संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO / यूनेस्को) द्वारा भारत के 28 स्थलों को विश्व धरोहर घोषित किया हुआ है। यूनेस्को की स्थापना 1972 में हुई। यूनेस्को विश्व के सांस्कृतिक व प्राकृतिक स्थलों की देखरेख के लिये जाना जाता है। यह संगठन अब तक विश्व के 152 देशों में 911 स्थलों की सूची तैयार कर चुका है जिनमें से 711 सांस्कृतिक व 180 प्राकृतिक स्थल हैं।
भारत की बात करें तो 1983 में पहली बार यूनेस्को ने आगरा के किले और अजंता की गुफ़ाओं को विश्व धरोहर में शामिल किया। पिछले 28 वर्षों में पच्चीस से अधिक स्थलॊं को अपनी सूची में डाल चुका है। भारत के 23 सांस्कृतिक व अन्य प्राकृतिक स्थल इस सूची में हैं। इस सूची में आने का आशय यह है कि ये स्थल अति भारतीय संस्कृति व पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील व महत्त्वपूर्ण हैं एवं इन स्थलों के रखरखाव की जिम्मेदारी सरकार व हर भारतीय को निभानी ही है। हाल ही में जयपुर के जंतर मंतर को भी इस विशिष्ट सूची में शामिल किया गया है।
काज़ीरंगा अभयारण्य पूर्वोत्तर राज्य असम में स्थित है। ये ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर है; वही ब्रह्मपुत्र जो पूर्वोत्तर राज्यों में जीवन रेखा की तरह है और चीन उसके बहाव को अपने अनुसार मोड़ना चाह रहा है उस पर बाँध बना कर। हो सकता है कि काज़ीरंगा का अस्तित्व भी उसके बहाव पर टिका हो। हालाँकि मैं कोई विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिये कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। यूनेस्को ने इस अभयारण्य को 1985 में विश्व धरोहर घोषित किया। इसकी स्थापना सर्वप्रथम 1908 में भारतीय गैंडों की सुरक्षा को ध्यान में रख कर हुई थी। उसके पश्चात यह वन कईं बदलावों से गुजरा व 1950 में अभयारण्य व 1974 में राष्ट्रीय पार्क बना। काज़ीरंगा एक लाख एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में फ़ैला हुआ है।
यूनेस्को की लिस्ट से दूसरा नाम आता है १९०७ में स्थापित मानस अभयारण्य का। ये भी असम में ही स्थित है व हिमालय की पहाड़ियों के ठीक नीचे भूटान के बॉर्डर को छूता हुआ अनेकानेक पशु-पक्षियों का घर है। अपने अनुपम प्राकृतिक सुंदरता व वन्य जीवों के कारण इसका नाम यूनेस्को ने 1985 में ही चुना। यहाँ 21 से अधिक दुर्लभ प्रजातियाँ हैं जिनमें बाघ, भारतीय गैंडा, जंगली भैंस व हाथी, सुनहरा लंगूर शामिल हैं। विलुप्त होती प्रजातियों के बारे में जानने के लिये इस लिंक पर जायें।
बौद्ध गया- बारह एकड़ के इस क्षेत्र का सांस्कृतिक व पुरातात्विक महत्त्व है। कहा जाता है कि इस मंदिर को 260 ईसा पूर्व भारत के महान सम्राट अशोक ने बनवाया। हालाँकि परिसर के कुछ मंदिर 1500 वर्ष पूर्व के भी बताये जाते हैं। इसकी संरचना ईंटों से की गई है। राजा सिद्धार्थ गौतम ने महज 35 वर्ष की उम्र में इसी जगह से बौद्ध धर्म का आरम्भ किया था। पूरे विश्व से बौद्ध धर्म के अनुयायी इस पवित्र व ऐतिहासिक मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं। इसकी ऊँचाई करीबन पचास मीटर की है। इसकी संरचना पाँचवीं शताब्दी की है व यह मंदिर भारतीय उप-महाद्वीप का प्राचीनतम मंदिर है। सम्पूर्ण मंदिर परिसर को विश्व धरोहर में रखा गया है।
जय हिन्द वन्देमातरम
अतुल्य भारत के आने वाले अंकों में यूनेस्को की लिस्ट में शामिल अन्य स्थल व भारत के वे पर्यटन स्थल जो इस धरती को अतुल्य बनाते हैं। आइये इन धरोहरों को संजो कर रखें ताकि भविष्य की पीढ़ी सर उठा कर स्वाभिमान से अपने अतीत को निहार सके-इस धरती को जान सके।
पिनकोड का मतलब है Postal Index Number । इसका इस्तेमाल भारतीय डाक सेवा चिट्ठी, पत्र, डाक, रजिस्टर्ड पोस्ट इत्यादि को दिये गये पते पहुँचाने के लिये होता है। पर ये सोचिये कि किसी क्षेत्र का पिनकोड निर्धारित कैसे होता है? किस तरह भारतीय डाक इसका उपयोग करता है? किसी डाक पर पिनकोड न लिखें तो क्या होगा?
भारतीय डाक ने पिनकोड का प्रयोग करना 15 अगस्त 1972 से शुरू किया। भारतीय डाक ने स्वयं को नौ क्षेत्र में बाँटा है। जिनमें से आठ क्षेत्रीय व एक सैन्य विभाग है। आपका पिन छह अंकों का होता है। पहला अंक वो राज्य व क्षेत्र होता है जिसमें आपका डाकघर है। मतलब यदि पहला अंक एक (1) है तो आपका डाकघर दिल्ली, हरियाणा, पंजाव, हिमाचल, चंडीगढ़ अथवा जम्मू व कश्मीर में ही है। इसी तरह दूसरा अंक उप-क्षेत्र दर्शाता है, तीसरा अंक जिला व अंतिम तीन अंक डाक-घर का नम्बर इंगित करता है।
वे नौ क्षेत्र/राज्य जो पिन कोड के अंतर्गत आते हैं। पहला अंक-
1 - दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर व चण्डीगढ़।
2 - उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड
3 - राजस्थान, गुजरात, दमन-दीव, दादर-नागर हवेली।
4 - गोआ, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़।
5 - आंध्रप्रदेश, कर्नाटक।
6 - तमिल नाडु, केरल, पुद्दुचेरी व लक्षद्वीप।
7 - उडीसा, पश्चिम बंगाल, अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणीपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, मेघालय, अंडमान-निकोबार।
8 - बिहार व झारखंड।
9 - आर्मी पोस्ट ऑफ़िस।
दूसरा व तीसरा अंक-
11 दिल्ली
12/13हरियाणा
14/15पंजाब
16 चंडीगढ़
17 हिमाचल प्रदेश
18-19जम्मू-कश्मीर
20 से 28उत्तर-प्रदेश/उत्तराखंड
30 से 34राजस्थान
36 से 39गुजरात
40 गोआ
40 से 44महाराष्ट्र
45 से 48मध्यप्रदेश
49 छत्तीसगढ़
50 से 53आंध्रप्रदेश
56 से 59कर्नाटक
60 से 64तमिलनाडु
67 से 69केरल
682 लक्षद्वीप
70 से 74पश्चिम बंगाल
744 अंडमान-निकोबार
75 से 77उड़ीसा
78 असम
79 अरूणाचल प्रदेश
793, 794, 783123मेघालय
795मणिपुर
796 मिज़ोरम
799त्रिपुरा
80 से 85 बिहार व झारखंड
जब एक ही राज्य में दो इलाकों का एक नाम हो तब इस पिनकोड का फ़ायदा होता है। इसलिये भारतीय डाक ने इसका प्रयोग करना प्रारम्भ किया।
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रवींद्रनाथ टैगोर ने एक कहानी लिखी जिसका नाम था काबुलीवाला। 1957 में इस कहानी पर तपन सिन्हा ने बंगाली भाषा में फ़िल्म बनाई और फिर हेमेन गुप्ता ने 1961 में मुम्बई में इसी कहानी पर बनी फ़िल्म का निर्देशन किया। हेमेन गुप्ता सुभाष चंद्र बोस के सेक्रेट्री भी रहे हैं।
आज धूप-छाँव पर भूले-बिसरे गीत में पहले वो कहानी जिसे साहित्य जगत में ऊँचा स्थान मिला और फ़िल्म जगत में भी भरपूर सम्मान मिला। उसके बाद उस गीत की करेंगे जिसके रचनाकार रहे प्रेम धवन और जिसे गाया था मन्ना डे ने। आप सोचिये कि ये फ़िल्म-ये गीत कितना महान,कितना खास बन जाता है जब इसके साथ रवींद्रनाथ टैगोर, मन्ना डे व बलराज साहनी जुड़े हों।
कहानी-काबुलीवाला, कहानीकार-रवींद्रनाथ टैगोर
मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से पल-भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक ही वर्ष लगा होगा। उसके बाद से जितनी देर सो नहीं पाती हैं, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। उसकी माता बहुधा डाँट-फटकारकर उसकी चलती हुई ज़बान बन्द कर देती हैं, लेकिन मुझ से ऐसा नही होता। मिनी का मौन मुझे ऐसा अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है कि मुझसे वह अधिक देर तक नहीं सहा जाता और यही कारण हैं कि मेरे साथ उसके भावों का आदान-प्रदान कुछ अधिक उत्साह के साथ होता रहा हैं।
सवेरे मैने अपने उपन्यास के सत्रहवें अध्याय में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना आरम्भ कर दिया - "बाबूजी! रामदयाल दरबान ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के विषय में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया- "बाबूजी! भोला कहता था, आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न? खाली बक-बक किया करता हैं, दिन-रात बकता रहता है।"
इस विषय में मेरी राय की तनिक भी राह न देख करके, चट से धीमें स्वर में एक जटिल प्रश्न कर बैठी- "बाबूजी! माँ तुम्हारी कौन लगती हैं?"
फिर उसने मेरी मेज के पार्श्व में पैरों के पास बैठकर अपने दोनो घुटने और हाथों का हिला-हिलाकर बड़ी शीघ्रता से मुँह चलाकर 'अटकन-बटबन दही चटाके' कहना आरम्भ कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के अध्याय में प्रताप सिंह उस समय कंचन माला को लेकर रात्रि के प्रगाढ़ अंधकार में बंदीगृह के ऊँचें झरोखे से नीचे कलकल करती हूई सरिता में कूद रहे थे।
मेरा घर सड़क के किनारे पर था। अचानक मिनी अपने अटकन-चटकन को छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"
मैले-कुचले ढीले कपड़े पहने, सिर पर कुल्ला रखे, उस पर साफा बाँधे कँधे पर सूखे फलों की झोली लटकाए, हाथ में चमन के अँगूरों की कुछ पिटारियाँ लिए, एक लम्बा-तगड़ा सा काबुली मन्द चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देख कर मेरी छोटी-सी बेटी के हृदय में कैसे भाव उदय हुए यह बताना असम्भव हैं। उसने जोर से पुकारना शुरु किया। मैने सोचा - 'अभी झोली कन्धे पर डाले, सिर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्रहवाँ अध्याय आज अधूरा रह जाएगा।'
किन्तु मिनी के चिल्लाने पर ज्यों ही काबुली ने हँसते हुए उसकी ओर मुँह फेरा और घर की ओर बढ़ने लगा, त्यों ही मिनी भय खाकर भीतर भाग गई। फिर पता ही नहीं लगा कि कहाँ छिप गई? उसके छोटे से मन में यह अन्धविश्वास बैठ गया था कि उस मैली-कुचैली झोली के अंदर ढूढ़ने पर उस जैसी और भी जीती जागती बच्चियाँ निकल सकती हैं।
इधर काबुली ने आकर मुस्कराते हुए, मुझे हाथ उठाकर अभिवादन किया और खड़ा हो गया। मैने सोचा- 'वास्तव में प्रताप सिंह औऱ कंचन माला की दशा अत्यन्त संकटापन्न हैं, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा।'
कुछ सौदा खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर-उधर की बातें करने लगा। रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप-शप होने लगी।
अन्त में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली-जुली भाषा में पूछा- "बाबूजी! आप की बच्ची कहाँ गई?"
मैंने मिनी के मन से व्यर्थ का भय दूर करने के अभिप्राय से उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल लगकर काबुली के मुख और झोली की ओर सन्देहात्मक दृष्टि डालती हुई खड़ी रही । काबुली ने झोली से किशमिश और खुबानी निकालकर देनी चाही, परन्तु उसने न ली और दुगने सन्देह के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। उसका पहला परिचय इस तरह हुआ।
इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे मैं किसी आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था। देखूँ तो मेरी बिटिया दरवाजे के पास बैंच पर बैठकर काबुली से हँस-हँस कर बातें कर रही है और काबुली उसके पैरों के समीप बैठा-बैठा मुसकराता हुआ, उन्हें ध्यान से सुन रहा है। और बीच-बीच में अपनी राय मिली-जुली भाषा में व्यक्त करता जाता हैं। मिनी को अपने पाँच वर्ष के जीवन में बाबूजी के सिवाय, ऐसा धैर्य वाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। देखो तो उसकी फ्रॉक का अग्रभाग बादाम-किशमिश से भरा हुआ था। मैंने काबुली से कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब कभी मत देना।"
यह कहकर कुर्ते की जेब में से एक अठन्नी निकालकर उसे दी। उसने बिना किसी हिचक के अठन्नी लेकर अपनी झोली में रख ली।
कुछ देर बाद, घर लौटकर देखता हूँ कि उस अठन्नी ने बड़ा उपद्रव खड़ा कर दिया हैं।
मिनी की माँ एक सफेद चमकीला गोलाकर पदार्थ हाथ में लिए डाँट-फटकार मिनी से पूछ रही थी- "तूने यह अठन्नी पाई कहाँ से, बता?"
मिनी ने कहा- "काबुली वाले ने दी हैं।"
"काबुली वाले से तूने अठन्नी ली कैसे, बता?"
मिनी ने रोने का उपक्रम करते हुए कहा- "मैने माँगी नहीं थी, उसने आप ही दी हैं।"
मैने जाकर मिनी की उस अकस्मात मुसीबत से रक्षा की और उसे बाहर ले आया। मालूम हूआ कि काबुली के साथ मिनी की यह दूसरी ही भेंट थी, सो कोई विशेष बात नहीं। इस दौरान वह रोज आता रहा। और पिस्ता-बादाम की रिश्वत दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर बहुत अधिकार कर लिया था। देखा कि इस नई मित्रता में बँधी हुई बातें और हँसी ही प्रचलित हैं। जैसी मेरी बिटिया, रहमत को देखते ही, हँसते हुए पूछती - "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली के भीतर क्या है?"
काबुली जिसका नाम रहमत था। एक अनावश्यक चन्द्र-बिन्दु जोड़कर मुस्कराता हुआ कहता, "हाथी।" उसके परिहास का रहस्य क्या हैं? यह तो नहीं कहाँ जा सकता, फिर भी इन नये मित्रों को इससे तनिक विशेष खेल-सा प्रतीत होता हैं और जाडे के प्रभात में एक सयाने और एक बच्ची की सरल हँसी सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगता।
उन दोनों मित्रों में और भी एक-आध बात प्रचलित थी। रहमत मिनी से कहता, "तुम ससुराल कभी नहीं जाना, अच्छा?"
हमारे देश की लड़कियाँ जन्म से ही 'ससुराल' शब्द से परिचित रहती हैं, लेकिन हम लोग तनिक कुछ नई रोशनी के होने के कारण तनिक-सी बच्ची को ससुराल के विषय में विशेष ज्ञानी नही बना सके थे, अतः रहमत का अनुरोध वह स्पष्ट नहीं समझ पाती थी। इस पर भी किसी बात का उत्तर दिए बिना चुप रहना उसके स्वभाव के बिल्कुल विरुद्ध था। उलटे वह रहमत से ही पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"
रहमत काल्पनिक ससुर के लिए अपना जबरदस्त घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।"
सुनकर मिनी 'ससुर' नामक किसी अनजाने जीव की दुरावस्था की कल्पना करके खूब हँसती।
देखते-देखते जाड़े की सुहावनी ऋतु आ गयी। पूर्व युग में इसी समय राजा लोग दिग्विजय के लिए कूच करते थे। मैं कोलकाता छोड़कर कभी कहीं नहीं गया। शायद इसीलिए मेरा मन ब्राह्मांड में घूमा करता था। यानी, कि मैं अपने घर में ही चिर प्रवासी हूँ। बाहरी ब्रह्मांड के लिए मेरा मन सर्वदा आतुर रहता था। किसी विदेश का नाम आगे आते ही मेरा मन वहीं की उडान लगाने लगता हैं। इसी प्रकार किसी विदेशी को देखते ही तत्काल मेरा मन सरिता-पर्वत-बीहड़ वन के बीच में एक कुटीर का दृश्य देखने लगता हैं और एक उल्लासपूर्ण स्वतंत्र जीवन-यात्रा की बात कल्पना में जाग उठती हैं।
इधर देखा तो मैं ऐसी प्रकृति का प्राणी हूँ, जिसका अपना घर छोड़कर बाहर निकलने में सिर कटता हैं। यही कारण हैं कि सवेरे के समय अपने छोटे-से कमरे मे मेंज के सामने बैठकर उस काबुली से गप-शप लड़ाकर बहुत कुछ भ्रमण कर लिया करता हूँ। मेरे सामने काबुल का पूरा चित्र खिंच जाता। दोनों ओर ऊबड़-खाबड़, लाल-लाल ऊँचे दुर्गम पर्वत हैं और रेगिस्तानी मार्ग, उन पर लदे गुए ऊँटों की कतार जा रही हैं। ऊँचे-ऊँचे साफे बाँधे हुए सौदागर और यात्री कुछ ऊँट की सवारी पर हैं तो कुछ पैदल है जा रहे हैं। किसी के हाथों मे बरछा हैं तो कोई बाबा आदम के जमाने की पुरानी बन्दूक थामें हुए हैं। बादलों की भयानक गर्जन के स्वर में काबुल लोग अपनी मिली-जुली भाषा में अपने देश की बातें कर रहें हैं।
मिनी की माँ बड़ी वहमी स्वभाव की थी। राह में किसी प्रकार का शोर-गुल हुआ नहीं कि उसने समझ लिया कि संसार-भर के सारे मस्त शराबी हमारे ही घर की ओर दौड़े आ रहे हैं? उसके विचारों में यह दुनिया इस छोर से उस छोर तक चोर-डकैत, मस्त, शराबी, साँप, बाघ, रोगों, मलेरिया, तिलचट्टे और अंग्रेजो से भरी पड़ी हैं। इतने दिन हुए इस दुनिया में रहते हुए भी उसके मन का यह रोग दूर नहीं हुआ।
रहमत काबुली की ओर से भी वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर विशेष नजर रखने के लिए मुझसे बार-बार अनुरोध करती रहती। जब मैं परिहास के आवरण से ढकना चाहता तो मुझसे एक साथ कई प्रश्न पूछ बैठती- 'क्या अभी किसी का लड़का नहीं चुराया गया? क्या काबुल में गुलाम नहीं बिकते? क्या एक लम्बे-तगड़े काबुली के लिए एक छोटे बच्चे को उठा ले जाना असम्भव हैं?' इत्यादि।
मुझे मानना पड़ता कि यह बात नितांत असम्भव हो सो बात नहीं, परन्तु भरोसे के काबिल नहीं। भरोसा करने की शक्ति सब में समान नहीं होती, अतः मिनी की माँ के मन में भय ही रह गया, परन्तु केवल इसीलिए बिना किसी दोष के रहमत को अपने घर में आने से मना न कर सका।
हर वर्ष रहमत माघ महीने में अपने देश लौट जाता था। इस समय वह अपने व्यापारियों से रुपया-पैसा वसूल करने में तल्लीन रहता। उसे घर-घर, दुकान-दुकान घूमना पड़ता था, मगर फिर भी मिनी से उसकी भेंट एक बार अवश्य हो जाती हैं। देखने में तो ऐसा प्रतीत होता हैं कि दोनों के मध्य किसी षड्यंत्र का श्रीगणेश हो रहा हो। जिस दिन वह सवेरे नहीं आ पाता, उस दिन देखूँ तो वह सन्ध्या को हाजिर हैं। अन्धेरे में घर के कोने में उस ढीले-ढाले जामा-पाजामा पहने, झोली वाले लम्बे-तगड़े आदमी को देखकर सचमुच ही मन में अचानक भय-सा पैदा हो जाता हैं।
लेकिन, जब देखता हूँ कि मिनी 'ओ काबुलीवाला' पुकारते हुए हँसती-हँसती दौड़ी आती हैं और दो भिन्न आयु के असम मित्रों में वही पुराना हास-परिहास चलने लगता हैं, तब मेरा सारा हृदय खुशी से नाच उठता हैं।
एक दिन सवेरे मैं अपने छोटे कमरे में बैठा नई पुस्तक के प्रुफ देख रहा था। जाड़ा विदा होने से पूर्व, आज दो-तीन दिन से खूब जोर से अपना प्रकोप दिखा रहा हैं। जिधर देखों, उधर इस जाड़े की ही चर्चा हो रही हैं। ऐसे जाडे़-पाले में खिड़की में से सवेरे की धूप मेज के नीचे मेरे पैरों पर आ पड़ी। उसकी गर्मी मुझे अच्छी प्रतीत होने लगी। लगभग आठ बजे का समय होगा। सिर से मफलर लपेटे ऊषा चरण सवेरे की सैर करके घर की और लौट रहे थे। ठीक उसी समय एक बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया।
देखूँ तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। उसके पीछे बहुत से तमाशाई बच्चों का झुंड चला आ रहा हैं। रहमत के ढीले-ढीले कुरते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से लथपथ छुरा। मैने द्वार से बाहर निकलकर सिपाही को रोक लिया और पूछा- 'क्या बात हैं?'
कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक रामपुरी चादर खरीदी थी। उसके कुछ रुपए उसकी ओर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने साफ इनकार कर दिया। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई और रहमत ने उसे छुरा निकालकर घोंप दिया। रहमत उस झूठे बेईमान आदमी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के अपशब्द सुना रहा था। इतने में "काबुलीवाला, काबुलीवाला", पुकारती हुई मिनी घर से निकल आई।
रहमत का चेहरा क्षण-भर में कौतुक हास्य से चमक उठा। उसके कन्धे पर आज झोली नहीं थी, अतः झोली के बारे में दोनों मित्रों की अभ्यस्त आलोचना न चल सकी। मिनी ने आते ही पूछा- ‘’तुम ससुराल जाओगे?"
रहमत ने प्रफुल्लित मन से कहा- "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"
रहमत ताड़ गया कि उसका यह जवाब के चेहरे पर हँसी न ला सकेगा और तब उसने हाथ दिखाकर कहा- "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"
छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई वर्ष का कारावास मिला।
रहमत का ध्यान धीरे-धीरे मन से बिलकुल उतर गया । हम लोग अब अपने घर में बैठकर सदा के अभ्यस्त होने के कारण, नित्य के काम-धन्धों में उलझे हुए दिन बिता रहे थे, तभी एक स्वाधीन पर्वतों पर घूमने वाला इंसान कारागर की प्राचीरों के अन्दर कैसे वर्ष पर वर्ष काट रहा होगा, यह बात हमारे मन में कभी उठी ही नहीं। और चंचल मिनी का आचरण तो और भी लज्जाप्रद था। यह बात उसके पिता को भी माननी पड़ेगी। उसने सहज ही अपने पुराने मित्र को भूलकर पहले तो नबी सईस के साथ मित्रता जोड़ी, फिर क्रमशः जैसे-जैसे उसकी वयोवृद्धि होने लगी, वैसे-वैसे सखा के बदले एक के बाद एक उसकी सखियाँ जुटने लगी। और तो क्या, अब वह अपने बाबूजी के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मेरा तो एक तरह से उसके साथ नाता ही टूट गया हैं।
कितने ही वर्ष बीत गए? वर्षो बाद आज फिर शरद ऋतु आई हैं। मिनी की सगाई की बात पक्की हो गई। पूजा की छुट्टियों में उसका विवाह हो जाएगा। कैलाशवासिनी के साथ-साथ अबकी बार हमारे घर की आनन्दमयी मिनी भी माँ-बाप के घर में अंधेरा करके सुसराल चली जाएगी।
सवेरे दिवाकर बड़ी सज-धज के साथ निकले। वर्षों के बाद शरद ऋतु की यह नई धवल धूप सोने में सुहागे का काम दे रही हैं। कोलकाता की संकरी गलियों से परस्पर सटे हुए पुराने ईटझर गन्दे घरों के ऊपर भी इस धूप की आभा ने इस प्रकार का अनोखा सौन्दर्य बिखेर दिया हैं।
हमारे घर पर दिवाकर के आगमन से पूर्व ही शहनाई बज रही हैं। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा हैं कि जैसे यह मेरे हृदय की धड़कनों में से रो-रोकर बज रही हो। उसकी करुण भैरवी रागिनी मानो मेरी विच्छेद पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ सारे ब्रह्मांड़ में फैला रही हैं। मेरी मिनी का आज विवाह है।
सवेरे से घर में बवंडर बना हुआ हैं। हर समय आने-जाने वालों का ताँता बँधा हुआ हैं। आँगन में बाँसों का मंडप बनाया जा रहा हैं। हरेक कमरे और बरामदे में झाड़-फानूस लटकाए जा रहे हैं और उनकी टक-टक की आवाज मेरे कमरे में आ रही हैं। 'चलो रे!', 'जल्दी करो!', 'इधर आओ!' की तो कोई गिनती ही नहीं हैं।
मैं अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत आया और अभिवादन करके ओर खड़ा हो गया।
पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न पहले जैसे लम्बे-लम्बे बाल और न चेहरे पर पहले जैसी दिव्य ज्योति ही थी। अंत में उसकी मुस्कान देखकर पहचान सका कि यह तो रहमत है।
"क्यों रहमत कब आए?" मैंने पूछा।
"कल शाम को जेल से छूटा हूँ।" उसने कहा।
सुनते ही उसके शब्द मेरे कानों में खट से बज उठे। किसी खूनी को अपनी आँखों से मैंने कभी नही देखा था। उस देखकर मेरा सारा मन एकाएक सिकुड़-सा गया! मेरी यही इच्छा होने लगी कि आज के इस शुभ दिन में वह इंसान यहाँ से टल जाए तो अच्छा हो।
मैंने उससे कहा- "आज हमारे घर में कुछ आवश्यक काम है, सो मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"
मेरी बातें सुनकर वह उसी क्षण जाने को तैयार हो गया, परन्तु द्वार के पास आकर कुछ इधर-उधर देखकर बोला, "क्या, बच्ची को तनिक नहीं देख सकता?"
शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। उसने सोचा हो कि मिनी अब भी पहले
की तरह "काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला" पुकारती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों के पहले हास-परिहास में किसी प्रकार की रुकावट न होगी। यहाँ तक कि पहले की मित्रता की याद करके वह एक पेटी अंगूर और एक कागज के दोने मं थोड़ी-सी किसमिश और बादाम, शायद अपने देश के किसी आदमी से माँग-ताँगकर लेता आया था। उसकी पहले की मैली-कुचैली झोली आज उसके पास न थी।
मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। सो किसी से भेंट न हो सकेगी।"
मेरा उत्तर सुनकर वह कुछ उदास-सा हो गया। उसी मुद्रा में उसने एक बार मेरे मुख की ओर स्थिर दृष्टि से देखा। फिर अभिवादन करके दरवाजे के बाहर निकल गया।
मेरे हृदय मे न जाने कैसी एक वेदना-सी उठी। मैं सोच ही रहा था कि उसे बुलाऊँ, इतने मे देखा कि वह स्वयं ही आ रहा हैं। वह पास आकर बोला- 'ये अंगूर और कुछ किशमिश, बादाम बच्ची के लिए लाया था, उसको दे दीजिएगा।'
मैने उसके हाथ से सामान लेकर पैसे देने चाहे, लेकिन उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा- 'आपकी बहुत मेहरबानी बाबू साहब! हमेशा याद रहेगी, पैसा रहने दीजिए।' थोड़ी देर रूककर वह फिर बोला- 'बाबू साहब! आपकी जैसी मेरी भी देश में एक बच्ची हैं। मैं उसकी याद करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ी-सी मेवा हाथ में ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।'
यह कहते हुए उसने ढीले-ढाले कुरते के अन्दर हाथ डालकर छाती के पास से एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया।
देखा कि कागज के उस टुकडे पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। फोटो नहीं, तेल चित्र नहीं, हाथ में थोडी-सी कालिख लगाकर, कागज के ऊपर उसी का निशान ले लिया गया हैं। अपनी बेटी के इस स्मृति-पत्र को छाती से लगाकर, रहमत हर वर्ष कोलकाता की गली-कूचों से सौदा बेचने के लिए आता हैं और तब वह कालिख चित्र मानो उसकी बच्ची के हाथ का कोमल स्पर्श, उसके बिछड़े हुए विशाल वक्षःस्थल में अमृत उडेलता रहता हैं।
देखकर मेरी आँखें भर आई और फिर मैं इस बात को बिल्कुल ही भूल गया कि वह एक मामूली काबुली मेवा वाला है, मैं एक उच्चवंश का रईस हूँ। फिर मुझे ऐसा लगने लगा जो वह हैं, वहीं मैं ही हूँ। वह भी एक बाप हैं और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी छोटी बच्ची की निशानी मेरी ही मिनी की याद दिलाती हैं। मैने तत्काल ही मिनी को बुलाया, हालाँकि इस पर अन्दर घर में आपत्ति की गई, परन्तु मैंने उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। विवाह के वस्त्रों और अलंकारों में लिपटी हुई बेचारी मिनी मारे लज्जा के सिकुड़ी हुई-सी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
उस अवस्था में देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में हँसते हुए बोला- 'लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?'
मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी, अतः अब उससे पहले की तरह उत्तर देते न बना। रहमत की बात सुनकर मारे लज्जा के उसके कपोल लाल-सुर्ख हो उठे। उसने मुँह फेर लिया। मुझे उस दिन की याद आई, जब रहमत के साथ मिनी का प्रथम परिचय हुआ था। मन में एक पीड़ा की लहर दौड़ गई।
मिनी के चले जाने के बाद, एक गहरी साँस लेकर रहमत फर्श पर बैठ गया। शायद उसकी समझ में यह बात एकाएक साफ हो गई कि उसकी बेटी भी इतनी ही बड़ी हो गई होगी और उसके साथ भी उसे अब फिर से नई जान-पहचान करनी पडेगी। सम्भवतः वह उसे पहले जैसी नहीं पाएगा। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? सवेरे के समय शरद की स्निग्ध सूर्य किरणों में शहनाई बजने लगी और रहमत कोलकाता की एक गली के भीतर बैठा हुआ अफगानिस्तान के मेरु-पर्वत का दृश्य देखने लगा।
मैने एक नोट निकालकर उसके हाथ में दिया और बोला- 'रहमत! तुम देश चले जाओ, अपनी लड़की के पास। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी सुख पाएगी।'
रहमत को रुपए देने के बाद विवाह के हिसाब में से मुझे उत्सव-समारोह के दो-एक अंग छाँटकर काट देने पड़े। जैसी मन में थी, वैसी रोशनी नहीं करा सका। अंग्रेजी बाजा भी नहीं आया। घर में औरतें बड़ी बिगड़ने लगी। सब कुछ हुआ, फिर भी मेरा विचार हैं कि आज एक अपूर्व ज्योत्स्ना से हमारा शुभ समारोह उज्ज्वल हो उठा।
गीतकार-प्रेम धवन, गायक-मन्ना डे, संगीतकार-सलिल चौधरी
ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन
तुझपे दिल कुर्बान, तू ही मेरी आरज़ू
तू ही मेरी आबरू, तू ही मेरी जान
माँ का दिल बन के कभी सीने से लग जाता है तू
और कभी नन्हीं सी बेटी बन के याद आता है तू
जितना याद आता है मुझको, उतना तड़पाता है तू
तुझपे दिल कुर्बान...
तेरे दामन से जो आए उन हवाओं को सलाम
चूम लूँ मैं उस ज़ुबां को जिसपे आए तेरा नाम
सबसे प्यारी सुबह तेरी, सबसे रंगीं तेरी शाम
तुझपे दिल कुर्बान...
छोड़ कर तेरी गली को दूर आ पहुंचे हैं हम
है मगर ये ही तमन्ना तेरे ज़र्रों की कसम
जिस जगह पैदा हुए थे, उस जगह ही निकले दम
तुझपे दिल कुर्बान...
हाल ही में रामदेव व अन्ना हजारे के अनशन प्रकरण के बीच कांग्रेस ने सोनिया जी के निवास पर आपातकालीन बैठक बुलाई। वहाँ पहुँचे मनमोहन, सोनिया, राहुल और दिग्विजय सिंह। हमारे संवाददाता ने उनकी बातचीत सुनी। आईये आप भी पढ़ें बैठक के अंदर का हाल।
मनमोहन सिंह: मैडम जी, राहुल बाबा व अन्य मंत्रीगण। जैसा कि आप जानते हैं कि अन्ना व रामदेव हम पर दबाव डाल रहे हैं। मैंने सोचा है कि... राहुल गाँधी (बीच में टोकते हुए): अरे रुकिये मनमोहन जी। मम्मी आप बताइये कैसे निपटा जाये इस अनशन के अंटशंट से। सोनिया जी: अभी तो कुछ समझ नहीं आ रहा है। उत्तर प्रदेश में चुनाव भी सर पर हैं। इन सबसे बचने का उपाय तो प्रियंका ही हो सकती है। राहुल: मतलब दीदी भी अनशन करेगी? सोनिया जी: अरे नहीं.. पर यदि उत्तर प्रदेश लाज बचानी है तो हम उसे चुनाव प्रचार में उतार सकते हैं। दिग्विजय सिंह: राहुल बाबा, मैडम ठीक कह रही हैं। रामदेव व अन्ना को संघ का एजेंट घोषित करा देते हैं।
तभी न जाने कहाँ से उमा भारती आ धमकती हैं। सभी एकदम आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
उमा: दिग्गी राजा.. कैसे हो....जिस तरह मध्य प्रदेश से तुम्हें हटाया था उसी तरह से उत्तर प्रदेश से भी तुम्हें साफ़ कर देंगे। मैं आ गई हूँ... दिग्विजय सिंह: अरे उमा जी.. आइये..धन्यभाग हमारे। बड़े दिनों से किसी ने हमें दिग्गी राजा नहीं कहा था। उत्तर प्रदेश हमारा है उमा जी। राहुल बाबा हमारे साथ हैं.. मनमोहन जी: हाँ उमा जी राहुल बाबा की जय हो। वैसे भी हमारी सरकार वहाँ किसानों के लिये नये नये प्रोजेक्ट के बारे में सोच रही है। वहाँ पंचायत होगी.. गाँव वालों से मिलेंगे और हम अपनी नीतियाँ लोगों तक पहुँचायेंगे.. हम... सोनिया जी: मनमोहन जीईईईईईईई... मनमोहन सिंह: सॉरी मैडम... मैं भावनाओं में बह गया था... राहुल जी: डॉक्टर साहब आप मौन रहा करिये.. बोलने का काम मेरा और मम्मी जी का है। राईट मॉम? सोनिया जी: यस बेटा! मनमोहन जी, आप तब बोला कीजिये जब मीडिया हमसे घोटालों के बारे में पूछे। बाकि समय बीच में टाँग न अड़ायें। मनमोहन सिंह (मायूस होते हुए): ओके मैडम...
उमा भारती एक नजर राहुल बाबा की ओर देखती हैं फिर वापस चला जाती हैं...
बैठक में थोड़ी देर के अंतराल के बाद.....
दिग्विजय सिंह: मैडम ओबामा ने जिस तरह से लादेन जी को मरवाया था वो मुझसे देखा नहीं गया। कोई मानवाधिकार नाम की चीज़ नहीं है क्या विश्व में? सोनिया जी: अरे दिग्विजय जी आप कौन सा विषय उठा रहे हैं? हम अन्ना पर चर्चा कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह: ओह.. हाँ.. उस घटना कि याद आते ही तन बदन में आग लग जाती है। पता नहीं कहाँ से याद आ गया सब कुछ। अब नहीं बोलूँगा। सोनिया जी (जनता से): हमारे महासचिव का बयान उनका निजी बयान समझा जाये कांग्रेस का नहीं। राहुल बाबा: एक काम करते हैं। थोड़ी माँगें मान लेते हैं.. बाकि कल पर टाल देते हैं। सोनिया जी: सही कह रहे हो बेटा। राहुल बाबा: चलो जी मीटिंग ऑवर। मनमोहन सिंह: पर मीटिंग ऑवर कैसे? अभी तो हमने कोई निर्णय लिया ही नहीं। राहुल बाबा: आपको कोई निर्णय लेना भी नहीं है। हमारे पास प्रणव मुखर्जी हैं। वे सम्भाल लेंगे। आप बस 2जी, कलमाड़ी, कनिमोझी को सम्भाले रखिये। आपका मुखौटा हमारे लिये कितना जरूरी है आप नहीं जानते। मेरा वैसे भी एक गाँव में रात गुजारने का प्लान है। दिग्विजय सिंह: सही बात है। और मैं संघ के किसी और एजेंट को ढूँढता हूँ। ये रामदेव और अन्ना का राग कब तक अलापूँगा। वैसे आप लोग कहें तो "आस्था" चैनल पर केस कर दें? सुना है कि वो चैनल बालकृष्ण का है? सोनिया जी: क्या कह रहे हैं दिग्विजय जी? करवाईये पड़ताल...बाय राहुल.. टेक केयर...
बैठक समाप्ति ओर.. लेकिन तभी... अरे ये क्या? ये कौन आ गया.. बैठक में एक बार फिर सन्नाटा...
सुषमा स्वराज नाचती हुई दाखिल हुईं...
"ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का.. इस देश का यारों....क्या कहना ये देश है दुनिया का गहना...."
और फिर वापस चली जाती हैं...
मनमोहन सिंह: ये सुषमा जी यहाँ किस मक़सद से आईं थीं। दिग्विजय सिंह: अरे हमारे राहुल बाबा की तारीफ़ों के क़सीदे पढ़ने के लिये.. उन्हें वीर जवान कहा गया है। वे ही इस देश के सच्चे जवान हैं। बाकि सब तो संघ के एजेंट.....
पर्दा गिरता है... समाप्त....
गुस्ताखियाँ हाजिर हैं आप को कैसा लगा और आप किस तरह की गुस्ताखियाँ पढ़ना पसंद करेंगे? जरूर बताइयेगा।
नोट: सुषमा स्वराज ने राजघाट पर जाने अनजाने गाना गाया हो.. नाचीं हों.. राजघाट का अपमान किया हो या नहीं...उसे भूल जाते हैं.. मनमोहन सिंह जी मौन थे मौन हैं मौन रहेंगे... तो उन्हें भूल जाते हैं। सोनिया जी कांग्रेस की ही नहीं बल्कि इस देश की मैडम हैं और राहुल गाँधी बाबा...ये आप और मैं गाँठ बाँध लेते हैं... दिग्विजय सिंह फ़ेसबुक पर डॉगविजय सिंह के नाम से मशहूर हो रहे हैं। संघ को साम्प्रदायिक बताने वाले कांग्रेस के नेताओं को इतिहास नहीं पता जब पंडित नेहरू ने सन 62-63 में संघ से उनके चीन युद्ध में सहायता करने के लिये गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने का आग्रह किया था.....शायद नेहरू गलत थे (?)
खैर ये सब भूल जाते हैं.....पर याद रखनी होगी एक बात
इस देश को दुनिया का गहना बनाना है। जो देश में हाल-फ़िलहाल हो रहा है वो इस देश के लिये आवश्यक था। यदि आप आक्रोश में हैं तो इसका सही इस्तेमाल कीजिये। मैंने कईं कमेंट पढ़े, फ़ेसबुक पर पढ़ा.. "अनशन से कुछ नहीं होना.. राजनीति है... सब बकवास है... इस देश का कभी भला नहीं होगा..."... ये सब नकरात्मक बातें हैं। ये इस देश का दुर्भाग्य कहा जायेगा कि युवाओं में नकरात्मकता का इस कदर प्रभाव है।
परन्तु इन सब के बीच एक और गीत मेरे जहन में अनायास ही आ जाता है...और मन शांत हो जाता है...
हम होंगे कामयाब... हम होंगे कामयाब....हम होंगे कामयाब एक दिन... हो हो मन में है विश्वास..पूरा है विश्वास.....हम होंगे कामयाब एक दिन...
"हिन्दी चीनी भाई भाई"- यही नारा दिया था उस पंचशील योजना के दौरान जब पंडित जवाहर लाल नेहरू चीन यात्रा पर गये थे। उसके कुछ समय पश्चात ही चीन ने हम पर हमला कर दिया और 1962 का वो युद्ध हम हार गये। वो बीता हुआ समय था पर सवाल ये है कि क्या अब बदले हुए वक्त में जब भारत भी सशक्त हो चुका है और विश्व में अपनी पहचान बना चुका है तब चीन और भारत के पड़ोसी रिश्ते वैसे ही हैं जैसे 1962 में थे अथवा नहीं? क्या चीन की सोच भारत के लिये बदली है?
पिछले दिनों धूप-छाँव पर लेख छपा था जिसमें चीन के एक विश्वविद्यालय में चल रहे संस्कृत प्रोग्राम का जिक्र था। उस के शीर्षक में मैंने चीन को "शत्रु" कह दिया था। लेकिन कुछ मित्रों ने यह प्रश्न उठाया कि क्या चीन को शत्रु मानना गलत है? क्रमबद्ध तरीके से बात करते हैं। हर बात का प्रमाण देने का प्रयास रहेगा।
चीन द्वारा माओवादियों की सहायता
गौरतलब है कि चीन नेपाल के रास्ते भारत में माओवादियों को हथियार मुहैया करा रहा है। उसका इरादा पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ से होते हुए उड़ीसा तक सभी माओवादियों व नक्सलियों हथियार पहुँचाना। और माओवादी देश के आंतरिक हालात किस तरह से बिगाड़ रहे हैं ये सभी जानते हैं।
कुछ खबरें जो विभिन्न साईट से ली गई हैं। चैनल 7 " बहराइच के रूपईडिहा में पिछले दिसम्बर में तीन चीनी नागरिकों को सशस्त्र सीमा बल के चौकी की तस्वीर उतारते गिरफ्तार किया गया था। तीनों बिना पासपोर्ट और वीजा के भारत आए थे। उनमें से एक के पास भारतीय स्थायी खाता संख्या (पैन कार्ड) भी मिला था। तीनों अभी बहराइच जेल में बंद हैं।"
"नेपाल में भारत की मदद से चलने वाली परियोजनाओं में माओवादियों द्वारा अड़ंगा डालने की एक और घटना सामने आई है। वहीं माओवादी पड़ोसी चीन से अपनी नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। खबर है कि विपक्षी माओवादी पार्टी दक्षिण नेपाल में रेलवे परियोजना पर सर्वे के काम में रुकावटें पैदा कर रही है। जबकि माओवादी नेता प्रचंड एक बार फिर चीन के लिए रवाना हो रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने बारदीबास बाजार में सर्वे के दौरान गाड़े गए खंभे भी उखाड़ दिए हैं। इससे पहले माओवादियों ने नेपाल में भारत की मदद से तैयार होने वाली दर्जनों पनबिजली परियोजनाओं को भी ठप करने की धमकी दी थी। इनका कहना है कि ये परियोजनाएं देशहित के खिलाफ हैं।"
वेबदुनिया "केन्द्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि माओवादियों को चीन से हथियार हासिल हो रहे हैं, चीन की सरकार से नहीं। माओवादियों से निपटने में उड़ीसा सरकार की तैयारी की समीक्षा करने के बाद पिल्लई ने स्पष्ट किया कि मैंने माओवादियों को चीनी सरकार से हथियार मिलने की बात कभी नहीं कही। उन्हें चीन से असलहे हासिल हो रहे हैं, चीन की सरकार से नहीं।हथियारों के अवैध कारोबार को दुनिया का बड़ा व्यवसाय करार देते हुए उन्होंने कहा कि माओवादियों को चीन, म्याँमार और बांग्लादेश जैसे मुल्कों से हथियार हासिल हो रहे हैं। "
चीन ने म्यांमार की सहायता से कोको टापू पर नौसेना का अड्डा बनाया है। ये जगह भारत से नज़दीक है और यहाँ चीन ने हथियार भी रखने शुरु कर दिये हैं। म्यांमार की नौसेना भी चीन का साथ दे रही है उसके बदले में चीन वहाँ की व्यवस्था को सुधार रहा है।
दूसरी खबर बांग्लादेश से है। यहाँ चटगाँव में चीन ने बंगाल की खाड़ी में अपना नौसेना अड्डा बनाया है।
चीन का लिट्टे के विरुद्ध श्रीलंका की मदद करना और वहाँ सैन्य अड्डा खोलना
श्रीलंका के हम्बंतोता में चीन ने पूरी तरह से कमर्श्यल बंदरगाह बनाया है और वहाँ पर अपना सैन्य अड्डा भी खोल दिया है। इसके लिये लिट्टे के विरुद्ध चीन ने लंका की सहायता करी। इस बंदरगाह के लिये चीन ने एक बिलियन डालर खर्च किय हैं। एक बिलियन डालर!!
स्रोत: पाकिस्तान व श्रीलंका की साईट
चीन का पाकिस्तान में नौसेना अड्डा और परमाणु शक्ति बनाना
हाल ही में पाकिस्तान के नौसेना अड्डे पर अलकायदा का हमला हुआ। पाकिस्तान ने भी काफ़ी समय से लम्बित अपने निर्णय पर सहमति जता दी है और चीन की मदद से एक नौसेना अड्डा खोलने को कह दिया है। ओसामा के मरने के बाद एक चीन ही था जो खुले तौर पर पाकिस्तान के साथ आया। चीन पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करता आया है ये बात भी किसी से नहीं छिपी है। और तो और पाकिस्तान को परमाणु शक्ति बनाने में चीन का ही हाथ है। काराकोरम की घाटियों में भी चीन सैन्य कार्रवाही करता आ रहा है।
बंगाल की खाड़ी हो या अरब सागर या फिर हिन्द महासागर। तीनों ओर से चीन भारत को घेर चुका है। पाकिस्तान, लंका, नेपाल, बंग्लादेश म्यांमार-सभी पड़ोसी देश चीन के साथ हैं। रही सही कसर चीन स्वयं कभी सिक्किम व अरूणाचल प्रदेश तो कभी कश्मीर में घुसपैठ कर पूरी कर देता है। इन सभी राज्यों में उसने जमीन हड़प रखी है ये भी सभी को ज्ञात है। इन सब बातों के बाद इसमें कोई दोराय नहीं है कि आज चीन पाकिस्तान से भी बड़ा शत्रु है। हमने ६२ के बाद भी कोई सीख नहीं ली। न हम खुल कर चीन के सामने आ पाते हैं। तिब्बत के लोग भारत से मदद की गुहार लगाते रहते हैं पर हम चुप रहते हैं।
चीन शत्रु है इसमें कोई संशय नहीं परन्तु यदि हम आँख मूँद कर बैठे रहे और अनजान बनकर चीन को अपना मददगार समझते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब ड्रैगन भारतीय बाघ को चारों तरफ़ दबा कर उसकी साँस रोक देगा और निगल जायेगा।
ये शे’र शायद अमीर खुसरो ने कहा है। "अतुल्य भारत" श्रृंख्ला का प्रारम्भ कश्मीर से करने की इच्छा हुई। इस श्रृंख्ला में हर राज्य के उन स्थानों के बारे में बताने की कोशिश रहेगी जिन्हें बढ़ावा देकर हम पर्यटन के क्षेत्र में विकास कर सकते हैं। ये स्थान हमारी धरोहर हैं व इन्हें संजो कर रखना हमारा कर्त्तव्य है। हमारा भविष्य इन्हें देख सके इसके लिये वर्तमान को आगे आकर इसकी रक्षा करनी होगी।
आज हम बात करेंगे जम्मू व कश्मीर की। भारत के उत्तर में स्थित यह राज्य ब्रिटिश काल से आजाद तो हुआ पर स्वतंत्र अभी तक नहीं हो पाया है। जम्मू, कश्मीर व लद्दाख हिस्से बँटा यह राज्य न जाने कितने हिस्सों में और बँटा हुआ है। पर हम बात करेंगे पर्यटन की। इस राज्य की ग्रीष्म ऋतु की राजधानी है श्रीनगर व बाकि समय जम्मू है। जम्मू की बात करें तो यहाँ पर पौराणिक मम्दिर, मस्जिद भी हैं तो किले व बाग-बगीचे भी। जम्मू-कश्मीर में वैष्णौ देवी, रघुनाथ मंदिर व अमरनाथ गुफ़ा वो तीर्थ धाम हैं जहाँ हर हिन्दू जाने की इच्छा रखता हैं। जम्मू के ऐतिहासिक किले इस्लामिक और हिन्दू वास्तुकला को दर्शाते हैं।
कश्मीर की बात करें तो यहाँ डल झील, श्रीनगर, गुलमर्ग व मुगल गार्डन पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण व दर्शनीय स्थल हैं। आजकल तो लद्दाख व लेह पर्यटकों के लिये लिस्ट में सबसे ऊपर पहुँच चुके हैं।
क्या आप जानते हैं कि कश्मीर की सुप्रसिद्ध डल झील 15.5 किमी लम्बी है? इस झील के आसपास मुग़ल गार्डन, शालीमार बाग व निशात बाग जैसे खूबसूरत बाग इस झील की शोभा बढ़ाते हैं। ये कश्मीर की दूसरी बड़ी झील है। पर्यटकों के द्वारा झील को गंदा करने की वजह से पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। इस झील को दोबार जिंदा करने के लिये भारत सरकार ने राज्य सरकार को 1100 करोड़ रूपये दिये हैं। झील में चलते शिकारों से सुंदरता में चार-चाँद लग जाते हैं। मछली के कारोबार में डल झील महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सर्दियों में इसका तापमान -11 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।
डल झील का जिक्र संस्कृत के पुराने ग्रंथों में भी किया गया है। कहते हैं कि झील के पूर्व में दुर्गा का निवास था। चाहें मुगल हों, ब्रिटिश या दुर्रानी-हर काल में डल झील राजा-महाराजाओं अथवा अंगेजों की पसंदीदा जगह बनी रही। 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के पश्चात यहाँ पश्तून जनजाति आई। फिर दुर्रानी ने दशकों तक राज किया और उसके बाद आये राजा रणजीत सिंह।
डल झील श्रीनगर के दिल में बसी हुई है और सड़क व हवाई रास्तों से जुड़ी हुई है। हवाई अड्डा बड़गाम में है जो यहाँ से सात किमी दूर है। सबसे नज़दीक रेलवे स्टेशन जम्मू में है और करीबन 300 किमी दूर है।
जम्मू कश्मीर का तीसरा हिस्सा है लद्दाख। लेह जिसे लद्दाख की राजधानी माना जाता है भारत का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। जानकारी के लिये बता दें कि गुजरात का कच्छ भारत का सबसे बड़ा जिला है।
यदि आपने ध्यान से पढ़ा हो तो मैंने डल झील को राज्य की दूसरी बड़ी झील बताया। तो फिर राज्य की सबसे बड़ी झील कौन सी है? जी हाँ डल झील से बड़ी झील है वूलर लेक- ये झील राज्य की नहीं, हिन्दुस्तान की नहीं बल्कि एशिया की सबसे बड़ी साफ़ पानी की झील है। इस झील में झेलम नदी का पानी बहता है और यह 189 वर्ग किमी (sq.km.) तक फ़ैली है। डल से करीबन दस गुना बड़ी झील!! झील में एक टापू है जो ज़ैन-उल-अबिदिन नाम के राजा ने 15वीं शताब्दी में बनवाया था।
कश्मीर के लोग ही कश्मीर को आतंक से आज़ाद करवा सकते हैं।खौफ़ से आज़ादी-आतंक से आज़ादी। कश्मीर मैंने तो नहीं देखा पर हर हिन्दुस्तानी का पसंदीदा राज्य जिस दौर से गुजर रहा है उसके लिये पर्यटन ही उबरने का एकमात्र सहारा है।
भूले बिसरे गीत के पहले अंक में प्यासा फ़िल्म के गीतों को सुना। आज के अंक में चार गीत ले कर आया हूँ एक बार फिर श्वेत-श्याम युग से। ये गीत आज भी नये से लगते हैं और इसलिये शायद इन्हें सदाबहार गीतों का दर्जा दिया गया है। रेड एफ़.एम को यदि छोड़ दें (क्योंकि ये बाप के जमाने के गाने नहीं सुनाते) तो तकरीबन सभी एफ़.एम वाले पुराने गीतों का एपिसोड जरूर सुनाते हैं।
क्योंकि गीत को मशहूर और सदाबहार बनाने में इसके पीछे के कलाकार यानि गायक, गीतकार व संगीत कार का भी पूरा योगदान होता है इसलिये हर गीत के साथ इसको मशहूर बनाने वाले पर्दे के पीछे की उन महान हस्तियों के भी नाम दिये गये हैं।
गीत १. मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।
इस गीत के बोलों को यदि आत्मसात कर लिया जाये तो जीने की कला आ जाये!!!
फ़िल्म : हम दोनों (1961)
गायक : मो. रफ़ी
संगीत: जयदेव
गीतकार: साहिर लुधियानवी
गीत २. ये मेरा दीवानापन है
फ़िल्म : यहूदी (1958) गायक : मुकेश संगीत: शंकर, जयकिशन गीतकार: शहरयार कलाकार: दिलीप कुमार, मीना कुमारी
गीत ३. तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी
गायक: मुकेश
संगीत: रोशन
गीतकार: साहिर लुधियानवी
फ़िल्म : दिल ही तो है।
गीत ४. किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार...
मुकेश की आवाज़ का जादू सर चढ़ कर बोलता है। और ये गीत दिल के अंदर तक छू कर जीना सिखा जाता है!!!
फ़िल्म: अनाड़ी गीतकार: शैलेंद्र संगीत: शंकर जयकिशन गायक: मुकेश
आने वाले अंकों में श्वेत - श्याम युग जारी रहेगा और एक बार फिर लेकर आयेंगे सदाबहार गीत (दादाजी के जमाने से)। कुछ तो बात थी उन गीतों में... आपका क्या ख्याल है?
क्या आप जानते हैं पर्यटन हमारे देश भारत का सबसे बड़ा सेवा उद्योग (Service Industry) है? भारत की जीडीपी का 6.23 प्रतिशत इसी क्षेत्र से आता है और रोजगार में इसका हिस्सा करीबन नौ प्रतिशत है। भारत में प्रतिवर्ष 50 लाख विदेशी सैलानी आअते हैं। विदेशियों में अमरीका और ब्रिट्घेन से सबसे ज्यादा लोग आते हैं। आँकड़ें बताते हैं कि देसी सैलानियों की तादाद 56 करोड़ के करीब है!! आगे आँकड़ें सुनकर चौंकियेगा नहीं। 2008 में हमने केवल पर्यटन से ही 100 अरब अमरीकी डॉलर का कारोबार किया था जो 2018 तक तीन सौ अरब अमरीकी डॉलर हो जाने का अनुमान है।
आँकड़ों से एक बात स्पष्ट रूप से उभरती है कि हम यदि चाहें तो हमारे देश में इतने पर्यटन स्थल हैं कि अरबों खरबों की कमाई हो सकती है व रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है। इस देश में विदेशियों के साथ दुर्व्यवहार होता है फिर भी इनकी संख्या में कमी नहीं आई है। इसके पीछे कारण है हमारे देश का गौरवशाली इतिहास, ऐतिहासिक किले व स्मारकें इत्यादि। यदि हम ऐतिहासिक स्थलों को सम्भाल नहीं पाये तो इनकी संख्या जरूर घटेगी। आज से करीबन चार वर्ष पूर्व धूप-छाँव पर आमेर के किले के बारे में लिखा था। उस किले की दशा देख कर यही लगा कि वो अपनी अंतिम साँसें ले रहा हो।
भारत में इतने पर्यटन स्थल हैं, इतनी खूबसूरत स्थान व ऐतिहासिक स्थल हैं कि हमें स्वयं भी नहीं पता। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात-राजस्थान से पूर्वोत्तर की सुंदरता अतुल्य है। शायद इसलिये भारत-सरकार भी "अतुल्य भारत" का प्रचार कर रही है। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली व उत्तर-प्रदेश में सबसे अधिक विदेशी आते हैं वहीं देशी पर्यटकों के लिये आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश व तमिलनाडु पसंदीदी राज्य हैं।
कुछ और आँकड़े आप तक पहुँचाना चाहूँगा। ताजमहल को देखने के लिये 30 लाख पर्यटक हर साल आते हैं। तमिलनाडु में हैं 34000 मंदिर।आने वाले अंकों में धूप-छाँव पर आप जान सकेंगे राज्यवार पर्यटक स्थल। प्रत्येक राज्य में कौन सी जगह हैं जिन्हें आप देखने के लिये जा सकते हैं। आप काज़ीरंगा अभयारण्य, बौद्धगया का महाबोद्धी मंदिर, हम्पी के स्मारक व अजंता-एलोरा समेत अनेको अनेक स्मारक व स्थलों के बारे में जानेंगे।
दिल्ली का लाल किला अब सफ़ेद रंग में रंगा जा रहा है। पुरातत्व विभाग कहता है कि लाल किला का रंग शुरु से लाल नहीं रहा इसलिये ऐसा किया जा रहा है।
दिल्ली का लाल किला
अगले अंक में हम जम्मू-कश्मीर से अपनी यात्रा शुरु करेंगे। आपको ये प्रयास कैसा लगा कृपया अवश्य बतायें।
आज तक आपने चीन की हरक़तों के बारे में सुना होगा। कराची में पाकिस्तान की सहायता से, बंगाल की खाड़ी में बंग्लादेश से मदद और भारतीय महासागर में श्रीलंका , तीनों दिशाओं से भारत के ऊपर नज़र रखे हुए है। अरूणाचल प्रदेश व कश्मीर में घुसपैठ जारी है। फिर भी भारत सरकार सोई हुई है। पता नहीं किस बात से डरते हैं हम? पर आज मैं आपको जो बताने जा रहा हूँ वो सुनकर आप भी उसी तरह से हैरान हो जायेंगे जिस तरह से मैं हो गया था।
जिस भाषा की कद्र उसके अपने देश में नहीं होती वो भाषा हमारे पड़ोसी शत्रु देश में शोभायमान हो रही है। जिस भाषा को एक सम्प्रदाय की भाषा मान कर हमारी सरकार केवल वोट बैंक की खातिर नजरअंदाज़ करती रही है वही भाषा चीन में अध्ययन का विषय बनी हुई है। मैं बात कर रहा हूँ हमारी मातृभाषा हिन्दी से भी अधिक उपेक्षित भाषा व हिन्दी की जननी संस्कृत की। जी हाँ इस देश की सबसे पुरानी भाषा संस्कृत जिसे आज हिन्दुओं की भाषा माना जाता है।
आजकल भारत में छठी कक्षा से ही अपनी भाषा चुनने की स्वतंत्रता मिल जाती है। बच्चे जर्मन, फ़्रैंच व स्पेनिश जैसी भाषाओं को संस्कृत से ऊपर मानते हुए चुनते हैं क्योंकि ये भाषायें आगे चलकर नौकरी दिलवाने में मदद करती हैं। यानि वो भाषा जिसे इस देश की राष्ट्रभाषा बनना चाहिये था वो राजनीति व जटिल पाठ्यक्रम के कारण हाशिये पर जाती जा रही है।
चलिये भारत की बात छोड़ते हैं और चीन की बात करता हूँ। चीन के पीकिंग विश्वविद्यालय की बात करें तो वहाँ पर संस्कृत विषय पर 1960 से अध्ययन व लोगों को संस्कृत सिखाने का कार्यचल रहा है। इसे जी ज़ानलिन की छत्रछाया में देश में प्रसिद्धि मिली। करीबन 2000 वर्ष पूर्व बौद्ध गुरुओं के माध्यम से संस्कृत चीन तक पहुँची। यहाँ 60 विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते हैं व कईं पुस्तकों का संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद भी करते हैं। यहाँ के विद्यार्थियों में जबर्दस्त लगन है और सटीक उच्चारण सीखने की इच्छा भी है।
नई दिल्ली से चीनी विश्वविद्यालय पढ़ाने के लिये गये संस्कृत विद्वान सत्यव्रत शास्त्री जी ने बताया कि तिब्बत में बहुत सी हस्तलिखित पुस्तकें हैं जो संस्कृत से तिब्बती व चीनी भाषा में अनूदित है किन्तु संस्कृत में मिलनी दुर्लभ है। वे कहते हैं कि अब वक्त आ गया है कि हम इस भाषा की कद्र करें व इसको पहचानें। वे आगे बताते हैं कि चीनी विद्यार्थी बहुत तेज़ी से इस भाषा को सीख रहे हैं। ये विद्यार्थी पी.एच.डी कर रहे हैं। ये लोग भगवद गीता और कालिदास की कुमारसम्भव में अध्ययन कर रहे हैं।
आपको यदि यकीन न हो तो आप अंग्रेज़ी दैनिक "हिन्दू" के इस लिंक पर जा कर इसके बारे में अधिक जान सकते हैं।
ये बात दुखी करती है कि जिस देश में वैदिक शिक्षा व संस्कृत अनिवार्य करनी चाहिये उस देश की आज की कथित "युवा" पीढ़ी को इन दोनों के बारे में ही ज्ञान नहीं है। कोई राज्य वैदिक शिक्षा शुरु करते भी हैं तो स्वयं को "धर्मनिरपेक्ष" कहने वाली कुछ पार्टियाँ टाँग अड़ाने से बाज नहीं आती हैं। ये वोट-बैंक की राजनीति हमारे देश को विपरीत दिशा में ले जा रही है। समय आ गया है संस्कृत के पाठ्यक्रम में सुधार करने का जिससे बच्चों में इसके प्रति दिलचस्पी बढ़े व इस भाषा को उचित सम्मान मिल सके। क्या ऐसे मिल सकेगा इसे सम्मान? आज पहली बार मैं चीन के साथ खड़ा हो रहा हूँ। घर की भाषा को घर में इज़्ज़त नहीं मिल रही और शत्रु देश उसे पूज रहा है। अचम्भा!!! हैरानी!!! दु:ख!!! खुशी!!! सब कुछ है इस खबर में....
मेरे पिछले लेख में मैंने आज के गानों को जमकर कोसा। बहुत बुरा-भला कहा। किन्तु वो कोसना अकारण नहीं था। धूप-छाँव पर आज से भूले-बिसरे गीत लेकर एक नईं श्रृंख्ला लेकर आ रहा हूँ। जो पाठक पुराने गीतों के शौकीन हैं उनकी यादें तो ताज़ा होंगी ही परन्तु जो उन्हें नहीं भी सुनते मेरा प्रयास रहेगा कि वे भी पुराने गानों के मुरीद बन जायें। हर अंक में किसी एक फ़िल्म के गीतों को लेकर आऊँगा।
आज की फ़िल्म है- प्यासा। चूँकि ये मेरी सबसे पसंदीदा फ़िल्मों में से एक है इसलिये इस फ़िल्म के गीतों की तरफ़ मेरा झुकाव लाज़मी है।
गीत १. जिन्हें नाज़ है हिन्द पे वो कहाँ हैं? इस अंक का पहला गीत वो है जिस गीत में इतनी सच्चाई थी जिसे सुनने के बाद सरकार ने रोक लगा दी थी...
गीत २. ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है...
इस दुनिया में इतना दर्द छुपा हुआ है जिसे बखान करना नामुमकिन है, किन्तु इस गीत के जरिये वो संवेदना दिलों तक पहुँचती है जब एक कलाकार अपनी कला को किसी दूसरे के नाम पर "बिकते" हुए देखता है।
गीत ३. जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला..
एक बार फिर.. दर्द... इस बार एक प्रेमी के नज़र से दर्द के एक अलग रूप देखने को मिलता है।
गीत ४. जाने क्या तूने कही.. जाने क्या मैंने सुनी..
वहीदा रहमान जब गुरुदत्त को अपनी ओर बुलाती हैं तब...
गीत ५. सर जो तेरा चकराये...
आज के मस्ती वाले गीत सुनें और इसको सुनिये। इस गाने को सुनने के बाद सिर का दर्द सही में गायब हो जायेगा। जॉनी वॉकर की मस्ती व एक्टिंग को सलाम...
और अंत में, गीत ६. तंग आ चुके हैं गम-ए-ज़िन्दगी से हम.. इस गीत की खासियत यह है कि इस गीत में संगीत नहीं है!!! रफ़ी के प्रशंसक कहते हैं कि जब मोहम्मद रफ़ी गाते हैं तो संगीत की ज़रूरत ही क्या है।
आशा करता हूँ कि इस श्रृंख्ला का यह पहला अंक आपको पसंद आ या होगा। हालाँकि अभी मुझे नहीं पता कि कितने और अंक मैं धूप-छाँव पर आपके लिये ला सकूँगा।
फ़िल्मों के बीच राजनैतिक/सामाजिक लेख जारी रहेंगे। कोशिश यही रहेगी कि आपका मनोरंजन कर सकूँ और नई जानकारी आप तक पहुँचाऊँ।
मैं कोई चुनावी विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिये छोटी सी पोस्ट ही लिख पाया पर हाल-ए-राजनीति इससे बयां हो ही जायेगी।
इस बार के विधानसभा चुनावों के परिणाम दो सबसे बड़ी पार्टियों कांग्रेस और भाजपा के लिये अच्छे नहीं रहे पर बाजी मरी है छोटे राजनैतिक दलों ने।
यदि आप कांग्रेस की केरल और बंगाल में हूई जीतों का आकलन करें तो पायेंगे कि केरल में कांग्रेस ने 82 में से महज 38 सीटें जीतीं। वो तो भला हो मुस्लिम लीग का जिसे 24 में से 20 सीट प्राप्त हुईं। वैसे तो मुस्लिम लीग भी साम्प्रदायिक पार्टी है पर फिर भी कांग्रेस को एक ही पार्टी साम्प्रदायिक नजर आती है। केरल में वैसे भी हर बार सत्ता पलटती है फिर भी यूपीए बड़ी कशमकश के बाद महज 2 सीटें ही आम बहुमत से अधिक ले पाई। बंगाल में भी तॄणमूल कांग्रेस के तिनके के सहारे ही सत्ता तक कांग्रेस पहुँच पाई। तमिलनाडु में दहाई के आँकड़े तक भी न पहुँच पाने के बाद पुड्डुचेरी में भी बुरी तरह हारी।
केवल एक असम ऐसा प्रदेश रहा जहाँ गोगोई के कार्यकाल को सराहा गया जिसके बलबूते एक अपनी चिपक्षी पार्टियों को एक अच्छे अंतर से हराने में कामयाब हुई। यदि प्रमुख विपक्षी दलों असम गण परिषद और भाजपा एकजुट होतीं तो कुछ टक्कर दे सकतीं थीं।
अब यदि बात करें भाजपा की तो केरल बंगाल और तमिलनाडु में वो पहले ही शून्य पर थीं। बंगाल में एक आध सीट भी उसके लिये काफ़ी है। बाकि राज्यों में भी वोट प्रतिशत बढ़ा है जो इसके लिये अच्छा माना जा सकता है। पर असम में अगप से तालमेल न बैठाने का खामियाज़ा भाजपा को भुगतना पड़ा जो पहले से भी कम सीटें हासिल कर पाई।
अब इस देश में पाँच ताकतवर महिलायें हो गईं हैं। एक आँटी हैं, एक अम्मा, एक बहन जी, एक दीदी और एक इन सब की मैडम!! देखना है कि नारी शक्ति इस देश में क्या गुल खिलाती है। आँटी के काम काज को अब सराहा नहीं जाता। न हीं अब कुछ खास रहा है। बहन जी और अम्मा करप्शन के सागर में पहले ही डुबकी लगा चुकी हैं। पाठक भूल गये हों तो याद दिला दिया जाये कि उनके पास से साड़ियाँ और सैंडल बरामद हो चुके हैं। दीदी बंगाल की कंगाली को दूर करने में कामयाब होंगी या नहीं ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा पर दीदी और अम्मा केंद्र की राजनीति पर असर जरूर डालेंगी क्योंकि इन दोनों पार्टियों से आने वाले राज्य सभा के सांसदों की संख्या भी 8-10 तक बढ़ सकती हैं।
धूप-छाँव पर पहले भी एक लेख छप चुका है जिसमें "गाँव और गाली" को एक समान कहा गया था। फ़िल्मों में गालियों का चलन बढ़ता जा रहा है। कुछ लोग इसको सही मानते हैं और कहते हैं कि इससे सब कुछ "असली" लगता है। चूँकि हम लोग गाली देते हैं और फ़िल्में तो समाज का आईना होती हैं इसलिये इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। फिर भी सेंसर बोर्ड इन फ़िल्मों को "ए" सर्टोफ़िकेट दे कर पास कर देता है। पिछले कुछ वर्षों से ऐसी फ़िल्में आने लगी हैं जिन्हें "डबल मीनिंग" की कैटेगरी में रखा जाता है।
मेरी बात से अधिकतर पाठक सहमत होंगे कि पुरानी फ़िल्मों के गानों में आज के मुकाबले शब्दों पर बड़ा जोर दिया जाता था। पहले जहाँ शब्दों के मतलब को ध्यान में रखकर गाना लिखा जाता था वहीं आज संगीत को तरजीह दी जाने लगी है। शब्द चाहें अंग्रेज़ी के हों, हिन्दी पंजाबी अरबी अथवा कोई ऐसी भाषा जो समझ से परे हो जाये पर संगीत "सॉलिड" होना चाहिये। आजकल फ़टाफ़ट गीत संगीत का जमाना है। मैं संगीत का कोई ज्ञानी नहीं हूँ लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि "फ़ास्ट फ़ूड" की भाँति ही "फ़ास्ट संगीत", संगीत की आत्मा की हत्या अवश्य कर रहा है। हाल ही में जगजीत सिंह को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा कि ग़ज़ल को आज के दौर में कोई नहीं पूछता। ऐसा लगता है कि आजकल गीत केवल तुकबंदी पर ही चल रहे हैं। आप "चार बज गये पार्टी अब भी बाकि है..." जैसे आज के सुपरहिट गाना उठा लीजिये। तुकबंदी के अलावा कुछ नहीं है।
बात करते हैं फ़िल्मों की। पहले की फ़िल्में पूरा परिवार साथ बैठ कर देखा करता था। धीरे धीरे ऐसी फ़िल्में बननी कम हो गईं। और आज ये आलम है कि हमें सोचना पड़ता है कि आखिरी बार पूरा परिवार कौन सी फ़िल्म देखने साथ गया था? फ़िल्मों में संवादों में गाली के बाद उनके नामों में गाली डाल दी गई। ज़िन्दगी को "साली" बना दिया गया। कुछ गालियाँ इतनी आम हो गई हैं कि ऐसा लगने लगा है कि यदि ये न होती तो हम बोलना ही न सीख पाते।
खैर, फ़िल्मों के बाद कमोबेश यही हाल गानों का होता प्रतीत हो रहा है। कुछ गाने ऐसे बनने लगे जो सुनने में तो अच्छे लगते हों पर उन्हें आप परिवार के साथ देख नहीं सकते। पर आज जो हाल में चलन है उसको देखते हुए ऐसा लगने लगा है कि अब गाने सुन भी नहीं सकते।
हालाँकि किसी को भी साला-साली बनाने की शुरुआत 1974 की फ़िल्म "सगिना" में हो गई थी जब दिलीप कुमार "साला मैं तो साहब बन गया" गाते हैं। उसके बाद जहाँ तक मुझे याद है फ़िल्म "रंगीला" में क्या करें क्या न करें... गाने में इसी शब्द का प्रयोग हुआ है और फिर फ़िल्म "जोश" में भी शाहरुख इसी शब्द को गाते दिखाई पड़े। वैसे कुछ लोग इसे गाली नहीं मानते। फिर "रंग दे बसन्ती" के एक गाने में भी यही शब्द इस्तेमाल हुआ। आप ही बताइये "Character Dheela" गाने में "साला" लगाने कि क्या तुक बनती है? हाल ही में आये "दम मारो दम" फ़िल्म के शीर्षक गीत को ही ले लीजिये। जयदीप साहनी ने क्या सोच कर इसके गीत लिखे ये तो वे ही बतायें। आज भी असली "दम मारो दम" और आज के गीत की तुलना कर के देख लीजिये। चाहें गीत हो अथवा संगीत।
आने वाली पीढ़ी स्वच्छ संगीत के दर्शन कर भी सकेगी अथवा नहीं ये कहना कठिन है। पर जो मिलावट आज परोसी जा रही है और रियालिटी शो के जरिये जो गायक बनाये जा रहे हैं उससे संगीत की राह दुर्गम अवश्य लग रही है।
सर्वप्रथम आपकी सरकार को बधाई देता हूँ कि आप की यूपीए सरकार को तीन बरस होने वाले है। परन्तु शायद आप भी इस बात से सहमत होंगे कि इस बार प्रधानमंत्री की कुर्सी आपके लिये काँटों भरा ताज रहा है। आज मेरे पत्र लिखने का खास कारण है।
दोरजी खांडू को आप जानते ही होंगे। वे सेना में कार्यरत रहे और 71 के युद्ध के पश्चात उन्हें गोल्ड मैडल से भी नवाज़ा गया। वे बाद में चार बार जनता द्वारा चुने भी गये। बाद में अरूणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। मुख्यमंत्री रहते हुए हैलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी असमय मृत्यु हो गई। पर ये मृत्यु कईं प्रश्न खड़े कर गई है। पिछले दो वर्षों में कईं बार हैलीकॉप्टर दुर्घटनायें हुई हैं। जिनमें से दो बार तो इस देश के दो मुख्यमंत्री मारे गये हैं। गोल्ड मैडल विजेता सैनिक अधिकारी की इस तरह हुई हत्या होगी यह उन्होंने भी नहीं सोचा होगा। हम पूरी दुनिया पर राज करने की बात करते आये हैं। इसरो एक के बाद एक सैटेलाईट अंतरिक्ष में भेज रहा है। वैज्ञानिक और सेना दोनों के पास ही यदि आधुनिक तकनीकें हैं तो मुख्यमंत्री को ढूँढने में चार दिन से ऊपर का समय कैसे लग जाता है? कहीं न कहीं तो गुंजाईश अवश्य है।
दोरजी खांडू की मृत्यु होती है और आपके मंत्री उनकी मृत्यु की पुष्टि होने से पहले ही दु:ख संदेश मीडिया को दे देते हैं। पुष्टि से पहले!!! यी हैं आपकी सरकार के विदेश मंत्री श्री एस.एम. कृष्णा जी। आपका ध्यान मैं मीडिया की ओर भी ले जाना चाहता हूँ। हमारी मीडिया के द्वारा जिस तरह से उत्तर-पूर्व क्षेत्र को नजर अंदाज़ किया जा रहा है वो आप तक पहुँचाना जरूरी महसूस कर रहा हूँ। श्री खांडू की मौत हुई पर हमारा मीडिया ओसामा और ओबामा के नामों को गुनगुना रहा था। ओबामा उनके लिये भगवान बना हुआ है। इतनी बार तो शायद आपका नाम भी न लिया हो। सुबह अखबार टटोले तो पहले पन्ने पर कही पर बड़ी तो कहीं पर छोटी खबर दिखाई दी। खैर इन सब के बीच एक समाचार पत्र ऐसा भी रहा जिसने श्री खांडू के निधन का कोई समाचार नहीं छापा!!! कम से कम पहले पन्ने पर तो नहीं।
दूसरी ओर हमारा नम्बर एक दुश्मन चीन उत्तर-पूर्व राज्यों में अपनी पैठ जमाने की पुरजोर कोशिश कर रहा है। परन्तु आपकी सरकार उसे भी नजर-अंदाज़ कर रही है। किस बात का खौफ़ है आपको? क्या आप चीन से डरते हैं? अमरीका द्वारा ओसामा को मारे जाने के पश्चात आपकी सेना के अधिकारी छाती ठोंक कर कह रहे थे कि हम भी ऐसा कर सकते हैं। पर क्या आपकी सरकार में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसने की हिम्मत है? जो चीन ओसामा के पाकिस्तान में मारे जाने के बाद भी पाकिस्तान का साथ दे रहा है उस चीन को माकूल जवाब देने में क्या आपकी सरकार समर्थ है?
आपके पास जब टू-जी आदि घोटालों से समय मिल जाये तो कृपया उत्तर-पूर्व के लोगों पर भी नजर डालियेगा। कहीं ऐसा न हो कि आने वाला वक्त भारत को बाईस राज्यों से जाने।
आज मातृ दिवस है। भारत माता के लिये आपसे निवेदन है कि हर राज्य को इस एक देश की माला में पिरोये रखें। आप सभी पाठकों से निवेदन है कि हम लोग ही पूर्वोत्तर के लोगों को पराया समझते हैं तो सरकार से कैसे हम कुछ आशा कैसे कर सकते हैं? "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरीयसी" : जननी और मातृभूमि दोनों स्वर्ग से भी महान हैं।
कहते हैं कि तम्बाकू सेहत के लिये हानिकारक है। इसलिये सरकार इसका उत्पादन तो नहीं रोकती, पर इस से बनने वाले पदार्थों जैसे सिगरेट आदि के पैकेट पर एक चेतावनी अवश्य छपवा देती है। तम्बाकू न सिर्फ़ सिगरेट पीने वाले बल्कि उस व्यक्ति के आसपास खड़े हुए लोगों के फ़ेफ़ड़ों तक भी पहुँचता है। तम्बाकू की खेती साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। कैंसर जैसा खतरनाक रोग भी सिगरेट आदि की बिक्री कम कर पाने में असमर्थ महसूस कर रहा है।
खैर आप सोच रहे होंगे कि आज तम्बाकू की बातें क्यों? दरअसल कुछ दिन पहले एक सड़क से गुजरते हुए मुझे एक बोर्ड दिखाई पड़ा। ये बोर्ड एक विद्यालय के बाहर की दीवार पर लगा हुआ था और उस पर लिखा हुआ था- Tobacco Free School. पढ़कर आश्चर्य हुआ। आप भी पढ़ें।
इसका आशय स्पष्ट है। बच्चों में सिगरेट व शराब की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ये आदत या घर से पड़नी शुरु होती है या फिर स्कूलों से। पर हमारी सरकारों को इन सबसे कोई सरोकार नहीं है। शराब को अब पेट्रोल पम्पों, मॉल व बरिस्तां आदि जैसे खाने-पीने की "विदेशी" दुकानों पर बेचे जाने की तैयारी है। किसी भी स्कूल के बाहर आपको बच्चे सिगरेट पीते हुए दिख जायेंगे। ये जनता को सोचना है कि वो अपने बच्चे को सिगरेट पीते हुए देखना पसंद करेंगे अथवा नहीं। यदि नहीं तो पहले आपको स्वयं पहल करनी होगी। स्कूल में दाखिला दिलवाने से पहले उस स्कूल का "Tobacco Free School" सर्टिफ़िकेट अवश्य पूछ लें। और यदि हाँ तो ये देश का भार ऐसे "युवा" कँधों पर है जो नि:संदेह वक्त से पहले ही कमजोर पड़ने वाले हैं।
यह पोस्ट धूप-छाँव पर सौंवी पोस्ट है। आशा है कि आप सभी पाठकों को पसन्द आयेगी। आपकी टिप्पणियों से लिखते रहने की प्रेरणा मिलती है। कृपया टिप्पणी अवश्य करें।
शायद पाँचवीं कक्षा की बात होगी। पता नहीं पर काफ़ी समय बीत गया जब ये कविता पढ़ी थी। कुछ वक्त पहले ये दोबारा पढ़ने का मौका मिला। "बसन्ती हवा" का असर इन वर्षों में कम नहीं हुआ है।
वहीं बसन्ती हवा आपके समक्ष फिर ला रहा हूँ। आशा करता हूँ कि कुछ यादें तो आप की भी ताज़ा हो ही जायेंगी। कविता के कुछ पंक्तियों को समझने का दोबारा प्रयास किया है।
"बसन्ती हवा" के दो पद्य अर्थ सहित:
चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया; गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू', उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची - वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।
अर्थ: महुआ के पौधे की डालियाँ काफ़ी सख्त होती हैं। कवि कहता है कि हवा पेड़ पर इधर-उधर कूदती फ़ाँदती है किन्तु कुछ भी प्राप्त न होने पर नीचे गिर जाती है। फिर वो आम के पेड़ पर जाती है जो महुआ से नरम पेड़ है। किन्तु तभी कोई उसे पुकारता है और वो आम के पेड़ को छोड़ कर खेतों में चली जाती है।
यदि महुआ के वृक्ष को लक्ष्य समझा जाये तो कवि कहता है कि हवा ने अपने लक्ष्य को पाने का अथक प्रयास किया किन्तु असफ़ल रही। फिर वो उस कठिन लक्ष्य को छोड़ सरल लक्ष्य की ओर (आम के पेड़ की ओर) लपकती है। परन्तु वहाँ भी थोड़ी सी कठिनाई आते ही अपने लक्ष्य से भटक जाती है व उस सरल लक्ष्य को भी नहीं पा सकी।
पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं! खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी - हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा, हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
अर्थ: फिर वही हवा अलसी के खेतों में घुस गई। अलसी के फूल टहनियों से इस तरह से जुड़ होते हैं कि उन्हें तोड़ना कठिन हो जाता है। हवा ने भी भरसक प्रयत्न किया किन्तु तोड़ न सकी। फिर वह सरसों के खेतों में गई। पर चूँकि वो अलसी में असफ़ल रही थी इसलिये उसने सरसों के फूलों को तोड़ने का प्रयास तक नहीं किया।
कभी कभार जीवन में किसी हार से हम इतने दुखी हो जाते हैं कि हर लक्ष्य कठिन मालूम होता है। हम निराशा से घिरे होने के कारण सरल कार्यों को भी मन लगा कर नहीं करते और उनमें भी असफ़ल होने का भय लगा रहता है।
आगे पढ़िये "केदारनाथ अग्रवाल" की कलम से लिखी एक सदाबहार कविता।
बसंती हवा हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ।
सुनो बात मेरी - अनोखी हवा हूँ। बड़ी बावली हूँ, बड़ी मस्तमौला। नहीं कुछ फिकर है, बड़ी ही निडर हूँ। जिधर चाहती हूँ, उधर घूमती हूँ, मुसाफिर अजब हूँ।
न घर-बार मेरा, न उद्देश्य मेरा, न इच्छा किसी की, न आशा किसी की, न प्रेमी न दुश्मन, जिधर चाहती हूँ उधर घूमती हूँ। हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
जहाँ से चली मैं जहाँ को गई मैं - शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन, हरे खेत, पोखर, झुलाती चली मैं। झुमाती चली मैं! हवा हूँ, हवा मै बसंती हवा हूँ।
चढ़ी पेड़ महुआ, थपाथप मचाया; गिरी धम्म से फिर, चढ़ी आम ऊपर, उसे भी झकोरा, किया कान में 'कू', उतरकर भगी मैं, हरे खेत पहुँची - वहाँ, गेंहुँओं में लहर खूब मारी।
पहर दो पहर क्या, अनेकों पहर तक इसी में रही मैं! खड़ी देख अलसी लिए शीश कलसी, मुझे खूब सूझी - हिलाया-झुलाया गिरी पर न कलसी! इसी हार को पा, हिलाई न सरसों, झुलाई न सरसों, हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
मुझे देखते ही अरहरी लजाई, मनाया-बनाया, न मानी, न मानी; उसे भी न छोड़ा - पथिक आ रहा था, उसी पर ढकेला; हँसी ज़ोर से मैं, हँसी सब दिशाएँ, हँसे लहलहाते हरे खेत सारे, हँसी चमचमाती भरी धूप प्यारी; बसंती हवा में हँसी सृष्टि सारी! हवा हूँ, हवा मैं बसंती हवा हूँ!
पिछले दिनों काँग्रेस की किसी साईट पर भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु की जातियाँ बताईं गईं। कौन जाट व कौन ब्राह्मण ये बताया गया। इस पर एक-दो खबरिया चैनलों ने शहीदों के अपमान को लेकर पूरे दिन "देशभक्ति" के नारे लगाये। खबरिया चैनलों के द्वारा "मुँह" में जबरदस्ती बात डालने पर शहीदों के परिवार वाले आगे आये फिर भाजपा ने भी इसका विरोध कर दिया। एक या दो दिन ही बीते थे कि भाजपा की किसी वेबसाईट पर भीमराव अंबेडकर की जाति बताये जाने पर बवाल खड़ा किया गया। जो भाजपा एक और मुद्दा सोचकर आगे बढ़ने का विचार करने ही वाली थे एकदम से "बैकफ़ुट" पर आ गई। प्रश्न ये उत्पन्न हो रहा है कि जिस देश में सभी के नाम के साथ ही जाति जुड़ जाती हो उस देश में यदि इन शहीदों व महापुरुषों की जातियों का उल्लेख हुआ भी हो तो लोगों को क्यों परेशानी होती है? "पंडित जवाहरलाल नेहरू इस देश के प्रथम प्रधानमंत्री थे"। ये "ब्रह्म"वाक्य बच्चे के दिल और दिमाग पर तब छा जाता है जब उसको ठीक से लिखना भी नहीं आता। तो नेहरू एक कश्मीरी पंडित थे। इस वाक्य में परोक्ष रूप से उनकी जाति छिपी है। कोई इन मीडिया वालों को समझाओ भई। अम्बेडकर के जन्मदिवस पर देश छुट्टी मनाता है, नेता दलितों की कॉलोनियों में जाते हैं। क्या फिर भी कोई ये कहेगा कि अम्बेडकर की जाति नहीं पता!! सोचने वाली बात यह है कि यदि अम्बेडकर दलित न होते तो भी क्या स्कूलों व दफ़्तरों में अवकाश होता? ये सब छोड़िये। जहाँ लोग गाड़ियों के पीछे "जाट का छोरा" व "गुज्जर मेल" जैसे शब्द लिख कर अपनी जाति स्वयं बताते हों और गर्व महसूस करते हों तो उस देश में यदि शहीदों की जाति को किसी पुस्तक व साईट पर लिख भी दिया तो क्या गुनाह किया? जब लोग खुद को अनुसूचित जाति व जनजाति में शामिल करवाने के लिये रेल की पटरियों पर सो जाते हैं, वाहनों में आग लगा देते हैं, रास्ते बंद कर देते हैं तो फिर अम्बेडकर, भगत सिंह की जाति पता चल जाने पर कौन सा पहाड़ टूट जायेगा? हाँ, एक बात जो कॉंग्रेस के मुख पत्र "संदेश" में कही गई कि सुखदेव सॉंडर्स की "हत्या" में शामिल थे। ये बात थोड़ी खटकती है। ऐसा लगता है कि इस पार्टी के मुताबिक केवल "गाँधीवादी" ही देशभक्त व शहीद थे। अन्य स्वतंत्रता सेनानी महज हत्यारे व क़ातिल थे। इस बात को मुद्दा बनाया जा सकता था। खैर इस देश में मुद्दों की कमी नहीं है। हर रोज़ हर पल नया मुद्दा। मीडिया वालों को चौबीसों घंटे काम जो चाहिये। तो ये एक और मुद्दा उठाकर क्या लाभ! जाते जाते - जाति इस देश से कभी नहीं जायेगी ये एक सत्य है। जाति हमारी पहचान है। आप इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा में दाखिले का पर्चा भरेंगे तो उसमें भी आपको अपनी "केटेगरी" बतानी पड़ेगी। अनुसूचित जाति/जनजाति के हैं तो बल्ले बल्ले। पास हों या फ़ेल, बाबू के बेटे हों व चाहें आप को आरक्षण की जरूरत हो या न हो, आपका दाखिला पक्का। जहाँ घर्म के आधार पर कॉलेजों में दाखिला होता हो वहाँ जाति तो छोटी रह जाती है। किसी ने सच ही कहा है- जाति कभी नहीं जाती। गाँठ बाँध लें, यही जाति आपके काम आने वाली है।
मार्च के अंतिम सप्ताह में सरकार ने ये घोषणा करी है कि प्राईवेट एफ़. एम. चैनल भी समाचार सुना सकेंगे। गौरतलब है कि अब तक प्राईवेट चैनलों पर समाचार सुनाये जाने पर रोक लगी हुई थी। चैनल अपनी सुविधा से अलग अलग तरह खबरें हम लोगों तक पहुँचाते थे। आप में से बहुत लोगों ने ऑल इंडिया रेडियो पर खबरें जरूर सुनी होंगी। इन खबरों की अवधि आमतौर पर पाँच मिनट से आधे घंटे तक होती है। पाँच मिनट वाली खबरें हर घंटे प्रसारित होती हैं व आधे घंटे की दिन दो से तीन बार।
प्राईवेट चैनल मनोरंजन को परोसते हैं इसलिये इसकी व्यावसायिकता को ध्यान में रखते हुए फ़िलहाल इन पर प्रसारित खबरों की अवधि दो से पाँच मिनट रखने का प्रस्ताव है। ये खबरें आकाशवाणी ही इन चैनलों को देगा और चैनल ज्यों की त्यों अपने एफ़.एम पर सुनायेंगे। अगले दो से तीन महीने में उम्मीद है कि सरकार इस प्रस्ताव को अंतिम रूप दे देगी। देखना दिलचस्प होगा कि श्रोतागण इस कदम को किस तरह से लेते हैं क्योंकि आकाशवाणी पर जैसे ही खबरें आती हैं अधिकतर "शहरी" लोग चैनल बदल लेते हैं। सरकार का ये कदम कितना "हिट" होता है यह तो वक्त ही बतायेगा।
आप सभी पाठकों को राम नवमी की शुभकामनायें। आज राम नवमी है तो मैंने सोचा कि क्यों न आज के इस पावन दिवस पर रूद्र की आरती रुद्राष्टकम का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया जाये। पहले भी मैंने कईं बार रुद्राष्टक के हिन्दी अनुवाद को इंटरनेट पर ढूँढा पर कामयाब नहीं हो पाया। तो इस बार मैंने रामचरितमानस से अक्षरश: प्रकाशित करने का सोचा।
मेरी समझ से जब तुलसीदास जी (1532-1623) रामचरितमानस गा रहे थे (क्योंकि रामचरितमानस एक काव्य है) उस युग में कबीरदास (1440-1518) भी अपनी भक्ति के लिये विख्यात हुए। दोनों ही संत अपने काल के महान संत थे किन्तु दोनों की भक्ति अलग थी। तुलसीदास जी जहाँ साकार श्रीराम के भक्त थे तो वहीं कबीरदास जी निराकारस्वरूप ईश्वर की उपासना करते थे। साकार व निराकार का द्वंद्व इस पृथ्वी पर प्रारम्भ से ही रहा होगा। और आगे भी रहेगा। इसी द्वंद्व को ध्यान में रखते हुए तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में जगह जगह साकार व निराकार ईश्वर का ध्यान किया है।
रुद्राष्टक स्तोत्र रामचरितमानस के अंतिम काण्ड उत्तरकाण्ड में आता है। शिव की स्तुति करते हुए तुलसीदास जी ने ईश्वर का जो व्याख्यान किया है उससे साकार व निराकार का वो द्वंद्व समाप्त करने का प्रयास किया है व हम जैसे मूढ़ भी आसानी से उस परम पिता परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
अनुवाद: हे मोक्षस्वरूप, विभु, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर व सबके स्वामी श्री शिव जी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात माया आदि से रहित), गुणों से रहित, भेद रहित, इच्छा रहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्र रूप में धारण करने वाले दिगम्बर आपको भजता हूँ।
अनुवाद: निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान व इंद्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार के परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ।
अनुवाद: जो हिमाचल समान गौरवर्ण व गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है,जिनके सर पर सुंदर नदी गंगा जी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीय का चंद्रमा और गले में सर्प सुशोभित है।
अनुवाद: जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, सुंदर भृकुटि व विशाल नेत्र हैं, जो प्रसन्नमुख, नीलकंठ व दयालु हैं, सिंहचर्म धारण किये व मुंडमाल पहने हैं, उनके सबके प्यारे, उन सब के नाथ श्री शंकर को मैं भजता हूँ।
अनुवाद: प्रचण्ड (रुद्र रूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले, तीनों प्रकार के शूलों (दु:खों) को निर्मूल करने वाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, प्रेम के द्वारा प्राप्त होने वाले भवानी के पति श्री शंकर को मैं भजता हूँ।
अनुवाद: कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अंत(प्रलय) करने वाले, सज्जनों को सदा आनन्द देने वाले, त्रिपुर के शत्रु सच्चिनानंदमन, मोह को हरने वाले, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।
न यावद उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् | न तावत्सुखं शान्ति संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ||७||
अनुवाद: हे पार्वती के पति, जबतक मनुष्य आपके चरण कमलों को नहीं भजते, तब तक उन्हें न तो इसलोक में न परलोक में सुख शान्ति मिलती है और न ही तापों का नाश होता है। अत: हे समस्त जीवों के अंदर (हृदय में) निवास करने वाले प्रभो, प्रसन्न होइये।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोङहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् | जरजन्मदुःखौ घतातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ||८||
अनुवाद: मैं न तो जप जानता हूँ, न तप और न ही पूजा। हे प्रभो, मैं तो सदा सर्वदा आपको ही नमन करता हूँ। हे प्रभो, बुढ़ापा व जन्म [मृत्यु] दु:खों से जलाये हुए मुझ दुखी की दुखों से रक्षा करें। हे ईश्वर, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
भ्रष्टाचार से "काली" पड़ी
एक कढ़ाई को
इंतज़ार है एक ऐसे "स्क्रॉच ब्राईट" का
जो दाग धो सके दशकों के
जो आकाओं ने उसको दिये हैं,
भ्रष्टाचार की अग्नि में झोंक-झोंक कर....
धरती जो कराह रही है
जिसे लगी प्यास है
दिल में जिसे आस है...
उस बादल की जो
बरसेगा और
भीतर जल रही अग्नि को
बुझायेगा...
वो बादल आज आकाश में है...
वो ज्वालामुखी आज फ़टने को है...
वो जलजला आज आने को है...
"आज़ाद" जिसके कण कण में है..
आज़ादी जिसके मन में है..
वो "अन्ना" आज का "गाँधी" है..
वो धूल उड़ाती आँधी है...
बहत्तर बरस का ये "युवा" है..
जहाँ चाहता है,
रुख वहाँ हवा का है...
आज उसके संग हो लो...
केवल नेताओं का नहीं...
अपना भी "काला" रंग धो लो...
यदि बनाते हम यही अपना "मिशन" है
तभी सफल होता ये अनशन है...
अन्ना के बारे में अब सभी लोग जान चुके हैं। इसलिये कुछ नहीं कहूँगा। सभी से केवल इतना ही आग्रह है कि जहाँ अन्ना भ्रष्टाचार के खिलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन हम सभी जानते हैं कि कहीं न कहीं हम भी भ्रष्टाचार का हिस्सा बने हैं.. कभी रिश्वत दी है (जाने-अनजाने डोनेशन वगैरह के माध्यम से ही सही) या ली है। इसलिये ये जंग हमारी स्वयं से है अपने ही समाज से है जिसका हम अंग हैं। ये कठिन है...परन्तु तभी शायद अन्ना का अनशन सफल माना जा सकता है... कहते हैं कि घर के बाहर सुधार करने से पहले घर के भीतर सुधार की आवश्यकता है। पर हम शायद अभी ये न समझ पायें.... आशा करूँगा कि अनशन अंतहीन न हो... वरना "अन्ना" और "जे.पी." पैदा होते रहेंगे..अनशन करते रहेंगे.. परन्तु स्थिति नहीं सुधरने पायेगी।
तकनीक ने इंसान के दिमाग पर इस कदर राज कर लिया है कि जिस तकनीक को हमने खुद बनाया उस पर हम स्वयं से भी ज्यादा यकीन करने लगे हैं। ऐसा ही एक मुद्दा आज इस लेख में उठा रहा हूँ। गूगल व अन्य कुछ कम्पनियों ने अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद करने की वेबसाइट बनाई है। हिन्दी के हाल से आप सभी वाक़िफ़ हैं। प्राईवेट कम्पनियाँ तो छोड़िये सरकारी जगहों पर भी हिन्दी के हालात कुछ खास बेह्तर नहीं कहे जा सकते।
मेरे एक मित्र मनीष अग्रवाल के हाथ जब एयर इंडिया की टिकट लगी तो जैसे उसके साथ निराशा भी हाथ आई। टिकट पर लिखी हिन्दी पढ़ने के बाद ये बात समझ आ गई कि अपना दिमाग लगाने की बजाय एयर इंडिया के कर्मचारियों ने गूगल आदि वेबसाइटों का सहारा लेना बेहतर समझा। मतलब यह कि हमारे देश जो व्यक्ति अंग्रेज़ी में दो वाक्य लिख सकता है वो उसी वाक्य को हिन्दी में दोहरा नहीं सकता। ये इस देश के लिये बेहद शर्मनाक है।
ज़रा आप भी एक नज़र इस टिकट पर डालें और हिन्दी में लिखे वाक्य को पढ़ने का प्रयाद करें। मेरा दावा है कि यदि आप सच्चे हिन्दी प्रेमी हैं तो शर्म से नजरे झुक जायेंगी और माथे पर बल पड़ जायेंगे।
एयर इंडिया की पहचान विश्व भर में है और उसी से भारत की भी। परन्तु इस तरह की हिन्दी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है। ये चिंता का विषय है। किसी भाषा के हम इतने गुलाम हो जायें कि अपनी भाषा भूल जायें। ये परतंत्रता का परिचय है। आज हमारी सोच गुलाम है और ऐसा लगने लगा है कि अंग्रेज़ी का मतलब विकास हो गया है।
हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा ने हाल ही में आयोजित एक कवि सम्मेलन में एक किस्से का जिक्र किया।
पहला व्यक्ति: अगर मैं अपने बच्चे को अंग्रेज़ी नहीं सिखाऊँगा तो वो पीछे छूट जायेगा।
दूसरा: यदि तू हिन्दी नहीं सिखायेगा तो वो संस्कार भूल जायेगा।
माना अंग्रेज़ी जरूरी है पर सभी देशवासियों व पाठकों से अनुरोध है कि हिन्दी को नीचा न होनें दें। हिन्दी हमारी शान है। यदि ये पोस्ट या इसकी बात एयर इंडिया के किसी कर्मचारी तक पहुँच जाये तो इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता। शायद कुछ असर पड़े और आगे छपने वाली टिकटों में ऐसी भूल न हो।