Sunday, August 28, 2011

क्या आप जानते हैं कि चीन की महान दीवार कितनी लम्बी है? Great Wall of China, Some Interesting Facts - Did You Know?

भारत के विभिन्न पर्यटन शहरों के बारे में तो हम जानते ही हैं किन्तु पड़ोसी को भी थोड़ा बहुत जानना चाहिये। क्या आप जानते हैं कि चीन की महान दीवार कितनी लम्बी है? चीन की दीवार मिट्टी व पत्थर से बनी हुई है व उत्तरी चीन में स्थित है। कहते हैं कि इसे चीन के राजाओं ने उत्तरी देशों से बचाव के लिये बनवाया है।

चीन की लम्बी दीवार
यह लेख लिखने से पहले मैं सोचता था कि यह एक ही दीवार है जो चीन में फ़ैली हुई है। किन्तु इंटेरनेट पर पढ़ कर समझ में आया है कि यह कईं सारी दीवारों के टुकड़े हैं जो विभिन्न राजाओं ने अलग अलग काल में बनवाये हैं। दीवार बनवाने की शुरुआत पाँचवी शताब्दी (ईसा -पूर्व) यानि करीबन ढाई हजार पहले हुई। प्रमुख दीवारों में किन शि हुआंग नामक राजा की दीवार शामिल है जो उन्होंने 220 से 206 ईसा पूर्व के दौरान बनवाई। हालाँकि अब इस दीवार का छोटा सा हिस्सा ही शेष बचा है। मिंग शासन के दौरान सबसे ज्यादा हिस्सा बनकर तैयार हुआ।

चीन की दीवार पूर्व में शंहाईगुआन से लेकर पश्चिम में लोपलेक तक फ़ैली हुई है। यह दीवार 6,259.6 किमी ईंटों से, 359.7 किमी खाई व 2,232 किमी प्राकृतिक रक्षात्मक बाधायें जैसे पहाड़ियाँ व नदियाँ हैं। इस तरह इसकी कुल लम्बाई करीबन नौ हजार किमी तक पहुँच जाती है। कहते हैं कि मानव निर्मित यह एक ही ऐसी कृति है जो चाँद से देखी जा सकती है।

अन्य कुछ रोचक तथ्य:

  • भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला फ़ोन है नोकिया ये तो सभी जानते हैं। ये कम्पनी फ़िनलैंड की है और इसका नाम फ़िनलैंड के शहर एक नाम पर रखा गया है।
  • दुनिया में सबसे ज्यादा पोस्ट ऑफ़िस भारत में ही हैं। इनकी संख्या एक लाख से भी अधिक है।
  • मिस्र के पिरामिड विश्वविख्यात हैं। किन्तु ये कम ही लोगों को पता है कि मिस्र से अधिक पिरामिड पेरू (दक्षिण अमरीका) में हैं।
  • जमाइका में 120 नदियाँ हैं व सऊदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ एक भी नदी नहीं है।
  • ऑस्ट्रेलिया विश्व का एक मात्र महाद्वीप है जहाँ एक भी ज्वालामुखी नहीं है।
  • ब्राज़ील दक्षिण अमरीका महाद्वीप का एक देश है जो महाद्वीप का पचास फ़ीसदी हिस्सा है।  ब्राज़ील का नाम एक पेड़ के नाम पर रखा गया है।


क्या आप जानते हैं के अन्य लेख पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। आपको यह श्रॄंख्ला कैसी लग रही है अवश्य बतायें।

जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Tuesday, August 23, 2011

राम लीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना हजारे का अनशन Anna Hazaare, Ramlila Ground Delhi, Anti Corruption Campaign

अन्ना हजारे- एक ऐसा नाम जो लाखों लोगों को अपनी बातों से, अपने उद्देश्य से सबको एक धागे में पिरोये हुए है। आज के भारत का एक ऐसा शख्स जिसके लिये कहा जा रहा है कि भारत में ऐसा कोई नेता या अभिनेता नहीं जो इतनी भारी भीड़ को सात दिनों तक मैदान में इकट्ठा कर सके। 

अन्ना अनशन क्यों कर रहे हैं ये सभी को पता है इसलिये आपका ज्यादा समय नहीं लूँगा। जनलोकपाल का समर्थन पाने की चाह में आज लगातार आठवें दिन उनका अनशन जारी है।

ऑफ़िस के कुछ साथी रविवार की कड़ी धूप में रामलीला मैदान, दिल्ली पहुँचे। मैं जैसे ही नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन में मेट्रो से बाहर निकला  मुझे हाथ में तिरंगे लिये, मुँह पर वन्देमातरम का राग व अन्ना  के साथ उनके संघर्ष में उनके साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हुए झुंड के झुंड रामलीला मैदान की ओर जा रहे हैं। स्टेशन के अंदर ही सैकड़ों लोग व तिरंगे..

आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे मौके कम ही आये होंगे जब स्वतंत्रता दिवस से भी अधिक झंडे सड़कों पर दिखाये दे रहे हों। जितने लोग मैदान में थे उससे कहीं अधिक लोग सड़कों पर थे।

आपके लिये कुछ तस्वीरें रामलीला मैदान से ही...




नारे लगाते लोगों के कुछ वीडियो भी...



"मितवा" गाने पर आकाश में स्वच्छंद उड़ते पंछियों को देख कर लगा कि शायद अब देश आज़ाद होगा.. 



अब कुछ ऐसे चित्र भी जो ये सोचने पर मजबूर करेंगे कि लोकपाल भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवा भी दे फिर भी इस कथित "सभ्य समाज" में सभ्य लोगों की कहीं कमी सी है। 

कूड़ा फ़ैलाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है....





लाइन तोड़ते और बिना हेलमेट व चार लोग एक बाइक पर..ऐसे दृश्य आम देखे जा सकते थे... ये सब देखकर कहीं से लगा नहीं कि ये लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ़ साथ देने आये हैं... भ्रष्टाचार तो केवल एक राक्षस है... हर आदमी में जो राक्षस पल रहा है जब तक उसके लिये लोकपाल नहीं आयेगा तब तक यह देश आज़ाद नहीं होगा।


आज़ादी की लड़ाई हमने नहीं देखी...पर रविवार को हमने देखा कि आज़ादी ऐसे ही मिली होगी।


नेताओं के भ्रष्टाचार तो हमें दिखता है और लोकपाल से साठ प्रतिशत दूर भी हो जाये परन्तु क्या वो दिन भी आयेगा जब हम लाइसेंस के लिये दो हजार, मैरिज सर्टिफ़िकेट के लिये पाँच हजार व पासपोर्ट के लिये दो सौ रूपये न दें?



वन्दे मातरम...
जय हिन्द
आगे पढ़ें >>

Saturday, August 20, 2011

आधी रात को "अन्ना के अनशन" पर हुई कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक Congress Midnight Meeting Rahul Gandhi, Manmohan Singh Present In Meeting

अभी अभी खबर आई है कि आधी रात को कांग्रेस के कुछ मुख्य सदस्यों के बीच एक बैठक हुई। राहुल गाँधी जी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में थे मनमोहन सिंह, कपिल सिब्बल व चिदम्बरम। हमारे पास इस बैठक में हुई बातों के "ए़स्क्ल्यूज़िव टैक्स्ट" है। आइये जानते हैं कि इस बैठक में आखिर हुआ क्या?

कपिल सिब्बल: नमस्कार राहुल बाबा।
चिदम्बरम: नमस्कार राहुल बाबा।
मनमोहन सिंह: नमस्कार....
राहुल: अरे नमस्कार नहीं.. जय किसान बोलिये.. शास्त्री जी के नारे में से मुझे यही नारा पसंद आया है। 

मनमोहन सिंह: जय कि...
राहुल बाबा: चलिये ये सब छोड़िये..सीधा मुद्दे पर आते हैं। इस अन्ना का क्या किया जाये?
कपिल: अन्ना का क्या करना है... सब ठीक हो जायेगा.. थोड़े दिन रूकिये अपने आप आंदोलन ठंडा हो जायेगा।
चिद्दु: पर सिब्बल जी, पिछली बार भी हमने यही सोचा था.. पर हुआ क्या... उलटे और भी ज्यादा लोग आंदोलन में जुड़ गये।
सिब्बल : हमने यही सोचा था कि जैसे रामदेव को भगाया.. वैसे ही अन्ना को जेल भिजवा कर ये अनशन भी तुड़वा देंगे।
चिद्दु: पर रामदेव के साथ ये क्रेन बेदी, केजरीवाल जैसे बंदे होते तो खाट खड़ी कर देते। बेचारा रामदेव... रामदेव का आंदोलन इससे ज्यादा बढ़ा साबित होता..उसके साथ गाँव के लोग जुड़े हुए हैं..और दिल्ली से बाहर के..
सिब्बल: और अन्ना के साथ शहर वाले... वोट की चिंता समाप्त.. हा हा...

राहुल: हाँ.. सभी जानते हैं कि ये शहरी वोट हमारे किसी काम के नहीं...रामदेव को पहली रात ही खत्म करना बहुत जरूरी था।
सिब्बल: एक काम करते  हैं अन्ना की टीम से मुलाकात करते हैं..दस में से चार-पाँच बातें और मान जाते हैं थोड़ा वे आगे बढ़ेंगे थोड़ा हम..बस हो गया काम...बोलिये..
मनमोहन सिंह: मेरे दिमाग में एक आईडिया आया है...

बाकि सभी एक साथ: क्या बात है..क्या बात है...आपको एक आईडिया है.. भई बाह...

मनमोहन सिंह: अरे सुनिये तो..मज़ाक की बात नहीं है.. हम उनकी सारी बातें मान जाते हैं। इससे लोगों में हमारी इज़्ज़त बढ़ जायेगी। सब यही समझेंगे कि हम जन लोकपाल के साथ है। पर हम ये जानते हैं कि सभी पार्टियाँ अन्ना के बिल से सहमत नहीं हैं। संसद में ये बिल पास हो ही नहीं सकता.. गारंटीड....


राहुल बाबा: कौन कहता है आपको राजनीति नहीं आती...? मैं मम्मी से बात करता हूँ.. आपकी प्रोमोशन के बारे में.. अगली बार आपको राष्ट्रपति बनायेंगे..

मनमोहन: राहुल बाबा आपका शुक्रिया...
राहुल बाबा: अरे शुक्रिया कैसा.. आप ही तो हमारे काम आते हैं...
सिब्बल जी: मनमोहन जी, आपने क्या युक्ति सुझाई है.. साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे.. अगर ये आप पहले बता देते तो प्रेस कांफ़्रेंस में हमारी इंसल्ट न होती। अब हर जगह हमें ताने सुनने को मिल रहे हैं। "हू हा हू हा कपिल सिब्बल चूहा" जैसे नारे... ओह...


चिद्दु: कोई नहीं जी.. देर आये दुरुस्त आये.. अभी ही ऐलान कर देते हैं..
राहुल: अरे आप नहीं.. जरूरत पड़ने पर मैं जाकर ऐलान करूँगा कि अन्ना को बिना बात परेशान किया गया और उनकी सभी बातें मानी जायें। इससे क्या होगा आप जानते ही हैं। वैसे भी मुझे यह कहकर बदना किया जा रहा है कि "सारे युवा यहाँ हैं..राहुल गाँधी कहाँ हैं?"...

(सभी सदस्य ताली बजाते हैं)

राहुल : बड़े दिनों से हम किसानों से मिलने नहीं गये.. यूपी में बगावत करवाओ.. रीता बहुगुणा जी आखिर कर क्या रही हैं.. नोएडा की बातों को भी महीने से ऊपर हो गया है। चुनाव सर पर हैं...
सिब्बल: मैं बात करता हूँ।
राहु्ल: चलिए मीटिंग समाप्त... कल अनशन की कंडीशन देखकर आज के विचारों पर कल फ़ैसला लेंगे.. सबको मंज़ूर है?

जी (सभी एक स्वर में)

मनमोहन जी: जी मंजूर है। राहुल बाबा.. सोनिया मैडम कैसी हैं अब?
राहुल: मुझे भी उनकी बहुत याद आ रही है। दो दिन में जाने की सोचता हूँ।
सिब्बु: लोकसभा सेक्रेट्री को आपकी यात्रा के बारे में बताना है क्या?
राहुल बाबा: सिब्बल जी, कैसी बहकी सी बातें कर रहे हैं.. इतने सालों में कभी हमने लोकसभा सेकेट्री से परमीशन ली है जो अब लेंगे? कब कहाँ कैसे जाना है ये हम तय करते हैं..लोकसभा सेक्रेट्री किस खेत की मूली है?

गुस्ताखियाँ हाजिर में आज इतना ही। आपको ये कड़ी कैसी लगी और श्रृंख्ला में आप किन किरदारों को पढ़ना चाहेंगे, जरूर बतायें।
आगे पढ़ें >>

Thursday, August 18, 2011

वह खून कहो किस मतलब का - खूनी हस्ताक्षर Khooni Hastakshar : A New Series Of Patriotic Poems

पिछले पाँच दिन देशभक्ति के फ़िल्मी गीतों के नाम थे तो आने वाले कुछ सप्ताह देशभक्ति की कविताओं के नाम होंगे। जी हाँ आज से एक नई श्रॄंख्ला का आगमन हो रहा है जिसमें वे कवितायें शामिल होंगी जिन्हें हम भूल चुके हैं। आज से उन कविताओं को हम याद करेंगे और कुछ ऐसा करने का प्रयास करते रहेंगे जिससे इस देश की मिट्टी का कर्ज़ चुकाया जा सके। स्वतंत्रता की लड़ाई में शहीद हुए जितने भी स्वतंत्रता सेनानी रहे ये श्रृंख्ला उनके लिये है। अगर उनकी जैसी देशभक्ति का एक फ़ीसदी हिस्सा भी हममें आ जाये तो जीवन  धन्य हो जाये।

इस कड़ी की शुरुआत हो रही है श्री गोपालदास व्यास की "खूनी हस्ताक्षर" से।

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे उबाल का नाम नहीं,
वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं.

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे जीवन ना रवानी हैं,
जो परवश होकर बहता हैं वह खून नहीं हैं पानी हैं.

उस दिन दुनिया ने सही सही खून की कीमत पहचानी थी,
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मांगी उनसे कुर्बानी थी.

बोले स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हे करना होगा,
तुम बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा.

आज़ादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जायेगी,
वह सुनो तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जायेगी.

आज़ादी का संग्राम कही पैसे पर खेला जाता हैं ,
यह शीश काटने का सौदा नंगे सर झेला जाता हैं.

आज़ादी का इतिहास कही काली स्याही लिख पाती हैं ?
इसको लिखने के लिए खून की नदी बहाई जाती हैं.

यह कहते कहते वक्ता की आँखों में लहू उतर आया,
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिम काया.

आजानुबाहू ऊँची करके वो बोले ” रक्त मुझे देना “
इसके बदले में भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना.

हो गयी सभा में उथल-पुथल सीने में दिल ना समाते थे,
स्वर इन्कलाब के नारों के कोसों तक छाये जाते थे.

हम देंगे-देंगे खून शब्द बस यही सुनाई देते थे,
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे.

बोले सुभाष ऐसे नहीं बातों से मतलब सरता हैं,
लो यह कागज़ हैं कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता हैं.

इसको भरने वाले जन को सर्वस्व समर्पण करना हैं,
अपना तन-मन -धन जीवन माता को अर्पण करना हैं.

पर यह साधारण पत्र नहीं आज़ादी का परवाना हैं,
इसपर तुमको अपने तन का कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना हैं.

वह आगे आये जिसके तन में भारतीय खून बहता हो,
वह आगे आये जो अपने को हिंदुस्तानी कहता हो.

वह आगे आये जो इसपर खूनी हस्ताक्षर देता हो ,
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ आये, जो हसकर इसको लेता हो.

सारी जनता हुंकार उठी हम आते हैं हम आते हैं,
माता के चरणों में यह लो हम अपना रक्त चढाते हैं.

साहस से बढे युवक उस दिन,देखा बढ़ते ही आते थे,
चाक़ू-छुरी कटियारों से वो अपना रक्त गिराते थे.

फिर उसी रक्त स्याही में वो अपनी कलम डुबाते थे,
आज़ादी के परवाने पर वो हस्ताक्षर करते जाते थे.

उस दिन तारों ने देखा हिंदुस्तानी इतिहास नया,
जब लिखा महा रणवीरों ने खून से अपना इतिहास नया.

नोट: ये श्रृंख्ला कब तक चलेगी यह कहना कठिन है.. मुझे जितनी कवितायें याद आ पायेंगी उतनी ही पोस्ट कर पाऊँगा.. आप यदि इस श्रॄंख्ला में कोई कविता शामिल करना चाहते हैं तो अवश्य बतायें।


जय हिन्द ।
वन्देमातरम ।
आगे पढ़ें >>

Monday, August 15, 2011

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत - स्वतंत्रता दिवस पर खास जवानों के लिये Independence Day Special - Two Songs Dedicated to our Soldiers


स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत...

कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों (हक़ीकत)



"ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी " : इस गीत के बिना ये श्रृंख्ला पूरी नहीं हो सकती।


आपको ये श्रृंख्ला कैसी लगी, अवश्य बताइयेगा। बेशक न बतायें पर इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपका हर कार्य ऐसा हो जो इस देश की मिट्टी के काम आये। इस धरती को अपनी माँ समझें और देश को अपना परिवार।

मैथिली शरण गुप्त कह गये हैं : जननी जन्मभूमि: च स्वर्गदापि गरीयसी। यानि माँ और जन्मभूमि को स्वर्ग से बड़ा दर्जा प्राप्त है।

जय हिन्द।
वन्देमातरम।
आगे पढ़ें >>

Sunday, August 14, 2011

कुछ कर गुज़रने को खून चला - स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 - 15 अगस्त ) RDB-Khoon Chala and Maa Tujhe Salaam Independence Day Special - Patriotic Songs Series



रंग दे बसन्ती फ़िल्म का "खून चला" आज की हकीकत से रूबरू कराता है इसलिये ये गीत इस श्रृंख्ला का हिस्सा बना।

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला

खुली -सी  चोट  लेकर , बड़ी -सी  टीस  लेकर
आहिस्ता  आहिस्ता
सवालों  की  ऊँगली , जवाबों  की  मुट्ठी
संग  लेकर  खून  चला
कुछ  कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला




माँ तुझे सलाम



स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।

आगे पढ़ें >>

Saturday, August 13, 2011

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 से 15 अगस्त) VandeMataram Song from Anandmath, Patriotic Songs Series

आज के गीतों में से एक है फ़िल्म आनन्दमठ का गीत वन्देमातरम।
वन्देमातरम गीत के इतिहास को जानने के लिये


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वन्देमातरम( आनन्दमठ) 






स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।


वन्देमातरम
जय हिन्द
आगे पढ़ें >>

Friday, August 12, 2011

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Independence Day Special Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011)

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम (शहीद)

है प्रीत जहाँ की रीत सदा (पूरब और पश्चिम का सदाबहार गीत)

आगे पढ़ें >>

Thursday, August 11, 2011

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति से ओत-प्रोत गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011) Independence Day Special

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



देश भक्ति का एक गीत आप काबुलीवाला से पहले ही सुन चुके हैं

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं..



लाये हैं हम तूफ़ान से किश्ती निकाल के.. (फ़िल्म: जागृति)



जय हिन्द।
वन्देमातरम।
आगे पढ़ें >>

Wednesday, August 10, 2011

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का क्रमवार लेखा-जोखा - स्वतंत्रता दिवस विशेष Chronological Order Of Events - Indian Independence Movement

देश के स्वतंत्रता आंदोलन की वो तारीखें जो इतिहास बन गईं। इन तारीखों में शहीदों का रक्त और उम्मीदें बँधीं हैं जो उन्होंने एक आज़ाद भारत के लिये देखीं थीं।

1608  : कैप्टन विलिय्म्स हॉकिंस का सूरत के जरिये व्यापार शुरु। मुगल शासक जहाँगीर  का वो क़दम जो इस देश की तक़दीर बदल गया।


1707  :  औरंगज़ेब की मृत्यु और मुगलों के अंत की शुरुआत।


1757  :  प्लासी का युद्ध, सिराजुद्दौला की हार।


1764  :  बक्सर का युद्ध, बंगाल ईस्ट इंडिया कम्पनी के हवाले।


1857  :  हिन्दुस्तान की पहली क्रान्ति। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे व मंगल पांडे शहीद। पूरे हिन्दुस्तान का कोई एक राजा न होना रहा नुकसान देह। बहादुर शाह ज़फ़र व मुगल हुकूमत का अंत।


1885  :  ए.ओ.ह्यूम (Alan Octavian Hume) द्वारा काँग्रेस की स्थापना।


1905  :  बंगाल का विभाजन। स्वदेशी का नारा बुलंद हुआ, दादाभाई नाओरोजी (कांग्रेस) द्वारा स्वराज की घोषणा। राज देशी नेताओं का, हुकुम ईस्ट इंडिया कम्पनी का।


1906  :  मुस्लिम लीग का हिन्दुस्तान की राजनीति में जन्म।


1907  :  काँग्रेस हुई दो फ़ाड़, बने गरम दल व नरम दल । बाल गंगाधर तिलक बने  गरम दल के नेता।


1908  :  11 अगस्त को खुदीराम बोस को फ़ाँसी। उम्र: महज अठारह बरस... !!


1909  :  Indian Council Act [Morley-Minto Reforms] मकसद भारतीयों की सरकार में दखल कम करना।


1914  :  विश्व युद्ध आरम्भ।
1916  :  गरम दल वापस कांग्रेस से जुड़े। काँग्रेस और मुस्लिम लीग में साथ मिलकर लड़ने का लखनऊ में हुआ समझौता।


1919  : तेरह अप्रैल,  स्थान- जलियाँवाला बाग, अमृतसर। ब्रिटिश मिलिट्री द्वारा 379 निहत्थों पर गोलियाँ दागी गईं। जलियाँवालाबाग में बाहर निकलने का केवल एक और वह भी तंग रास्ता है। दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं। कुछ लोग यदि आज भी जिन्दा होंगे तो सोच रहे होंगे कि आज के हालात देखने से अच्छा होता यदि शहीद हो जाते।


1920  :  असहयोग व खिलाफ़त आंदोलन आरम्भ।


1922  :  चौरा-चौरी आंदोलन में तीन हजार लोगों के झुंड ने पुलिस   चौकी जलाई व पुलिसवालों की हत्या की। नाराज़ गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया।

1924  :  काकोरी रेल लूटी गई।


1928  : लाला लाजपत राय की हत्या।


1929  :  साइमन कमिशन का भारत में आना, भगत सिंह द्वारा एसेम्बली में बम फ़ेंका गया। पूर्ण स्वराज का इरादा जाहिर किया। मक़सद हिन्दुस्तान पर केवल हिन्दुस्तानियों का राज होना, ब्रिटेन की दखल मंज़ूर नहीं।


1930  :  भगत सिंह द्वारा पूर्ण स्वराज के नारे के बाद काँग्रेस ने भी 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी। डांडी मार्च व नमक सत्याग्रह भी उसी साल हुए।


1931  :5 मार्च को गाँधी व वाइसरॉय इरविन में हुआ समझौता जिसके अंतर्गत अहिंसक सत्याग्रहियों को जेल से बाहर करने पर व नमक इत्यादि पर टैक्स से मुक्ति पर हुआ समझौता। हिंसा से विद्रोह करने वालों पर कोई बात नहीं। अठारह दिन पश्चात 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फ़ाँसी।

1937  : 1935 एक्ट के तहत हुए चुनावों में काँग्रेस की भारी जीत।
1939  :  दूसरा विश्व युद्ध शुरु।


1942  :  अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन, सुभाष चंद्र बोस का काँग्रेस छोड़ा जाना व अपनी स्वयं की आर्मी बनाना।
1946  :  बोस की असामयिक मृत्यु, कबिनेट मिशन का भारत आगमन, नौसेना द्वारा विद्रोह।


1947  :  पन्द्रह अगस्त को लालकिले पर तिरंगा फ़हराया गया, देश आज़ाद हुआ।


जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Tuesday, August 9, 2011

मैं अब तक क्यों मौन हूँ? Why Am I Silent Spectator of Crime happening in my city?

मित्रों,

आज से चार वर्ष पूर्व मैंने यह कविता लिखी थी। हो सकता है आप में से कुछ लोगों ने यह पढ़ी हुई हो पर आज स्वतंत्रता दिवस विशेष पर यह आज भी सामयिक है। देश में कितनी पीढ़ा और असंवेदनशीलता है यह कविता उसके बारे में बताती है। कहते हैं जुर्म सहने और जुर्म देख कर आवाज़ उठाने वाला उतना ही बड़ा गुनाहगार है जितना जुर्म करने वाला.. और आज के इस दौर में शोषण को देखते रहने वाले लोगों की तादाद बढ़ रही है....

अँधा वो नहीं,

जो चलने के लिये,
डंडे का सहारा ले,
अँधा तो वो है,
जो अत्याचार होते देखे,
और आँखें फिरा ले।

बहरा वो नहीं,
जिसको सुनाने के लिये,
ऊँचा बोलना पड़ता है,
बहरा वो है,
जो कानों में रूई ठूँस कर,
इंसाफ किया करता है।

गूँगा वो नहीं,
जिसके मुँह में ज़ुबान नहीं,
गूँगे वो हैं,
जो चुप रहते हैं जब तक,
रुपया उन पर मेहरबान नहीं।

यहाँ अँधे, गूँगे बहरों की,
फ़ौज दिखाई देती है,
यहाँ मासूम खून से तरबतर,
मौजें दिखाई देती हैं।

खूब सियासत होती है,
लोगों के जज़्बातों पर,
जश्न मनाया जाता है,
यहाँ ज़िंदा हज़ारों लाशों पर।

यहाँ धमाके होने चाहिये
ताकि खाना हजम हो सके,
मौत का तांडव न हो तो,
चेहरे पर रौनक कैसे आ सके।

यहाँ बगैर लाल रंग के,
हर दिन बेबुनियाद है,
लाशों को ४७, ८४, ०२ की,
काली तारीखें याद हैं।

कोई पूछे उन अँधों से,
कैसे देखा करते हो बलात्कार,
कोई पूछे उन बहरों से,
कैसे सुन लेते हो चीत्कार,
कोई पूछे उन गूँगों से,
क्यों मचाया है हाहाकार।

मुझसे मत पूछना,
इन सवालों को,
मुझे नहीं पता मैं अँधा हूँ,
बहरा हूँ, गूँगा हूँ या कौन हूँ?
हद है!
हर सवाल पर,
मैं अब तक क्यों मौन हूँ??
आगे पढ़ें >>

Monday, August 8, 2011

संवेदना की अर्थी No Feelings Left In Metros

कल बस से कटा था एक हाथ,
कराहता रहा वो,
तड़पता रहा वो
कईं घंटे
एक मेट्रो शहर में-
हिन्दुस्तान का दिल कहते हैं हम जिसे!!

आज कार चलाते एक शख्स ने
टक्कर मार दी गाय को,
और पलट कर भी न देखा-
श्राद्ध पर रोटी खिलाने के लिये
गाय ढूँढेगा
तब शायद याद आ जाये
इस बेज़ुबान की-
माँ का दर्जा दिया है हमने जिसे!!

सड़क किनारे  पड़े पड़े
लाश बन गया है एक शरीर-
जिसे ठोकर मारते हुए
चल पड़ी है दुनिया
तरक्की की राह पर,
विश्व का
नम्बर एक बनने की चाह लिये

कहते हैं ये शहर नहीं सोता
पर हाँ
आँखें जरूर मूँद लेता है
पीड़ा देख नहीं सकता पगला!!

लाशें चीख रही हैं-
समय की माँग है-
संवेदना की
अर्थी पर रोने के लिये
रूदालियों को बुलाया जाये!!!
आगे पढ़ें >>

Wednesday, August 3, 2011

क्या आप जानते हैं - थर्मामीटर और वायरलैस का किसने और कब किया आविष्कार? Scientists Who Invented Thermometer And Wireless- Do You Know?

हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कईं उपकरण या वस्तुयें ऐसी होती हैं जिन्हें हम देखते तो हैं पर हम उन पर ध्यान नहीं देते। वे कैसे बने, किसने कब कैसे बनाया? आज हम कुछ ऐसी ही चीज़ों के बारे में संक्षेप में जानेंगे।

पहली बात करते हैं डायनामाईट की। इसका जिक्र मैंने भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेताओं के लेख में भी किया था। डायनामाईट का आविष्कार एल्फ़्रेड नोबेल (1833-1896) ने किया। स्वीडन के इस वैज्ञानिक से नाइट्रोग्लीसरीन (Nitro Glycerin) की बोतल गलती से Keisulghur पर गिर गई, जो एक बारीक पाऊडर होता है। नोबेल को लगा कि वहाँ उसी समय एक छोटा ब्लास्ट होना चाहिये था। पर वो एक पेस्ट बन गया। नोबेल ने महसूस किया कि वो पेस्ट ज्वलनशील तो है परन्तु उससे घबराने की बात नहीं थी। उन्होंने उस पेस्ट का नाम डायनामाईट रखा। Dynamite एक ग्रीक शब्द Dunamis से बना है जिसका अर्थ पाऊडर होता है। नोबेल नहीं जानते थे कि वो पाऊडर आज वैश्विक खतरा बन चुका है।



1590 के दशक में इटली के एक वैज्ञानिक ने शीशे की नली से तापमान मापा। वो आविष्कार कारगर साबित हुआ और आज हम उसको थर्मामीटर के नाम से जानते हैं। वैज्ञानिक थे गैलीलियो।

क्या कभी आपने सोचा है कि बिना तारों के आपकी ज़िन्दगी कैसी हो गई है? जहाँ चाहो वहाँ से बात करो!! पर इसके बारे में विचार आया तो किसे आया? बचपन में इस वैज्ञानिक का नाम पढ़ा तो था पर फिर भूल गया था। ये थे मार्कोनॊ (१८७४-१९३७)।1901 में इटली के इस वैज्ञानिक ने विद्युत तरंगों को बिना तार के एक जगह से दूसरी जगह तक भेजने में सफलता पाई। उन्होंने इंग्लैंड के कार्नवाल से कनाडा के न्यूफ़ाऊंडलैंड तक विद्युत तरंगों को भेजा। यानि अटलांटिक महासागर के ऊपर से। उस एक आविष्कार ने आज के मोबाईल फ़ोन को जन्म दिया।

अगली बात करते  हैं कार की। पहली कार किसने और कब बनाई इसके बारे पता लगाना कठिन  है। कार के उपकरण बनाने में जर्मनी की तकनीक का आज मुकाबला नहीं है। जर्मनी के ही एक वैज्ञानिक डायबलर ने 1886 में पेट्रोल से चलने वाला एक इंजन बनाया। इस इंजन को एक वाहन में लगा कर उसे कईं किलोमीटर तक सफलता पूर्वक चलाया।
आगे पढ़ें >>

Friday, July 29, 2011

बदलता वक्त बदलता नजरिया - माइक्रोपोस्ट Time Changes, Perception Changes?

ट्रैफ़िक सिग्नैल पर हमारे ऑफ़िस की ए.सी. कैब खड़ी थी। गर्मी का मौसम था। नारियल की गिरी बेचने वाला एक आदमी पसीने से तर बतर गोला-गिरी बेच रहा था। वहीं फ़ुटपाथ पर बैठा एक छोटा सा दुकानदार खीरे पर मसाला लगा रहा था।

आठ वर्ष पूर्व..

ये वो वक्त था जब कॉलेज के दोस्त कॉलेज से घर जा रहे होते थे। बस का इंतज़ार करने के  बाद एक डी.टी.सी की बस आती तो दौड़ कर उस पर चढ़ जाते थे। गुलाबी रंग का साढ़े बारह रूपये का कॉलेज-पास बना हुआ था। कोई दूसरी खाली बस दिखी तो उस पर चढ़ गये। एक से दूसरे पर, दूसरे से तीसरे पर। पसीने की परवाह किये बगैर। आज की तरह लाल रंग की ए.सी. बस जो नहीं थी तब.. वो तो एक डब्बा था...

कभी कभार बस का इंतज़ार करते हुए भूख लगती तो फ़ुटपाथ पर बैठे हुए खीरे-मूली वाले से खीरा खरीद कर खा लेते। मसाला लगाये हुए मूली और उस पर नींबू..वाह क्या स्वाद आता था। कभी गोला-गिरी खा लेते। पचास पैसे का पानी पी लेते तो कभी उसी ठेले से नींबू-पानी या फिर कहीं से बंटा!! मसालेदार पापड़ का स्वाद आज भी याद है।

वर्ष 2011..
कॉलेज के हम दोस्त सॉफ़्टवेयर इंजीनियर अथवा मैनेजर बन गये हैं।  चालीस..पचास..साठ हजार रूपये महीने की तन्ख्वाह...ए.सॊ कैब में सफ़र करने के अलग ठाठ हैं। कम्पनी तो वही जो कैब "प्रोवाईड" करे। मुफ़्त की कैब हो तो कहने ही क्या!! टीम की पार्टी होती है तो पित्ज़ा या "मैक-डी" का बर्गर। कोल्ड ड्रिंक तो होगी ही पर अगर वाइन-बीयर का घूँट भी गले को तर कर जाये तो वारे-न्यारे। अरे हाँ "हार्ड-ड्रिंक" के साथ जो पापड़ मिलता है वो....कहीं बाहर जाना हो तो "बिसलेरी" की बोतल का होना अत्यन्त आवश्यक है। पन्द्रह रूपये की ही तो है!!

ट्रैफ़िक सिग्नेल पर ऑफ़िस की ए.सी कैब खड़ी है। एफ़.एम. पर आज के जमाने के गाने बज रहें हैं। बाहर फ़ुटपाथ पर खीरे वाला गंदे पानी से खीरे धो रहा है। गोला-गिरि वाला उसी बदबूदार पानी गोले पर छिड़क रहा है। पचास पैसे वाला पानी अब एक रूपये का हो गया है। प्यास काफ़ी लगी है.. .ठेले वाले ने गिलास कब धोया होगा पिछली बार? खुले में पापड़ वाला पापड़ लिये खड़ा है...सब कुछ कितना "अन-हाइजिनिक" है.....छि:...
आगे पढ़ें >>

Monday, July 25, 2011

भारत के किस राज्य में आते हैं सबसे अधिक विदेशी पर्यटक? क्या खास है इस राज्य में? Most Foreign Tourists In Southern State - Incredible India

तुल्य भारत की श्रृंख्ला में आज-भारत का दक्षिण का राज्य तमिलनाडु। हाल ही में तमिलनाडु अपनी राजनैतिक गतिविधियों के कारण चर्चा में रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि ये राज्य सबसे अधिक विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है? पुरातत्व विभाग ने तमिलनाडु राज्य में कईं ऐसे स्थानों की खोज की है जहाँ 3800 बरसों से भी पुरानी सभ्यता के अवशेष मिलने की पुष्टि हुई है।

तमिलनाडु में 34000 से अधिक मंदिर हैं जैसे मदुरई का मीनाक्षी मंदिर, रामेश्वरम , श्री रंगनाथस्वामी मंदिर व वृहदेश्वर मंदिर। यूनेस्को की लिस्ट में तमिलनाडु के सबसे अधिक स्थल हैं जिनमें चोल शासन के दौरान बनाये गये मंदिर और महाबलीपुरम भी है। वृहदेश्वर मंदिर 1987 में यूनेस्को लिस्ट में शामिल हुआ जबकि गन्गईकोंडाचोलिस्वरम व ऐरावतेश्वर मंदिर 2004 में बाद में इसमें जोड़े गये।

चिकित्सा पर्यटन की दृष्टि से भी राज्य जाना जाता है और एशिया के कुछ बड़े अस्पताल भी इसी राज्य में हैं।

महाबलीपुरम चेन्नई से महज साठ किलोमीटर की दूर स्थित एक तटीय शहर है। सातवीं शताब्दी में पल्लव शासन के दौरान यह बंदरगाह के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी। कहा जाता है कि इसका नाम पल्लव राजा नरसिम्हावरमन ने रखा जो पहले ममल्लापुरम और अब यह महाबलीपुरम बन गया है। पल्लव शासन में महा-मल्ला (कुश्ती) एक प्रिय खेल मानी जाती थी। इसके अधिकतर ऐतिहासिक स्थल सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच ही बने।

महाबलीपुरम के मंदिर महाभारत काल में हुई अनेकों घटनाओं को दर्शते हैं। ये मंदिर नरसिम्हावर्मन व राजसिम्हावर्मन ने बनाये जो चट्टानों को काट कर बनाये गये और उस समय की कारीगरी की खासियत रही।
महाबलीपुरम शहर को अंग्रेजों ने आकर 1827 में बसाया।

तिरुवल्लुवर की प्रतिमा (कन्याकुमारी)
यदि अन्य पर्यटन स्थलों की बात करें तो कन्याकुमारी अपने सूर्योदय व सूर्यास्त के समय होने वाले अनुपम दृश्य के लिये जाना जाता है। यह भारत का दक्षिणतम शहर है। केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम से यह केवल 85 किमी की दूरी पर स्थित है। इसके बारे में बताने को बहुत कुछ है इसलिये इसे किसी अन्य लेख के लिये छोड़ रहा हूँ।

येर्कोड, कोडाइकनाल, उदागामंडलम (ऊटी), वलपरई, येलगिरी इत्यादि प्राकृतिक सुंदरता बिखेरते हुए अत्यन्त विहंगम हिल स्टेशन हैं। ऊटी से  सटकर है कुन्नूर जो चाय के बागानों के लिये मशहूर है। ऊटी में ही अनेकों झील, झरने हैं। यदि आप प्रकृति को नज़दीक से देखना चाहते हैं तो इन हिल स्टेशनों पर अवश्य जायें। कोयम्बटूर सबसे नज़दीक एयरपोर्ट है। तमिलनाडु में कईं जीव अभयारण्य भी हैं। पिचावरम में विश्व के दूसरा सबसे बड़ा सदाबहार वन है।

पिचावरम के घने जंगल
मेट्टूपलम से ऊटी के बीच में पहाड़ी रास्तों के बीच से गुजरती हुई रेल है नीलगिरी। ये ज़मीन से 7500 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है जो दोनों शहरों के बीच 41 किमी की दूरी तय करती है। इस रेल को भी यूनेस्को ने विश्व धरोहर में शामिल किया हुआ है।

तमिलनाडु में प्राकृतिक सुंदरता भी है, ऐतिहासिक मंदिर-स्थल, वन-जीव-समुद्र भी है। यानि पर्यटन की दृष्टि से इस राज्य में आपको सबकुछ मिलेगा शायद इसलिये इस राज्य में भारत के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं।

अतुल्य भारत की यह श्रृंख्ला आगे भी जारी रहेगी। हिन्दुस्तान नहीं देखा तो क्या देखा।

जय हिन्द।
वन्देमातरम।

आगे पढ़ें >>

Wednesday, July 20, 2011

भूले बिसरे गीत : 1956 से अब तक इस देश ने कईं बम्बई दे दी हैं Song On Current Social-Political Condition Film CID (1956)

अगर किसी कवि को आज के हालात पर कविता लिखने को कहा जाये तो वो वही लिखेगा जो गीतकार ने आज से करीबन साठ वर्ष पूर्व ही लिख दिया था। फ़िल्म थी CID और गाना था - "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ"। इस गीत से मुम्बई को हटा कर कोई भी मेट्रो शहर का नाम डाल दीजिये बस हो गया आपका काम। आपके शहर का हाल आप तक पहुँच गया समझो। 1956 से अब तक इस देश ने कईं बम्बई दे दी हैं।

आज के जमाने में मुझे ऐसा कोई गाना नहीं सूझ रहा जो मुझे वर्तमान का हाल बता सके। हालाँकि सभी फ़िल्म निर्माता यही कहते हैं कि वे समाज का ही आईना दिखाते हैं। न ही कोई ऐसा बनता है जो आज से साठ बरस बाद भी सामयिक लगे। मतलब यह कि यदि 2070 में कोई आज का गाना गाये (क्या मैं ज्यादा आशावादी तो नहीं हुआ हूँ?) तो भी लगे कि अरे ये तो इसी दौर का गीत है....

आज आपके लिये हर दौर का गीत लेकर भूले-बिसरे गीत में हाजिर है फ़िल्म CID (1956) का यह गीत। अरे हाँ, तब का बॉम्बे आज का मुम्बई हो गया है (राज सर माफ़ कीजियेगा...) अच्छा हुआ इस गीत में बंगाल नहीं है.. अब तक आप जान चुके होंगे कि ममता दीदी कलकत्ता की तरह बंगाल का नाम भी बदलने के मूड में हैं।

ऐ  दिल  है  मुश्किल  जीना  यहाँ
ज़रा  हट  के  ज़रा  बच  के , यह  है  बॉम्बे  मेरी  जान
ऐ  दिल  है ..

कहीं  बिल्डिंग  कहीं   ट्रामे , कहीं  मोटर  कहीं  मिल
मिलता  है  यहाँ  सब  कुछ  इक  मिलता  नहीं  दिल
इंसान  का  नहीं  कहीं  नाम  -ओ -निशाँ
ज़रा  हट  के  ज़रा  बच  के , यह  है  बॉम्बे  मेरी  जान
ऐ  दिल  है ..

कहीं  सत्ता , कहीं  पत्ता  कहीं  चोरी  कहीं  रेस
कहीं  डाका , कहीं  फाका  कहीं  ठोकर  कहीं  ठेस
बेकारों  के  हैं  कई  काम  यहाँ
ज़रा  हट  के  ज़रा  बच  के , यह  है  बॉम्बे  मेरी  जान
ऐ  दिल  है ..

बेघर  को  आवारा  यहाँ  कहते  हँस हँस
खुद  काटे  गले  सबके  कहे  इसको  बिज़नेस
इक  चीज़  के  हैं  कई  नाम  यहाँ
ज़रा  हट  के  ज़रा  बच  के , यह  है  बॉम्बे  मेरी  जान
ऐ दिल है...



जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Sunday, July 17, 2011

हिन्दुस्तान की राजनीति का साप्ताहिक सार Weekly Update Of Indian Politics

भ्रष्टाचार पर
चहुँ ओर से घिरी सरकार ने
किया मंत्रिमंडल फ़ेरबदल-
किसी की कुर्सी गई,
किसी को मिला सत्कार
जमकर हुई
राजनैतिक उथलपुथल।
पर इससे नहीं बदलेगा
सरकार का भ्रष्ट चेहरा
शतरंज खेलती मैडम हैं
मनमोहन तो हैं बस एक मोहरा ।

कईं बरसों से
रेल मंत्रालय
चढ़ता आया है
गठबंधन की बलि,
कभी बिहार की
शान होती थी रेल,
अब बंगाल की ओर चली।

चाहें बिहार चाहें बंगाल
रेल रही हमेशा कंगाल
परियोजनायें-
पटरी से उतरी पड़ी हैं
हाशिये पर है
सुरक्षा का ख्याल।

मुम्बई एक मर्तबा फिर दहली
सरकार ने हुँकार भरी-
आतंकवाद का मुकाबला
डटकर करेंगे
आतंकवादियों को
जल्द ही पकड़ेंगे...
पर प्रधानमंत्री जी...
पकड़कर आप करेंगे क्या?
जिनके अपने चले गये
उन्हें वापस ला सकेंगे क्या?

आपके नेता कहते हैं-
हम पाकिस्तान से बेहतर हैं!!!
तो अब ये दिन आ गये हैं..
पाकिस्तान से मुकाबला करेंगे क्या?
राहुल बाबा का अंदाज़ विलग
हमले रोके नहीं जा सकते।
हमले रोके नहीं जा सकते?
पाकिस्तान, बांग्लादेश
टोके नहीं जा सकते?

अफ़्ज़ल कसाब को मत मारो
डेढ़ सौ लोगों के कातिलों को
मत चढ़ाओ तुम फ़ाँसी पर...
पर इतना हम पर उपकार करो...
जैसे उन्हें सुरक्षित रखा है..
हमारी सुरक्षा का भी
वैसा पुख़्ता इंतज़ाम करो...
वैसा पुख्ता इंतज़ाम करो....

कभी रेल होगी
कभी आतंकवादी हमलों से होगा
यमराज का
हम पर वार-
परोक्ष रूप से हत्या का 
कोई गुनाह नहीं होता यार-
हिन्दुस्तान की राजनीति का 
यही है साप्ताहिक सार,
यही है साप्ताहिक सार।


जय हिन्द
वन्देमातरम
आगे पढ़ें >>

Tuesday, July 12, 2011

केरल के गाँव में वैज्ञानिकों ने किया हवन प्रक्रिया पर शोध Scientists Experiment On Hindu Ritual In Kerala - Science In Hinduism

समय समय पर हिन्दू रीति रिवाज़ पर शोध होता आया। हिन्दुओं के पूजा-पाठ  करने के तरीके को विज्ञान ने हमेशा बारीक निगाहों से परखा है। आज बात इसलिये उठी है क्योंकि हाल ही में केरल के एक दूर-दराज के गाँव में वैज्ञानिकों ने यज्ञ से होने वाले फ़ायदे पर शोध किया है। हिन्दुत्व विज्ञान से किस कदर जुड़ा हुआ है यह शोध इसी बात को दर्शाता है।

अतिरत्रम नामक यज्ञ चार से पन्द्रह अप्रैल के बीच त्रिसूर जिले के पन्जल गाँव में सम्पन्न हुआ। करीबन चार हजार वर्षों से यह पर्व मनाया जा रहा है। कोच्ची विश्वविद्यलय के प्रो. वी,पी.एन.नामपुरी के नेतृत्व में एक वैज्ञानिक दल ने इस पूरे पर्व से जुड़े हुए हर वैज्ञानिक पहलू को देखा।

उन्होंने इस हवन के दौरान वातावरण, मिट्टी व सूक्ष्म जीवों पर होने वाले असर पर शोध किया। ऐसा माना जा रहा है कि इस हवन के पश्चात बीज अंकुरित होने वाली प्रक्रिया में तीव्रता से बढ़ोतरी हुई है एवं अग्नि अनुष्ठान के क्षेत्र में और उसके चारों ओर हवा, पानी और मिट्टी में माइक्रोबियल उपस्थिति बेहद कम हुई है। 

दल ने अनुष्ठान आरम्भ होने से पहले ही लोबिया, हरा चना व बंगाल ग्राम के बीज स्थल के चारों ओर बो दिये थे। पन्द्रह अप्रैल के बाद में जाँच में उन्होंने पाया कि स्थल के सबसे नज़दीक बोये गये बीज सबसे बेहतरीन स्थिति में थे। बंगाल ग्राम के पौधे तो 2000 गुना से अधिक की तेजी से उगे।

नामपुरी के अनुसार लगातार मंत्र-उच्चारण से जो ध्वनि उत्पन्न हुई उससे बीज-अंकुरित होने की प्रक्रिया को बढ़ावा मिला। वे कहते हैं कि इस शोध से वैदिक प्रक्रिया पर प्रश्न चिह्न उठाने व इसे अंधविश्वास से  जोड़ने वाले लोगों तक हमारा मत पहुँचाने में सहायता मिलेगी और इस शोध के नतीजे से हम वातावरण की बेहतरी के लिये कदम उठा सकेंगे।

इस टीम ने यज्ञशाला के 500 मीटर से लेकर डेढ़ कि.मी. तक की दूरी का निरीक्षण किया तो पाया कि शाला के नज़दीक की वायु सबसे अधिक स्वच्छ थी व बैक्टीरिया की संख्या सबसे कम।

हवन प्रक्रिया से होने वाले फ़ायदे पर यह पहला शोध नहीं था। वैज्ञानिकों के बीच यह प्रक्रिया हमेशा से ही चर्चा का विषय रही है। हवन सामग्री में जो जड़ी बूटियाँ मिलाई जाती हैं उनसे न केवल वायु स्वच्छ होती है अपितु शरीर में रक्त संचार ठीक होता है व त्वचा से जुड़ी बीमारियाँ भी ठीक हो जाती हैं।

अधिक जानकारी के लिये यहाँ क्लिक करें।

हिन्दुत्व किसी धर्म से नहीं जुड़ा अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है। प्राचीन काल से हम इससे जुड़ हुए हैं। मंदिर की घंटी बजाना, मंत्र उच्चारण करना, हवन करना, दीपक जलाना, सूर्य को जल चढ़ाना इत्यादि अनेकानेक कार्य हम प्रतिदिन करते हैं और हम भूल जाते हैं कि ये सभी हिन्दू रीति-रिवाज़ से तो जुड़े हैं हीं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। 

जय हिन्द
वन्दे मातरम
आगे पढ़ें >>

Thursday, July 7, 2011

क्या आप जानते हैं अब तक कितने भारतीयों को नोबेल पुरस्कार मिला है? Nobel Prize Indian Winners

नोबेल पुरस्कार-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के सबसे बड़े पुरस्कार। इसकी शुरुआत वर्ष 1901 से हुई और इसे एल्फ़्रेड नोबेल के नाम पर रखा गया। नोबेल स्वीडन के निवासी थे व डायनामाईट के आविष्कारक। नोबेल पुरस्कार भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर विज्ञान या चिकित्सा, साहित्य और शांति के लिये दिये जाते हैं।

आज हम बात करेंगे उन भारतीयों की जिन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। सर्वप्रथम नाम आता है गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का। टैगोर को साहित्य के लिये 1913 में पुरस्कृत किया गया। वे सम्मान पाने वाले पहले एशियाई भी रहे। रवींद्रनाथ (7 मई 1861 – 7 अगस्त 1941) बंगाली कवि, संगीतकार, लेखक व चित्रकार थे। गीतांजलि के लेखक ने महज आठ वर्ष की उम्र से ही कवितायें लिखनी शुरु कर दी थी। वे एक ऐसी हस्ती रहे जिन्होंने हिन्दुस्तान और बंग्लादेश-दो देशों के लिये राष्ट्रगान लिखा।

दूसरा नाम आता है सर चंद्रशेखर वेंकटरमन का। सर सी.वी रमन (7 नवम्बर 1888 - 21 नवम्बर 1970) ने भौतिकी के क्षेत्र में यह सम्मान 1930 में हासिल किया। जब प्रकाश किसी पारदर्शी माध्यम से गुजरता है तब उसकी वेवलैंथ (तरंग की लम्बाई) में बदलाव आता है। इसी को रमन इफ़ेक्ट के नाम से जाना गया।

हरगोबिंद खुराना (भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक)  उन्हें चिकित्सा के लिये नोबेल मिला। खुराना ने मार्शल व. निरेनबर्ग और रोबेर्ट होल्ले के साथ मिलकर चिकित्सा के क्षेत्र में काम किया। उन्हें कोलम्बिया विश्वविद्यालय की ओर से 1968 में ही होर्विट्ज़ पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। वे 1966 में अमरीका के नागरिक बने।

अल्बानिया मूल की भारतीय मदर टेरेसा (26 अगस्त 1910 - 5 सितम्बर 1997) को 1979 में शांति नोबेल पुरस्कार मिला। उनका असली नाम एग्नेस गोन्शा बोजाज़्यू था। उन्होने 1950 में मिशनरी ऑफ़ कोलकाता की स्थापना की। 45 बरसों तक उन्होंने अनाथ व गरीब बीमार लोगों की सेवा करी।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर को 1983 में भौतिकी के लिये समानित किया। वे भारतीय मूल के अमरीकी नागरिक थे। उन्होंने तारों के क्षेत्र में खोज करी। वे सर सी.वी रमन के भतीजे थे। उन्होंने शिकागो विश्वविद्यालय में 1937 से 1997 तक काम किया। वे 1953 में अमरीकी नागरिक बने।

वर्ष 1998  में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र में उनके योगदान के लिये नोबेल पुरस्कार मिला। उन्होंने अकाल में भोजन की व्यवस्था के लिये अपनी थ्योरी दी। फ़िलहाल वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर के तौर पर कार्यरत हैं। ऑक्सब्रिज विश्वविद्यालय के शीर्ष पर काबिज होने वाले वे प्रथम भारतीय ही नहीं अपितु प्रथम एशियाई भी हैं। पिछले चालीस बरसों से उनकी तीस से अधिक भाषाओं में उनकी पुस्तकें छप चुकी हैं।

भारतीय मूल के अमरीकी वेंकटरमन रामाकृष्ण को 2009 में रसायन शास्त्र के क्षेत्र में नोबेल मिला। उन्हें सेट्ज़ और योनाथ के साथ ही नोबेल प्राप्त हुआ। वे कैम्ब्रिज में अभी MRC Laboratory Of Molecular Biology में हैं।

कुल मिलाकर बात करें तो विशुद्ध रूप से रवींद्रनाथ टैगोर, सी.वी. रमन व अमर्त्य सेन ही भारतीय हैं जिन्हें नोबेल मिला है। बाकि सभी या तो विदेशी नागरिक रहे या विदेशी मूल के भारतीय नागरिक।
वैसे विडम्बना यह भी कि विनाश की जड़ डायनामाईट के आविष्कारक के नाम पर नोबेल का शांति पुरस्कार मिलता है
आगे पढ़ें >>

Saturday, July 2, 2011

भूले बिसरे गीत- संगीत, कहानी, अदाकारी, गीत हर क्षेत्र में बेजोड़ थी फ़िल्म गाईड - Old Hindi Movie Songs- Guide - One Of The Best Movie Of Bollywood

आज जिस फ़िल्म की बात हम भूले-बिसरे गीत में कर रहे हैं वो है - गाईड। हिन्दी फ़िल्म जगत की एक ऐसी बेमिसाल फ़िल्म जिसमें कहानी भी है, अदाकारी भी, गीत के बोल, संगीत- सब कुछ है इस फ़िल्म में। अगर मैं कहूँ कि गाईड की गिनती हिन्दी फ़िल्म जगत की पहली पाँच फ़िल्मों में होती है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी

छह फ़रवरी 1965 को रिलीज़ हुई गाईड जिसमें थे देव आनन्द और वहीदा रहमान, जिसे लिखा था विजय आनन्द ने और संगीत था सचिन देव बर्मन का। गाईड की कहानी आर.के.नारायण द्वारा निखित उपन्यास पर आधारित थी। इस फ़िल्म ने एक या दो नहीं बल्कि सात फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड जीते थे- सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, निर्देशन, नायक, नायिका, कहानी, सिनेमाटोग्राफ़ी और डॉयलाग।

पेश हैं इसी फ़िल्म के कुछ गीत। हिन्दी सिनेमा के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ गीत।

आज फ़िर जीने की तमन्ना है
वो गीत जिसमें अंतरा मुखड़े से पहले आया!!






दिन ढल जाये..


गाता रहे मेरा दिल..




क्या से क्या हो गया.. बेवफ़ा...


पिया तोसे नैना लागे रे..








तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं




वहाँ कौन है तेरा..मुसाफ़िर जायेगा कहाँ..






गाईड जैसी फ़िल्में आज के दौर में नहीं बन सकती और विडम्बना यह कि ऐसी ही फ़िल्मों की जरूरत है।




जय हिन्द
वन्देमातरम



भूले-बिसरे गीत श्रृंख्ला आपको कैसी लगी टिप्पणी के माध्यम से अवश्य बतायें।
आगे पढ़ें >>