Sunday, May 29, 2011

भूले बिसरे गीत में इस बार रफ़ी और मुकेश की आवाज़ में सदाबहार नग़में Songs of Rafi And Mukesh : Old Hindi Movie Songs

भूले बिसरे गीत के पहले अंक में प्यासा फ़िल्म के गीतों को सुना। आज के अंक में चार गीत ले कर आया हूँ एक बार फिर श्वेत-श्याम युग से। ये गीत आज भी नये से लगते हैं और इसलिये शायद इन्हें सदाबहार गीतों का दर्जा दिया गया है। रेड एफ़.एम को यदि छोड़ दें (क्योंकि ये बाप के जमाने के गाने नहीं सुनाते) तो तकरीबन सभी एफ़.एम वाले पुराने गीतों का एपिसोड जरूर सुनाते हैं।


क्योंकि गीत को मशहूर और सदाबहार बनाने में इसके पीछे के कलाकार यानि गायक, गीतकार व संगीत कार का भी पूरा योगदान होता है इसलिये हर गीत के साथ इसको मशहूर बनाने वाले पर्दे के पीछे की उन महान हस्तियों के भी नाम दिये गये हैं।


गीत १.
मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।

इस गीत के बोलों को यदि आत्मसात कर लिया जाये तो जीने की कला आ जाये!!!



फ़िल्म : हम दोनों (1961)
गायक : मो. रफ़ी
संगीत: जयदेव
गीतकार: साहिर लुधियानवी




गीत २. ये मेरा दीवानापन है


फ़िल्म : यहूदी (1958)
गायक : मुकेश
संगीत: शंकर, जयकिशन
गीतकार: शहरयार
कलाकार: दिलीप कुमार, मीना कुमारी


गीत ३. तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी






गायक: मुकेश
संगीत: रोशन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
फ़िल्म : दिल ही तो है।


गीत ४. किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार...
मुकेश की आवाज़ का जादू सर चढ़ कर बोलता है। और ये गीत दिल के अंदर तक छू कर जीना सिखा जाता है!!!

फ़िल्म: अनाड़ी
गीतकार: शैलेंद्र
संगीत: शंकर जयकिशन
गायक: मुकेश


आने वाले अंकों में श्वेत - श्याम युग जारी रहेगा और एक बार फिर लेकर आयेंगे सदाबहार गीत (दादाजी के जमाने से)। कुछ तो बात थी उन गीतों में... आपका क्या ख्याल है?
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Wednesday, May 25, 2011

क्या आप जानते हैं भारत में पर्यटकों की कितनी संख्या है? Tourism In India - New Series

क्या आप जानते हैं पर्यटन हमारे देश भारत का सबसे बड़ा सेवा उद्योग (Service Industry) है? भारत की जीडीपी का 6.23 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आता है और रोजगार में इसका हिस्सा करीबन नौ प्रतिशत है। भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख विदेशी सैलानी आअते हैं। विदेशियों में अमरीका और ब्रिट्घेन से सबसे ज्यादा लोग आते हैं। आँकड़ें बताते हैं कि देसी सैलानियों की तादाद 56 करोड़ के करीब है!! आगे आँकड़ें सुनकर चौंकियेगा नहीं। 2008 में हमने केवल पर्यटन से ही 100 अरब अमरीकी डॉलर का कारोबार किया था जो 2018 तक तीन सौ अरब अमरीकी डॉलर हो जाने का अनुमान है। 

आँकड़ों से एक बात स्पष्ट रूप से उभरती है कि हम यदि चाहें तो हमारे देश में इतने पर्यटन स्थल हैं कि अरबों खरबों की कमाई हो सकती है व रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। इस देश में विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार होता है फिर भी इनकी संख्या में कमी नहीं आई है। इसके पीछे कारण है हमारे देश का गौरवशाली इतिहास, ऐतिहासिक किले व स्मारकें इत्यादि। यदि हम ऐतिहासिक स्थलों को सम्भाल नहीं पाये तो इनकी संख्या जरूर घटेगी। आज से करीबन चार वर्ष पूर्व धूप-छाँव पर आमेर के किले के बारे में लिखा था। उस किले की दशा देख कर यही लगा कि वो अपनी अंतिम साँसें  ले रहा हो। 

भारत में इतने पर्यटन स्थल हैं, इतनी खूबसूरत स्थान व ऐतिहासिक स्थल हैं कि हमें स्वयं भी नहीं पता। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात-राजस्थान से पूर्वोत्तर की सुंदरता अतुल्य है। शायद इसलिये भारत-सरकार भी "अतुल्य भारत" का प्रचार कर रही है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली व उत्तर-प्रदेश में सबसे अधिक विदेशी आते हैं वहीं देशी पर्यटकों के लिये आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश व तमिलनाडु पसंदीदी राज्य हैं। 

कुछ और आँकड़े आप तक पहुँचाना चाहूँगा। ताजमहल को देखने के लिये 30 लाख पर्यटक हर साल आते हैं। तमिलनाडु में हैं 34000 मंदिर।आने वाले अंकों में धूप-छाँव पर आप जान सकेंगे राज्यवार पर्यटक स्थल। प्रत्येक राज्य में कौन सी जगह हैं जिन्हें आप देखने के लिये जा सकते हैं। आप काज़ीरंगा अभयारण्य, बौद्धगया का महाबोद्धी मंदिर, हम्पी के स्मारक व अजंता-एलोरा समेत अनेको अनेक स्मारक व स्थलों के बारे में जानेंगे।

दिल्ली का लाल किला अब सफ़ेद रंग में रंगा जा रहा है। पुरातत्व विभाग कहता है कि लाल किला का रंग शुरु से लाल नहीं रहा इसलिये ऐसा किया जा रहा है। 

दिल्ली का लाल किला



अगले अंक में हम जम्मू-कश्मीर से अपनी यात्रा शुरु करेंगे। आपको ये प्रयास कैसा लगा कृपया अवश्य बतायें।

।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
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Sunday, May 22, 2011

इस देश की सबसे उपेक्षित भाषा संस्कृत को कैसे सीख रहा है शत्रु देश चीन The Sanskrit Tale On Enemy's Land - China Learning The Language We Ignore Most

आज तक आपने चीन की हरक़तों के बारे में सुना होगा। कराची में पाकिस्तान की सहायता से, बंगाल की खाड़ी  में बंग्लादेश से मदद और भारतीय महासागर में श्रीलंका , तीनों दिशाओं से भारत के ऊपर नज़र रखे हुए है। अरूणाचल प्रदेश व कश्मीर में घुसपैठ जारी है। फिर भी भारत सरकार सोई हुई है। पता नहीं किस बात से डरते हैं हम? पर आज मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ वो सुनकर आप भी उसी तरह से हैरान हो जायेंगे जिस तरह से मैं हो गया था।

जिस भाषा की कद्र उसके अपने देश में नहीं होती वो भाषा हमारे पड़ोसी शत्रु देश में शोभायमान हो रही है। जिस भाषा को एक सम्प्रदाय की भाषा मान कर हमारी सरकार केवल वोट बैंक की खातिर नजरअंदाज़ करती रही है वही भाषा चीन में अध्ययन का विषय बनी हुई है। मैं बात कर रहा हूँ हमारी मातृभाषा हिन्दी से भी अधिक उपेक्षित भाषा व हिन्दी की जननी संस्कृत की। जी हाँ इस देश की सबसे पुरानी भाषा संस्कृत जिसे आज हिन्दुओं की भाषा माना जाता है।

आजकल भारत में छठी कक्षा से ही अपनी भाषा चुनने की स्वतंत्रता मिल जाती है। बच्चे जर्मन, फ़्रैंच व स्पेनिश जैसी भाषाओं को संस्कृत से ऊपर मानते हुए चुनते हैं क्योंकि ये भाषायें आगे चलकर नौकरी दिलवाने में मदद करती हैं। यानि वो भाषा जिसे इस देश की राष्ट्रभाषा बनना चाहिये था वो राजनीति व जटिल पाठ्यक्रम के कारण हाशिये पर जाती जा रही है।

चलिये भारत की बात छोड़ते हैं और चीन की बात करता हूँ। चीन के पीकिंग विश्वविद्यालय की बात करें तो वहाँ पर संस्कृत विषय पर 1960 से अध्ययन व लोगों को संस्कृत सिखाने का कार्यचल रहा है। इसे जी ज़ानलिन की छत्रछाया में देश में प्रसिद्धि मिली। करीबन 2000 वर्ष पूर्व बौद्ध गुरुओं के माध्यम से संस्कृत चीन तक पहुँची। यहाँ 60 विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते हैं व कईं पुस्तकों का संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद भी करते हैं। यहाँ के विद्यार्थियों में जबर्दस्त लगन है और सटीक उच्चारण सीखने की इच्छा भी है।

नई दिल्ली से चीनी विश्वविद्यालय पढ़ाने के लिये गये संस्कृत विद्वान सत्यव्रत शास्त्री जी ने बताया कि तिब्बत में बहुत सी हस्तलिखित पुस्तकें हैं जो संस्कृत से तिब्बती व चीनी भाषा में अनूदित है किन्तु संस्कृत में मिलनी दुर्लभ है। वे कहते हैं कि अब वक्त आ गया है कि हम इस भाषा की कद्र करें व इसको पहचानें। वे आगे बताते हैं कि चीनी विद्यार्थी बहुत तेज़ी से इस भाषा को सीख रहे हैं। ये विद्यार्थी पी.एच.डी कर रहे हैं। ये लोग भगवद गीता और कालिदास की कुमारसम्भव में अध्ययन कर रहे हैं। 
आपको यदि यकीन न हो तो आप अंग्रेज़ी दैनिक "हिन्दू" के इस लिंक पर जा कर इसके बारे में अधिक जान सकते हैं।

ये बात दुखी करती है कि जिस देश में वैदिक शिक्षा व संस्कृत अनिवार्य करनी चाहिये उस देश की आज की कथित "युवा" पीढ़ी को इन दोनों के बारे में ही ज्ञान नहीं है। कोई राज्य वैदिक शिक्षा शुरु करते भी हैं तो स्वयं को "धर्मनिरपेक्ष" कहने वाली कुछ पार्टियाँ टाँग अड़ाने से बाज नहीं आती हैं। ये वोट-बैंक की राजनीति हमारे देश को विपरीत दिशा में ले जा रही है। समय आ गया है संस्कृत के पाठ्यक्रम में सुधार  करने का जिससे बच्चों में इसके प्रति दिलचस्पी बढ़े व इस भाषा को उचित सम्मान मिल सके। क्या ऐसे मिल सकेगा इसे सम्मान? आज पहली बार मैं चीन के साथ खड़ा हो रहा हूँ।  घर की भाषा को घर में इज़्ज़त नहीं मिल रही और शत्रु देश उसे पूज रहा है। अचम्भा!!! हैरानी!!! दु:ख!!! खुशी!!! सब कुछ है इस खबर में....

।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
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Thursday, May 19, 2011

भूले बिसरे गीत- धूप छाँव पर एक नई श्रृंख्ला की शुरुआत Old Songs - New Series on Dhoop Chaaon

मेरे पिछले लेख में मैंने आज के गानों को जमकर कोसा। बहुत बुरा-भला कहा। किन्तु वो कोसना अकारण नहीं था। धूप-छाँव पर आज से भूले-बिसरे गीत लेकर एक नईं श्रृंख्ला लेकर आ रहा हूँ। जो पाठक पुराने गीतों के शौकीन हैं उनकी यादें तो ताज़ा होंगी ही परन्तु जो उन्हें नहीं भी सुनते मेरा प्रयास रहेगा कि वे भी पुराने गानों के मुरीद बन जायें। हर अंक में किसी एक फ़िल्म के गीतों को लेकर आऊँगा।

आज की फ़िल्म है- प्यासा। चूँकि ये मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है इसलिये इस फ़िल्म के गीतों की तरफ़ मेरा झुकाव लाज़मी है।

गीत १. जिन्हें नाज़ है हिन्द पे वो कहाँ हैं?
इस अंक का पहला गीत वो है जिस गीत में इतनी सच्चाई थी जिसे सुनने के बाद सरकार ने रोक लगा दी थी...

गीत २. ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है...
इस दुनिया में इतना दर्द छुपा हुआ है जिसे बखान करना नामुमकिन  है, किन्तु इस गीत के जरिये वो संवेदना दिलों तक पहुँचती है जब एक कलाकार अपनी कला को किसी दूसरे के नाम पर "बिकते" हुए देखता है।

गीत ३. जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला..
एक बार फिर.. दर्द... इस बार एक प्रेमी के नज़र से दर्द के एक अलग रूप देखने को मिलता है।

गीत ४. जाने क्या तूने कही.. जाने क्या मैंने  सुनी..
वहीदा रहमान जब गुरुदत्त को अपनी ओर बुलाती हैं तब...


गीत ५. सर जो तेरा चकराये... 
आज के मस्ती वाले गीत सुनें और इसको सुनिये। इस गाने को सुनने के बाद सिर का दर्द सही में गायब हो जायेगा। जॉनी वॉकर की मस्ती व एक्टिंग को सलाम...

और अंत में,
गीत ६. तंग आ चुके हैं गम-ए-ज़िन्दगी से हम..
इस गीत की खासियत यह है कि इस गीत में संगीत नहीं है!!! रफ़ी के प्रशंसक कहते हैं कि जब मोहम्मद रफ़ी गाते हैं तो संगीत की ज़रूरत ही क्या है।


आशा करता हूँ कि इस श्रृंख्ला का यह पहला अंक आपको पसंद आ या होगा। हालाँकि अभी मुझे नहीं पता कि कितने और अंक मैं धूप-छाँव पर आपके लिये ला सकूँगा।
फ़िल्मों के बीच राजनैतिक/सामाजिक लेख जारी रहेंगे।  कोशिश यही रहेगी कि आपका मनोरंजन कर सकूँ और नई जानकारी आप तक पहुँचाऊँ।

धन्यवाद।
।वन्दे मातरम।
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Tuesday, May 17, 2011

भारतीय राजनीति में क्या मायने हैं विधानसभा चुनावों के परिणामों के (माइक्रोपोस्ट) Indian Politics And Assembly Election 2011 Results

मैं कोई चुनावी विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिये छोटी सी पोस्ट ही लिख पाया पर हाल-ए-राजनीति इससे बयां हो ही जायेगी।

इस बार के विधानसभा चुनावों के परिणाम दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिये अच्छे नहीं रहे पर बाजी मरी है छोटे राजनैतिक दलों ने।

यदि आप कांग्रेस की केरल और बंगाल में हूई जीतों का आकलन करें तो पायेंगे कि केरल में कांग्रेस  ने 82 में से महज 38 सीटें जीतीं। वो तो भला हो मुस्लिम लीग का जिसे 24 में से 20 सीट प्राप्त हुईं। वैसे तो मुस्लिम लीग भी साम्प्रदायिक पार्टी है पर फिर भी कांग्रेस को एक ही पार्टी साम्प्रदायिक नजर आती है। केरल में वैसे भी हर बार सत्ता पलटती है फिर भी यूपीए बड़ी कशमकश के बाद महज 2 सीटें ही आम बहुमत से अधिक ले पाई। बंगाल में भी तॄणमूल कांग्रेस के तिनके के सहारे ही सत्ता तक कांग्रेस पहुँच पाई। तमिलनाडु में दहाई के आँकड़े तक भी न पहुँच पाने के बाद पुड्डुचेरी में भी बुरी तरह हारी। 

केवल एक असम ऐसा प्रदेश रहा जहाँ गोगोई के कार्यकाल को सराहा गया जिसके बलबूते एक अपनी चिपक्षी पार्टियों को एक अच्छे अंतर से हराने में कामयाब हुई। यदि प्रमुख विपक्षी दलों असम गण परिषद और भाजपा एकजुट होतीं तो कुछ टक्कर दे सकतीं थीं।

अब यदि बात करें भाजपा की तो केरल बंगाल और तमिलनाडु में वो पहले ही शून्य पर थीं। बंगाल में एक आध सीट भी उसके लिये काफ़ी है। बाकि राज्यों में भी वोट प्रतिशत बढ़ा है जो इसके लिये अच्छा माना जा सकता है। पर असम में अगप से तालमेल न बैठाने का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ा जो पहले से भी कम सीटें हासिल कर पाई।

अब इस देश में पाँच ताकतवर महिलायें हो गईं हैं। एक आँटी हैं, एक अम्मा, एक बहन जी, एक दीदी और एक इन सब की मैडम!! देखना है कि नारी शक्ति इस देश में क्या गुल खिलाती है। आँटी के काम काज को अब सराहा नहीं जाता। न हीं अब कुछ खास रहा है। बहन जी और अम्मा करप्शन के सागर में पहले  ही डुबकी लगा चुकी हैं। पाठक भूल गये हों तो याद दिला दिया जाये कि उनके पास से साड़ियाँ और सैंडल बरामद हो चुके हैं। दीदी बंगाल की कंगाली को दूर करने में कामयाब होंगी या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा पर दीदी और अम्मा केंद्र की राजनीति पर असर जरूर डालेंगी क्योंकि इन दोनों पार्टियों से आने वाले राज्य सभा के सांसदों की संख्या भी 8-10 तक बढ़ सकती हैं।
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Saturday, May 14, 2011

फ़िल्मों और गीतों में बढ़ते हुए अपशब्दों के बीच क्या होगा आने वाले संगीत का भविष्य? Use Of Abuse Words In Hindi Songs & Movies

धूप-छाँव पर पहले भी एक लेख छप चुका है जिसमें "गाँव और गाली" को एक समान कहा गया था। फ़िल्मों में गालियों का चलन बढ़ता जा रहा है। कुछ लोग इसको सही मानते हैं और कहते हैं कि इससे सब कुछ "असली" लगता है। चूँकि हम लोग गाली देते हैं और फ़िल्में तो समाज का आईना होती हैं इसलिये इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। फिर भी सेंसर बोर्ड इन फ़िल्मों को "ए" सर्टोफ़िकेट दे कर पास कर देता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसी फ़िल्में आने लगी हैं जिन्हें "डबल मीनिंग" की कैटेगरी में रखा जाता है।

मेरी बात से अधिकतर पाठक सहमत होंगे कि पुरानी फ़िल्मों के गानों में आज के मुकाबले शब्दों पर बड़ा जोर दिया जाता था। पहले जहाँ शब्दों के मतलब को ध्यान में रखकर गाना लिखा जाता था वहीं आज संगीत को तरजीह दी जाने लगी है। शब्द चाहें अंग्रेज़ी के हों, हिन्दी पंजाबी अरबी अथवा कोई ऐसी भाषा जो समझ से परे हो जाये पर संगीत "सॉलिड" होना चाहिये। आजकल फ़टाफ़ट गीत संगीत का जमाना है। मैं संगीत का कोई ज्ञानी नहीं हूँ लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि "फ़ास्ट फ़ूड" की भाँति ही "फ़ास्ट संगीत", संगीत की आत्मा की हत्या अवश्य कर रहा है। हाल ही में जगजीत सिंह को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि ग़ज़ल को आज के दौर में कोई नहीं पूछता। ऐसा लगता है कि आजकल गीत केवल तुकबंदी पर ही चल रहे हैं। आप "चार बज गये पार्टी अब भी बाकि है..." जैसे आज के सुपरहिट गाना उठा लीजिये। तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है। 


बात करते हैं फ़िल्मों की। पहले की फ़िल्में पूरा परिवार साथ बैठ कर देखा करता था। धीरे धीरे ऐसी फ़िल्में बननी कम हो गईं। और आज ये आलम है कि हमें सोचना पड़ता है कि आखिरी बार पूरा परिवार कौन सी फ़िल्म देखने साथ गया था? फ़िल्मों में संवादों में गाली के  बाद उनके नामों में गाली डाल दी गई। ज़िन्दगी को "साली" बना दिया गया। कुछ गालियाँ इतनी आम हो गई हैं कि ऐसा लगने लगा है कि यदि ये न होती तो हम बोलना ही न सीख पाते।

खैर, फ़िल्मों के बाद कमोबेश यही हाल गानों का होता प्रतीत हो रहा है। कुछ गाने ऐसे बनने लगे जो सुनने में तो अच्छे  लगते हों पर उन्हें आप परिवार के साथ देख नहीं सकते। पर आज जो हाल में चलन है उसको देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि अब गाने सुन भी नहीं सकते।

हालाँकि किसी को भी साला-साली बनाने की शुरुआत 1974 की फ़िल्म "सगिना" में हो गई थी जब दिलीप कुमार "साला मैं तो साहब बन गया" गाते हैं। उसके बाद जहाँ तक मुझे याद है फ़िल्म "रंगीला" में  क्या करें क्या न करें... गाने में इसी शब्द का प्रयोग हुआ है और फिर फ़िल्म "जोश" में भी शाहरुख इसी शब्द को गाते दिखाई पड़े। वैसे कुछ लोग इसे गाली नहीं मानते। फिर "रंग दे बसन्ती" के एक गाने  में भी यही शब्द इस्तेमाल हुआ। आप ही बताइये "Character Dheela" गाने में "साला" लगाने कि क्या तुक बनती है? हाल ही में आये "दम मारो दम" फ़िल्म के शीर्षक गीत को ही ले लीजिये। जयदीप साहनी ने क्या सोच कर इसके गीत लिखे ये तो वे ही बतायें। आज भी असली "दम मारो दम" और आज के गीत की तुलना कर के देख लीजिये। चाहें गीत हो अथवा संगीत।

आने वाली पीढ़ी स्वच्छ संगीत के दर्शन कर भी सकेगी अथवा नहीं ये कहना कठिन है। पर जो मिलावट आज परोसी जा रही है और रियालिटी शो के जरिये जो गायक बनाये जा रहे हैं उससे संगीत की राह दुर्गम अवश्य लग रही है।

। वन्देमातरम ।

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Sunday, May 8, 2011

दोरजी खांडू का निधन और पूर्वोत्तर राज्यों से होते सौतेले व्यवहार के बीच प्रधानमंत्री के नाम पत्र Death Of Dorji Khandu, North-East States Ignored By Media - Letter to Prime Minister

माननीय मनमोहन जी,

सर्वप्रथम आपकी सरकार को बधाई देता हूँ कि आप की यूपीए सरकार को तीन बरस होने वाले है। परन्तु शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इस बार प्रधानमंत्री की कुर्सी आपके लिये काँटों भरा ताज रहा है। आज मेरे पत्र लिखने का खास कारण है।

दोरजी खांडू को आप जानते ही होंगे। वे सेना में कार्यरत रहे और 71 के युद्ध के पश्चात उन्हें गोल्ड मैडल से भी नवाज़ा गया। वे बाद में चार बार जनता द्वारा चुने भी गये। बाद में अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए हैलीकॉप्टर  दुर्घटना में उनकी असमय मृत्यु हो गई। पर ये मृत्यु कईं प्रश्न खड़े कर गई है। पिछले दो वर्षों में कईं बार हैलीकॉप्टर दुर्घटनायें हुई हैं। जिनमें से दो बार तो इस देश के दो मुख्यमंत्री मारे गये हैं। गोल्ड मैडल विजेता सैनिक अधिकारी की इस तरह हुई हत्या होगी यह उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। हम पूरी दुनिया पर राज करने की बात करते आये हैं। इसरो एक के बाद एक सैटेलाईट अंतरिक्ष में भेज रहा है। वैज्ञानिक और सेना दोनों के पास ही यदि आधुनिक तकनीकें हैं तो मुख्यमंत्री को ढूँढने में चार दिन से ऊपर का समय कैसे लग जाता है? कहीं न कहीं तो गुंजाईश अवश्य है।

दोरजी खांडू की मृत्यु होती है और आपके मंत्री उनकी मृत्यु की पुष्टि होने से पहले ही दु:ख संदेश मीडिया को दे देते हैं। पुष्टि से पहले!!! यी हैं आपकी सरकार के विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा जी। आपका ध्यान मैं मीडिया की ओर भी ले जाना चाहता हूँ। हमारी मीडिया के द्वारा जिस तरह से उत्तर-पूर्व क्षेत्र को नजर अंदाज़ किया जा रहा है वो आप तक पहुँचाना जरूरी महसूस कर रहा हूँ। श्री खांडू की मौत हुई पर हमारा मीडिया ओसामा और ओबामा के नामों को गुनगुना रहा था। ओबामा उनके लिये भगवान बना हुआ है। इतनी बार तो शायद आपका नाम भी न लिया हो। सुबह अखबार टटोले तो पहले पन्ने पर कही पर बड़ी तो कहीं पर छोटी खबर दिखाई दी। खैर इन सब के बीच एक समाचार पत्र ऐसा भी रहा जिसने श्री खांडू के निधन का कोई समाचार नहीं छापा!!! कम से कम पहले पन्ने पर तो नहीं। 

दूसरी ओर हमारा नम्बर एक दुश्मन चीन उत्तर-पूर्व राज्यों में अपनी पैठ जमाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। परन्तु आपकी सरकार उसे भी नजर-अंदाज़ कर रही है। किस बात का खौफ़ है आपको? क्या आप चीन से डरते हैं? अमरीका द्वारा ओसामा को मारे जाने के पश्चात आपकी सेना के अधिकारी छाती ठोंक कर कह रहे थे कि हम भी ऐसा कर सकते हैं। पर क्या आपकी सरकार में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसने की हिम्मत है? जो चीन ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने के बाद भी पाकिस्तान का साथ दे रहा है उस चीन को माकूल जवाब देने में क्या आपकी सरकार समर्थ है?

आपके पास जब टू-जी आदि घोटालों से समय मिल जाये तो कृपया उत्तर-पूर्व के लोगों पर भी नजर डालियेगा। कहीं ऐसा न हो कि आने वाला वक्त भारत को बाईस राज्यों से जाने।


आज मातृ दिवस है। भारत माता के लिये आपसे निवेदन है कि हर राज्य को इस एक देश की माला में पिरोये रखें। आप सभी पाठकों से निवेदन है कि हम लोग ही पूर्वोत्तर के लोगों को पराया समझते हैं तो सरकार से कैसे हम कुछ आशा कैसे कर सकते हैं?
"जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी" : जननी और मातृभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान हैं। 


| जय हिन्द |
| वन्दे मातरम |
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Saturday, April 30, 2011

तस्वीरों में देखिये: क्या आपका बच्चा तम्बाकू रहित स्कूल में जाता है? Children And Tobacco Free Schools

कहते हैं कि तम्बाकू सेहत के लिये हानिकारक है। इसलिये सरकार इसका उत्पादन तो नहीं रोकती, पर इस से बनने वाले पदार्थों जैसे सिगरेट आदि के पैकेट पर एक चेतावनी अवश्य छपवा देती है। तम्बाकू न सिर्फ़ सिगरेट पीने वाले बल्कि उस व्यक्ति के आसपास खड़े हुए लोगों के फ़ेफ़ड़ों तक भी पहुँचता है। तम्बाकू की खेती साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। कैंसर जैसा खतरनाक रोग भी सिगरेट आदि की बिक्री कम कर पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है।

खैर आप सोच रहे होंगे कि आज तम्बाकू की बातें क्यों? दरअसल कुछ दिन पहले एक सड़क से गुजरते हुए मुझे एक बोर्ड दिखाई पड़ा। ये बोर्ड एक विद्यालय के बाहर की दीवार पर लगा हुआ था और उस पर लिखा हुआ था- Tobacco Free School. पढ़कर आश्चर्य हुआ। आप भी पढ़ें।



इसका आशय स्पष्ट है। बच्चों में सिगरेट व शराब की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ये आदत या घर से पड़नी शुरु होती है या फिर स्कूलों से। पर हमारी सरकारों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं है। शराब को अब पेट्रोल पम्पों, मॉल व बरिस्तां आदि जैसे खाने-पीने की "विदेशी" दुकानों पर बेचे जाने की तैयारी है। किसी भी स्कूल के बाहर आपको बच्चे सिगरेट पीते हुए दिख जायेंगे।  ये जनता को सोचना है कि वो अपने बच्चे को सिगरेट पीते हुए देखना पसंद करेंगे अथवा नहीं। यदि नहीं तो पहले आपको स्वयं पहल करनी होगी। स्कूल में दाखिला दिलवाने से पहले उस स्कूल का "Tobacco Free School" सर्टिफ़िकेट अवश्य पूछ लें। और यदि हाँ तो ये देश का भार ऐसे "युवा" कँधों पर है जो नि:संदेह वक्त से पहले ही कमजोर पड़ने वाले हैं।

।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
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Saturday, April 23, 2011

"बसन्ती हवा"- केदारनाथ अग्रवाल द्वारा लिखित सदाबहार कविता Basanti Hawa - Written By KedarNath Agarwal

यह पोस्ट धूप-छाँव पर सौंवी पोस्ट है। आशा है कि आप सभी पाठकों को पसन्द आयेगी। आपकी टिप्पणियों से लिखते रहने की प्रेरणा मिलती है। कृपया टिप्पणी अवश्य करें।

शायद पाँचवीं कक्षा की बात होगी। पता नहीं पर काफ़ी समय बीत गया जब ये कविता पढ़ी थी। कुछ वक्त पहले ये दोबारा पढ़ने का मौका मिला। "बसन्ती हवा" का असर इन वर्षों में कम नहीं हुआ है।
वहीं बसन्ती हवा आपके समक्ष फिर ला रहा हूँ। आशा करता हूँ कि कुछ यादें तो आप की भी ताज़ा हो ही जायेंगी। कविता के कुछ पंक्तियों को समझने का दोबारा प्रयास किया है।

"बसन्ती हवा" के दो पद्य अर्थ सहित:

चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में
लहर खूब मारी।

अर्थ:
महुआ के पौधे की डालियाँ काफ़ी सख्त होती हैं। कवि कहता है कि हवा पेड़ पर इधर-उधर कूदती फ़ाँदती है किन्तु कुछ भी प्राप्त न होने पर नीचे गिर जाती है। फिर वो आम के पेड़ पर जाती है जो महुआ से नरम पेड़ है। किन्तु तभी कोई उसे पुकारता है और वो आम के पेड़ को छोड़ कर खेतों में चली जाती है।


यदि महुआ के वृक्ष को लक्ष्य समझा जाये तो कवि कहता है कि हवा ने अपने लक्ष्य को पाने का अथक प्रयास किया किन्तु असफ़ल रही। फिर वो उस कठिन लक्ष्य को छोड़ सरल लक्ष्य की ओर (आम के पेड़ की ओर) लपकती है। परन्तु वहाँ भी थोड़ी सी कठिनाई आते ही अपने लक्ष्य से भटक जाती है व उस सरल लक्ष्य को भी नहीं पा सकी। 

पहर दो पहर क्या,
अनेकों पहर तक
इसी में रही मैं!
खड़ी देख अलसी
लिए शीश कलसी,
मुझे खूब सूझी -
हिलाया-झुलाया
गिरी पर न कलसी! 
इसी हार को पा, 
हिलाई न सरसों,
झुलाई न सरसों,
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!


अर्थ:
फिर वही हवा अलसी के खेतों में घुस गई। अलसी के फूल टहनियों से इस तरह से जुड़ होते हैं कि उन्हें तोड़ना कठिन हो जाता है। हवा ने भी भरसक प्रयत्न किया किन्तु तोड़ न सकी। फिर वह सरसों के खेतों में गई। पर चूँकि वो अलसी में असफ़ल रही थी इसलिये उसने सरसों के फूलों को तोड़ने का प्रयास तक नहीं किया। 


कभी कभार जीवन में किसी हार से हम इतने  दुखी हो जाते हैं कि हर लक्ष्य कठिन मालूम होता है। हम निराशा से घिरे होने के कारण सरल कार्यों को भी मन लगा कर नहीं करते और उनमें भी असफ़ल होने का भय लगा रहता है।


आगे पढ़िये "केदारनाथ अग्रवाल" की कलम से लिखी एक सदाबहार कविता। 

बसंती हवा
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।


        सुनो बात मेरी -
        अनोखी हवा हूँ।
        बड़ी बावली हूँ,
        बड़ी मस्तमौला।
        नहीं कुछ फिकर है,
        बड़ी ही निडर हूँ। 
        जिधर चाहती हूँ,
        उधर घूमती हूँ,
        मुसाफिर अजब हूँ।


न घर-बार मेरा,
न उद्देश्य मेरा,
न इच्छा किसी की,
न आशा किसी की,
न प्रेमी न दुश्मन,
जिधर चाहती हूँ
उधर घूमती हूँ।
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!


        जहाँ से चली मैं
        जहाँ को गई मैं -
        शहर, गाँव, बस्ती,
        नदी, रेत, निर्जन,
        हरे खेत, पोखर,
        झुलाती चली मैं।
        झुमाती चली मैं! 
        हवा हूँ, हवा मै
        बसंती हवा हूँ।


चढ़ी पेड़ महुआ,
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुँची -
वहाँ, गेंहुँओं में 
लहर खूब मारी।


        पहर दो पहर क्या,
        अनेकों पहर तक
        इसी में रही मैं!
        खड़ी देख अलसी
        लिए शीश कलसी,
        मुझे खूब सूझी -
        हिलाया-झुलाया
        गिरी पर न कलसी! 
        इसी हार को पा,
        हिलाई न सरसों,
        झुलाई न सरसों,
        हवा हूँ, हवा मैं
        बसंती हवा हूँ!


मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा - 
पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हँसी ज़ोर से मैं,
हँसी सब दिशाएँ,
हँसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हँसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हँसी सृष्टि सारी!
हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ!
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Wednesday, April 20, 2011

शहीदों की जाति बताकर किसने किसका अपमान किया? Freedom Fighters Caste, Political Parties and Our Society

पिछले दिनों काँग्रेस की किसी साईट पर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की जातियाँ बताईं गईं। कौन जाट व कौन ब्राह्मण ये बताया गया। इस पर एक-दो खबरिया चैनलों ने शहीदों के अपमान को लेकर पूरे दिन "देशभक्ति" के नारे लगाये। खबरिया चैनलों के द्वारा "मुँह" में जबरदस्ती बात डालने पर शहीदों के परिवार वाले आगे आये फिर भाजपा ने भी इसका विरोध कर दिया। एक या दो दिन ही बीते थे कि भाजपा की किसी वेबसाईट पर भीमराव अंबेडकर की जाति बताये जाने पर बवाल खड़ा किया गया। जो भाजपा एक और मुद्दा सोचकर आगे बढ़ने का विचार करने ही वाली थे एकदम से "बैकफ़ुट" पर आ गई।

प्रश्न ये उत्पन्न हो रहा है कि जिस देश में सभी के नाम के साथ ही जाति जुड़ जाती हो उस देश में यदि इन शहीदों व महापुरुषों की जातियों का उल्लेख हुआ भी हो तो लोगों को क्यों परेशानी होती है? "पंडित जवाहरलाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे"। ये "ब्रह्म"वाक्य बच्चे के दिल और दिमाग पर तब छा जाता है जब उसको ठीक से लिखना भी नहीं आता। तो नेहरू एक कश्मीरी पंडित थे। इस वाक्य में परोक्ष रूप से उनकी जाति छिपी है। कोई इन मीडिया वालों को समझाओ भई। अम्बेडकर के जन्मदिवस पर देश छुट्टी मनाता है, नेता दलितों की कॉलोनियों में जाते हैं। क्या फिर भी कोई ये कहेगा कि अम्बेडकर की जाति नहीं पता!! सोचने वाली बात यह है कि यदि अम्बेडकर दलित न होते तो भी क्या स्कूलों व दफ़्तरों में अवकाश होता?

ये सब छोड़िये। जहाँ लोग गाड़ियों के पीछे "जाट का छोरा" व "गुज्जर मेल" जैसे शब्द लिख कर अपनी जाति स्वयं बताते हों और गर्व महसूस करते हों तो उस देश में यदि शहीदों की जाति को किसी पुस्तक व साईट पर लिख भी दिया तो क्या गुनाह किया? जब लोग खुद को अनुसूचित जाति व जनजाति में शामिल करवाने के लिये रेल की पटरियों पर सो जाते हैं, वाहनों में आग लगा देते हैं, रास्ते बंद कर देते हैं तो फिर अम्बेडकर, भगत सिंह की जाति पता चल जाने पर कौन सा पहाड़ टूट जायेगा?

हाँ, एक बात जो कॉंग्रेस के मुख पत्र "संदेश" में कही गई कि सुखदेव सॉंडर्स की "हत्या" में शामिल थे। ये बात थोड़ी खटकती है। ऐसा लगता है कि इस पार्टी के मुताबिक केवल "गाँधीवादी" ही देशभक्त व शहीद थे। अन्य स्वतंत्रता सेनानी महज हत्यारे व क़ातिल थे। इस बात को मुद्दा बनाया जा सकता था। खैर इस देश में मुद्दों की कमी नहीं है। हर रोज़ हर पल नया मुद्दा। मीडिया वालों को चौबीसों घंटे काम जो चाहिये। तो ये एक और मुद्दा उठाकर क्या लाभ!

जाते जाते - जाति इस देश से कभी नहीं जायेगी ये एक सत्य है। जाति हमारी पहचान है। आप इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में दाखिले का पर्चा भरेंगे तो उसमें भी आपको अपनी "केटेगरी" बतानी पड़ेगी। अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं तो बल्ले बल्ले। पास हों या फ़ेल, बाबू के बेटे हों व चाहें आप को आरक्षण की जरूरत हो या न हो, आपका दाखिला पक्का। जहाँ घर्म के आधार पर कॉलेजों में दाखिला होता हो वहाँ जाति तो छोटी रह जाती है। किसी ने सच ही कहा है- जाति कभी नहीं जाती। गाँठ बाँध लें, यही जाति आपके काम आने वाली है।


।वंदेमातरम।
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Friday, April 15, 2011

अब प्राईवेट एफ़.एम पर भी सुना सकेंगे खबरें । खबरें फ़टाफ़ट-एक माइक्रोपोस्ट News Bulletin On Private FM Channels

मार्च के अंतिम सप्ताह में सरकार ने ये घोषणा करी है कि प्राईवेट एफ़. एम. चैनल भी समाचार सुना सकेंगे। गौरतलब है कि अब तक प्राईवेट चैनलों पर समाचार सुनाये जाने पर रोक लगी हुई थी। चैनल अपनी सुविधा से अलग अलग तरह खबरें हम लोगों तक पहुँचाते थे। आप में से बहुत लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो पर खबरें जरूर सुनी होंगी। इन खबरों की अवधि आमतौर पर पाँच मिनट से आधे घंटे तक होती है। पाँच मिनट वाली खबरें हर घंटे प्रसारित होती हैं व आधे घंटे की दिन दो से तीन बार।

प्राईवेट चैनल मनोरंजन को परोसते हैं इसलिये इसकी व्यावसायिकता को ध्यान में रखते हुए फ़िलहाल इन पर प्रसारित खबरों की अवधि दो से पाँच मिनट रखने का प्रस्ताव है। ये खबरें आकाशवाणी ही इन चैनलों को देगा और चैनल ज्यों की त्यों अपने एफ़.एम पर सुनायेंगे। अगले दो से तीन महीने में उम्मीद है कि सरकार इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दे देगी। देखना दिलचस्प होगा कि श्रोतागण इस कदम को किस तरह से लेते हैं क्योंकि आकाशवाणी पर जैसे ही खबरें आती हैं अधिकतर "शहरी" लोग चैनल बदल लेते हैं। सरकार का ये कदम कितना "हिट" होता है यह तो वक्त ही बतायेगा।
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Tuesday, April 12, 2011

रुद्राष्टक का हिन्दी अनुवाद: रामनवमी विशेष Rudrashtak Translated In Hindi Ram Navmi Special

आप सभी पाठकों को राम  नवमी की शुभकामनायें। आज  राम नवमी है तो मैंने सोचा कि क्यों न आज के इस पावन दिवस पर रूद्र की आरती रुद्राष्टकम का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया जाये। पहले भी मैंने कईं बार रुद्राष्टक के हिन्दी अनुवाद को इंटरनेट पर ढूँढा पर कामयाब नहीं हो पाया। तो इस बार मैंने रामचरितमानस से अक्षरश: प्रकाशित करने का सोचा।

मेरी समझ से जब तुलसीदास जी (1532-1623) रामचरितमानस गा रहे थे (क्योंकि रामचरितमानस  एक काव्य है) उस युग में कबीरदास (1440-1518) भी अपनी भक्ति के लिये विख्यात हुए। दोनों ही संत अपने काल के महान संत थे किन्तु दोनों की भक्ति अलग थी। तुलसीदास जी जहाँ साकार श्रीराम के भक्त थे तो वहीं कबीरदास जी निराकारस्वरूप ईश्वर की उपासना करते थे। साकार व निराकार का द्वंद्व इस पृथ्वी पर प्रारम्भ से ही रहा होगा। और आगे भी रहेगा। इसी द्वंद्व को ध्यान में रखते हुए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में जगह जगह साकार व निराकार ईश्वर का ध्यान किया है।

रुद्राष्टक स्तोत्र रामचरितमानस के अंतिम काण्ड उत्तरकाण्ड में आता है। शिव की स्तुति करते हुए तुलसीदास जी ने ईश्वर का जो व्याख्यान किया है उससे साकार व निराकार का वो द्वंद्व समाप्त करने का प्रयास किया है व हम जैसे मूढ़ भी आसानी से उस परम पिता परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

तो प्रस्तुत है रुद्राष्टकमस्तोत्रम:

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् |
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेङहम् ||१||

अनुवाद:
हे मोक्षस्वरूप, विभु, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर व सबके  स्वामी श्री शिव जी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको भजता हूँ।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् |
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोङहम् ||२||

अनुवाद:
निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान व इंद्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम् |
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगंगा लसदभालबालेन्दुकण्ठे भुजंगा ||३||

अनुवाद:
जो हिमाचल समान गौरवर्ण व गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,जिनके सर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा और  गले में सर्प सुशोभित है।

चलत्कुण्डलं भ्रुसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् |
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ||४||

अनुवाद:
जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटि व विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ व दयालु हैं, सिंहचर्म धारण किये व मुंडमाल पहने हैं, उनके सबके प्यारे, उन सब के नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् |
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेङहं भावानीपतिं भावगम्यम् ||५||

अनुवाद:
प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ। 

कलातिकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनान्ददाता पुरारी |
चिदानंदसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ||६||

अनुवाद:
कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत(प्रलय)  करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु  सच्चिनानंदमन, मोह को हरने वाले, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

न यावद उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् |
न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ||७||

अनुवाद:
हे पार्वती के पति, जबतक मनुष्य आपके चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इसलोक में न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न ही तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइये।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोङहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् |
जरजन्मदुःखौ घतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||

अनुवाद:
मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा। हे प्रभो, मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। हे प्रभो, बुढ़ापा व जन्म [मृत्यु] दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा करें। हे ईश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विपेण हरतुष्टये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ||

भगवान रुद्र का यह अष्टक उन शंकर जी की स्तुति के लिये है। जो मनुष्य इसे प्रेमस्वरूप पढ़ते हैं, श्रीशंकर उन से प्रसन्न होते हैं।

मेरा  धार्मिक/आध्यात्मिक  ज्ञान आप पाठकों से कम है इसलिये यदि त्रुटि हुई तो कृपया अवश्य बतायें।
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Saturday, April 9, 2011

अन्ना : आज का गाँधी... Anna Hazaare's Mission.. Make It A Success!!!

भ्रष्टाचार से "काली" पड़ी
एक कढ़ाई को
इंतज़ार है एक ऐसे "स्क्रॉच ब्राईट" का
जो दाग धो सके दशकों के
जो आकाओं ने उसको दिये हैं,
भ्रष्टाचार की अग्नि में झोंक-झोंक कर....

धरती जो कराह रही है
जिसे लगी प्यास है
दिल में जिसे आस है...
उस बादल की जो
बरसेगा और
भीतर जल रही अग्नि को
बुझायेगा...
वो बादल आज आकाश में है...

वो ज्वालामुखी आज फ़टने को है...
वो जलजला आज आने को है...

"आज़ाद" जिसके कण कण में है..
आज़ादी जिसके मन में है..
वो "अन्ना" आज का "गाँधी" है..
वो धूल उड़ाती आँधी है...
बहत्तर बरस का ये "युवा" है..
जहाँ चाहता है,
रुख वहाँ हवा का है...
आज उसके संग हो लो...
केवल नेताओं का नहीं...
अपना भी "काला" रंग धो लो...
यदि बनाते हम यही अपना "मिशन" है
तभी सफल होता ये अनशन है...



अन्ना के बारे में अब सभी लोग जान चुके हैं। इसलिये कुछ नहीं कहूँगा। सभी से केवल इतना ही आग्रह है कि जहाँ अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन हम सभी जानते हैं कि कहीं न कहीं हम भी भ्रष्टाचार का हिस्सा बने हैं.. कभी रिश्वत दी है (जाने-अनजाने डोनेशन वगैरह के माध्यम से ही सही) या ली है। इसलिये ये जंग हमारी स्वयं से है अपने ही समाज से है जिसका हम अंग हैं। ये कठिन है...परन्तु तभी शायद अन्ना का अनशन सफल माना जा सकता है... कहते हैं कि घर के बाहर सुधार करने से पहले घर के भीतर सुधार की आवश्यकता है। पर हम शायद अभी ये न समझ पायें.... आशा करूँगा कि अनशन अंतहीन न हो... वरना "अन्ना" और "जे.पी." पैदा होते रहेंगे..अनशन करते रहेंगे.. परन्तु स्थिति नहीं सुधरने पायेगी।

वन्देमातरम..
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Thursday, April 7, 2011

गूगल ने दिया एयर इंडिया को धोखा? एयर इंडिया की टिकट पर हिन्दी के हाल InCorrect Hindi Statement On Air India Ticket

तकनीक ने इंसान के दिमाग पर इस कदर राज कर लिया है कि जिस तकनीक को हमने खुद बनाया उस पर हम स्वयं से भी ज्यादा यकीन करने लगे हैं। ऐसा ही एक मुद्दा आज इस लेख में उठा रहा हूँ। गूगल व अन्य कुछ कम्पनियों ने अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद करने की वेबसाइट बनाई है। हिन्दी के हाल से आप सभी वाक़िफ़ हैं। प्राईवेट कम्पनियाँ तो छोड़िये सरकारी जगहों पर भी हिन्दी के हालात कुछ खास बेह्तर नहीं कहे जा सकते।

मेरे एक मित्र मनीष अग्रवाल के हाथ जब एयर इंडिया की टिकट लगी तो जैसे उसके साथ निराशा भी हाथ आई। टिकट पर लिखी हिन्दी पढ़ने के बाद ये बात समझ आ गई कि अपना दिमाग लगाने की बजाय एयर इंडिया के कर्मचारियों ने गूगल आदि  वेबसाइटों का सहारा लेना बेहतर समझा। मतलब यह कि हमारे देश जो व्यक्ति अंग्रेज़ी में दो वाक्य लिख सकता है वो उसी वाक्य को हिन्दी में दोहरा नहीं सकता। ये इस देश के लिये बेहद शर्मनाक है। 

ज़रा आप भी एक नज़र इस टिकट पर डालें और हिन्दी में लिखे वाक्य को पढ़ने का प्रयाद करें। मेरा दावा है कि यदि आप सच्चे हिन्दी प्रेमी हैं तो शर्म से नजरे झुक जायेंगी और माथे पर बल पड़ जायेंगे।

एयर इंडिया की पहचान विश्व भर में है और उसी से भारत की भी। परन्तु इस तरह की हिन्दी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है। ये चिंता का विषय है। किसी भाषा के हम इतने गुलाम हो जायें कि अपनी भाषा भूल जायें। ये परतंत्रता का परिचय है। आज हमारी सोच गुलाम है और ऐसा लगने लगा है कि अंग्रेज़ी का मतलब विकास हो गया है।

हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने हाल ही में आयोजित एक कवि सम्मेलन में एक किस्से का जिक्र किया।
पहला व्यक्ति: अगर मैं अपने बच्चे को अंग्रेज़ी नहीं सिखाऊँगा तो वो पीछे छूट जायेगा।
दूसरा: यदि तू हिन्दी नहीं सिखायेगा तो वो संस्कार भूल जायेगा।

माना अंग्रेज़ी जरूरी है पर सभी देशवासियों व पाठकों से अनुरोध है कि हिन्दी को नीचा न होनें दें। हिन्दी हमारी शान है। यदि ये पोस्ट या इसकी बात एयर इंडिया के किसी कर्मचारी तक पहुँच जाये तो इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता। शायद कुछ असर पड़े और आगे छपने वाली टिकटों में ऐसी भूल न हो।


जय हिन्द, जय हिन्दी ।

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Tuesday, March 29, 2011

गुस्ताखियाँ हाजिर हैं: मनमोहन-गिलानी की बातचीत का फ़ोन टेप Manmohan Gilani Phone Talks Leak - Gustaakhiyaan Haajir Hain


कल भारत और पाकिस्तान का मैच है। पर दुनिया में मैच से ज्यादा उस "मिलन" को लेकर बातें चल रही हैं जो मनु भाई और गिल्लू (गिलानी जी) के बीच होने वाली है। पर मैं आप लोगों को वो बातें बताने जा रहा हूँ जो इन दोनों के बीच मैच से पहले ही हो चुकी हैं। बात तब की है जब भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराया था। जैसे ही भारत जीता तो पाकिस्तान व भारत का सेमीफ़ाइनल भी तय हो गया। उस रात हमारे मनमोहन जी भी जागे हुए थे। वैसे तो उनकी रातों की नींद पिछले दो सालों से गायब है (जब से वे दूसरी बार सत्ता में आये हैं)। लेकिन वो रात खास थी। सोनिया जी ने उनके कान में "कुछ" फ़ूँक दिया था।

अगली सुबह उन्होंने वही किया जो सोनिया जी ने कहा था।

सुबह तड़के ही गिलानी जी के "पर्सनल" फ़ोन के घंटी बजी... ट्रिन ट्रिन....
गिलानी जी: हैलो...
मनमोहन जी: हैलो.. गिल्लू?
गिलानी जी: ओये मनु..तू? इस वक्त...इतनी सुबह....
मनमोहन जी: यार गिल्लू.. एक जरूरी गल है...
गिलानी जी: हाँ हाँ बता यार... कोई परेशानी है? हमने तो कल कोई बम भी नहीं फ़टवाया भारत में... फिर कैसे मेरी याद आ गई?
मनमोहन जी: यार.. बात दर असल यह है कि भारत कल ऑस्ट्रेलिया से क्वार्टर फ़ाइनल जीत चुका है और सेमीफ़ाइनल मोहाली में पाकिस्तान से है।
गिलानी जी: हाँ... तो?
मनमोहन जी: तू समझा नहीं गिल्लू? भाई मैं यहाँ आफ़त में हूँ.. कोई न कोई परेशानी आई रहती है..शशि थरूर, कॉमनवेल्थ से लेकर विकीलीक्स तक.... मुझे नींद ही नहीं आ रही है...
गिलानी जी: बता दोस्त मैं तेरे किस काम आ सकता हूँ। मैं भी यहाँ कम परेशान नहीं हूँ.. इन तालिबानियों को जितना भी खिलाओ पिलाओ... हर समय तंग करते रहते हैं...आर्थिक ढाँचा अस्त-व्यस्त हुआ पड़ा है। सारा बजट अमेरिका और चीन से हथियार लेने में निकल जाता है।
मनमोहन जी: वो सब छोड़... जनता का ध्यान इस समय भारत-पाक के मैच पर है। ये बिल्कुल सही समय है... एक काम करते हैं। मैच देखने का मैं तुझे न्यौता देता हूँ। तू बस आ जाइयो... पूरी दुनिया हमारी वार्त्ता पर नजर रखेगी...
गिलानी जी: और हम दोनों दोस्त फिर से ऐश करेंगे...भोली जनता का ध्यान आतंकवाद, भ्रष्टाचार से निकल कर "अमन की आशा" में ;लग जायेगा... बहुत खूब!! क्या चाल चली है ... मजा आ गया...
मनमोहन जी: हाँ.. तो फिर मैच पर "मिलन" पक्का?
गिलानी जी: हाँ हाँ बिल्कुल पक्का है जी... मिल बैठेंगे दो यार.. मैं.. तू.. और....
मनमोहन जी:.. अरे अरे..मैं नहीं पीता भाई....

कहकर फ़ोन काट दिया....
मनमोहन जी (सोचते हुए)... सोनिया जी न होती तो आज मेरा क्या होता....

आज फिर वार्त्ता हो रही है.. कल फिर होगी.. वार्त्ताओं का दौर जारी रहेगा। एक बार अटल बिहारी वाजपेयी ने वार्त्ता का दाँव खेला। मिला कारगिल... हर बार वार्त्ता.. हर बार बातचीत... हर बार एक नई जगह..हर बार युद्ध... कभी बलूचिस्तान पर हमारे मनमोहन सिंह अपनी खिल्ली उड़वाते हैं... कभी कश्मीर पर चर्चा... इस बार कश्मीर में भारत या पाकिस्तान की जीत की खुशी में पटाखे फ़ोड़ने पर पाबंदी लगाई गई है.... हालात पिछले साठ बरसों से नहीं सुधरे...तो क्या अब भी चर्चाओं से मामला सुलझाने के आसार हैं? या ये केवल एक राजनैतिक दाँव है... 

28 हजार की क्षमता वाले इस मैदान में महज सात हजार टिकट बिके हैं। बाकि हैं वीआईपी पास..जनता????

जो भी हो.. कल 30 मार्च 2011 की तारीख इतिहास जरूर बनायेगी। एक खेल मैदान पर खेला जायेगा तो दूसरी ओर होंगे राजनीति के वे खिलाड़ी जो अपनी "विकेट" बचाने के लिये खेल रहे हैं। आप भी जरूर देखियेगा..दोनों खेल...देखें जीत किसकी होती है!!!

धूप-छाँव के नियमित स्तम्भ


गुस्ताखियाँ हाजिर हैं

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Thursday, March 24, 2011

फिर एक धमाका कर जाओ... 23 March 1931 Salute Shaheed Bhagat Singh, Sukhdev, Rajguru

एसेम्बली में वो एक धमाका..

ज़ालिम अंग्रेज़ों को चेता गया
सोई जनता को जगा गया...

तब देश हमारा परतंत्र था
अंग्रेज़ों के आतंक से त्रस्त था

पर तुमने वो धमाका किया क्यों?
अपने बचपन को
अपनी जवानी को
यूँ सस्ते में खो दिया क्यों?

क्या तुम्हें भविष्य का अंदाज़ा था
ये देश कितने दिन आज़ाद रहेगा
क्या तुमने मन में सोचा था (?)

तुम गलत थे भगत!!!
तुम गलत थे...

ये देश आज भी गुलाम है..
जहाँ सिर्फ़ पैसे को ही सलाम है..
यहाँ जनता गूँगी बैठी है...
यहाँ नेता बहरे बैठे हैं...
ताकत के गुरूर में
कुर्सी पर ऐंठे बैठे हैं...

सोने की चिड़िया की इस धरती पर
भुखमरी का ऐसा साया है...
जहाँ "ममता" नहीं निर्ममता है
और "माया", "राज" छाया...

23 मार्च का वो इंकिलाबी दिन
जब तुम हँसे देश रोया था..
आज तारीख भूल गया ये देश...
नहीं जानता क्या खोया था...

भगत तुम्हारी आज फिर
महसूस होती जरूरत है...
एक और एहसान कर जाओ...
सोई जनता जगा जाओ..


फिर एक धमाका कर जाओ...
फिर एक धमाका कर जाओ...
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Thursday, March 17, 2011

शहर धुँए में कैद है Shahar Dhuey Mein Qaid Hai - Poem

शहर धुँए में कैद है
दम घुट रहा है....
पर दुनिया की सबसे बड़ी
प्रदूषण - रहित बस सेवा
चलाने वाले इस शहर के पास
इस धुँए से बचने के लिये
कोई सी.एन.जी नहीं !!!

यहाँ दिन-दहाड़े कत्ल होता है
इन्सानियत का....
जो पैदा करता है जेसिकायें व राधिकायें
और रोज़ सहम जाता है शहर..
"रे बैन" का काला चश्मा लगा कर
घूमते हैं लोग...
नज़र चुराते हैं दूध पी रही बिल्ली की तरह..
जैसे कुछ दिख ही नहीं रहा हो
उस रंगीन चश्मे के पीछे...

फ़ुटऑवर ब्रिज और फ़्लाईऑवरों
से गुजरते वाहन..लोग...
तोड़ते हैं उम्मीदों का पुल..
मनों में घोला जाता है "तारकोल"
और रौंदी जाती हैं खुशियाँ
"रोडरोलर" के तले...
और तैयार हो जाती है ईर्ष्या व द्वेष
की एक मज़बूत सड़क..

"विकसित" देशों में शामिल होने की चाह लिये...
हर दिन होता है मानवता का खून...
रोज़ बढ़ाते हैं हम सीने में जल रही
उस आग का जी.डी.पी...
उसी "आग" के धुँए में घुट रहा है
"नैशनल क्राइम कैपिटल"
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Saturday, March 12, 2011

तस्वॊरों में देखिये: दिल्ली में हो रहे विकास की एक तस्वीर Development In Delhi In Pictures

आप सभी इस बात से वाकिफ़ हैं कि आजकल "Development" यानि विकास बहुत ज्यादा हो रहा है खासतौर पर मेट्रो शहरों में। इन्हीं मेट्रो शहर में से एक है हमारी दिल्ली जहाँ राष्ट्रकुल खेल या कहें कि भ्रष्टकुल खेलों की वजह से "विकास" की रफ़्तार कुछ ज्यादा ही अधिक है।
इसी तरह का विकास मेरे इलाके रानी बाग में भी शुरु हुआ। उसी विकास की दो तस्वीरें आप लोगों के समक्ष रख रहा हूँ।

रानी बाग में एक बहुत पुराना पीपल का पेड था जो कि विकास की भेंट चढ़ गया। बदले में मिला एक फ़ुट ऑवर ब्रिज। जिस जगह इस ब्रिज को बनाया गया है, इस ब्रिज का वैसे तो कोई खास इस्तेमाल होना नहीं है, फिर भी यदि कोई इसके सहारे सड़क पार करना भी चाहे तो आप नीचे की तस्वीर पर एक बार नज़र जरूर डालें।
ट्रांसफ़ॉर्मर पर खत्म होता फ़ुटऑवरब्रिज

गौर से देखने पर आप पायेंगे कि जहाँ पर ये ब्रिज खत्म हो रहा है उस जगह पर एक बड़ा सा ट्रांसफ़ॉर्मर पहले से ही मौजूद है। अब आप ही बतायें कि यदि कोई चाहे भी तो भी इसका प्रयोग किस तरह कर सकता है?

प्रदेश अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल के पोस्टरों से लदा फ़ुटऑवर ब्रिज

एक बात और बताते जायें कि इसका उद्घाटन दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माननीय जयप्रकाश अग्रवाल जी अपनी पदयात्रा के दौरान कर चुके हैं। वे यहाँ से गुजरे और इसको चालू करते  चले गये।
शायद इसी को विकास कहते हैं।

विकास की एक और झलक आपको दिखाता हूँ। पिछले माह ही धूप-छाँव पर "विलुप्तप्राय: जीवों" के बारे में एक पोस्ट डाली थी। यदि आप ध्यान देंगे तो पायेंगे कि जीवों के विलुप्त होने का मुख्य कारण उनके रहने के स्थान का तेजी से  हो रहा क्षरण है। पिछले 20 दिनों से हमारे घर के आसपास एक बंदर का आतंक फ़ैला हुआ है। घर के पीछे जहाँ फ़ुटऑवरब्रिज बना हुआ है उसके साथ ही बहुत सारे पेड़ भी हैं। आजकल वे भी लगातार काटे जा रहे हैं। कहते हैं कि यहाँ से एक सड़क बनाई जायेगी जो गंतव्य स्थानों की दूरी को 15 मिनट तक कम कर देगी। एक तस्वीर उसकी भी देखते चलें। मेरा मानना है  कि इन पेड़ों की कटाई के कारण ही ये बंदर सड़क पार आ कर घरों में घुस रहा है।

मुख्य सड़क के पीछे काटे जा रहे पेड़

जंगलों की कटाई के कारण ही आजकल तेंदुओं के शहर में घुसने जिसे वाकये बढ़ते जा रहे हैं। पर हम "सभ्य" लोग इन सब बातों से बेखबर केवल एक ही राह पर चलते हैं जिसे हमने अपने लिये "विकास" का नाम दिया है और अपनी  "गुमराही" पर "गुमान" करते हुए खुशफ़हमी में जी रहे हैं।

"तस्वीरों में देखिये" जारी रहेगा....
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Friday, March 4, 2011

कर्नाटक क्रिकेट में कुम्बले और श्रीनाथ को राजनेताओं ने फ़ेंकी बाऊंसर और गुगली..Karnataka Cricket Ticket Distribution - Kumble Srinath Attacked By Politicians

पिछले कुछ समय से राजनेता किसी न किसी गलत कारणों से खबरों का हिस्सा बन रहे हैं। कॉमनवेल्थ, 2जी, एस-बैंड घोटाला तो कभी सीवीसी की नियुक्ति पर सवाल। कभी महाराष्ट्र से घोटालों की बू आती है तो कभी कर्नाटक। आंध्रप्रदेश में तेलंगाना जल कर धू-धू सुलग रहा है और राजनेता तसल्ली से रोटी सेंक रहे हैं। जगन मोहन रेड्डी बगावती तेवर अपनाये हुए हैं तो इसलिये कांग्रेस ने चिरंजीवी का हाथ थामा। "हाथ" तो करूणानिधि भी थाम रहे हैं। उन्हें शायद यह लग रहा है कि "हाथ" के सहारे वे आम आदमी का साथ पा लेंगे। केरल में लॉटरी घोटाले में कांग्रेस और लेफ़्ट गुत्त्थम-गुत्था हो रहे हैं। चुनाव आने वाले हैं तो हर तरफ़ सियासती रस्साकशी का माहौल है।

ऐसा बहुत कम होता है जब कांग्रेस और भाजपा जिन्हें देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियाँ माना जाता है, दोनों के सुर एक हों। ऐसा भी कम ही दिखाई पड़ता है जब राजनेताओं ने खेल संस्थाओं में गद्दी न हड़प रखी हो। अरूण जेटली डीडीसीए में, नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट में काबिज हैं तो राजीव शुक्ला बरसों से क्रिकेट बोर्ड में "कमाई" कर रहे हैं। और अपने शरद पवार को कैसे कोई भुला सकता है। लेकिन हाल ही में कुछ अलग देखने को मिला जब कुम्बले और श्रीनाथ कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष नियुक्त हुए तो भला नेता कैसे चुप बैठेंगे। उन्हें तो काटो मानो खून नहीं।

पिछले दिनों क्रिकेट खेल प्रेमियों पर टिकटों की बिक्री के समय बेंग्लुरु में लाठीचार्ज हुआ। इस मौके पर भाजपा और कांग्रेस ने विधानसभा में हंगामा किया। जी हाँ दोनों पार्टियाँ एक साथ..सही पढ़ा आपने। दोनों पक्ष के कुछ नेताओं ने कुम्बले और श्रीनाथ पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये। भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे शिष्ट खिलाड़ियों में इन दोनों की गिनती की जाते तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दरअसल कर्नाटक में इस बार एक व्यक्ति को केवल एक पास दिया जाना था। भाजपा के एक विधायक ने कहा कि उन्हें विधायक के तौर पर केवल एक पास मिला है इसलिये वे अपने परिवार को साथ नहीं ले जा पा रहे। इन्हें कौन समझाये कि यदि आपको इतना ही शौक है तो आप टिकट क्यों नहीं खरीदते। ऊपर से उनका कहना यह भी है कि वे "आम आदमी" नहीं हैं। इन शब्दों से आपको इन नेताओं के आगे हम लोगों की औकात पता चल गई होगी। कॉंग्रेस विधायक कहते हैं कि कुम्बले और श्रीनाथ के रिश्तेदार उनसे पास के बदले में 5000 रूपये की माँग कर रहे हैं।

हाल ही में एक अखबार में छोटी सी कहानी पढ़ी थी। एक मंत्री जी थे जो ईमानदारी से काम करते थे। एक पैसा भी हेर-फ़ेर नहीं करते। एक दिन उनको कुछ हजार रूपये की जरूरत पड़ी। उनकी पत्नी ने कहा कि पार्टी फ़ंड से रूपये उधार ले लो और तीन दिन में लौटा देना। उन्होंने कहा कि पहले तुम ये लिख कर दे दो कि इन तीन दिनों में मुझे मृत्यु नहीं आयेगी उस सूरत में मैं उधार ले लूँगा। आज के राजनेता ऐसे नहीं हैं। शायद किसी की कलम से गलत कहानी लिखी गई।

खैर, आप ही बतायें कुर्सी के लालची ये सियासी दल इन दोनों खिलाड़ियों को कैसे जीने देंगे?
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Tuesday, March 1, 2011

राष्ट्रगान फिर फ़ँसा विवादों में-स्कूल ने बदले राष्ट्रगान के शब्द National Anthem Controversy Strikes Again

हाल ही में एक खबर पढ़ी। उत्तर प्रदेश के एक गाँव के स्कूल में "जन गण मन" को बदला गया। उसके कुछ शब्दों में हेर-फ़ेर किया गया। जब किसी ने इसकी शिकायत करी तो प्रशासन ने स्कूल के प्रधानाचार्य को नोटिस भिजवा दिया। स्कूल प्रशासन का कहना है कि उन्होंने शब्दों को इसलिये बदला क्योंकि वे अंग्रेजी राजा किंग जॉर्ज पंचम के लिये कहे गये थे।

अम्बेडकर नगर जिले के एक गाँव के निजी स्कूल स्कूल के प्रबन्धक रघुनाथ सिंह स्कूल के बच्चों को जो राष्ट्रगान गवाते है उसमें ‘भारत भाग्य विधाता’ के स्थान पर ‘स्वर्णिम भारत निर्माता’ तथा ‘तव शुभ आशीष मांगे’ के स्थान पर ‘तव शुभकामना मांगे’ तथा ‘अधिनायक’ के स्थान पर ‘उत्प्रेरक’ शब्द गाया जा रहा है।
राष्ट्रगान के इस विवाद के बारे में कईं बार पढ़ा है। आइये जानते हैं कि आखिर माजरा है क्या। बात 1911 की है जब काँग्रेस ने रविंद्र नाथ टैगोर से अंग्रेज़ी राजा जॉर्ज पंचम के सम्मान में गीत लिखने को कहा। काँग्रेस राजा को खुश करना चाहती थी क्योंकि उन्होंने बंगाल के विभाजन को रोकने में भूमिका निभाई थी। कहते हैं कि उसके कुछ समय के पस्चात के बाद रविंद्रनाथ ने "जन गण मन" लिख कर कांग्रेस को दिया। जिसे दिसम्बर में काँग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए जॉर्ज के समक्ष गाया गया था। बस इसी के बाद विवाद खड़ा होना शुरू हो गया।

पर वे शब्द हैं कौन से जो विवादित हैं?
जन गण मन अधिनायक जय हे: इस पंक्ति में "अधिनायक" (super hero) कह कर किसे संबोधित किया जा रहा है?
भारत भाग्य विधाता: यहाँ भारत का "भाग्य -विधाता" कौन है?
गाये तव जय गाथा: "तव" और "जय गाथा" शब्द भी विवादित माने गये हैं क्योंकि इस पंक्ति में किस की जीत की बात हो रही है?

रविंद्रनाथ के करीबी बताते हैं कि जब काँग्रेस ने गाना लिखने का आग्रह किया था उसके बाद कुछ दिनों तक वे काफ़ी परेशान रहे। फिर उन्होंने ये गीत लिखा जो उस "भाग्य विधाता" के नाम था जो भारत के साथ सदियों से रहा है और भारत को सभी कठिनाइयों से उबार रहा है। खैर अधिवेशन में खुद रविंद्रनाथ ने सर्वप्रथम इस राष्ट्रगान को गाया था।
और 24 जनवरी 1950 को ये गीत हमारा राष्ट्रगीत बन गया।

क्या सही है क्या गलत ये समझना तब अधिक कठिन हो जाता है जब इतिहास पुराना पड़ता चला जाता है और रह जाते हैं तो केवल कुछ तर्क। और चूँकि भारतीय इतिहास सबसे पुराना है और कईं तरह के बदलावों से गुजरा है इसलिये इसको समझने में और दिक्कतें आती हैं। बुद्धिजीवी अपने हिसाब से शब्दों की परिभाषा निकालते आये हैं और हम तक सही बात पहुँच नहीं पाती। चाहें वंदे मातरम हो या "जन गण मन" विवाद दोनों के साथ है... चलो फिर क्यों न हम "सारे जहाँ से अच्छा.." गुनगुना शुरु कर दें....

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा..
वन्देमातरम.

वन्देमातरम पर विवाद (सम्बन्धित लेख)
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