Saturday, May 10, 2008

काश

सुबह ज्यों ही
सूरज को
खुले आकाश में उठते
अपनी किरणों को चारों ओर
फैलाते हुए
देखता हूँ तो यकीन होता है
कि हम भी सर उठा कर
चलने लगे हैं,
हम हैं विश्व का सबसे
बड़ा बाज़ार,
डंका बजता है हमारा
पूरी दुनिया में,
अंतरिक्ष में अब भेजते हैं हम
दूसरे देशों के उपग्रह,
हर साल बढ़ते हैं हमारे
देश में खरबपति,
सूचना प्रौद्योगिकी में विश्व
देखता है हमारी ओर,
हमारा है सबसे बड़ा लोकतंत्र
और हमारा सर ऊँचा होता है
गर्व से कि हम चलाते हैं
अमरीका को,
पर भूल जाता हूँ सब कुछ
जब ये गुरूर
चकनाचूर होता है
हर शाम जब
सूरज को ढलते हुए देखता हूँ
टूट जाता है उसका दंभ,
कहते हैं कि वो उस समय रोता है
होता है वो लहूलुहान,
मेरे सामने तब आ जाते हैं
रात के अँधेरे में होने वाले
हर वो गुनाह जो
सुबह अखबारों में समाचार
परोसे जाने का कारण बनते हैं,
सिग्नलों पर भीख माँगते
वो बच्चे
जो कार के अंदर
से कुछ मिल जाने की
उम्मीद में अपने पैर जलाते हैं
पूरे दिन,
चिराग तले अँधेरे का मतलब
समझाती हैं किसानों की
आत्महत्यायें,
मेहमान को भगवान
बनाने वाले देश में
राज करते हैं हैवान,
खून से सराबोर होते हैं
जब खेली जाती है यहाँ होली
जाति व धर्म की,
उसी रंग में नहा जाता है
रोता हुआ वो सूरज
काश नहीं होता ये
सूर्योदय और सूर्यास्त
और नहीं हो पाती
इनमें कोई तुलना
या काश मुझे बना दिया होता
ईश्वर ने अँधा
कि नहीं देख पाता मैं
सूर्योदय और सूर्यास्त!!
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Sunday, May 4, 2008

एक अलग दुनिया की झलक

मुझे नहीं पता कि मैं अपने इस लेख की शुरुआत किस तरह से करूँ? दरअसल अभी पिछ्ले दिनों कम्पनी के कुछ लोगों से पता चला कि ४-५ लोग मिलकर बच्चों को खाना खिलाने के लिये अँध महविद्यालय जा रहे हैं। मैंने भी उन लोगों के साथ जाने का मन बना लिया था। दिल में एक अजीब सी जिज्ञासा थी उस दुनिया को देखने की जहाँ कहा जाता है कि लोग मन की आँखों से देखा करते हैं।


मैं निकल पडा़ शनिवार की उस सुबह को जिस का मैं इंतज़ार कर रहा था। अभी सब लोग पहुँचे नहीं थे, हम दो लोग थे ही थे वहाँ पर। इसीलिये सोचा कि बच्चों से मिला जाये, अंदर जा कर देखा जाये कि वे कैसे रहते हैं।




अंदर घुसे तो दो बच्चे मिले जो चहाँ पर दो सहायक कर्मचारियों के साथ खेल रहे थे। हमने उनके नाम पूछे और वहाँ काम करने वालों से ये भी पूछा कि बच्चे कहाँ कहाँ से आते हैं। हमें पता चला कि उस स्कूल में पढ़्ने के लिये बिहार, यूपी, म.प्र. व आसपास के राज्यों से बच्चे आते हैं।




वो जो बच्चे साथ में थे उन्होंने अपने नाम स्वयं ही बता दिये थे-


विशाल



व रंजीत।


विशाल गाजियाबाद से और रंजीत आजाद्पुर, दिल्ली से ही था। दोनों की खूब पटती है। अच्छे दोस्त हैं दोनों। उनकी शरारतों से ही पता चल रहा था कि खूब मस्ती करते होंगे। जब मैं वहाँ जा रहा था तो मेरे मन में उनके लिये बेबस और लाचार जैसी छवि थी, लेकिन यकीन मानिये किस तरह से उन दोनों ने हमारा दिल जीत लिया ये बताना मेरे लिये बहुत कठिन है।

आँख से बिना देखे ही उन्होंने हमें अपने सारे कमरे, कक्षायें दिखाईं। वे उस पूरे इलाके में बहुत तेज़ी से घूम रहे थे, दौड़ लगा रहे थे। किस प्रकार वे हर कमरे, दालान व अन्य चीज़ों की आकृति को समझ लेते हैं वो अपने आप में अद्भुत है। वहाँ के चप्पे चप्पे से वाकिफ़ थे।



अपने आप ही नल से पानी भरते हैं।

सभी कुछ पढा़ करते हैं वे भी-हिन्दी, अंग्रेज़ी, गणित आदि। हमारी ही तरह- बस तरीका विलग है।



ब्रेल लिपी-जी हाँ, यही स्लेट का प्रयोग करते हैं ये जुझारू, जिन्दादिल बच्चे।




यहाँ रखे खाँचों में जिस तरह से इन टुकड़ों को फँसाया जाता है उस पर अंक निर्भर करता है। टुकड़ों कई दिशा, उनका झुकाव ये सब अंक को निर्धारित करता है।

आम बिस्तर...



कमरा, अपनी कहानी खुद कह रहा है...



यहाँ घुसते ही गाना सुनाई दिया- ज़िन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मुकाम, वे फिर नहीं आते....

टीवी....


उनके लिये जो हलका देख पाते हों या फिर इसका प्रयोग सुनने के लिये किया जाता है।

अपना गम लेके कहीं और न जाया जाये,
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये।




इस बच्चे के मुँह से जब गज़ल के ये बोल सुने तो लगा कि हम लोग कितने कमज़ोर हैं. ज़िन्दगी को जीना हम सीख ही नहीं पा रहे हैं।
थोड़ी देर के बाद ही हमारे बाकि दो साथी भी वहाँ पहुँच गये, और हम लोगों ने खाना शुरू करवाया।



रोटियों की हालत बहुत खराब थी। वे चम्मच से नहीं, हाथ से दाल खाते हैं-मुँह तक पहुँचने से पहले ही दाल गिर सकती है।

भोजन समाप्त हुआ हम फिर नीचे आये। वहाँ वही दो शैतान जिनका जिक्र मैंने शुरू में किया था-विशाल और रंजीत...
और तब सुनाया विशाल ने पूरा गाना- "हट जा ताऊ पाछे ने"..इतना सुरीला मुझे ये कभी नहीं लगा, न ही कभी पूरा सुना था....हम हैरान थे कि उसे पूरा गाना कैसे याद है?



विशाल सोमवार को घर जा रहा है...हमसे पूछ्ता है कि गाज़ियाबाद में उसके बारे में कोई पूछता है क्या?...हमें कोई जवाब नहीं मिल पाता है।
रंजीत १५ मई को जायेगा। मैं सोचता हूँ कि ये छोटे बच्चे दिन/रात की पहचान कैसे कर पाते हैं?

जाने का समय हो रहा था। दोनों हमें दरवाज़े तक छोड़ने आये। उन्हें इससे कोई सारोकार नहीं था कि हम कौन हैं, कहाँ से आये हैं। हम उनके साथ रहे...उनको अच्छा लगा.. हमें और कुछ नहीं चाहिये था।
सोचा था कि सांत्वना देंगे...पर हमें क्या पता था कि उन्हीं से बहुत कुछ सीखने को मिल जायेगा...


वहीं पर ये भी पता चला कि हम जिस महाविद्यालय में गये थे, वो प्राइवेट संस्था चला रही है। बगल में ही सरकारी स्कूल भी है।
तो हमारे कदम उस ओर हो लिये। बहुत ही खराब रास्तों से होते हुए हम पहुँच गये उस स्कूल में...
हालत कुछ इस तरह से थी..




बाकि फ़ोटो मैं खीच नहीं पाया, लेकिन इतना समझ लीजिये कि हालत कुछ अच्छी नहीं कही जा सकती।

दफ़्तर में पंखे लगे हुए थे, कूलर नहीं था। दोनों महाविद्यालयों में बहुत अंतर देखा जा सकता था। हमने उनसे कार्ड माँगा तो प्राइवेट वालों ने अपनी पूरी एक मेगज़ीन ही थमा दी।

सरकारी दफ़्तर से पता चला कि वहाँ कूलर और फ्रिज की जरूरत है...

इस सब के बाद हम वापसी के लिये चल दिये। लेकिन अभी ये निर्णय लेना बाकि था कि बचे हुए पैसों का क्या करना है? रूम कूलर लेते हैं तो वो सरकारी दफ़्तर की शोभा बढा़येगा, फ्रिज लेने जितने न तो पैसे थे और न ही ये यकीन की ये उन ज़रूरतमंद बच्चों तक पहुँच भी पायेगा या नहीं। शायद पानी का कूलर खरीदें, जिससे उनकी ज़रूरत पूरी हो सके... या कुछ और...

जो गज़ल की पंक्तियाँ पहले बच्चे ने गाईं थीं, उस के आगे एक शेर ये भी आता है...

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलों यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये..


शायद हम उसमें कुछ कामयाब हुए...
और हम अपने अपने रास्तों पर वापस चल दिये...

उस अँधेरी दुनिया की एक हलकी सी झलक देखने के बाद, देखने के बाद? जिसे हम महसूस नहीं करते..
वो अँधेरी दुनिया. जिसे उस दुनिया के निवासी नहीं देख सकते...लेकिन हमारी दुनिया को महसूस कर सकते हैं..

अब ये समझ में नहीं आ रहा है कि कमज़ोर हम हैं या वे??

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Saturday, April 26, 2008

अश्लील कौन?

जी हाँ। तो ये है आजकल का सबसे गर्म सवाल। इस विषय पर हमारे देश में पिछले कईं वर्षों से बहस जारी है। जब से समाचार चैनलों की संख्या में तेज़ी हुई है, इस विषय पर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। सबसे ताज़ा उदाहरण बना है क्रिकेट में मनोरंजन के लिये विदेशी बालाओं के द्वारा किया जाने वाला डांस। अब तंग कपड़ों में कोई हिरोइन रीमिक्स गाने का वीडियो करे तो उस गाने पर लोग शादियों में डीजे पर आधी रात तक थिरकते नज़र आयेंगे। पूरी रात चलने वाली पेज थ्री की पार्टियों में, जिसमें नेता, अभिनेता सब शामिल होते हैं, उसमें पूरी शिरकत करते हैं। लेकिन वही लोग इन विदेशी बालाओं के नृत्य पर सवाल उठाते हैं। जिनकी पार्टियों में "बार" में रोक लगने पर वही बार बालायें नाचती दिखाई देती हैं वही "चीयर लीडर्स" के डांस पर उंगली उठाये हुए हैं।
हर इंसान का सोचने का अपना अलग नजरिया होता है, इसलिये सवाल ये नहीं उठाऊँगा कि नृत्य अश्लील है या नहीं। ये आप लोगों पर निर्भर करता है। पर एक और बात है जो मुझे सोचने पर मजबूर करती है कि मैं एक महान ऐतिहासिक संस्कृति की धरोहर वाले भारत के खोखले होते संस्कारों का गवाह बनता जा रहा हूँ।
घटना हैदराबाद के मैच की है। इन्हीं विदेशी नर्तकियों में से किसी की शिकायत आती है कि जहाँ वे नाच रही थीं उसके ठीक पीछे लोग भद्दी टिप्पणियाँ व इशारे कर रहे थे। वे घबरा गईं हैं। जो लोग घर की औरतों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं उनसे इससे ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है? सवाल ये नहीं कि उन्होंने कैसे कपड़े पहने हैं। ये उनका पेशा है और जैसा आयोजक कहेंगे वे वैसा ही करेंगी। हम ही ने उन्हें अपने घर बुलाया था। वे खुद अपनी मर्जी से कतई नहीं आईं हैं। पर इस घटना के बाद वे दोबारा आने से पहले सोचेंगी। विदेश में भारत की जो छवि बनी हुई है उस पर ये घटना दाग के समान है और छवि धूमिल हो गई है। इसमें कोई संशय नहीं है। अश्लील नृत्य किया हो अथवा नहीं किया हो परन्तु हमारे देश में जो बेइज़्ज़ती हुई है उसको शालीनता तो नहीं कह सकते?? कह सकते हैं क्या?? ये हमारे बनाये हुए ही संस्कार हैं। अगर हम कहते हैं कि वे नर्तकियाँ गलत हैं तो सही तो हम भी नहीं?? पहले हम अपने गिरेबान में क्यों नहीं झाँकते?
आये दिन हो रहा दुर्व्यवहार हमारा ही पैदा किया हुआ है। पहले हम क्यों नहीं सुधरते? नर्तकियों को बुलाया जाता है फिर उन्हीं पर रोक लगाई जाती है। ये हास्यास्पद है और भारत की पूरे विश्व में बदनामी करवाने के लिये काफी है। हम लोग मेहमान को भगवान कहते हैं और उसी का ही निरादर करते हैं। अब समझ आया कि ईश्वर इस धरती पर दोबारा जन्म लेने से क्यों घबराता है!!!
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Friday, April 18, 2008

सहनशीलता या कायरता?

ऊपर शीर्षक में दो शब्द दिये हुए हैं। सहनशीलता व कायरता। मैं समझता हूँ कि इन दो शब्दों में बहुत बारीक सी एक लकीर है जो इन दोनों को आपस में विलग करती है। आप सोच रहे होंगे कि अचानक इनकी क्या ज़रूरत आ पड़ी है। दरअसल अभी हाल ही में जो चीन व तिब्बत को लेकर भारत में माहौल चल रहा है, उस से व्यथित होकर मुझे ये लिखना पड़ रहा है।

हम सभी जानते हैं तिब्बत पर चीन का कब्जा है। तिब्बत दुनिया का सबसे ऊँचा इलाका है इसलिये ये "दुनिया की छत" के नाम से जाना जाता है। इस देश का इतिहास सातवीं शताब्दी से शुरू होता है। सन् १९११ में ये चीन से पूरी तरह से अलग हो गया। परन्तु १९४९-५० में चीन के ४०,००० सैनिकों ने तिब्बत पर हमला बोल दिया। तिब्बत के ५००० सैनिक इतनी विशाल सेना का सामना न कर सके और जंग हार गये। तब से चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया हुआ है।

इस विषय में यदि आपने जानना है कि किस प्रकार से जुल्म हो रहे हैं तो आप यहाँ पढ़ें।
मैं इस विषय में ज्यादा नहीं जाऊँगा बस मैं इतना जानता हूँ कि ये गलत हो रहा है। अत्याचार हो रहा है। लेकिन मैं दुखी हूँ कि भारत की सरकार चुप क्यों है? गाँधी, नेहरू की चमची ये सरकार उनके द्वारा किये गये कामों को क्यों नहीं दोहराती? उन्होंने भारत को आजाद करवाया तो ये बहरी और निकम्मी सरकार गूँगी बनकर क्यों बैठी है? चीन के खिलाफ बोलते वक्त ये मिमियाती क्यों है? क्या चीन सही कर रहा है? अगर हाँ, तो भारत ने अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन क्यों किया था? और अगर गलत कर रहा है, तो भारत तिब्बत की मदद क्यों नहीं कर रहा? भाजपा ने तिब्बतियों के समर्थन में रैली निकाली पर क्या वो सरकार में होती तो चीन को दो टूक जवाब दे पाती?

चीन एक ओर कशमीर पर अपना हक जमाये बैठा है तो दूसरी तरफ पूर्वांचल राज्यों में भी घुसपैठ जारी है। सिक्किम और अरूणाचल के कुछ हिस्सों को तो वो बड़े गर्व से अपना कहता है। चीनी राजदूत भारत में कहता है कि अरूणाचल चीन का है और भारत की सरकार चुप रहती है। भारतीय प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर जाते हैं और सीमा रेखा की बात करे बिना ही वापस आ जाते हैं। चीन चाहें जो मर्जी करे भारत कभी भी उसके खिलाफ नहीं बोलता है। किस बात का डर है? एक बार युद्ध में हार गये, क्या इसलिये खौफ खाये बैठे हैं? चीन को मालूम है कि यदि तिब्बत आजाद हो गया तो चीन भारत पर हमला नहीं कर पायेगा। तिब्बत चीन के लिये कवच के समान है।

भारत के पास किस बात की कमी है? आज इसके पास हर तरह के मारक हथियार हैं, जो युद्ध के समय काम आ सकते हैं। चीन से युद्ध करने में हम पूरी तरह सक्षम हैं। तिब्बत को आजाद करवाने से भारत का ही भला होगा। फिर इस नेक काम को करने से पीछे क्यों हटें? भारत का इतिहास रहा है कि इसने बहुत सहनशीलता दिखाई है। कोई भी यु्द्ध करने से पहले कईं बार सोचा है। कभी खुद हमला नहीं किया है। लेकिन यहाँ बात सहनशीलता की नहीं। सही या गलत में से एक को चुनने की है। हमारा पड़ोसी हमारे से मदद की गुहार लगा रहा है और हम डरे सहमें से बैठे हैं। अगर हम तिब्बत को सैनीय मदद न भेजें पर बस उसके आंदोलन को सपोर्ट करें तब भी उनकी हौंसला अफ़ज़ाई के लिये काफी होगा। परन्तु लगता है हमारा देश सहनशील बना रहेगा। आखिर कब तक?मैं समझता हूँ कि भारत सहनशीलता की लकीर फाँद कर कायरता की श्रेणी में प्रवेश कर चुका है, जिसे अपने आप पर विश्वास नहीं है। किस हक से हम आजादी की सालगिरह मनाते हैं जब हम हमारे पड़ोसी को आज़ाद नहीं करा सकते। भारत स्वयं को शांति का दूत कहता है और शांति प्रिय तिब्बतवासियों के लिये कुछ भी नहीं कर रहा है। तीन किमी की ओलम्पिक मशाल की दौड़ औपचारिक व हास्यास्पद लगती है। आज चीन का गुलाम अकेला तिब्बत ही नहीं, भारत भी है।
आपका इस विषय में क्या कहना है। कृपया टिप्पणी करें।
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Friday, April 11, 2008

मिस्टर लाल का परिवार

मि.लाल के परिवार को जानिये मेरी नज़र से। आपकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा।

लो चले हैं मिस्टर लाल संग अपने परिवार के
श्रीमती जी और बच्चों को तोहफे दिलवाने त्योहार के।

आज बच्चे खुश हैं, पापा मोबाइल दिलवाने जा रहे हैं,
बीवी और बच्चों के चेहरे पर स्माइल लाने जा रहे हैं।

बड़े दिनों से जिद थी घर में, मॉल से लायेंगे मोबाइल,
चाहें घर में पानी न हो, या फिर न हो रिफाइंड ऑइल।

कोई इनके दिल से पूछे कितने का फोन खरीद पायेंगे,
दस तारीख भी तो सर पे है, होम लोन कैसे चुका पायेंगे।

दिल्ली के एक इलाके में अभी अभी एक घर लिया है ,
आधी पगार है उसमें जाती, ओवरटाइम भी खूब किया है।

लाल जी हैं परेशान, सरदी में आ रहा है पसीना,
गाड़ी की भी तो फरमाइश बाकी है, आने दो अगला महीना

आबादी की तरह बढ़े जा रहा है क्रेडिट कार्ड का बिल ,
परिवार के खर्चे से तेजी से धड़क रहा है लाल जी का दिल।

अभी हाल ही में तो डूबे थे शेयरों में पचास हजार,
साठ हजार पगार महीने की, फिर भी लगते हैं लाचार।

न ज़मीन अपनी है, न घर अपना है, न ही अपनी है गाड़ी,
सस्ते लोन और लालच ने लाल जी की बचत बिगाड़ी।

किसी भुलावे में जी रहा है, मध्यम वर्ग का हर परिवार
मार्केट, मनी, मॉल, मोबाइल से हर कोई है कितना बीमार।
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Tuesday, April 1, 2008

खबरिया चैनलों की होड़ में बिगड़ता बचपन

मैं ये लेख पहले लिखना चाहता था परन्तु कोई न कोई बात हो जाती और इसमें देरी हो जाती। पर शनिवार को जो बात हुई उसके बाद मुझे ये लिखने के लिये समय निकालना ही पड़ा। अभी कुछ महीनों से एक नाम जो हर हफ्ते मीडिया की खबरों में होता है वो है खली उर्फ दिलीप सिंह। चाहें कोई देश के प्रधानमंत्री का नाम नहीं जानता हो, पर आज की तारीख में खली के नाम और काम से सब वाकिफ़ हैं। पेशे से WWE का पहलवान है। इस तरह की कुश्ती भारत में करीबन १७ सालों से दिखाई जा रही है। जबसे केबल चालू हुआ, तब से। मैं छोटा हुआ करता था और ये कुश्ती बहुत पसंद थी, परन्तु वही देख पाते थे जिनके यहाँ केबल था। अब हर घर में केबल है तो सभी देखते हैं। ट्रम्प कार्ड्स भी खूब बिका करते थे।

भारत में इस कुश्ती के काफी दर्शक हैं और इन दर्शकों में बच्चों की तादाद शायद ९० फीसदी से ऊपर होगी। ये हाल ही में और ज्यादा चर्चा में तब आई जब खली का नाम भी इस कुश्ती में शामिल किया गया। खली भारत का है इसीलिये इस कुश्ती की खबर हर चैनल पर दिखाई जाने लगी। जिस कुश्ती का परिणाम २-३ सप्ताह के बाद पता चलता था वो उसके खत्म होते के साथ ही पता चलने लगा। वो दिन दूर नहीं जब इसका सीधा प्रसारण भी होने लगेगा। लेकिन इन सब के बीच ये कोई ध्यान नहीं दे रहा है कि मासूम बच्चों पर क्या असर पड़ेगा।

मुझे गुस्सा आता है मीडिया पर जो "तेज़" व "सच्ची" खबर आगे रखने का दावा करते हैं पर इन वादों और दावों को पूरा करने में पूरी तरह से नाकामयाब हैं। ये सभी जानते हैं कि इस कुश्ती के पहलवान पूरी तरह से प्रशिक्षित हैं व ये लड़ाई फिक्स होती है। यानि कि परिणाम पहलवानों को पहले से ही पता होता है व जो भी दाँव उन्हें लगाना होता है वे उसकी पहले से ही पूरी प्रैक्टिस करके रखते हैं। किस दाँव को कैसे खेलना है ये उन्हें सिखाया जाता है। और इसके उन्हें पैसे भी खूब मिलते हैं। ये एक धारावाहिक की तरह है जिसके सारे किरदारों पर कहानी लिखी जाती है और ये किरदार उस कहानी को निभाते हैं। पर ये सब बातें हमारा मीडिया नहीं बताता। क्योंकि यदि ऐसा किया गया तो उनके चैनल की टी आर पी कम हो जायेगी। चैनलों का मकसद केवल टी आर पी को बढ़ाने का है। हमारे समय में मीडिया इतना नहीं था इसलिये ये सब बातें हमें पता चलने में देरी हुई। अब इस कुश्ती को देखते हुए ये पता होता है कि ये सब दाँवों की इन पहलवानों को आदत है। पर बच्चों को ये सब कौन बतायेगा?

अब मैं बताता हूँ कि गत शनिवार हुआ क्या था। मेरी बुआ का लड़का जो महज ६ साल का है हमारे घर आया हुआ था। काफी होशियार है और कम्प्यूटर को बखूबी इस्तेमाल करता है। वो मेरे एक और छोटे भाई से खली और ट्रम्प कार्ड्स के बारे में बातें कर रहा था। इस पर मैं उसे समझाने लगा कि ये सब लड़ाई नकली होती है और उस पर ध्यान न दे।
"पर न्यूज़ में दिखाते हैं, तो क्या वो गलत बतायेंगे?"। मैं उसका जवाब सुनकर हैरान रह गया और सच बताऊँ तो मैं इस तरह के जवाब के लिये तैयार नहीं था।

दरअसल इसी तरह की बातें सभी बच्चों के मन में गहरा प्रभाव छोड़ती है। बच्चे हिंसक हो जाते हैं और यही मीडिया फिर स्कूल प्रशासन को दोषी करार देता है। सच्ची खबरें देने का ढोंग करते ये झूठे चैनल केवल अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे हुए हैं। कोई भी ये सच्चाई बताने की हिम्मत नहीं कर रहा है। मैं आप सब से गुजारिश करूँगा कि आपके रिश्ते में जितने भी छोटे बच्चे हैं उन सब को सिखायें कि इन सब बातों में न पड़ें|

वरना वो दिन दूर नहीं जब हर स्कूल में गोलियाँ चलेंगी। और इन तेज़ , चालाक, झूठे खबरिया चैनलों को एक और सनसनीखेज़, सच्ची व दर्दनाक खबर मिल जायेगी जो इनका चैनल अगले एक सप्ताह तक चलाती रहेगी।
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Monday, March 24, 2008

एक शहर कईं चेहरे

अभी हाल ही में मुझे चेन्नई शहर में जाने का मौका मिला। हर बड़े शहर की तरह वहाँ भी कंक्रीट के बड़े बड़े पुल बन रहे थे। दिल्ली से काफी हद तक जुदा था। लोगों का रहन सहन, खान पान, भाषा, कार्यशैली सब विलग हैं। कैसे भिन्नता है इसके बारे में कभी आगे के लेखों में जिक्र करूँगा, आज कुछ और ही बताने जा रहा हूँ। ये मेरे अनुभव हैं जो वहाँ के लोगों से मिलकर, उनसे बातें कर के मैंने जाने|

आपके अपने आज के विचार बचपन से ही बनते जाते हैं। आप किस तरह से जीवन व्यतीत करते हैं, आपके परिवार का माहौल कैसा है, आपके घर के आसपास व शहर का राजनैतिक व समाजिक वातावरण भी आपकी सोच पर पूरा असर करता है।

शुरू करता हूँ उस घटना से जो हो सकता है आपको आशावादी बना दे। हुआ यूँ कि मैं और मेरा दोस्त समुद्र किनारे टहल रहे थे। चेन्नई शहर में आपको विदेशी लोग काफी नजर आ जायेंगे जो वहाँ काफी पहले से रह रहें हैं व वहाँ के लोगों के साथ जुड़े हुए हैं। किनारे पर जो विदेशी महिलायें सागर की ओर देख रहीं थीं मेरे दोस्त ने उन से पूछा कि आप रेत पर बैठीं हैं, क्या आपको वहाँ गंदगी फैली हुई नज़र नहीं आती? वहाँ से जवाब मिला, "हम सागर की खूबसूरती को देख रहें हैं फिर गंदगी कौन देखे?"। जीवन की सच्चाई है। हम हमेशा लोगों की गलतियाँ व बुराइयाँ देखते हैं, पर अच्छाइयाँ हमें नज़र नहीं आतीं।

दूसरी घटना तब घटी जब हम सड़क पर चल रहे थे कि तभी मेरे दोस्त की नज़र एक ऐसी लड़की पर पड़ी जो साइकिल के साथ किसी दुकान में जाने के लिये खड़ी थी। पता नहीं क्या हुआ कि वो उसके पास गया और किसी घटना का जिक्र करने लगा। दरअसल मेरे दोस्त ने एक बार उस लड़की को सड़क किनारे किसी बच्चे को खिलौना देते हुए देखा था। तो वो उससे बात करके पूछना चाहता था कि क्या वो वही थी? उस लड़की ने कहा कि वो वहाँ बहुत पहले से है और वहाँ के लोगों व बच्चों के साथ बहुत मिलजुल चुकी है। उससे पता चला कि वो फ़्रांस की निवासी थी।(देयर इज़ ए बॉंडिंग बिटवीन अस) उसका जवाब सुनकर मैं दंग रह गया कि एक वो है जो विदेशी होकर भी भारतीय लोगों को इतना प्यार बाँटती है और एक हम हैं जो आपस में लड़ते रहते हैं। कभी महाराष्ट्र, कभी पूर्वाँचल और कभी द्रविड़ प्रदेशों में हम मारपीट करते हैं। मुझे शर्म आ रही थी।

अगली घटना बहुत दुःखदाई थी। मैं चेन्नई में एक महीने से ऊपर रहा और कभी भी मैंने ये नहीं देखा कि उत्तर भारतीयों के साथ कोई बुरा सुलूक किया हो। किया भी हो तो मुझे इसका आभास कभी नहीं हुआ। पर मेरे दिल्ली आने से ठीक एक रात पहले जब मैं अपने दोस्त के साथ रेस्तरां में भोजन कर रहा था कि तभी हमारी टेबल के पीछे कुछ तमिल बोलने वाले लोग आकर बैठे। मेरी पीठ उनकी तरफ थी पर मेरा दोस्त उन्हें ठीक से देख पा रहा था। वे चार लोग थे। रात के करीबन साढ़े दस बज रहे होंगे, ज्यादा लोग रेस्तरां में नहीं बचे थे। वेटर भी खाना खा रहे थे। हम खाना खा रहे थे और आपस में बात कर रहे थे। क्योंकि हम दोनों ही दिल्ली की तरफ के थे तो हिन्दी में ही बातें कर रहे थे। तभी मुझे पीछे से आवाज़ें सुनाई देने लगी। "ऐ, नो हिन्दी, नो हिन्दी"....."हिन्दी पीपल, खच खच खच", ये वाक्य एक आदमी ने हाथ से चाकू की तरह काटने का इशारा करते हुए कहा। मेरा दोस्त ये सब देख रहा था। मेरी पीछे मुड़के देखने की हिम्मत नहीं हुई हालाँकि एक दफा कोशिश जरूर करी थी। पर मेरे दोस्त ने पीछे देखने से मना किया। हम लोग तब खाना खत्म ही करने वाले थे। वेटर ने बाद में माफी भी माँगी। पर तब तक मैं चेन्नई का एक और रूप देख चुका था। शायद ये वहाँ का राजनैतिक रूप था। क्या यही वहाँ की सच्चाई है? क्या मिलता है नेताओं को ऐसी बातों से? ये सवाल मेरे मन में आज भी गूँज रहे हैं।

अगले ही दिन मेरी वापसी थी। हवाई जहाज में मेरी सीट रास्ते के बगल वाली थी। खिड़की की तरफ एक १५-१६ साल की लड़की बैठी थी व बीच में मुझसे करीबन ७-८ वर्ष बड़ी उस लड़की की बहन थी। लड़की की बहन की शादी हो चुकी थी और वे एक शादी के समारोह में शामिल होने दिल्ली आ रहीं थीं। मैं अपनी डायरी के पन्नों में कुछ लिख रहा था तो उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं दिल्ली क्यों जा रहा हूँ। बस वहीं से हमारी बातें शुरू हुईं। मैंने उन्हें बताया कि मैं करीबन ३५ दिन चेन्नई में रहके अब वापस दिल्ली जा रहा हूँ। वे मूलतः हैदराबाद के पास की किसी जगह से थीं व चेन्नई में उनका विवाह हुआ था। उनकी हिन्दी में मुझे कोई गलती नहीं दिखी। बहुत साफ बोलतीं थी वे। बातों ही बातों में मैंने उन दीदी को अपनी पिछली रात वाली घटना बताई। उन्होंने कहा कि पहले ये काफी होता था पर अब लोगों को हिन्दी आती है और वे बोलते भी हैं। और जो लोग ऐसा करते भी हैं तो वे राजनैतिक लोगों की वजह से। उनकी बातों से लगा कि जो पढ़ा लिखा बुद्धिजीवी वर्ग है शायद उसको फर्क न पड़ता हो परन्तु वो तबका जो बेरोजगार है व एक किस्म की मानसिक बीमारी से ग्रस्त है व जो पिछले कईं सालों से आँख मूँदे राजनेताओं की जी हुजूरी करते जी रहा है केवल वो ही ऐसी हरकतें कर रहा है।

ये चार वे घटनायें जो एक ही शहर के उन लोगों के विचार दर्शाती हैं। आप किस शहर को, किस व्यक्ति को, किस घटना को किस नज़र से देखते हैं ये सब आप पर निर्भर करता है। चेन्नई की हर एक घटना ने मेरी सोच को व मेरे जीवन को प्रभावित किया है। इसीलिये मैंने ये सब आपके समक्ष रखीं हैं। आगे अभी और भी ऐसी ही घटनायें आपके सामने रखूँगा जैसे ही मुझे याद आयेंगी। तब तक के लिये चेन्नई की मेरी यात्रा से इतना ही।
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Tuesday, March 11, 2008

बैसाखियों के सहारे भारत

मान लीजिये किसी के पैर में चोट लग गई है तो आप सबसे पहले क्या करेंगे? जाहिर सी बात है कि चोट ठीक करने का प्रयास करेंगे। पर यदि कोई चिकित्सक उसको बैसाखियाँ पकड़ा दे और चोट का इलाज न करे तो आप उसको पागल ही कहेंगे। ठीक है? अब "ब्रेकिंग न्यूज़" ये है कि आजकल ऐसे चिकित्सक भारत में आम हो गये हैं। और कमाल की बात ये है कि रोगी भी इलाज की बजाय बैसाखी पसंद कर रहे हैं। आखिर क्यों?

पिछले कुछ वर्षों में छात्रों में आत्महत्या जैसी घटनायें बढ़ गईं हैं। सरकार व सी.बी.एस.ई ने इस बाबत कदम उठाये हैं। कोशिश रहती है कि परीक्षाओं से ठीक पहले मनोचिकित्सक से बात करवाई जाये जिससे परीक्षा का भय कम हो सके। पर इस तरह "क्रैश कोर्स" करेंगे तो कैसे चलेगा? पूरे साल की मेहनत है भई। सी.बी.एस.ई भी हर साल अलग अलग बदलाव करके कोशिश करती है कि परीक्षायें सरल हो जायें, बच्चे पास हो जायें। एक वर्ग तो इन्हें समाप्त करवा देना चाहता है। कमाल है!मुझे ये समझ नहीं आ रहा है कि आत्महत्याएं अभी क्यों बढ़ रहीं हैं? सरल से सरल पेपर होने पर भी छात्र ऐसे कदम उठा रहे हैं। आज से १०-१५ साल पहले तक तो ऐसा नहीं था। जबकि कहा जाता है कि पेपर तब ज्यादा कठिन हुआ करते थे।
दरअसल हम समस्या की जड़ तक पहुँचने की बजाय उसका जल्द समाधान करने के चक्कर में एलोपैथी खा रहे हैं और होम्योपैथी से दूर भाग रहे हैं। हम ये नहीं समझ रहे कि बच्चों को गाइडेंस चाहिये जो उसको अभिभावकों से मिले। पर आज के समय में किसी के पास बच्चों के लिये समय नहीं है और उनके मन में भय आ जाता है। ऊपर से माता-पिता का जोर की ९० प्रतिशत अंक ही आने चाहियें। आप सभी ने "तारे जमीं पर" तो देखी ही होगी। उम्मीद है कि कुछ सीखा ही होगा। इन सब दबावों में बच्चा अपने आप को अकेला समझने लगता है और इसी उधेड़बुन में गलत कदम उठा लेता है। और हम कहते हैं कि परिक्षा कठिन थी। अगर ये बात है तो १०-१२ वर्ष पहले इससे ज्यादा आत्महत्या के किस्से होने चाहियें थे। पर ऐसा नहीं है। परीक्षायें समाप्त करना ही हल नहीं है। बच्चों को समझाया जाये कि ये तो बहुत छोटी परीक्षा है आगे ज़िन्दगी में इससे बड़ी परीक्षायें देनी हैं। इनहीं छोटी छोटी परीक्षाओं से ही सीखा जाता है। ये सब बताने की जगह उन्हें ग्रेडिंग प्रणाली की बैसाखी थमा देना मेरी नज़र में एक बचपने वाला कदम है।
ऐसा ही एक कदम हम ६० वर्ष पहले उठा चुके हैं जब आरक्षण का बीज हमने बोया था। फसल कितनी खराब उगी है इसका पता आज के समाज को देख कर लगाया जा सकता है। हर भारतीय बैसाखियों के सहारे चलने पर आतुर है। शायद हमें इनकी आदत हो गई है।
मुझे आज से अगले ३० बरस बाद की अपंग भारत की तस्वीर नज़र आने लगी है। क्या आप भी वही देख रहे हैं?
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Friday, March 7, 2008

अनेकता में Unएकता

भारत एक ऐसा देश है जिसमें २९ राज्य हैं। हर राज्य व केंद्र शासित प्रदेश की अपनी अलग ही खूबी है, अलग पहचान है। ये पहचान बनती है वहाँ के खानपान से, रहन सहन से, भाषा से, कपड़ों से व और भी कईं कारणों से। सन् १९४७ में जब हिन्दुस्तान का विभाजन हुआ व पाकिस्तान बना तब कहते हैं कि राजनेताओं ने अलग अलग राज्यों के राजा महाराजा व वहाँ के स्थानीय नेताओं से मिलकर एक ही देश में शामिल होने के लिये मनाया था। और इस तरह अलग अलग प्रदेश एक देश बने थे और हर जगह गूँजने लगा था एक ही नारा। अनेकता में एकता।

भारत में न जाने कितने ही तरह के लोग रहते हैं। करीबन २० भाषायें हैं और बोलियाँ कितनी हैं इसके बारे में मुझे नहीं पता। सबसे ज्यादा बोले जाने वाली भाषा हिन्दी है। भारत मुख्यतया ४-५ हिस्सों बाँटा जा सकता है।
एक सबसे ऊपर उत्तर में कश्मीर। जिसका ४७ से अब तक कोई हिसाब किताब नहीं है। पाकिस्तान उसे अपना कहता है, हिन्दुस्तान अपना कहता है और वहाँ रहने वाले लोग न पाकिस्तान में जाना चाहते है और न ही भारत में। अजीब विडम्बना है। ऐसे राज्य को अपना कहें भी तो कैसे जब वहाँ के लोग ही विरूद्ध हैं। क्या यही राजनीति है? मुझे जवाब नहीं पता।

दूसरे आते हैं हिन्दी भाषी राज्य जिसमें हिमाचल, पंजाब (इस पर सवाल उठाना चाहें तो उठा सकते हैं पर मैं पंजाबी को हिन्दी के बहुत नज़दीक मानता हूँ), दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार/झारखण्ड, मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ व कुछ हद तक गुजरात शामिल हैं। ये वो राज्य हैं जहाँ की खबरें हम लोग ज्यादातर सुनते हैं। हिन्दी या उससे मिलती जुलती भाषायें अथवा बोलियाँ यहाँ बोली जाती हैं। यहाँ आपस में मतभेद अलग ही कारणों से है। यहाँ सदियों पहले बनाई गई जाति प्रथा हावी है। कुछ जातियाँ पिछड़ी हुई मानी जाती हैं पर उनका विकास उन राजनेताओं के भरोसे है जो उनका इस्तेमाल राजनैतिक रोटियाँ सेंकने में करते हैं। आरक्षण उसकी जीती जागती मिसाल है। प्राथमिक शिक्षा न दे कर उच्च शिक्षा में आरक्षण देना उन बच्चों के लिये बैसाखी थमाने लायक है, जिसके वे आदी हो चुके हैं। कहने को सबका धर्म एक ही है पर कोई मीणा है, कोई जाट है, कोई गुर्जर है, कोई राजपूत है। इसी के चलते कभी "आजा नच ले" पर विवाद होता है तो कभी "जोधा अकबर" का। समझ में ये नहीं आता कि जब ये फिल्में बन रहीं होती हैं तब विवाद नहीं होता अपितु बनने के बाद होता है। क्या ये भी राजनीतिक चालें तो नहीं?

आइये आगे चलते हैं महाराष्ट्र की तरफ जहाँ मराठी लोग रहते हैं। यहाँ के बारे में आज के बारे में क्या बोलूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है। पर एक बात मैं ठाकरे परिवार से कहना चाहूँगा कि जितने भी मराठी विदेशों में जा कर बसे हुए हैं उन सब को वापस बुला लें क्योंकि वे लोग भी विदेशी लोगों के लिये "बिहारी" ही हैं। जैसे बिहार के लोग विभिन्न राज्यों में जा कर मेहनत करते हैं व अपना पेट पालते हैं, ठीक वैसे ही हम भी पैसा कमाने के लिये विदेश का रूख करते हैं। आगे से आपके परिवार के लिये गुजारिश है कि पासपोर्ट व वीसा आपके पास होना चाहिये यदि आप महाराष्ट्र से बाहर जाते हैं तो। अभी हाल ही में मैं चेन्नई गया था, तो वहाँ चाट वाला मिला जो बिहार से ही था। उसने कहा कि ऐसा क्यों है कि सबसे ज्यादा साक्षर राज्य यानि केरल से ज्यादा आई.ए.एस अधिकारी बिहार जैसे पिछड़े राज्य से बनते हैं। जवाब आसान है- क्योंकि वहाँ के लोग मेहनती हैं।

अब रूख करते हैं द्रविड़ प्रदेशों का। यहाँ भी हालात कुछ ज्यादा अच्छे नहीं हैं। यहाँ पर स्थानीय नेताओं व पार्टियों का दबदबा ज्यादा है। मीडिया में भी कम कवरेज मिलता है। क्या आपको पता चला कि रामेश्वरम में १६ गायों की असामयिक मृत्यु हो गई। पता कैसे चलेगा जब मीडिया वहाव ध्यान ही नहीं देता। मैंने ये बात अपने पिछले लेखों में भी बताई है। और वहाँ के कुछ लोगों में भी हिन्दी भाषियों के लिये बैर ही है।

यदि बंगाल व पूर्वोत्तर राज्यों की तरफ जायें तो हालात बद से बदतर होते जायेंगे। उस तरफ कोई राजनेता ध्यान नहीं देता है। आतंकवाद वहाँ है, भूख वहाँ है, अशिक्षा वहाँ है, बेरोजगारी, रोटी, कपड़ा, मकान की समस्या वहाँ है। इन सबके बावजूद टीवी पर उन राज्यों की खबर तभी आती है जब वहाँ कोई हादसा हो जाता है। बहुत शर्म की बात है। और मुझे लगता है कि यही हाल रहा तो वहाँ को लोग कब अलग देश की माँग करें पता नहीं।

इतने सारे राज्यों में घूमें ये तो पता चल गया कि भारत में अनेकता है। पर अगर आज को देखूँ तो मैं बहुत निराशावादी हो जाता हूँ और मुझे नहीं लगता कि इस समय कोई एकता बची है। लोगों के मन में द्वेष का भाव भरा हुआ है और हर कोई केवल अपने राज्य की सोच रहा है, पूरे देश की नहीं।

ये तो अभी हम लोगों ने लेख में धर्म या मजहब नाम के राक्षसों को तो छुआ ही नहीं है। धर्म पर मैं अपने विचार पहले ही यहाँ (http://tapansharma.blogspot.com/2007/01/blog-post_4643.html) जाहिर कर चुका हूँ।
मुझे डर है कि कहीं एक पुराने गाने की तर्ज पर कुछ ही सालों में हमें एक नया गाना सुनने को न मिल जाये-
इस भारत के टुकड़े हजार हुए,
मेरे भारत के टुकड़े हजार हुए,
कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा,
कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा।
क्या मैं गलत हूँ जो अगर मैं कहूँ कि आज के दौर में अनेकता में Unएकता छुपी हुई है?
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Sunday, March 2, 2008

वो सवा घंटा

आज सोचा था कि कुछ मालामाल क्रिकेट पर लिखा जाये, शायद पैसा हम पर भी मेहरबान हो जाये। पर अपनी ऐसी किस्मत कहाँ? आज नोएडा और दिल्ली के बीच जब सफर किया तो पता नहीं क्यों इसी पर लिखने का मन कर रहा है। हालाँकि काफी बार मैं इस रूट पर सफर कर चुका हूँ। पिछले २.५ साल से कर रहा हूँ पर बस से सफर का जो आनन्द है वो कैब में कहाँ? :-) मुझे पूरी उम्मीद है कि इसे पढ़ने के बाद जो दिल्ली वाले पाठक हैं उन्हे खुद पर बीते हुए कुछ वाकये याद आ जायेंगे। और जो दिल्ली के बाहर हैं उन्हें घर बैठे दिल्ली के सफर का मजा मिलेगा।

चलिये शुरू करते हैं कश्मीरी गेट से नोएडा का सफर व्हाइट लाइन बस में। ये वो बस होती है जिसका किराया एक ही होता है। इसमें कोई स्लैब्स नहीं होते। फिक्स्ड रेट १० रू। मैट्रो स्टेशन से बाहर आते ही मुझे ये बस खड़ी मिली और मैं उसमें चढ़ गया। नज़रें घुमाईं और मुझे एक सीट मिल गई। खिड़की की सीट थी तो मैं खुश था। सोने को भी मिल जायेगा और भीड़ से भी बचा जा सकेगा। फिर धूप की किसे फिक्र हो।

मैं बैठा और थोड़ी ही देर में मैंने अपने बैग से एक उपन्यास निकाल लिया। आदत से मजबूर हूँ, लम्बा सफर हो तो एक ही सहारा होता है। आसपास वाले हैरान हुए कि ये हिन्दी में क्या पढ़ रहा है? खैर बहुत जल्द लालकिले पर पहुँच गये। बस में लगातार लोग चढ़ रहे थे। कंडक्टर के लिये तो जगह खत्म होने को ही नहीं आ रही थी। देखते ही देखते दरियागंज आ गया और बस खचाखच भर गई। अगर बस की सीटिंग ४० लोगों की हो तो दिल्ली की बसों में खड़े होकर ८० लोग आ जाते होंगे्। कुल मिलाकर १०० से कम तो नहीं हो सकते। शतक तो ठोका ही जायेगा।
ओ भाई, कितनी बोरियाँ हैं तेरे पास? कंडक्टर ने एक आदमी से जब पूछा तो उसने डरते हुए जवाब दिया, "तीन"।
"तीन बोरियों के हिसाब से ३० रूपये निकाल ले फटाफट"
"२० ही तो लगेंगे"
उस आदमी के जवाब पर कंडक्टर भाई साहब बिफर गये और ये हाथ हवा में लहराया।
"देने हों तो दे, वरना सामान लेकर यहीं उतर जा, पीछे बड़ी सवारियाँ आ रहीं हैं"
आदमी सहम गया। क्या करता, ३० रू निकाल कर उसके हाथ में थमा दिये। दिल्ली सरकार के हिसाब से १०वीं पास ही कंडक्टर बन सकता है|पर इस तरह से किसी से बातें करना तो गँवारों की तरह लगता है।

"रे ताऊ, तैने समझ न आई के, भीतर ने हो ले बाकी सवारी भी आयेंगी अभी"। एक और दसवीं पास की आवाज़ (?)। दरअसल हर बस में एक सहायक भी होता है। जो आगे की सीट पर बैठा हुआ, टूटी हुई खिड़की से बाहर झाँकता है और अपने हाथों से बस के बाहर का हिस्सा पीटता रहता है। वो बताता है कि ड्राइवर को बस कितनी तेज़ चलानी है, और कहाँ रूकना है। कोई भी स्टॉप आयेगा तो आगे आने वाले १० जगहों के बारे में होटल के बैरे के मीनू बताने से भी तेज़ बोलता रहेगा। अब हुआ यूँ था कि किसी बुजुर्ग का बैग अड़ रहा था और वे बस में अंदर घुस नहीं पा रहे थे। घुसते भी कैसे, जहाँ खड़े होने के लिये २ लाइनें होनी चाहियें, वहाँ तीन और कहीं कहीं पर चार लाइनें थीं। अब आप अपना दिमाग चलाइये और हिसाब लगाइये कि २ की जगह ४ लाइनें हों तो निकलने की कितनी जगह मिलेगी।
पर दिल्ली की बसों में यही जुगाड़ तो चलता है।

ये तो शुक्र था कि आज उसी रूट पर चलने वाली कोई और बस उसी समय नहीं चल रही थी, वरना तो फर्मूला वन होते देर नहीं लगनी थी। वैसे भी ग्रेटर नोएडा में ही ट्रैक बनाने की योजना है। बस की आधी खिड़कियाँ टूटी हुईं थीं। गनीमत है कि सर्दियों के खत्म होने पर मैं उस बस से सफर कर रहा था, वरना कुल्फी जमते देर नहीं लगनी थी। मुझसे २ सीट आगे की खिड़की ऐसी थी मानो किसी ने उलटी कर रखी हो। हो भी सकता है। कुम्भ के मेले में तबीयत तो खरीब हो ही सकती है। खड़े हुए लोगों को देख कर मुझे अपनी किस्मत अच्छी लगने लगी थी।

उपन्यास के १५ पन्ने पढ़ने के बाद मुझे नींद आने लगी थी और मैं सो गया। जब नींद टूटी तो पता चला कि अगला स्टॉप मेरा ही था।

बैग में फटाफट किताब डाली। और मोबाइल फोन भी। पर्स चैक किया, वो पहले से ही बैग में था। आप सोच रहे होंगे कि किताब तो समझ आती है, पर फोन और पर्स क्यों डाला बैग में। २ बार पर्स और १ बार फोन जेब कतरों के हवाले कर चुका हूँ मैं। इसलिये बचाव के लिये ऐसा कदम मैं हमेशा उठाता हूँ। कोशिश रहती है कि पर्स बैग में ही रहे, और ज़रूरत के हिसाब से खुले पैसे जेब में।

पर अब मेरे सामने १० कदम का पहाड़ जैसा रास्ता था जो मुझे अगले एक मिनट में पूरा करना था।
ओह! जैसे ही पैर सीट के बाहर रखा बगल में खड़े एक आदमी ने मुझे घूरा। मेरा पैर उसके पैर पर जो पड़ गया था।
आगे एक सज्जन ने अपना एक बैग भी बस के फर्श पर रखा हुआ था। जहाँ पैर रखने की जगह नहीं वहाँ बैग!!
"अरे हटो भाई, आगे जाने दो" मैं ये शब्द दोहराता हुआ, भीड़ को चीरता हुआ, चला जा रहा था। सुबह जो खाकर निकला था, वो सारा अब हजम हो रहा था। मैं सोच रहा था कि पेट को पाचन क्रिया करने की ज़रूरत ही क्या है? बस में चढ़ो और भीड़ के धक्कों में झूलो। कुछ ऐसा ही उस वक्त मुझे महसूस हो रहा था।५ कदम चल चुका था और आगे का रस्ता संकीर्ण होता जा रहा था। पहाड़ो पर बर्फ गिरती है तो ज़मीन पर पैर नहीं पड़ते। ठीक वैसा ही मेरे साथ हो रहा था। ५-६ कदम चलने के बाद भी पैर फर्श तक नहीं पहुँच पा रहे थे। ३ कतारों को काट के आगे बढ़ रहा था तो मुझे लगने लगा कि बस में सफर करने वाले हर आदमी को बहादुरी पुरस्कार मिलना ही चाहिये। बैग को कंधे से मैं कब का उतार चुका था और वो मेरे दाहिने हाथ में ऊपर लटक रहा था। उसी दाहिने हाथ से मैंने छत पर लगा हुआ डंडा पकड़ा हुआ था। मेरे हाथ पैर अब तेज़ी से आगे की तरफ बढ़ रहे थे और मुझे अपनी मंज़िल नज़र आने लगी थी। वाह, आगे गेट है। पर दरवाज़े की ३ सीढियों पर ४ लोग पहले से ही खडे़ थे और कमाल की बात ये थी कि उनमें से किसी को भी वहाँ नहीं उतरना था। शुक्र है कि बस खडी थी वरना कईं बार तो लोगों को बस से गिरते हुए भी देखा है, जब चालक जानबूझ कर जल्दबाजी के चक्कर में बस रोकता ही नहीं है।

पर आखिरकार, मेहनत रंग लाई और मैं झूले खाता हुआ उतरा व खुली हवा में फिर से साँस लेने लगा।

ये वो सफर है जिसका चश्मदीद दिल्ली में रहने वाला हर वो शख्स है जो इन बसों में सफर करता है। दिल्ली सरकार इन बस मालिकों का कुछ क्यों नहीं करती जो लोगों की जान जोखिम में डाल कर ज़रुरत से ज्यादा लोग भर लेते हैं। सरकार उन सहायकों व चालकों का कुछ क्यों नहीं करती जो यात्रियों से बुरी तरह पेश आते हैं। लगता ही नहीं कि ये दिल्ली के स्कूलों से पास हुए १०वीं व १२वीं के छात्र हैं। सवाल बहुत हैं पर जवाब किसी अफसर के पास नहीं है। क्योंकि यही बस मालिक इनका पेट भरते हैं। चलिये मेरा ये सफर यहीं समाप्त होता है। अरे हाँ, एक बात बतानी तो मैं भूल ही गया। वापसी में ऐसी ही एक बस में मैं ३० मिनट खड़े होकर गया। सोच रहें हैं कि मेरा क्या हुआ होगा। शायद इसीलिये मैंने आप सब के साथ अपना दुःख बाँटने के लिये ये लिखा है।
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Wednesday, February 20, 2008

रंगीन होती भारत की सड़कें

जब आप इस शीर्षक को पढ़ेंगे तो सोचने लगेंगे कि तपन ये किस बारे में लिख रहा है। होली आने में तो अभी करीबन एक महीना है क्योंकि तभी सड़कें रंगों से सराबोर होती हैं तो ये किस बारे में बात कर रहा है?

होली में हम रंग हम पिचकारी से डालते हैं परन्तु यहाँ जो आए दिन सड़कों पर लाल-लाल रंग हम डालते हैं उसका क्या? मुद्दे पर आता हूँ। मैं बात कर रहा हूँ पान तम्बाकू खाने वालों के मुँह से निकलने वाले लाल रंग से रंगे हुए थूक का!!
कभी कोई रिक्शे वाला पान चबाये हुए रिक्शा चलाते चलाते सडक पर थूक देता है और लीजिये जनाब सड़क पर एक दिलचस्प डिज़ाईन तैयार। और कभी कोई व्यक्ति अपनी मस्ती में मगन सड़क किनारे चलते हुए, अपनी बाईं ओर गर्दन करता है और मुँह से पीक निकालता है और फुटपाथ, "थूक बाथ" बन जाता है| अब वो ये नहीं देखता कि पीछे से कोई आ रहा है या नहीं।

वाह!! पूरा सीन नज़रों के सामने तैर गया। अब तो चलते हुए सिर्फ ट्रैफिक का ही नहीं थूक वर्षा का भी ख्याल रखना होता है। ये तो बात हुई रिक्शे चलाने वाले व पैदल चलने वालों की। कहते हैं कि कार खरीदने का मतलब ये नहीं कि अक्ल भी खरीद ली गई। जब कार का शीशा नीचे होता है या ट्रैफिक सिग्नल पर कार का दरवाज़ा खुलता है तो आपने किसी सज्जन को सड़क रंगीन करते ज़रूर देखा होगा।

चाहे किसी भी तबके के लोग हों, चाहें अनपढ़ हों अथवा ऊँचे स्थान पर बैठे पढ़े लिखे मूर्ख लोग, सब के सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं। अब मुँह में पान डाला है तो थूकना तो पड़ेगा ही।

ज़रा इन सज्जनों से कहें कि अगर पान खाने का इतना ही शौक है तो अपने घर के फर्श पर क्यों नहीं थूकते? दरअसल हम अपने घर को ही अपना समझते हैं। जब हमारे हक की बात आती है तो हम कभी दिल्ली हमारी है, मुम्बई हमारी है, ऐसे नारे देते हैं और जब अपनी ड्यूटी की बात आती है तो हम पीछा छुड़ाते हैं। कि ये काम सरकार का है। फलाना काम निगम वाले देखेंगे। हम लोग कभी भी अपने देश को,प्रदेश को, शहर को अपना समझते ही नहीं है। वरना किसी भी तरह से गंदा करने की सोचते ही नहीं। सड़कों पर कूड़ पड़ा रहता है। हम अपने घर का निकला कूड़ा घर के बाहर ही डाल देते हैं। चलो घर से तो निकला कम से कम। आगे की ज़िम्मेदारी सरकार की है। हम ये क्यों करें?

पूरे शहर को अगर कैन्वास पर उतारा जाये तो एक ज़बर्दस्त माडर्न आर्ट बन जाये।

हमारी सोच इतनी अविकसित है और हम क्या सोच कर अमरीका, यूरोप से बराबरी करते हैं। अरे अगर बराबरी करनी है तो सफाई में बराबरी करो, वहाँ लोगों की तरह ही कानून के नियमों का पालन करो। हम लोग अमरीका जा कर नहीं थूकेंगे, यहाँ वापस आकर वहाँ की तारीफ करेंगे और फिर यहाँ आकर वही काम करते हैं। हद है बेशर्मी की। अपने हक को माँगने वालों कभी अपने फर्ज़ की तरफ भी ध्यान दो। सरकार और शिक्षकों का ये फर्ज़ बनता है कि बच्चों को डिग्रियाँ बाँटने के अलावा उनको नैतिक शिक्षा भी दें ताकि अगली बार कोई थूकने से पहले हर कोई सोचे कि वो अपने घर पर, व अपनी मातृभूमि पर थूक रहा है जिसे हम हिन्दुस्तानी माँ का दर्जा देते हैं।
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Saturday, February 9, 2008

हँसी मनोरंजन में टूटता भारत

पिछले दिनों मैंने एक लेख लिखा था झूठे, मतलब परस्त - हम भारतीय!! जिसमें मैंने भारतीयों की क्षेत्रवाद व नस्लवाद के प्रति पाक-साफ़ दिखने वाली छवि पर कुछ प्रश्न किये थे। आज थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। कुछ ऐसी बातें जो हमारी एकता पर सवाल करती हैं, कुछे ऐसी बातें जिनसे हमारे भारत के शरीर पर पड़ती झुर्रियाँ, मकानों में दरारें व घर-परिवार में दीवार खिचती दिखाई देती है। जिसकी झलक आप खेल में, चुनावों में, यहाँ तक कि टीवी के कार्यक्रमों में भी देख सकते हैं। मैं यहाँ ये साफ़ के देना चाहता हूँ कि कारण और भी हैं परन्तु मैं फिलहाल एक को ही ध्यान में रख कर लिख रहा हूँ।
करीबन १२-१३ साल पहले २ कार्यक्रम शुरू हुए थे। एक था दूरदर्शन पर आने वाला "मेरी आवाज़ सुनो" व ज़ी पर अभी भी धूम मचाने वाला "सा रे ग म" जो आजकल "सारेगमप" के नाम से जाना जाता है। मंशा थी कि जनता में से बेहतरीन आवाज़ें आगे लाना ताकि हमारे देश में संगीत कोने कोने तक फैले और नई प्रतिभाओं को आगे आने का मौका मिल सके। सब बढ़िया तरीके से चल रहा था। कुछ ३-४ वर्ष पूर्व अचानक ही मनोरंजन जगत में इस कार्यक्रम को टक्कर देने के लिये सोनी ने इंडियन आइडल की शुरुआत की। उसी दौरान क्रांति आई और संगीत के ऐसे ही कुछ और कार्यक्रम शुरू हुए। लेकिन बदले हुए अंदाज़ में। इन प्रोग्रामों को "रियालिटी शो" का नाम दिया गया। चूँकि अब नलों से ज्यादा मोबाइल हो गये हैं तो क्यों न लोगों को मैसेज करना भी सिखाया जाये। ये बीडा उठाया समाचार चैनलों ने जो हर रोज़ किये जाने बेतुके सवालों पर पोल करते हैं और लोगों के मैसेज इंबोक्स में ज़ंग लगने से रोकते हैं। कम्पीटीशन इस कदर बढ़ गया कि अब इन शो में जजों के होने या न होने का कोई मतलब नहीं रह गया और लोगों से फोन की सहायता से वोट माँगे जा रहे हैं। हाँ भई, भारत देश में लोकतंत्र जो है।
मजाक में कही जाने वाली एक कहावत है : इस देश में क्रिकेट और राजनीति पर इस विषय में शून्य ज्ञान रखने वाले भी १ घंटे तक बिना रुके बोल सकते हैं। अब इसमें संगीत को भी जोड़ देना चाहिये। अब ज़रा वोट माँगने के तरीके पर गौर फरमायें। मैं राजस्थान के सभी लोगों से अपील करूँगा कि मुझे वोट करें। यहाँ राजस्थान की जगह आप पंजाब, हरियाणा, आँध्र, तमिलनाडु, उप्र, कश्मीर, असम, बंगाल कोई भी राज्य लगा सकते हैं। ये सभी जानते हैं कि इस तरह की वोटिंग से हमारे मन में उस प्रतियोगी के लिये अलग जज़्बात उभरते हैं और हम ये भूल जाते हैं कि हम प्रदेश के लिये नहीं, देश के लिये चुनना होता है। और यहाँ शुरू होता है देश का बिखराव। यहाँ राज्यों के हिसाब से ही नहीं वरन् धर्म और मजहब के आधार पर भी वोटिंग होती है। मैं किसी को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता पर २-३ वर्ष पूर्व एक ऐसे ही शो में काज़ी व रूपरेखा के चुने जाने पर बवाल हुआ था। उत्तर पूर्व से एक के बाद एक संचिता, देबोजीत, अनीक,प्रशांत का आगे आना, व तीन क्षेत्रों में पिछड़ने के बाद इशमीत का उत्तर क्षेत्र(जिसमें उनका अपना राज्य पंजाब आता है) में आगे आना, व और भी कईं ऐसे किस्से हुए हैं। मैं इनकी प्रतिभाओं पर संदेह नहीं कर रहा हूँ।हजारों लाखों लोगों में से चुने गये हैं तो कुछ तो दम होगा ही। जिनमें एक खराब परन्तु कईं बार ऐसा हुआ है जब उम्मीदवार केवल इसलिये आगे है क्योंकि उसके क्षेत्र के लोगों ने वोट करे थे। खराब प्रदर्शन भी उस उम्मीदवार को खेल में बनाये रखता है। जिस मकसद से "मेरी आवाज़ सुनो" व "सारेगम" प्रतियोगितायें होतीं थीं वो मकसद अब खत्म होता जा रहा है या यूँ कहें कि वो मकसद ही बदल गया है।
उम्मीदवार खुद फोन व सिम खरीद कर लोगों में बाँटते फिर रहे हैं। फोन कम्पनी करोड़ों कमा रही है। यही हाल चैनलों का है। लोग बावलों की तरह वोट करते हैं।
ये कहाँ का संगीत है? ये किस बात का मनोरंजन है? इसलिये तो इन कार्यक्रमों को शुरू नहीं किया गया था? पैसे की खनक ने पायल और तबले की आवाज़ों को दबा दिया है। रूपये और पैसे की दौड़ में कहीं हम भारत की एकता को तो नहीं बेच रहे हैं? ये बात हमें समझनी चाहिये। चैनल व सरकार दोनों से अनुरोध है कि अगर आप तक मेरी बात पहुँचे तो कृपया जनता के वोटों को बंद कराइये। मैं जानता हूँ चैनल व मोबाइल कम्पनी दोनों को घाटा होगा पर संगीत व भारत की अखंडता के लिये यदि नोटों व वोटों को भुला दें तो यही सभी के लिये हितकारी होगा।
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Tuesday, February 5, 2008

हिंदयुग्म : प्रगति मैदान में हुआ 'पहला सुर' का भव्य विमोचन

हिंद युग्म को आज हिंदी ब्लागों में ज्यादातर पाठक जानते हैं। ये अपने आप में एक अलग व अनूठे प्रोजेक्ट की तरह है जिसका मकसद लोगों में हिंदी के खोये हुए अस्तित्व, मान-सम्मान को वापस लौटाना है। हिंद युग्म की कोशिश रही है कि ज्यादा से ज्यादा लोग हिंदी में लिखें, हिंदी को पढें, हिंदी में बोलें। इसके अलावा भारत अथवा विश्व में जितनी भी प्रतिभायें छुपी हुई हैं, उनको आगे आने का मार्ग भी इसी मंच द्वारा दिया जा रहा है। यहाँ कवि, कहानीकार, संगीतकार, गीतकार, गायक, चित्रकार सभी का समान तरह से स्वागत होता है। इसी के चलते हिंद युग्म ने उससे जुड़े हुए सभी संगीतकार, गीतकार, गायकों के द्वारा गाये हुए गीतों की एक एल्बम निकालने का निर्णय लिया। और अभी रविवार, ३ फरवरी को प्रगति मैदान में इस एलबम का विमोचन (रिलीज़) भी हुआ।
ज्यादा जानकारी हेतु पढें :
http://merekavimitra.blogspot.com/2008/02/blog-post_7922.html

यदि आप दिल्ली में हैं और पुस्तक मेले में जा रहे हैं तो एक बार हिंद-युग्म के इस प्रयास को और सार्थक बनाने हेतु उसके स्टैंड पर अवश्य जायें और इससे जुड़ी सारी पुरानी व भविष्य में होने वाली गतिविधियों के बारे में जानें।
स्टैंड का पता-
हॉल नं॰ १२, स्टैंड नं॰ एस १/१० (वाणी प्रकाशन के स्टॉल के ठीक सामने, एन बी टी के स्टॉल के बगल में)
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Thursday, January 31, 2008

झूठे, मतलब परस्त - हम भारतीय!!

अभी हाल ही में क्रिकेट के क्षेत्र में एक विवाद पैदा हुआ जो क्रिकेट के जानकारों और इस खेल से अनभिज्ञ, दोनों ही तरह के लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा। मुद्दा था हरभजन सिंह ने साइमंड्स को नस्लवादी टिप्पणी करी या नहीं करी। आरोप संगीन था। प्रथम बार में इस आरोप के साबित होने पर देश भर में हड़कम्प मच गया। देश के समाचार परोसने वाले सभी तेज चैनलों में होड़ लग गई कि ऐसे कैसे कोई बिना सुबूत के आरोप लगा सकता है। बात भी सही थी। कानून सुबूत माँगता है। चैनलों का बस चले तो दिन को ४८ घंटों का कर दें और फिर भी इनके मसाले खत्म नहीं होंगे। खैर ये बात फिर कभी उठायेंगे।

अब ज़रा मुद्दे पर फिर रोशनी डालें। अभी हाल ही में मैं रिक्शे में जा रहा था कि एक कार वाला पीछे से होर्न मारने लगा। अब रिक्शे और कार की गति में अंतर तो होता ही है। थोड़ देर लगी उसको साइड होने में। अब जैसे ही कार बगल से गुजरी, उस कार वाले ने रिक्शा वाले को "बिहारी" कह कर सम्बोधित किया। अब चाहें वो रिक्शे वाला हरियाणा से हो, या उत्तर प्रदेश से या राजस्थान से आप उसे "बिहारी" ही कहेंगे। आप चाहें किसी भी महानगर में हों, आपको ये दृश्य नजर आ ही जायेगा। और दलील ये कि बिहार वालों को बिहारी ही तो कहेंगे। बात सही है। पर कम से कम कहने से पहले पूछ तो लिया जाये कि वो बंदा है कहाँ का? दरअसल हम लोगों ने ये नियम बना लिया है, कोई भी मजदूर हो, हम उसे बिहारी ही बोलेंगे। ये आम शब्द है और एक तरह से ये जताने का तरीका है कि मजदूर हम से नीचे दर्जे के लोग हैं। क्या इसे हम सही आचरण कहेंगे? क्या ये जातिवाद व क्षेत्रवादी टिप्पणी नहीं है?

और तब क्या सही है जब ठाकरे साहब उत्तर भारतीय लोगों को बुरा भला बोलते हैं। जब बिहार के लोगों को पीटा जाता है। यही हाल कमोबेश पूर्वी भारत में है। और उत्तर पूर्वी लोगों को बाकि क्षेत्र से अलग समझा जाता है। मीडिया में भी उस तरफ़ के लोगों की खबर न के बराबर होती है। और जब करूणानिधि जैसे नेता द्रविड प्रदेश का नारा देते हैं और हिंदीभाषियों के खिलाफ बोलते हैं। और हमारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के आधार पर आरक्षण देना। ये तो जातिवाद कतई नहीं है!!

हम ही ने ठाकरे, करूणानिधि जैसे नेता बनाये हैं, तो हम किस मुँह से कहें कि हम नस्लवाद के खिलाफ हैं। हम तो क्षेत्रवाद और जातिवाद के कट्टर समर्थक हैं। शर्म आनी चाहिये हमें और मीडिया वालों को भी, जिन्होंने खबर को गलत तरीके से पेश किया। कड़वी सच्चाई यही है कि हम सदियों से जाति व क्षेत्र में भेद करते आये हैं और कर रहे हैं। मैं नस्लवाद और जाविवाद व क्षेत्रवाद में कोई अंतर नहीं समझता। क्या आप समझते हैं?

भज्जी ने नस्लवादी टिप्पणी करी या नहीं, सवाल ये नहीं है। सवाल ये है कि हम किस मुँह से विदेश में साफ झूठ बोल रहें हैं कि हम इन सब के खिलाफ हैं। हम लोग झूठे व मतलब परस्त हैं, हमें जब जो अपने मतलब का लगता है हम करते हैं।

जो मुझे लगा मैंने कहा। सवाल उठाना मेरा फर्ज था। जवाब ढूँढना हम सब का।
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Wednesday, January 2, 2008

"नया साल मुबारक"

अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से नये वर्ष का आगमन हो गया है। मेरी शुभकामनायें हैं कि आप और आपका परिवार सदैव खुश रहें।

साल आता है,
चला जाता है,
और हम फिर खो जाते हैं
नये साल के स्वागत में।

भूल जाते हैं वो नरसंहार-
जिसके हम अब आदी हो गये हैं।
भुला दिये जाते हैं अकाल और बाढ़ से
मरे सैकड़ों लोग,
छोड़ दिया जाता है उन्हें भूखा
रोटी को तरसते लोगों को मिलती है
लाठियाँ, हड़ताल, जेल, बंद।
कभी आरक्षण में जलता है वर्ष,
कभी नंदीग्राम का संग्राम देखता,
कभी हैदराबाद, लखनऊ, बनारस से
दहलता है वर्ष।

फिर भी हम जश्न मनाते हैं
झगडों, दंगों, आतंक, द्वेष के संगीत पर,
और डूब जाते है इस कदर
कि साल की शुरुआत में,
ये देश होता है शर्मसार
गवाह होती है कभी मुम्बई, दिल्ली,
और मुजरिम होते हैं हम-
पर जश्न लगातार जारी है!!

जश्न तो तब होगा
जब "भारत एक है" का नारा
बेमानी नहीं लगेगा,
भारत तो सोने कि चिड़िया कहना
दिखावा नहीं लगेगा,
उस पल जो नया साल आयेगा
जश्न तब होगा
और मैं और आप गर्व से कह सकेंगे
"नया साल मुबारक"
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Saturday, December 22, 2007

समुन्द्र पर सवाल-जवाब

१)
मीलों दूर तक
फैले हुए समुन्द्र की
अनगिनत विशाल लहरें,
आपस में टकराती हुई,
लड़ती, झगड़ती हुई,
किनारे की ओर
तड़पती हुई आती हैं,
फिर टकराकर चली जाती हैं,
कुछ वहीं दम तोड़ देती हैं
कुछ फिर इकट्ठे होकर
पुराने वेग से दौड़ कर आती हैं
फिर वही तेजी, फिर वही शोर,
जाने कहाँ से ये लहरें
इतनी ताकत लेकर आती हैं?

२)
ये लहरों की तड़प,
ये टकराव,
ये तो बस है
चन्द्रमा का आकर्षण
जो खीच लेता है
लहरों को अपनी ओर,
और ऊँची,
और ऊँची उठती हैं,
चाँद का आलिंगन करने को,
नई जान आ जाती है
विशाल सागर में,
ऊँचा उठता है छू लेने को आकाश,
फिर भी पूछते हो
कि ये ताकत कहाँ से लाता है!!
ये प्रेम ही तो है...
ये प्रेम ही तो है...
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Friday, December 7, 2007

ये यादें

कभी हलकी सी मुस्कान होठों पर,
कभी आँखें नम कर जाती हैं
कभी सपने दिखलाती हैं दिन में,
कभी मन भारी कर जाती हैं..
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब आँखों के सामने ही
सब होता हुआ सा दिखता है,
जब रात के सन्नाटे में,
कुछ सुना हुआ सा लगता है,
गाल पर खारा पानी
टपटपा जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब भरी महफिल में भी
कुछ सूना सूना सा लगने लगे,
जब अपनों के बीच में भी,
अजनबी सा लगने लगे,
तब शायद बे-प्रीत होने लगती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

सालों का साथ जब
पल भर ही रह जाता है,
कितने दूर कितने पास,
ये सवाल मुश्किल हो जाता है,
वो हर पल भारी कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

जब रोने का बहाना नहीं मिलता,
जब हँसने का मन नहीं करता,
तब अपने आप से खुद को
दूर कर जाती हैं,
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!

क्यों दिलों का मिलना होता है?
क्यों ये बिछड़ना होता है?
क्यों ये विरह के पल,
मन को खाने लगते हैं?
क्यों ये खूबसूरत आकाश,
काटने को दौड़ता है?
ऐसे ही अनगिनत यक्ष प्रश्न,
अब हर वक्त मेरे सामने
खड़े कर जाती हैं
आह ये यादें, क्या क्या कर जाती हैं!
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Monday, December 3, 2007

क्यों दुनिया को जन्नत बनाते नहीं?

मेरी इस रचना को ग़ज़ल कहें या कविता, ये मुझे नहीं पता। जो भी हो, मुझे आपकी टिप्पणी की उम्मीद रहेगी।
और इस रचना के माध्यम से उठाये गये सवालों को आप कितना सही मानते हैं अवश्य बताइयेगा|


दिवाली और ईद दोनों में लोग, एक दूसरे को गले लगाते हैं,
तो मुसलमान मनाते दिवाली नहीं, क्यों हिंदू ईद मनाते नहीं?

गर इंसां को है ये पता, कि सबका मालिक एक है,
क्यों मंदिर में मुसलमां, क्यों मस्जिद में हिंदू जाते नहीं?

गर धर्म सिखाये कत्ले-आम, मजहब सिखाये आतंक फैलाना,
क्यों नहीं मारते मजहब को पत्थर, क्यों धर्म को तुम जलाते नहीं?

जिसने बनाया इंसां को, उस खुदा की है ये दुनिया सारी।
तो मंदिर - मस्जिद छोड़ कर, क्यों औरों का घर बसाते नहीं?

जब धर्म अधर्म सिखाता है, और मजहब आग लगाता है,
क्यों मानते हो उस धर्म को, क्यों मजहबी आग बुझाते नहीं?

तोड़ डालो ये मंदिर मस्जिद, मालिक ने तो ये न चाहे थे,
पूरी कायनात में वो ही समाया है, क्यों दुनिया को जन्नत बनाते नहीं?
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Sunday, November 25, 2007

मेरे बाद-

कभी कभी सोचता हूँ
मेरे बाद कैसे रहोगे?
क्या वही हँसी मजाक होगा,
क्या वैसे ही चुटकुले होंगे?

क्या मैं भुला दिया जाऊँगा,
या हर बात में याद आऊँगा?
सिहरन उठती है पूरे शरीर में,
डर लगता है,
घबरा जाता हूँ जब
बिछड़ने का ख्याल
मन पर हावी होने लगता है!!

क्या इतिहास हो जायेगा
मेरा आज,
क्या भुला दिये जायेंगे
मेरे सब काज,
मेरी आवाज़ अब
नहीं गूँजेगी यहाँ पर,
नहीं गुनगुनाये जायेंगे
मेरे गीत यहाँ पर|

पर लोगों को
आदत हो जायेगी,
मेरे बिना रहने की,
मेरे बिना खाने की,
बिना मेरे घूमने की|

दो चार दिन काम के बहाने
याद आ जाया करूँगा शायद,
पर वक्त से रह जायेगी
बस एक शिकायत-

वक्त जब हँसाता है,
तो रोने क्यों देता है?
जब परायों को अपना बनाता है
तो बिछड़ने क्यों देता है?

बड़ा छलिया है ये वक्त,
मेरी बात ही नहीं सुनता,
आवाज़ देता हूँ,
दो पल तो ठहर कमबख्त

पर क्या कभी रुका है
किसी के लिये ये वक्त?
क्या ऐसे ही चलता रहेगा
ये बेईमान वक्त?
मेरे बाद भी!!
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Sunday, November 4, 2007

कंजकें

ज्यादा भूमिका नहीं बाँधूँगा। लड़कियों का कम होना चिंता का विषय है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि अनपढ़ तो अनपढ़ हैं ही, सभ्य समाज या शहर में बसने वाले और आधुनिक कहे जाने वाले समाज में भी बेटियों को कुछ नहीं समझा जाता।
उन्हें या तो पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता है, या बेटों से कम तवज्जो दी जाती है। आधुनिक भारत के सभ्य व आधुनिक समाज के मुँह पर ये जोरदार तमाचा है। तमाचा जोर का लगे उसके लिये आपकी टिप्पणी आवश्यक है।

अरे पिंकू बेटे,
ज़रा बाहर जा,
गुप्ता आँटी की
निक्की को बुला ला।

पिंकू दौड़ा दौड़ा गया,
वापिस आया, माँ से बोला,
निक्की मेहता अंकल के गई है,
१५ मिनट में आने का है बोला।

नवरात्रि के इस त्योहार में
हर घर में कंजकें जीमी जायेंगी,
पर लगता है कि इस बार भी
निक्की ही सब के घर जायेगी।

जब पालने में बेटी होती है,
तो उसका गला दबाया जाता है।
पर "देवी" से आशीर्वाद मिल जाये,
इसलिये नवरात्रि में पूजा जाता है।।

ये सभ्य लोगों का समाज है,
जो बेटी नहीं पाल सकता,
न जाने किस बात का डर है
जो बेटियों को हाशिये पर है रखता।

पंजाब जैसे समृद्ध प्रदेश में भी,
लगातार बेटियाँ हो रही है कम।
जब बेटे की शादी के लिये लड़की ढूँढेंगे,
शायद तब निकलेगा सबका दम।।

तब समझेगा ये समाज,
बेटियों की अहमियत को,
जब तरसेगा आदमी,
पत्नी,बहन, भाभी और माँ को।

भयावह सा लगता है जब,

सोचता हूँ जीवन,
इन रिश्तों के बिना,

हकी़क़त सा लगने लगा था ये दु:स्वप्न,

जो इस बार मैंने कंजकों को,
पिछली बार से आठ कम गिना!!!
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