
ये "भारत" तुझसे
मौत चाहता है॥

आभारः तपन शर्मा
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Saturday, August 25, 2007

रक्षा बंधन

राखी के त्योहार से हर कोई परिचित है। ये उन त्योहारों में से एक है जो किसी धर्म, जाति विशेष से संबन्ध नहीं रखता।
ये वो त्योहार है जिसने हिंदू रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ को प्रेम के बँधन में बाँधा। ये वो त्योहार है जिसने राजा पुरू को युद्ध में सिकंदर को मारने से रोका, क्योंकि पुरू की कलाई में सिकंदर की बीवी की राखी बँधी थी।

यूँ तो आमतौर पर राखी बहन बाँधती है.. पर ऐसा हमेशा ज़रूरी नहीं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार रानी शचि ने पति इंद्र को वृत्र नामक राक्षस से युद्ध के लिये जाने से पूर्व इसी प्रकार धागा बाँधा था।
यम-यमुना और द्रौपदी-कृष्ण का जिक्र किये बिना ये त्योहार अधूरा है।

इसी त्योहार और भाई बहन के रिश्ते को समर्पित ,एक छोटी सी कविता लिखी है। आशा है आपको पसंद आयेगी।

भाई बहन के प्रेम का,
है अजब अनोखा बंधन,
प्यार भी तकरार भी,
सच्चा है, और है ये कंचन॥

भाई बहन की करता रक्षा,
सारी खुशियाँ कर देता अर्पण,
पल पल भाई का ध्यान रखना,
जानता है बहन का मन॥

जिस दिन रानी कर्णावती ने,
बाँधा हुमायूँ की कलाई पे धागा,
वो दिन इतिहास का था स्वर्णिम,
जब रिश्ते का मान बढ़ा गया धागा॥

इस अनूठे बँधन को,
शब्दों में बयां करना है मुश्किल,
जहाँ तकरार में प्रेम घुलता है और,
कच्चे धागे से बँधते हैं दिल॥


आभार,
तपन शर्मा
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Tuesday, August 14, 2007

60 का हुआ भारत

ये कविता मैंने पिछले साल लिखी थी..पर आज भी इसमें "वर्ष" को छोड़ कोई और बदलाव की आवश्यकता नहीं पड़ी :-(


60 का हुआ भारत,
61 में किया प्रवेश
सैकड़ों बदलाव देखे हमने,
फ़िर भी वैसा अपना देश |

तब भी नहीं थी खाने को,
दो वक्त की सूखी रोटी,
अब भी इस देश में,
आधी जनता भूखी है सोती |

47 में भी हुए थे,
मजहब के नाम पर दंगे..
आज भी आये दिन,
होते रहते हैं ये अड़ंगे |

कभी सोने की चिड़िया था,
तब अंग्रेज़ों ने लूटा था भारत
अब भी भारत लुटता है,
नेताओं से कहाँ है राहत ?

पर बदलाव तो आया है..

आज हर क्षेत्र मे,
भ्रष्टाचार का साया है
पहले पंजाब में खौफ़ था,
आज कशमीर से कन्याकुमारी तक,
आतंक ही आतंक छाया है |

क्या दिन और क्या रात,
सरहद पर जगते हैं जवान,
यहाँ नेता शान से सोते,
उन्हीं का कफ़न तन पर तान |

वो ज़माना और था,
जब प्रेमचन्द की रचनायें
बिकती थी खड़े खड़े |
आजकल 'वीमेंस एरा' और,
'स्टारडस्ट' का ज़माना है,
उपन्यास सड़ते हैं पड़े पड़े |

नेह्रू जी ने तिरंगा फ़हराया था,
दिया था निर्भयता से,
देश के नाम संदेश,
आज दिन में भी डरे डरे,
प्रधानमन्त्री को टीवी पर से,
देेखता है सारा देश |

पतंग उड़ाना कभी,
अपनी शान थी होती,
आज इसे उड़ाने पर,
कड़ी पाबंदी है होती |

60 साल में ये हालत है.
आगे क्या होगा ?
ये सोच कर मन घबरता है,

ट्रक के पीछे पढ़करः
"100 में से 99 बेईमान
फ़िर भी मेरा भारत महान"
"भारत" अपनी किस्मत पर,
मन ही मन,
कभी हँसता, कभी रोता,
अपनी ही गलियों में खोता जाता है...
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Sunday, July 29, 2007

किसान

खाते पीते शहरी लोग,
गाँव में लहलहाते खेत,
मेहनती किसान ।

शहर में दौड़ती कार,
गाँव में रोबीला साहूकार,
कर्ज़दार किसान ।

बढ़ते रेस्तरां, व्यञ्जन,
रोटी को तरसता,
भूखा किसान ।

पेट भरना दूसरों का,
हँसते हुए सिखा गया,
मुर्दा किसान ।
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खेल

पुल पर तेज़ी से चलती ट्रेन से बाहर मैने झाँका है
एक कब्रिस्तान नज़र मुझको आया है..

उसी के पास एक ज़मीन..और उस पर कुछ बच्चे..
क्रिकेट खेलते..खेल को देखते..हँसी मजाक करते..

किल्लियाँ बिखर जाती हैं एक गेंद से..
बल्लेबाज बल्ले को पटकता है ज़ोर से..

मैं देखता हूँ एक खिलाड़ी को पैविलियन वापस जाते हुए..
और दूसरे को अपनी बारी शुरु होने पर खुश नज़र आते हुए..

कुछ ही पलों में आँखों से दृश्य ओझल हो रहा है...
धीरे धीरे ही सही...अब ये मुझे समझ में आ रहा है

इस खेल के मैदान में खेलती दुनिया सारी है
अम्पायर के निर्देशों पर..ये खेल निरन्तर जारी है..

ये खेल निरन्तर जारी है.. ये खेल निरन्तर जारी है..
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Sunday, July 22, 2007

आमेर : किले से खंडहर के ओर

आमेर का दुर्ग..



करीबन 10-12 साल पहले देखा था तो देखता ही रह गया। इतना विशाल और मजबूत, जैसे अपने महान इतिहास की हर गाथा बयान कर रह हो।
कईं सौ साल पुरना यह दुर्ग जयपुर को आगे बढ़ते हुए देख रहा है..


पर खुद पीछे जाता जा रहा है
आमेर आज भी वहीं खड़ा है.. लेकिन उसका रूप बदल चुका है.. वो जर्जर हो चुका है..ऐसा लगता है मानो आखिरी साँसें ले रहा हो.. 10 साल् बाद अगर मैं फ़िर देखने जाऊँ तो हो सकता है उसे न पाऊँ!!
ज़रा नीचे एक तस्वीर पर नज़र डालें..



इस दीवार पर कुछ शीशे अब नहीं हैं.. अंदर कमरे की दीवार का और भी बुरा हाल है..
जनता की मेहरबानी है
अब उन तस्वीरों को देखते हैं जिन्हें देखकर उन कारीगरों के बारे में सोचा करता हूँ कि आज तो हम नई तकनीक से ऊँचे कंक्रीट की इमारतें खड़ी करते हैं..वो लोग तब किस प्रकार से पहाड़ के ऊपर महल बनाया करते थे..





और अब यह है खूबसूरत कारीगरी का नमूना... क्या बढ़िया चित्रकारी है..


नज़र नहीं आ रही?? हम ही लोगों ने उखाड़ फ़ेंकी है.. शायद कुछ लोगों को बहुत पसंद आ गई
शुक्र है भारतीयों का कद आमतौर पर बड़ा नहीं होता..


वरना छत की इस नक्काशी के कुछ शीशे हम में से किसी एक के घर की शोभा बढ़ा रहे होते!!

आगे के चित्र आपको विचलित भी कर सकते हैं और शायद सोचने पर मजबूर भी कि 21वें सदी में 10 प्रतिशत की विकास दर के सथ भारत तरक्की कर रहा है(?) या फ़िर केवल "पैसा पैसा" छोड़ कर और भी कुछ सोचने की ज़रूरत है!!



हम में से ही किसी एक ने थूका है इतिहास पर!!


टूट रहीं हैं दीवारें..


खत्म हो रहा है इतिहास



मरम्मत का काम जारी है..


गाइड ने बताया कि 40 करोड़ मिले हैं किले को ठीक करने के लिये...
पर सरकारी के काम को आप और हम अच्छी तरह से समझते हैं..
पर हर बार सरकार को दोष मढ़ना किस हद तक सही है.. इस बार दोषी हम और आप हैं..
हम लोग ही शीशे निकालते हैं.. हम ही थूकते हैं.. हम ही प्रेम संदेश लिखते हैं दीवारों पर..
अब सवाल उठता है कि हम क्या करसकते हैं.. हर उस शख्स को जिसे आप इतिहास को गंदा करते हुए पायें.. तुरं त रोकें..
हमसे ही इतिहास बना है.. हम ही बिगाड़ रहे हैं.. इन धरोहरों को देखने के लिये देश विदेश से पर्यटक आते हैं..भारत का नाम और शोभा इन्ही किलों में है.. इसके अस्तित्व को बचाये रखने में मदद करें.. यही विनती है
वर्ना अगली पीढ़ी हमें दोष देगी कि इतिहास को हमने वर्तमान में तबाह करके भविष्य की पीढ़ी को सिवाये पत्थरों और मिट्टी के ढेरों के कुछ न दिया!!
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