Tuesday, September 27, 2011

भूले बिसरे गीत: एस.डी बर्मन के जन्मदिन पर समर्पित आज का यह अंक Old Hindi Movies Songs SD Burman Special

एक अक्तूबर 1906 को कोमिल्ला (अब बांग्लादेश) में एक बच्चे का जन्म हुआ जो हिन्दी फ़िल्म जगत में सचिन देव बर्मन (1 अक्टूबर 1906 - 31 अक्टूबर 1975) के नाम से जाना गया। बर्मन दा ने सौ से भी अधिक बॉलीवुड और बंगाली फ़िल्मों में अपना संगीत दिया।।

वे हिन्दी और बंगाली फ़िल्म संगीत प्रेमियों के चहेते बने रहे। एस.डी बर्मन ने लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, गीता दत्त, मन्ना डे, किशोर कुमार, हेमन्त कुमार, आशा भोंसले, शमशाद बेग़म, मुकेश व तलत महमूद सभी के साथ काम किया। 

उन्होंने बीस फ़िल्मों में स्वयं भी गाने गाये हैं। इस बार के भूले-बिसरे गीत में हैं उनके जन्मदिन पर उन्हीं के गाये हुए गीत। उनकी आवाज़ में गजब सा जादू था, कशिश थी जिसे सुनते ही हर श्रोता मंत्रमुग्ध हो जाता है।

एस.डी. बर्मन उन शख़्सियतों में शामिल थे जिन्हें अवार्ड मिलते ही उस अवार्ड की महत्ता बढ़ जाती है।

1934: गोल्ड मैडल, बंगाल ऑल इंडिया म्यूज़िक कॉंफ़्रेंस, कोलकाता
1958: संगीत नाटक अकादमी
1958: एशिया फ़िल्म सोसायटी अवार्ड

राष्ट्रीय फ़िल्म अवार्ड

  • 1970 :  पार्श्वगायक (सफ़ल होगी तेरी आराधना :  आराधना)
  • 1974: संगीत निर्देशन (ज़िन्दगी ज़िन्दगी)

1969: पद्मश्री अवार्ड

फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड:

  • 1954: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : टैक्सी ड्राईवर
  • 1973: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : अभिमान
  • 1959: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : सुजाता (नामांकित)
  • 1965: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : गाईड (नामांकित)
  • 1969: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : आराधना (नामांकित)
  • 1970: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : तलाश (नामांकित)
  • 1974: सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक : प्रेम नगर (नामांकित)


सफ़ल होगी तेरी आराधना

फ़िल्म: आराधना (1969)
संगीत: सचिन देव बर्मन
गीत: आनन्द बख़्शी




वहाँ कौन है तेरा
फ़िल्म: गाईड (1965)


मेरे साजन हैं उस पार 
फ़िल्म: बन्दिनी (1963)




।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।

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Thursday, September 22, 2011

हमें क्यों आवश्यकता पड़ती है एक "स्पेशल" दिन की? (माइक्रोपोस्ट) Why Do We Celebrate Hindi Divas? Why Not Everyday? (Micropost)

हर वर्ष सितम्बर माह की चौदह तारीख को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। आखिर इन "दिवसों" की आवश्यकता क्या पड़ती है? क्यों नहीं हर दिन हम हिन्दी को अपनी आत्मा में संजो कर रख सकते? क्यों हम अंग्रेज़ों की तरह साल में एक दिन का इंतज़ार करते हैं कुछ करने के लिये। हमारे देश को व देश के लोगों को विदेशियों की आदतें कॉपी करने में आनन्द आता है। हम यह नहीं सोचते कि विदेशी को कर रहे हैं वे अच्छा है अथवा बुरा।

अग्रेज़ों के यहाँ रिश्ते आज हैं और कल नहीं। इसलिये अपने प्रेमी से प्रेम का इज़हार करने के लिये वैलेंटाईन डे बनाया। हर साल ही प्रेमी और प्रेमिका बदलते रहते हैं वहाँ। वैसे तो पति-पत्नी भी एक वर्ष साथ रह जायें वही बहुत है। उनके लिये परिवार आवश्यक नहीं इसलिये मदर्स डे व फ़ादर्स डे जैसे दिन बना डाले। चलो एक दिन तो अपने माता-पिता के पास वे जायेंगे। और हम उस श्रवणकुमार की कहानी भूल जाते हैं जो अपने अँधे माता पिता को सभी धामों की यात्रा कराता था।  क्यों नहीं श्रवणकुमार की याद में कोई दिवस मनाया जाता? है न ग्लोबलाइज़ेशन का कमाल!! देश को भूलो परदेस को याद रखो....

उसी तरह हम हिन्दी भी भूल रहे हैं। अंग्रेज़ी व अन्य विदेशी भाषायें इस कदर हम पर हावी हैं कि कुछ लोग अपने दो-तीन साल के बच्चे के साथ भी अंग्रेज़ी में ही बात करते हैं। मैक-डॉनैल्ड जैसे विदेशी रेस्टोरेंट में जाकर धड़ल्ले से अंग्रेज़ी में रोब जमाते हैं। और ऐसे व्यवहार करते हैं कि जैसे हिन्दी बोलना पाप हो गया हो। हिन्दी बोलने वाला बच्चा हीन भावना का शिकार हो रहा है। 

आजकल छठीं कक्षा से फ़्रेंच व जर्मन भाषायें सिखाने का चलन शुरू हो गया। अभिभावक यह समझते हैं कि चूँकि ये भाषायें उनके बच्चे का "विकास" करेंगी इसलिये वे अपने बच्चों को जर्मन व फ़्रेंच सिखा रहे हैं। लेकिन वे नहीं जानते कि वे संस्कृत न पढ़वा कर बच्चे को बौद्धिक विकास से दूर कर रहे हैं। हमारे ग्रन्थों में व नीतियों में ऐसी गूढ़ बातों का  उल्लेख है जो हम जर्मन व स्पेनिश में नहीं सीख सकते। जर्मन व स्पेनिश जैसी भाषायें तो आप एक साल का कोई भी कोर्स करके सीख जायेंगे..पर संस्कृत कब सीखेंगे? आपको यह जानकर अचरज हो सकता है कि चीन का विश्वविद्यालय संस्कृत सिखा रहा है और विद्यार्थियों में रूचि भी है। और हम.... ग्लोबलाइज़ेशन का जमाना है...

आज हिन्दी इतनी उपेक्षित हो चुकी है कि यह "एक दिन" की मोहताज बन गई है। सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक संस्कृत अब केवल पंडितों की भाषा बन कर रह गई है। उसका तो एक "दिवस" भी मुझे नहीं पता। क्या आपको पता है "संस्कृत दिवस" कब मनाया जाता है? बहरहाल प्रश्न जस का तस ही रह जाता है। "’हिन्दी दिवस" की आवश्यकता क्यॊं है? यदि हम प्रति दिन हिन्दी को अपनी आत्मा बना कर रखें तो शायद ....


वैसे क्या आप जानते हैं अमरीका के लोग "इंग्लिश डे" कब मनाते हैं?

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Sunday, September 18, 2011

दो खेल, दो कहानियाँ, दो वर्तमान...पर अंजाम केवल एक.. मौत... Death Of Cricket and hockey But different reasons

एक खेल जीना चाह रहा है पर हर पल मौत से जूझ रहा है और दूसरा अपने ऐश-ओ-आराम में इतना खो गया है कि जीना भूल गया है। एक खेल गरीबी की बीमारी से जूझ रहा है तो दूसरे खेल को वो हर सुविधा मुहैया कराई जा रही है जिसकी उसे आवश्यकता है। एक खेल में खिलाड़ियों की आत्मा बसती है तो दूसरे खेल में खिलाड़ी अपनी आत्मा का सौदा करते हैं। एक हमारा राष्ट्रीय खेल है तो दूसरा राष्ट्र का खेल है।

उपर्युक्त पंक्तियों में हॉकी का दर्द सुनाई दे जायेगा। यह खेल हमारा राष्ट्रीय खेल है जिसे मेजर ध्यानचंद जैसे खिलाड़ी ने अपने पसीने सींचा और परगट सिंह व धनराज पिल्लै ने इसका ध्यान रखा। वो मेजर ध्यानचंद जिसके हॉकी पर लोग शक करते थे कि कहीं उन्होंने अपनी स्टिक में कुछ लगा तो नहीं रखा? आखिर गेंद उनकी स्टिक से हटती क्यों नहीं? परन्तु यह खेल हर पल घुटता गया। इतना उपेक्षित हो गया कि खिलाड़ी खून के आँसू पीते चले गये और एक दिन ऐसा आया जब धनराज पिल्लै जैसा शख्स चीख पड़ता है और कराह कर कहता है कि-हॉकी ने मुझे इज़्ज़त दी, शोहरत दी पर पैसा नहीं दिया।

हॉकी के खिलाड़ी इस खेल को जी रहे हैं। इस खेल को ज़िन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं। किसी के पास प्रैक्टिस करने के जूते नहीं तो कोई एक ही जोड़ी जूतों से सारे गेम खेल रहा है और उन्हीं से प्रैक्टिस भी कर रहा है। ऐसी एकेडमी नहीं जहाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधायें हों व कोच हो। काफ़ी प्रयासों व कठिन परिश्रम के पश्चात जब यही हॉकी टीम एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीम बन कर भारत लौटती है तो इस टीम को महज पच्चीस हजार रूपये का "पुरस्कार(?)" दिया जाता है। खेल मंत्रालय इतने में ही खुश दिखाई देता और खिलाड़ियों की पीठ थपथपाता है। खिलाड़ियों में गुस्सा साफ़ दिखाई देता है जब वे इस पुरस्कार को लेने से ही मना कर देते हैं। मौका देखकर पंजाब सरकार पच्चीस लाख रूपये का ईनाम घोषित करती है तो अजय माकन जी को भारी दबाव के चलते उसी दिन पुरस्कार की राशि डेढ़-डेढ़ लाख रूपये प्रति खिलाड़ी कर देनी पड़ती है। अजय माकन जी हॉकी इंडिया और आईएचएफ़ का विवाद ही सुलझाने में ही लगे हुए हैं।

वैसे खेलों में सुधारों के लिये एक अच्छा बिल पेश किया था इन्होंने पर सत्ता और फ़ेडरेशनों के ठेकेदारों ने इसे सिरे से नकार दिया। विजय कुमार मल्होत्रा, अजय चौटाला जैसे नेता बिदके जो कईं वर्षों से अपने अपने फ़ेडरेशनों के मालिक बने बैठे हैं तो दूसरी ओर फ़ार्रूख अब्दुला को फ़ेडरेशन के अध्यक्ष की अधिकतम आयु सत्तर वर्ष करना रास नहीं आया। वे कहते हैं कि अभी तो वे "जवान" हैं इसलिये वे अध्यक्ष पद सम्भाल सकते हैं। उन्हें कौन समझाये कि एक आम इंसान भी साठ बरस में रिटायर होता है और पैसठ की उम्र में जज भी कुर्सी छोड़ देते हैं। पर नेता जी को कौन समझाये। और हमारे शरद पवार जी। वे तो चूहे की तरह "मैडम जी" की धमकी देने लग गये। भई वाह!

यह कैसी बेचारगी है? किसी भी देश के राष्ट्रीय खेल की ऐसी बुरी हालत शायद ही होगी। क्यों नहीं इसके पुनरुत्थान के लिये प्रयास किये जाते? क्यों नहीं कोई कॉर्पोरेट जगत से आगे आता है? हॉकी को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है। आईपीएल की तर्ज पर क्यों नहीं हॉकी में भी कोई टूर्नामेंट शुरू किया जाता? कुछ वर्ष पूर्व ऐसा टूर्नामेंट ईएस्पीएन की तरफ़ से शुरू किया गया था पर लोगों की जागरूकता व सरकार की उदासीनता के कारण बंद कर दिया गय। स्कूलों से ही इस खेल में बच्चों का ध्यान लगाने की आवश्यकता है। इस समय हॉकी ऐसे मरीज की तरह है जो "कोमा" में है परन्तु अपनी इच्छा शक्ति के बल पर वापिस जीना चाह रहा हो। 

दूसरी ओर एक ऐसा खेल है जिसमें हर खिलाड़ी को औसतन तीस लाख रूपये सालाना दिया जाता है। प्रति मैच उन्हें एक से दो लाख के बीच अलग से मिलता है। इस खेल के खिलाड़ियों के पास सुविधाओं की कमी नहीं है।एड जगत इन्हें सर-माथे बिठाता है। पर ये खिलाड़ी देश से पहले अपने क्लब के बारे में सोचते हैं। ये "बिगड़ैल" खिलाड़ी हैं जिन्हें खेलों से अधिक पार्टियाँ  प्यारी हैं। और हालत ये हो गई है कि विश्व चैम्पियन टीम रैंकिंग में पाँचवें नम्बर की टीम है। पर फिर भी इस टीम के खिलाड़ियों को डेढ़ लाख से ज्यादा मिलता है। किसी की टाँग टूटी है, किसी का हाथ, किसी आँख, किसी का कान, किसी की उंगली तो किसी की कमर। वैसे अंतर्राष्ट्रीय मैच यह नहीं खेलेंगे परन्तु जहाँ पैसा होगा वहाँ ये ज़रुर जायेंगे। क्रिकेट भी बदहाल हो चुकी है। यहाँ केवल पैसा रह गया है पर खेल खत्म हो चुका है। इस पर मैं विस्तार से कुछ नहीं कहूँगा।

दो विभिन्न शैली के खेल हैं, दोनों की कहानी अलग, दोनों का इतिहास अलग, दोनों के प्रति नेताओं व कॉर्पोरेट व फ़िल्म जगत के करोड़पतियों-अरबपतियों व्यवहार अलग, दोनों का "आज" अलग। लेकिन यकीन मानिये यदि दोनों ही खेलों पर ध्यान नहीं दिया तो दोनों का ही आने वाला "कल" एक ही होगा। एक खेल गुमनामी के अँधेरों में धकेल दिया जायेगा तो दूसरा खेल सब कुछ  होते हुए भी बेमौत मार दिया जायेगा।


जय हिन्द
वन्देमातरम


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Thursday, September 15, 2011

यूनेस्को की लिस्ट में शामिल हुमायूँ का मकबरा और कुतुब मीनार : अतुल्य भारत Humayun's Tomb, Qutub Minar Unesco List

अतुल्य भारत के पिछले अंकों में यूनेस्को की लिस्ट में भारत के 28 में से तीन स्थलों के बारे में बताने के बाद आज हम दिल्ली के दो स्थलों के बारे में जानेंगे।

हुमायूँ का मकबरा
पहला है हुमायूँ का मकबरा। हाल ही में जब ओबामा भारत आये तब वे भी इस मकबरे के दर्शन करने गये थे। हुमायूँ का मकबरा ताजमहल के बनने से करीबन एक शताब्दी पहले बन कर तैयार हुआ। इस मकबरे में नये तरह उपकरण लगाये गये व शाही बाग के बीचो बीच बनाया गया। यह मक़बरा 1570 में निर्मित हुआ व इसकी सांस्कृतिक महत्त्व को समझते हुए यूनेस्को ने इसे 1993 में अपनी लिस्ट में शामिल किया। हुमायूँ की विधवा बेगम हाजी ने इसे 1569-1570 में बनवाया। इसके निर्माण में इसके वास्तुकार मिर्ज़ा गियात ने अहम भूमिका निभाई। अपनी दो गुम्बददारी छतरियों के कारण यह मुगल शैली अपने आप में अद्भुत है। यहाँ हुमायूँ के मकबरे के अलावा 150 अन्य शाही लोगों की भी कब्र हैं।


जल में मकबरे का प्रतिबिम्ब

इस मकबरे में दो गेट के साथ चार बाग हैं। यह दोनों गेट एक दक्षिण की ओर है अथवा दूसरा उत्तर की ओर। यहाँ अनगिनत जल संग्रह हैं। गुम्बद की ऊँचाई 42.5 मीटर है। इसमें संगमरमर लगाये गये हैं व छतरियों से इसे सजाया गया है। दिल्ली के अन्य बेहतरीन स्मारकों जैसे अक्षरधाम मंदिर, लाल किला, इंडिया गेट व  बहाई मंदिर आदि ऐतिहासिक व सांस्कृतिक स्थलों को छोड़ कर हुमायूँ के मकबरे में ओबामा के जाने के दो अर्थ हो सकते हैं। एक, वे इस मकबरे के अद्भुत सौंदर्य का दर्शन करना चाहते थे या फिर अपना कोई राजनैतिक कारण रहा होगा।

कुतुब मीनार

दूसरा स्मारक है कुतुब मीनार। दक्षिणी दिल्ली में स्थित कुतुब मीनार के इर्दगिर्द अन्य स्मारक भी हैं। लाल पत्थरों से निर्मित इस मीनार की ऊँचाई करीबन 238 फ़ीट है। ज़मीन पर इसका डायामीटर 47 फ़ीट का है जो सबसे ऊपर जाकर मात्र 9 फ़ीट का रह जाता है। इस स्थल का निर्माण तेरहवीं शताब्दी में शुरु हुआ व अलग अलग चरणों में हुआ। अलई दरवाज़ा, अलई मीनार और फिर कुब्बत-उल-इस्लाम मस्जिद जो भारत की सबसे पहले बनाई गईं मस्जिदों में शुमार है। इल्तुमिश का मकबरा व लोहे का स्तम्भ भी इसी क्षेत्र में आते हैं।

लौह स्तम्भ किस धातु से बना हुआ इस पर कईं वैज्ञानिक शोध करते आये हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से यह स्तम्भ अद्भुत है क्योंकि इस पर जंग नहीं लगता जिस प्रकार अन्य साधारण लोहे की किसी वस्तु पर लगता है। इस्लामिक तानाशाही व लूट-पाट की निशानी है यह क्षेत्र जो कहा जाता है हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करके बनाया गया। तुग़लक, लोदी, अब्दाली, गज़नवी व अन्य अनगिनत लुटेरे हमारे यहाँ आये और लूट कर चले गये। 

अलई दरवाज़ा
खैर, इस लौह स्तम्भ की ऊँचाई तेईस फ़ीट है व इस पर संस्कृत भाषा में लिखा गया है। कहा जाता है कि इसे चन्द्रगुप्त द्वितीय के राज काल में बनाया गया। इतिहास के अनुसार कुतुब मीनार के निर्माण का आरम्भ कुतुब्बुद्दीन ऐबक ने सन 1192 में किया जिसे बाद में इल्तुमिश (1211-36) व अलाउद्दीन खल्जी (1296-1316) ने पूरा किया। बाद में इसमें अन्य शासकों ने भी लगातार बदलाव किये।  यूनेस्को ने इसे इस्लामिक वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए विश्व घरोहरों की श्रेणी में शामिल किया।
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Sunday, September 11, 2011

अमर सिंह को पहुँचे तिहाड़, दिल्ली पर आतंकी हमला और पाकिस्तान व चीन क्या कर रहे हैं राजस्थान की सीमा पर? China-Pakistan At Rajasthan Border, Amar singh sent to Tihar, Delhi Bomb Blast - Where are terrorists?

राजनैतिक दृष्टि से पिछला सप्ताह काफ़ी उथल-पुथल का रहा। वैसे तो पिछले दो-तीन वर्षों में कोई भी दिन ऐसा नहीं बीता जब पक्ष व विपक्ष शांत रहे हों। दिग्विजय सिंह जी ने रामदेव को ठग की उपाधि तक डाली। बेल्लारी बँधुओं को कर्नाटक में हो रहे अवैध खनन के मामले में जेल भेज दिया है। अन्ना की टीम अपनी अगली रणनीति के लिये मीटिंग कर रही है। लेकिन तीन मुद्दे महत्त्वपूर्ण रहे जिनमें से दो पर तो मीडिया की नज़र गई पर एक खबर ऐसी थी जो पर्दे के पीछे रह गई। 


पहली खबर रही अमर सिंह को तिहाड़ भेजने की। आज के हालात ऐसे हैं जिसमें या तो तिहाड़ में 800 लोगों के लिये एक ऑडिटॉरियम बनवा देना चाहिये या फिर संसद में तिहाड़-एक्स्टेंशन खोल देना चाहिये। "वोट के बदले नोट" का केस जो वर्ष 2008 में चर्चा का विषय रहा। अमर सिंह के ऊपर आरोप है कि उन्होंने भाजपा के तीन सांसदों को सरकार के पक्ष में वोट डालने के लिये घूस दी। उन्होंने अदालत में अर्जी दी कि उनकी दोनों किडनी खराब चल रही हैं और वे काफ़ी बीमार हैं। जज ने उनकी ये अपील खारिज कर दी और उन्हें अदालत में दोपहर 12.30 बजे तक हाजिर होने का आदेश दिया। उनके साथ भाजपा के दो पूर्व सांसद भी जेल भेज दिये गये। जिन तीन सांसदों को रिश्वत दी गई थी उनमें से एक आज भी सांसद हैं इसलिये बिना लोकसभा सेक्रेट्री के आदेश के उन्हें जेल नहीं भेजा सकता था।

यदि आपको याद हो तो यह एक स्टिंग ऑप्रेशन था जिसे भाजपा ने आईबीएन के साथ मिलकर किया था। भाजपा के तीनों सांसदों ने जानबूझ कर रिश्वत ली और कैमरे में कैद करना चाहा। भाजपा ने संसद में रूपयों  की गड्डी उछालीं और यह उम्मीद करी की आईबीएन स्टिंग ऑप्रेशन की  वीडियो जनता को दिखायेगा। लेकिन इस चैनल ने यह कहकर वीडियो दिखाने से मना कर दिया कि तस्वीरें साफ़ नहीं थीं। अब  इसे क्या कहा जाये मुझे नहीं मालूम। और इन सब में हैरानी की बात यह रही सीबीआई ने सत्ता पक्ष के एक भी नेता पर आरोप नहीं लगाये।   मतलब यह कि अमर सिंह ने रिश्वत दी,  भाजपा सांसदों ने रिश्वत ली, चैनल ने सब रिकॉर्ड किया पर इन सबसे जिस सरकार का फ़ायदा होना था उस सत्ता पक्ष में कोई आरोपी नहीं।

दूसरा मुद्दा रहा दिल्ली में हुआ बम विस्फ़ोट। तेरह लोग मारे गये और सौ के करीब घायल हुए। सरकार की ओर से वही रिकॉर्डेड बयान जो शायद उन्होंने पहले भी कईं बार यही बयान दिये होंगे। सुन सुन कर कान भी पक गये हैं। माना कि हर बम विस्फ़ोट नहीं रोका जा सकता। पर होने के बाद आतंकवादी पकड़े तो जा सकते हैं? लेकिन नहीं, चार दिन में एक  भी आतंकवादी पकड़ा नहीं गया। सारी एजेंसियाँ अपने हिसाब से केस देख रही हैं। दिल्ली के पिछले कितने ही बम विस्फ़ोटों में एक भी आरोपी को नहीं पकड़ा जा सका है। क्या कर रही हैं सुरक्षा एजेंसियाँ? और यदि एक आध कोई अफ़्ज़ल या नलिनी जैसा पकड़ा भी जाता है तो उसे सजा नहीं होती। क्योंकि यदि फ़ाँसी हो गई तो किसी को अल्पसंख्यक वोट नहीं मिलेंगे तो किसी को अपने राज्य के। यह कैसा ’वोट’तंत्र है?


दस साल पहले अमरीका में आतंकी हमला हुआ। उसके दस साल में एक भी नहीं। और जिसने हमला किया वो  लादेन भी मारा गया। लेकिन हमारे देश में दस साल पहले संसद पर हमला हुआ। वह संसद जिससे देश चलता है। भारत की आन-बान-शान की धज्जियाँ उड़ा दी गईं। उस हमले के दस साल के अंदर इस  देश में 38 हमले हो चुके हैं। लेकिन किसी को सजा नहीं हुई। अफ़्ज़ल और कसाब जेल में कबाब खा रहे हैं। पर कैद में होते हुए भी आज़ाद हैं। यह कैसा कानून है? यह कैसा संविधान?

यह दोनों खबरें मीडिया में चर्चा में रहीं लेकिन सप्ताह के आरम्भ में एक ऐसी घटना घटी जो इक्के-दुक्के समाचार-पत्रों में ही नज़र आईं वो भी केवल एक ही दिन।

राजस्थान के बाड़मेर में एक गाँव है मुनाबाओ। यह गाँव पाकिस्तान के बॉर्डर पर स्थित है। पाकिस्तान इसी बॉर्डर के नज़दीक ही रेलवे स्टेशन बना रहा है। आप कहेंगे कि इसमें हर्ज ही क्या है? नियम के अनुसार किसी भी अंतर्राष्ट्रीय सीमा के 150 गज के दायरे के अंदर कोई भी देश निर्माण नहीं कर सकता है। जबकि पाकिस्तान जो रेलवे स्टेशन बना रहा है वो केवल दस मीटर की दूरी पर है। जी हाँ, केवल दस मीटर। 2006 में उन्होंने इस सीमा पर ट्रैक बिछाना शुरु किया था जो अब सीमा के बेहद नज़दीक आ गया है। अब चौकाने वाली एक और बात यह है कि ये सब काम एक चीनी कम्पनी कर रही है। 

अब आप लोगों को सब समझ आ गया होगा। चीनी ड्रैगन ने पश्चिमी सीमा पर भी अपना कब्जा कर लिया है। सीमा सुरक्षा बलों की हर हरकत पर चीन की नज़रें हैं। हम चारों ओर से घिर चुके हैं। भारत ने अपनी शिकायत दर्ज कराई है पर...। इन सबसे क्या मिलेगा भारत को? श्री एस.एम.कृष्णा जैसे विदेश मंत्री हमारे पास हैं। कौन सा आरोपी पाकिस्तान की जेल में है कौन सा राजस्थान की यह उन्हें नहीं पता। सरबजीत को पाकिस्तान ने क्यों पकड़ रखा है यह उन्हें नहीं पता। हीना रब्बानी खार उनसे पहले हुर्रियत नेताओं से क्यों मिलीं यह भी उन्हें नहीं पता। सरकार के प्रधानमंत्री हों या राहुल बाबा या सोनिया जी सभी लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं और हमारे कृष्णा साहब तो किसी दूसरे देश का ही भाषण पढ़ देते हैं तो कहाँ विरोध जतायें हम? ऐसे विदेश मंत्री के दरवाजे पर खटखटायें? ठोस विदेशी नीतियों की कमी है हमारे पास या फिर इच्छा शक्ति की?

चलते-चलते: सोनिया जी वापिस आ गई है। "मैडम आईं राहत लाईं" का नारा लगा रहे होंगे कांग्रेसी नेता। देखते हैं अगला सप्ताह क्या नये रंग लेकर आता है।
चीन पाकिस्तान से बड़ा शत्रु है... 

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, September 6, 2011

कांग्रेस सरकार, टीम अन्ना, देशद्रोह व कुछ "सुविचार" Congress Government, Anti-Team Anna Campaign

टीम अन्ना को इस आंदोलन से कुछ हासिल नहीं हुआ.. न सरकारी लोकपाल बिल वापिस हुआ.. न वो तारीख बताई गई जब तक जनलोकपाल बिल पास होगा.. ऊपर से दस तरह के "दिखावटी" बिल और आ गये सरकार के पास...अब अगर  कुछ होगा तो संसद में बहस... इस आंदोलन से हार केवल टीम अन्ना की हुई है...और अब सरकार के वार पर वार.. देखें आगे क्या होता है.. अन्ना ने कहा आधी लड़ाई जीते हैं... मुश्किल लगता है...

हाल ही में किरण बेदी, प्रशांत भूषण व ओमपुरी पर संसद की अवहेलना का आरोप लगाया गया। सांसद संसद की गरिमा की दलील देने लगे। किरण बेदी कहती हैं "सांसद विश्वासघाती हैं" तो क्या गलत कहा है? प्रशांत भूषण जब कहते हैं कि "सांसद पैसा लेकर  सवाल पूछते हैं" तो क्या गलत कहते हैं? क्या सांसदों पर पहले कभी घूस का आरोप नहीं लगा है? बकायदा सुबूत हैं उसके। और जब आवेश में ओमपुरी के मुँह से सांसदों को अनपढ़ और गँवार कहा गया तो वो इस देश की जनता की आवाज़ थी। आज हर सोशल नेटवर्किंग साईट पर नेताओं के खिलाफ़ नारे पढ़े जा सकते हैं। वैसे सांसद जब संसद में बहस करते हैं तब अनपढ़-गँवार नहीं बल्कि पढ़े लिखे गँवार जरूर लगते हैं।

(ये मैंने क्या लिख दिया......!!)

अब पढ़ते हैं अन्य "सुविचार"...

  • हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी कहते हैं शहीद ओसामा बिन लादेन के शोक में प्रार्थना सभा की जाये। आगे बयान आता है कि कश्मीर की आज़ादी ही एकमात्र रास्ता है।
  • मीरवाईज़ उमर अफ़्ज़ल गुरू की फ़ाँसी पर कहते हैं कि यदि उमर व फ़ारूख अब्दुल्ला को अफ़्ज़ल की फ़िक्र है तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिये।
  • अरूंधति रॉय भी काफ़ी बार माओवादियों के समर्थन में खुलकर बोल चुकी हैं। हुर्रियत नेताओं के साथ एक ही मंच पर आकर कश्मीर की आज़ादी का गुणगान कर चुकी हैं। उनके हिसाब से कश्मीर भारत का हिस्सा है ही नहीं क्योंकि वो कभी भारत में था ही नहीं।
  • उमर अब्दुला का हालिया बयान आया है कि यदि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा यदि अफ़्ज़ल गुरू की फ़ाँसी माफ़ करने की अर्जी दे तो क्या हिन्दुस्तान चुप बैठेगा। बातों बातों कईं बार अलगाववादियों का साथ दे चुके हैं और कश्मीर को भारत का हिस्सा नहीं मानने से आनाकानी करते रहते हैं।
  • जामा मस्जिद के शाही इमाम कहते हैं  कि भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन मुस्लिम-विरोधी है और मुसलमानों को इसमें शामिल नहीं होना चाहिये। वे न जाने कितनी बार हिन्दुस्तान विरोधी नारे लगा चुके हैं।
  • दिग्विजय सिंह ओसामा को "जी" कहकर सम्बोधित करते हैं और उसकी मृत्यु पर शोक प्रकट करते हैं। वैसे ये महाशय बहुत ज्ञानी हैं.. अन्ना की टीम का पूरा "सच" बस यही जानते हैं.. बाबा रामदेव को महाठग घोषित कर दिया है इन्होंने.. पिछले दस वर्षों में इन्हें बाबा रामदेव नहीं दिखाई दिये पर बस इसी साल ये नींद से जागे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यदि रामदेव सही राजनीति खेल पाते तो इनके आकाओं के पसीने छूट जाते।


और भी न जाने कितने ही ऐसे "सच्चे देशभक्त" महानुभाव हैं जो अपनी ज़ुबान से  "सुविचार" बोल चुके हैं। लेकिन उन पर कोई आरोप नहीं लगाये जाते..कांग्रेस सरकार कुछ नहीं कहती...क्यों? क्या माओवादियों को समर्थन देना..  अलगाववादियों का साथ देना देशद्रोह नहीं?

केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण को खरी खोटी सुनाने वाला सत्ता पक्ष उमर अब्दुल्ला के बयान पर क्यों चुप्पी साध लेता है? हुर्रियत नेताओं को नज़रबंद रखा जाने का  दिखावा क्यों किया जाता है? पाकिस्तान की विदेश मंत्री हमारे मन्त्रियों से मिलने से पहले हुर्रियत नेताओं से मिलती हैं वो भी नई दिल्ली में..  सरकार की नाक के ठीक नीचे..यही हुर्रियत नेता श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडे लहराते हैं और जश्न मनाते हैं..


कमाल है.. फिर भी आँखें मींच लेती है सरकार...

काले धन के साढ़े तीन लाख करोड़ नजर नहीं आते लेकिन केजरीवाल के नौ लाख जरूर खलते हैं.. सरकार की गरीबी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है...

आप ही बतायें देशद्रोह बड़ा है या संसद की अवहेलना? संसद देश की है। सरकार को संसद की गरिमा नज़र आती है परन्तु देश की मिटती साख और देश के विरूद्ध आग उगलते शब्द नज़र नहीं आते।

वैसे उमर अब्दुल्ला और अरूँधति रॉय पर सरकार चुप रहेगी। नई दिल्ली व श्रीनगर में हुर्रियत नेताओं के देश विरोधी बयान पर सरकार आँखें मूँद लेगी। बुखारी और मीरवाईज़ उमर और अफ़्ज़ल गुरू पर हो रही राजनीति भी उन्हें दिखाई नहीं देगी। कारण आप और मैं दोनों जानते हैं...

हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम,
वे कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होता...


एक अंतिम प्रश्न:  एक बार मान लेते हैं कि संसद जनता से बड़ी है.. सांसद हमारे कर्ताधर्ता हैं.. मंत्री व प्रधानमंत्री राजा हैं तो जिस अफ़्ज़ल ने संसद पर.. हमारे "महान", "सच्चे", "देशप्रेमी" सांसद, कर्त्तव्यनिष्ठ मंत्रियों पर हमला करवाया उसकी फ़ाँसी पर क्या आपत्ति है?


पहले भी कहा है आज फिर दोहराऊँगा, कसाब तो अपने देश पाकिस्तान के लिये हिन्दुस्तान आया.. उसको मारने से पहले अपने देश के गद्दार अफ़्ज़ल को फ़ाँसी दो।



नोट: आज का यह लेख नहीं.. भड़ास है.. जो कईं हिन्दुस्तानियों के दिलों में है... आज लिखते हुए दिमाग नहीं लगा पाया..



वन्देमातरम।
जय हिन्द।
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Thursday, September 1, 2011

खुसरो के गीत से जब बोल चुराये गुलज़ार ने तो निकला यह बेमिसाल गीत Amir Khusrau, Gulzar, Beautiful Lyrics Film Ghulami

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन ब-रंजिश
ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है..
सुनाई देती है जिसकी धड़कन
हमारा दिल या तुम्हारा दिल है

फ़िल्म गुलामी का यह गीत अपने आप में एक मिसाल है। इसके गीतकार हैं गुलज़ार साहब। गुलज़ार ने फ़िल्म इंडस्ट्री को इतने नायाब गीत दिये जितने शायद किसी और गीतकार ने नहीं दिये। एक से बढ़कर एक सदाबहार गीत। उन्हीं में से एक है आज का यह गीत। इस गीत के शुरुआती बोल फ़ारसी के हैं और गुलज़ार ने इसे खूबसूरती से अमीर खुसरो के एक सूफ़ी गीत से "चुराया"।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत को सुनकर इस गीत को गुनगुनाने से अपने आप को कोई नहीं रोक सकता।
फ़ारसी के शब्दों के बिल्कुल सटीक अर्थ बताने तो कठिन हैं, परन्तु प्रयास किया है। किसी को इससे बेहतर कोई अर्थ पता हो तो अवश्य बतायें।
इंटेरनेट पर खोजने पर अंग्रेज़ी भाषा में इसका मतलब लिखा हुआ आपको अवश्य मिल जायेगा।

ज़िहाल- ध्यान देना/गौर फ़रमाना
मिस्कीं- गरीब
मकुन- नहीं
हिज्र- जुदाई
भावार्थ यही निकलता है कि मेरे इस गरीब दिल पर गौर फ़रमायें और इसे रंजिश से न देखें। बेचारे दिल को हाल ही में जुदाई का ज़ख्म मिला है।

विडियो





खुसरो का वह गीत जिससे गुलज़ार को प्रेरणा मिली थी।

अमीर खुसरो ने एक गीत (तकनीकी तौर पर इसे क्या कहेंगे मैं नहीं बता सकता) लिखा जिसकी खासियत यह थी कि इसकी पहली पंक्ति फ़ारसी में थी जबकि दूसरी पंक्ति ब्रज भाषा में। फ़िल्म के गीत की तर्ज पर ही खुसरो के इस गीत को भी पढ़ें। गजब के शब्द.. कमाल की शब्दों की जादूगरी।

ज़िहाल-ए मिस्कीं मकुन तगाफ़ुल, (फ़ारसी)
दुराये नैना बनाये बतियां | (ब्रज)
कि ताब-ए-हिजरां नदारम ऎ जान, (फ़ारसी)
न लेहो काहे लगाये छतियां || (ब्रज)

शबां-ए-हिजरां दरज़ चूं ज़ुल्फ़
वा रोज़-ए-वस्लत चो उम्र कोताह, (फ़ारसी)
सखि पिया को जो मैं न देखूं
तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां || (ब्रज)

यकायक अज़ दिल, दो चश्म-ए-जादू
ब सद फ़रेबम बाबुर्द तस्कीं, (फ़ारसी)
किसे पडी है जो जा सुनावे
पियारे पी को हमारी बतियां || (ब्रज)

चो शमा सोज़ान, चो ज़र्रा हैरान
हमेशा गिरयान, बे इश्क आं मेह | (फ़ारसी)
न नींद नैना, ना अंग चैना
ना आप आवें, न भेजें पतियां || (ब्रज)

बहक्क-ए-रोज़े, विसाल-ए-दिलबर
कि दाद मारा, गरीब खुसरौ | (फ़ारसी)
सपेट मन के, वराये राखूं
जो जाये पांव, पिया के खटियां || (ब्रज)

चाहें अमीर खुसरो हों जिनके सूफ़ी गीत आज भी उनके चाहने वालों की पहली पसंद हैं और चाहें गुलज़ार जो पिछले पाँच से छह दशकों से एक के बाद एक नायाब गीत हमें दे रहे हैं.. दोनों का ही अपने क्षेत्र में कोई मुकाबला नहीं।


यदि किसी को खुसरो के गीत के बोल के अर्थ पता हो तो हमारे साथ अवश्य बाँटें।
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Sunday, August 28, 2011

क्या आप जानते हैं कि चीन की महान दीवार कितनी लम्बी है? Great Wall of China, Some Interesting Facts - Did You Know?

भारत के विभिन्न पर्यटन शहरों के बारे में तो हम जानते ही हैं किन्तु पड़ोसी को भी थोड़ा बहुत जानना चाहिये। क्या आप जानते हैं कि चीन की महान दीवार कितनी लम्बी है? चीन की दीवार मिट्टी व पत्थर से बनी हुई है व उत्तरी चीन में स्थित है। कहते हैं कि इसे चीन के राजाओं ने उत्तरी देशों से बचाव के लिये बनवाया है।

चीन की लम्बी दीवार
यह लेख लिखने से पहले मैं सोचता था कि यह एक ही दीवार है जो चीन में फ़ैली हुई है। किन्तु इंटेरनेट पर पढ़ कर समझ में आया है कि यह कईं सारी दीवारों के टुकड़े हैं जो विभिन्न राजाओं ने अलग अलग काल में बनवाये हैं। दीवार बनवाने की शुरुआत पाँचवी शताब्दी (ईसा -पूर्व) यानि करीबन ढाई हजार पहले हुई। प्रमुख दीवारों में किन शि हुआंग नामक राजा की दीवार शामिल है जो उन्होंने 220 से 206 ईसा पूर्व के दौरान बनवाई। हालाँकि अब इस दीवार का छोटा सा हिस्सा ही शेष बचा है। मिंग शासन के दौरान सबसे ज्यादा हिस्सा बनकर तैयार हुआ।

चीन की दीवार पूर्व में शंहाईगुआन से लेकर पश्चिम में लोपलेक तक फ़ैली हुई है। यह दीवार 6,259.6 किमी ईंटों से, 359.7 किमी खाई व 2,232 किमी प्राकृतिक रक्षात्मक बाधायें जैसे पहाड़ियाँ व नदियाँ हैं। इस तरह इसकी कुल लम्बाई करीबन नौ हजार किमी तक पहुँच जाती है। कहते हैं कि मानव निर्मित यह एक ही ऐसी कृति है जो चाँद से देखी जा सकती है।

अन्य कुछ रोचक तथ्य:

  • भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला फ़ोन है नोकिया ये तो सभी जानते हैं। ये कम्पनी फ़िनलैंड की है और इसका नाम फ़िनलैंड के शहर एक नाम पर रखा गया है।
  • दुनिया में सबसे ज्यादा पोस्ट ऑफ़िस भारत में ही हैं। इनकी संख्या एक लाख से भी अधिक है।
  • मिस्र के पिरामिड विश्वविख्यात हैं। किन्तु ये कम ही लोगों को पता है कि मिस्र से अधिक पिरामिड पेरू (दक्षिण अमरीका) में हैं।
  • जमाइका में 120 नदियाँ हैं व सऊदी अरब एक ऐसा देश है जहाँ एक भी नदी नहीं है।
  • ऑस्ट्रेलिया विश्व का एक मात्र महाद्वीप है जहाँ एक भी ज्वालामुखी नहीं है।
  • ब्राज़ील दक्षिण अमरीका महाद्वीप का एक देश है जो महाद्वीप का पचास फ़ीसदी हिस्सा है।  ब्राज़ील का नाम एक पेड़ के नाम पर रखा गया है।


क्या आप जानते हैं के अन्य लेख पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें। आपको यह श्रॄंख्ला कैसी लग रही है अवश्य बतायें।

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, August 23, 2011

राम लीला मैदान में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ अन्ना हजारे का अनशन Anna Hazaare, Ramlila Ground Delhi, Anti Corruption Campaign

अन्ना हजारे- एक ऐसा नाम जो लाखों लोगों को अपनी बातों से, अपने उद्देश्य से सबको एक धागे में पिरोये हुए है। आज के भारत का एक ऐसा शख्स जिसके लिये कहा जा रहा है कि भारत में ऐसा कोई नेता या अभिनेता नहीं जो इतनी भारी भीड़ को सात दिनों तक मैदान में इकट्ठा कर सके। 

अन्ना अनशन क्यों कर रहे हैं ये सभी को पता है इसलिये आपका ज्यादा समय नहीं लूँगा। जनलोकपाल का समर्थन पाने की चाह में आज लगातार आठवें दिन उनका अनशन जारी है।

ऑफ़िस के कुछ साथी रविवार की कड़ी धूप में रामलीला मैदान, दिल्ली पहुँचे। मैं जैसे ही नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन में मेट्रो से बाहर निकला  मुझे हाथ में तिरंगे लिये, मुँह पर वन्देमातरम का राग व अन्ना  के साथ उनके संघर्ष में उनके साथ रहने की प्रतिज्ञा करते हुए झुंड के झुंड रामलीला मैदान की ओर जा रहे हैं। स्टेशन के अंदर ही सैकड़ों लोग व तिरंगे..

आज़ाद भारत के इतिहास में ऐसे मौके कम ही आये होंगे जब स्वतंत्रता दिवस से भी अधिक झंडे सड़कों पर दिखाये दे रहे हों। जितने लोग मैदान में थे उससे कहीं अधिक लोग सड़कों पर थे।

आपके लिये कुछ तस्वीरें रामलीला मैदान से ही...




नारे लगाते लोगों के कुछ वीडियो भी...



"मितवा" गाने पर आकाश में स्वच्छंद उड़ते पंछियों को देख कर लगा कि शायद अब देश आज़ाद होगा.. 



अब कुछ ऐसे चित्र भी जो ये सोचने पर मजबूर करेंगे कि लोकपाल भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवा भी दे फिर भी इस कथित "सभ्य समाज" में सभ्य लोगों की कहीं कमी सी है। 

कूड़ा फ़ैलाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है....





लाइन तोड़ते और बिना हेलमेट व चार लोग एक बाइक पर..ऐसे दृश्य आम देखे जा सकते थे... ये सब देखकर कहीं से लगा नहीं कि ये लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ़ साथ देने आये हैं... भ्रष्टाचार तो केवल एक राक्षस है... हर आदमी में जो राक्षस पल रहा है जब तक उसके लिये लोकपाल नहीं आयेगा तब तक यह देश आज़ाद नहीं होगा।


आज़ादी की लड़ाई हमने नहीं देखी...पर रविवार को हमने देखा कि आज़ादी ऐसे ही मिली होगी।


नेताओं के भ्रष्टाचार तो हमें दिखता है और लोकपाल से साठ प्रतिशत दूर भी हो जाये परन्तु क्या वो दिन भी आयेगा जब हम लाइसेंस के लिये दो हजार, मैरिज सर्टिफ़िकेट के लिये पाँच हजार व पासपोर्ट के लिये दो सौ रूपये न दें?



वन्दे मातरम...
जय हिन्द
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Saturday, August 20, 2011

आधी रात को "अन्ना के अनशन" पर हुई कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक Congress Midnight Meeting Rahul Gandhi, Manmohan Singh Present In Meeting

अभी अभी खबर आई है कि आधी रात को कांग्रेस के कुछ मुख्य सदस्यों के बीच एक बैठक हुई। राहुल गाँधी जी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में थे मनमोहन सिंह, कपिल सिब्बल व चिदम्बरम। हमारे पास इस बैठक में हुई बातों के "ए़स्क्ल्यूज़िव टैक्स्ट" है। आइये जानते हैं कि इस बैठक में आखिर हुआ क्या?

कपिल सिब्बल: नमस्कार राहुल बाबा।
चिदम्बरम: नमस्कार राहुल बाबा।
मनमोहन सिंह: नमस्कार....
राहुल: अरे नमस्कार नहीं.. जय किसान बोलिये.. शास्त्री जी के नारे में से मुझे यही नारा पसंद आया है। 

मनमोहन सिंह: जय कि...
राहुल बाबा: चलिये ये सब छोड़िये..सीधा मुद्दे पर आते हैं। इस अन्ना का क्या किया जाये?
कपिल: अन्ना का क्या करना है... सब ठीक हो जायेगा.. थोड़े दिन रूकिये अपने आप आंदोलन ठंडा हो जायेगा।
चिद्दु: पर सिब्बल जी, पिछली बार भी हमने यही सोचा था.. पर हुआ क्या... उलटे और भी ज्यादा लोग आंदोलन में जुड़ गये।
सिब्बल : हमने यही सोचा था कि जैसे रामदेव को भगाया.. वैसे ही अन्ना को जेल भिजवा कर ये अनशन भी तुड़वा देंगे।
चिद्दु: पर रामदेव के साथ ये क्रेन बेदी, केजरीवाल जैसे बंदे होते तो खाट खड़ी कर देते। बेचारा रामदेव... रामदेव का आंदोलन इससे ज्यादा बढ़ा साबित होता..उसके साथ गाँव के लोग जुड़े हुए हैं..और दिल्ली से बाहर के..
सिब्बल: और अन्ना के साथ शहर वाले... वोट की चिंता समाप्त.. हा हा...

राहुल: हाँ.. सभी जानते हैं कि ये शहरी वोट हमारे किसी काम के नहीं...रामदेव को पहली रात ही खत्म करना बहुत जरूरी था।
सिब्बल: एक काम करते  हैं अन्ना की टीम से मुलाकात करते हैं..दस में से चार-पाँच बातें और मान जाते हैं थोड़ा वे आगे बढ़ेंगे थोड़ा हम..बस हो गया काम...बोलिये..
मनमोहन सिंह: मेरे दिमाग में एक आईडिया आया है...

बाकि सभी एक साथ: क्या बात है..क्या बात है...आपको एक आईडिया है.. भई बाह...

मनमोहन सिंह: अरे सुनिये तो..मज़ाक की बात नहीं है.. हम उनकी सारी बातें मान जाते हैं। इससे लोगों में हमारी इज़्ज़त बढ़ जायेगी। सब यही समझेंगे कि हम जन लोकपाल के साथ है। पर हम ये जानते हैं कि सभी पार्टियाँ अन्ना के बिल से सहमत नहीं हैं। संसद में ये बिल पास हो ही नहीं सकता.. गारंटीड....


राहुल बाबा: कौन कहता है आपको राजनीति नहीं आती...? मैं मम्मी से बात करता हूँ.. आपकी प्रोमोशन के बारे में.. अगली बार आपको राष्ट्रपति बनायेंगे..

मनमोहन: राहुल बाबा आपका शुक्रिया...
राहुल बाबा: अरे शुक्रिया कैसा.. आप ही तो हमारे काम आते हैं...
सिब्बल जी: मनमोहन जी, आपने क्या युक्ति सुझाई है.. साँप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे.. अगर ये आप पहले बता देते तो प्रेस कांफ़्रेंस में हमारी इंसल्ट न होती। अब हर जगह हमें ताने सुनने को मिल रहे हैं। "हू हा हू हा कपिल सिब्बल चूहा" जैसे नारे... ओह...


चिद्दु: कोई नहीं जी.. देर आये दुरुस्त आये.. अभी ही ऐलान कर देते हैं..
राहुल: अरे आप नहीं.. जरूरत पड़ने पर मैं जाकर ऐलान करूँगा कि अन्ना को बिना बात परेशान किया गया और उनकी सभी बातें मानी जायें। इससे क्या होगा आप जानते ही हैं। वैसे भी मुझे यह कहकर बदना किया जा रहा है कि "सारे युवा यहाँ हैं..राहुल गाँधी कहाँ हैं?"...

(सभी सदस्य ताली बजाते हैं)

राहुल : बड़े दिनों से हम किसानों से मिलने नहीं गये.. यूपी में बगावत करवाओ.. रीता बहुगुणा जी आखिर कर क्या रही हैं.. नोएडा की बातों को भी महीने से ऊपर हो गया है। चुनाव सर पर हैं...
सिब्बल: मैं बात करता हूँ।
राहु्ल: चलिए मीटिंग समाप्त... कल अनशन की कंडीशन देखकर आज के विचारों पर कल फ़ैसला लेंगे.. सबको मंज़ूर है?

जी (सभी एक स्वर में)

मनमोहन जी: जी मंजूर है। राहुल बाबा.. सोनिया मैडम कैसी हैं अब?
राहुल: मुझे भी उनकी बहुत याद आ रही है। दो दिन में जाने की सोचता हूँ।
सिब्बु: लोकसभा सेक्रेट्री को आपकी यात्रा के बारे में बताना है क्या?
राहुल बाबा: सिब्बल जी, कैसी बहकी सी बातें कर रहे हैं.. इतने सालों में कभी हमने लोकसभा सेकेट्री से परमीशन ली है जो अब लेंगे? कब कहाँ कैसे जाना है ये हम तय करते हैं..लोकसभा सेक्रेट्री किस खेत की मूली है?

गुस्ताखियाँ हाजिर में आज इतना ही। आपको ये कड़ी कैसी लगी और श्रृंख्ला में आप किन किरदारों को पढ़ना चाहेंगे, जरूर बतायें।
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Thursday, August 18, 2011

वह खून कहो किस मतलब का - खूनी हस्ताक्षर Khooni Hastakshar : A New Series Of Patriotic Poems

पिछले पाँच दिन देशभक्ति के फ़िल्मी गीतों के नाम थे तो आने वाले कुछ सप्ताह देशभक्ति की कविताओं के नाम होंगे। जी हाँ आज से एक नई श्रॄंख्ला का आगमन हो रहा है जिसमें वे कवितायें शामिल होंगी जिन्हें हम भूल चुके हैं। आज से उन कविताओं को हम याद करेंगे और कुछ ऐसा करने का प्रयास करते रहेंगे जिससे इस देश की मिट्टी का कर्ज़ चुकाया जा सके। स्वतंत्रता की लड़ाई में शहीद हुए जितने भी स्वतंत्रता सेनानी रहे ये श्रृंख्ला उनके लिये है। अगर उनकी जैसी देशभक्ति का एक फ़ीसदी हिस्सा भी हममें आ जाये तो जीवन  धन्य हो जाये।

इस कड़ी की शुरुआत हो रही है श्री गोपालदास व्यास की "खूनी हस्ताक्षर" से।

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे उबाल का नाम नहीं,
वह खून कहो किस मतलब का आ सके देश के काम नहीं.

वह खून कहो किस मतलब का जिसमे जीवन ना रवानी हैं,
जो परवश होकर बहता हैं वह खून नहीं हैं पानी हैं.

उस दिन दुनिया ने सही सही खून की कीमत पहचानी थी,
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में मांगी उनसे कुर्बानी थी.

बोले स्वतंत्रता की खातिर बलिदान तुम्हे करना होगा,
तुम बहुत जी चुके हो जग में लेकिन आगे मरना होगा.

आज़ादी के चरणों में जो जयमाल चढ़ाई जायेगी,
वह सुनो तुम्हारे शीशों के फूलों से गूँथी जायेगी.

आज़ादी का संग्राम कही पैसे पर खेला जाता हैं ,
यह शीश काटने का सौदा नंगे सर झेला जाता हैं.

आज़ादी का इतिहास कही काली स्याही लिख पाती हैं ?
इसको लिखने के लिए खून की नदी बहाई जाती हैं.

यह कहते कहते वक्ता की आँखों में लहू उतर आया,
मुख रक्त वर्ण हो दमक उठा दमकी उनकी रक्तिम काया.

आजानुबाहू ऊँची करके वो बोले ” रक्त मुझे देना “
इसके बदले में भारत की आज़ादी तुम मुझसे लेना.

हो गयी सभा में उथल-पुथल सीने में दिल ना समाते थे,
स्वर इन्कलाब के नारों के कोसों तक छाये जाते थे.

हम देंगे-देंगे खून शब्द बस यही सुनाई देते थे,
रण में जाने को युवक खड़े तैयार दिखाई देते थे.

बोले सुभाष ऐसे नहीं बातों से मतलब सरता हैं,
लो यह कागज़ हैं कौन यहाँ आकर हस्ताक्षर करता हैं.

इसको भरने वाले जन को सर्वस्व समर्पण करना हैं,
अपना तन-मन -धन जीवन माता को अर्पण करना हैं.

पर यह साधारण पत्र नहीं आज़ादी का परवाना हैं,
इसपर तुमको अपने तन का कुछ उज्ज्वल रक्त गिराना हैं.

वह आगे आये जिसके तन में भारतीय खून बहता हो,
वह आगे आये जो अपने को हिंदुस्तानी कहता हो.

वह आगे आये जो इसपर खूनी हस्ताक्षर देता हो ,
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ आये, जो हसकर इसको लेता हो.

सारी जनता हुंकार उठी हम आते हैं हम आते हैं,
माता के चरणों में यह लो हम अपना रक्त चढाते हैं.

साहस से बढे युवक उस दिन,देखा बढ़ते ही आते थे,
चाक़ू-छुरी कटियारों से वो अपना रक्त गिराते थे.

फिर उसी रक्त स्याही में वो अपनी कलम डुबाते थे,
आज़ादी के परवाने पर वो हस्ताक्षर करते जाते थे.

उस दिन तारों ने देखा हिंदुस्तानी इतिहास नया,
जब लिखा महा रणवीरों ने खून से अपना इतिहास नया.

नोट: ये श्रृंख्ला कब तक चलेगी यह कहना कठिन है.. मुझे जितनी कवितायें याद आ पायेंगी उतनी ही पोस्ट कर पाऊँगा.. आप यदि इस श्रॄंख्ला में कोई कविता शामिल करना चाहते हैं तो अवश्य बतायें।


जय हिन्द ।
वन्देमातरम ।
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Monday, August 15, 2011

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत - स्वतंत्रता दिवस पर खास जवानों के लिये Independence Day Special - Two Songs Dedicated to our Soldiers


स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

1962 के युद्ध के बाद आये ये दो बेमिसाल गीत...

कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों (हक़ीकत)



"ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी " : इस गीत के बिना ये श्रृंख्ला पूरी नहीं हो सकती।


आपको ये श्रृंख्ला कैसी लगी, अवश्य बताइयेगा। बेशक न बतायें पर इतना ध्यान ज़रूर रखें कि आपका हर कार्य ऐसा हो जो इस देश की मिट्टी के काम आये। इस धरती को अपनी माँ समझें और देश को अपना परिवार।

मैथिली शरण गुप्त कह गये हैं : जननी जन्मभूमि: च स्वर्गदापि गरीयसी। यानि माँ और जन्मभूमि को स्वर्ग से बड़ा दर्जा प्राप्त है।

जय हिन्द।
वन्देमातरम।
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Sunday, August 14, 2011

कुछ कर गुज़रने को खून चला - स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 - 15 अगस्त ) RDB-Khoon Chala and Maa Tujhe Salaam Independence Day Special - Patriotic Songs Series



रंग दे बसन्ती फ़िल्म का "खून चला" आज की हकीकत से रूबरू कराता है इसलिये ये गीत इस श्रृंख्ला का हिस्सा बना।

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला

खुली -सी  चोट  लेकर , बड़ी -सी  टीस  लेकर
आहिस्ता  आहिस्ता
सवालों  की  ऊँगली , जवाबों  की  मुट्ठी
संग  लेकर  खून  चला
कुछ  कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला

कुछ कर  गुजरने  को  खून  चला  खून  चला
आँखों  के  शीशे  में  उतरने  को  खून  चला
बदन  से  टपक  कर , ज़मीन  से  लिपटकर
गलियों  से  रास्तों  से  उभरकर , उमड़कर
नए  रंग  भर  ने  को  खून  चला  खून  चला




माँ तुझे सलाम



स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।

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Saturday, August 13, 2011

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है स्वतंत्रता दिवस विशेष (11 से 15 अगस्त) VandeMataram Song from Anandmath, Patriotic Songs Series

आज के गीतों में से एक है फ़िल्म आनन्दमठ का गीत वन्देमातरम।
वन्देमातरम गीत के इतिहास को जानने के लिये।


सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वन्देमातरम( आनन्दमठ) 






स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।


वन्देमातरम
जय हिन्द
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Friday, August 12, 2011

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Independence Day Special Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011)

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम (शहीद)

है प्रीत जहाँ की रीत सदा (पूरब और पश्चिम का सदाबहार गीत)

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Thursday, August 11, 2011

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं - स्वतंत्रता दिवस विशेष: देश भक्ति से ओत-प्रोत गीतों की श्रृंख्ला (11 से 15 अगस्त) Series Of Patriotic Songs (11 to 15 August 2011) Independence Day Special

स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को मिली। जिसकी खुशी हम आज तक मनाते हैं। लेकिन कभी कभार  ही हम ये सोचते हैं कि हमने इस देश को क्या दिया। बस यही कहते रहते हैं कि इस देश में कुछ नहीं रखा..इस देश ने हमें क्या दिया? स्वतंत्रता दिवस के विशेष पर्व पर धूप-छाँव लेकर आया है देश भक्ति से ओत-प्रोत दस गानों की कड़ियाँ। ग्यारह से पन्द्रह अगस्त तक हर रोज़ एक या दो राष्ट्रभक्ति का गीत।

शायद इन गीतों को सुनकर रक्त में उबाल आ जाये और देश को अपना जीवन समर्पित करने का जज़्बा आ जाये। कुछ "बड़ा" नहीं करना..नेता नहीं बनना.. यदि हम कूड़ा न फ़ैलायें..ट्रैफ़िक का पालन करें...सड़क पर लड़ाई न करें...झूठ न बोलें...किसी का बुरा न करें... तो भी देश का भला हो सकता है।



देश भक्ति का एक गीत आप काबुलीवाला से पहले ही सुन चुके हैं

अपनी आज़ादी को हम हर्गिज़ मिटा सकते नहीं..



लाये हैं हम तूफ़ान से किश्ती निकाल के.. (फ़िल्म: जागृति)



जय हिन्द।
वन्देमातरम।
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Wednesday, August 10, 2011

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का क्रमवार लेखा-जोखा - स्वतंत्रता दिवस विशेष Chronological Order Of Events - Indian Independence Movement

देश के स्वतंत्रता आंदोलन की वो तारीखें जो इतिहास बन गईं। इन तारीखों में शहीदों का रक्त और उम्मीदें बँधीं हैं जो उन्होंने एक आज़ाद भारत के लिये देखीं थीं।

1608  : कैप्टन विलिय्म्स हॉकिंस का सूरत के जरिये व्यापार शुरु। मुगल शासक जहाँगीर  का वो क़दम जो इस देश की तक़दीर बदल गया।


1707  :  औरंगज़ेब की मृत्यु और मुगलों के अंत की शुरुआत।


1757  :  प्लासी का युद्ध, सिराजुद्दौला की हार।


1764  :  बक्सर का युद्ध, बंगाल ईस्ट इंडिया कम्पनी के हवाले।


1857  :  हिन्दुस्तान की पहली क्रान्ति। लक्ष्मीबाई, तांत्या टोपे व मंगल पांडे शहीद। पूरे हिन्दुस्तान का कोई एक राजा न होना रहा नुकसान देह। बहादुर शाह ज़फ़र व मुगल हुकूमत का अंत।


1885  :  ए.ओ.ह्यूम (Alan Octavian Hume) द्वारा काँग्रेस की स्थापना।


1905  :  बंगाल का विभाजन। स्वदेशी का नारा बुलंद हुआ, दादाभाई नाओरोजी (कांग्रेस) द्वारा स्वराज की घोषणा। राज देशी नेताओं का, हुकुम ईस्ट इंडिया कम्पनी का।


1906  :  मुस्लिम लीग का हिन्दुस्तान की राजनीति में जन्म।


1907  :  काँग्रेस हुई दो फ़ाड़, बने गरम दल व नरम दल । बाल गंगाधर तिलक बने  गरम दल के नेता।


1908  :  11 अगस्त को खुदीराम बोस को फ़ाँसी। उम्र: महज अठारह बरस... !!


1909  :  Indian Council Act [Morley-Minto Reforms] मकसद भारतीयों की सरकार में दखल कम करना।


1914  :  विश्व युद्ध आरम्भ।
1916  :  गरम दल वापस कांग्रेस से जुड़े। काँग्रेस और मुस्लिम लीग में साथ मिलकर लड़ने का लखनऊ में हुआ समझौता।


1919  : तेरह अप्रैल,  स्थान- जलियाँवाला बाग, अमृतसर। ब्रिटिश मिलिट्री द्वारा 379 निहत्थों पर गोलियाँ दागी गईं। जलियाँवालाबाग में बाहर निकलने का केवल एक और वह भी तंग रास्ता है। दीवारों पर आज भी गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं। कुछ लोग यदि आज भी जिन्दा होंगे तो सोच रहे होंगे कि आज के हालात देखने से अच्छा होता यदि शहीद हो जाते।


1920  :  असहयोग व खिलाफ़त आंदोलन आरम्भ।


1922  :  चौरा-चौरी आंदोलन में तीन हजार लोगों के झुंड ने पुलिस   चौकी जलाई व पुलिसवालों की हत्या की। नाराज़ गाँधी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया।

1924  :  काकोरी रेल लूटी गई।


1928  : लाला लाजपत राय की हत्या।


1929  :  साइमन कमिशन का भारत में आना, भगत सिंह द्वारा एसेम्बली में बम फ़ेंका गया। पूर्ण स्वराज का इरादा जाहिर किया। मक़सद हिन्दुस्तान पर केवल हिन्दुस्तानियों का राज होना, ब्रिटेन की दखल मंज़ूर नहीं।


1930  :  भगत सिंह द्वारा पूर्ण स्वराज के नारे के बाद काँग्रेस ने भी 26 जनवरी को पूर्ण स्वराज की घोषणा कर दी। डांडी मार्च व नमक सत्याग्रह भी उसी साल हुए।


1931  :5 मार्च को गाँधी व वाइसरॉय इरविन में हुआ समझौता जिसके अंतर्गत अहिंसक सत्याग्रहियों को जेल से बाहर करने पर व नमक इत्यादि पर टैक्स से मुक्ति पर हुआ समझौता। हिंसा से विद्रोह करने वालों पर कोई बात नहीं। अठारह दिन पश्चात 23 मार्च को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फ़ाँसी।

1937  : 1935 एक्ट के तहत हुए चुनावों में काँग्रेस की भारी जीत।
1939  :  दूसरा विश्व युद्ध शुरु।


1942  :  अंग्रेज़ों भारत छोड़ो आंदोलन, सुभाष चंद्र बोस का काँग्रेस छोड़ा जाना व अपनी स्वयं की आर्मी बनाना।
1946  :  बोस की असामयिक मृत्यु, कबिनेट मिशन का भारत आगमन, नौसेना द्वारा विद्रोह।


1947  :  पन्द्रह अगस्त को लालकिले पर तिरंगा फ़हराया गया, देश आज़ाद हुआ।


जय हिन्द
वन्देमातरम
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Tuesday, August 9, 2011

मैं अब तक क्यों मौन हूँ? Why Am I Silent Spectator of Crime happening in my city?

मित्रों,

आज से चार वर्ष पूर्व मैंने यह कविता लिखी थी। हो सकता है आप में से कुछ लोगों ने यह पढ़ी हुई हो पर आज स्वतंत्रता दिवस विशेष पर यह आज भी सामयिक है। देश में कितनी पीढ़ा और असंवेदनशीलता है यह कविता उसके बारे में बताती है। कहते हैं जुर्म सहने और जुर्म देख कर आवाज़ उठाने वाला उतना ही बड़ा गुनाहगार है जितना जुर्म करने वाला.. और आज के इस दौर में शोषण को देखते रहने वाले लोगों की तादाद बढ़ रही है....

अँधा वो नहीं,

जो चलने के लिये,
डंडे का सहारा ले,
अँधा तो वो है,
जो अत्याचार होते देखे,
और आँखें फिरा ले।

बहरा वो नहीं,
जिसको सुनाने के लिये,
ऊँचा बोलना पड़ता है,
बहरा वो है,
जो कानों में रूई ठूँस कर,
इंसाफ किया करता है।

गूँगा वो नहीं,
जिसके मुँह में ज़ुबान नहीं,
गूँगे वो हैं,
जो चुप रहते हैं जब तक,
रुपया उन पर मेहरबान नहीं।

यहाँ अँधे, गूँगे बहरों की,
फ़ौज दिखाई देती है,
यहाँ मासूम खून से तरबतर,
मौजें दिखाई देती हैं।

खूब सियासत होती है,
लोगों के जज़्बातों पर,
जश्न मनाया जाता है,
यहाँ ज़िंदा हज़ारों लाशों पर।

यहाँ धमाके होने चाहिये
ताकि खाना हजम हो सके,
मौत का तांडव न हो तो,
चेहरे पर रौनक कैसे आ सके।

यहाँ बगैर लाल रंग के,
हर दिन बेबुनियाद है,
लाशों को ४७, ८४, ०२ की,
काली तारीखें याद हैं।

कोई पूछे उन अँधों से,
कैसे देखा करते हो बलात्कार,
कोई पूछे उन बहरों से,
कैसे सुन लेते हो चीत्कार,
कोई पूछे उन गूँगों से,
क्यों मचाया है हाहाकार।

मुझसे मत पूछना,
इन सवालों को,
मुझे नहीं पता मैं अँधा हूँ,
बहरा हूँ, गूँगा हूँ या कौन हूँ?
हद है!
हर सवाल पर,
मैं अब तक क्यों मौन हूँ??
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Monday, August 8, 2011

संवेदना की अर्थी No Feelings Left In Metros

कल बस से कटा था एक हाथ,
कराहता रहा वो,
तड़पता रहा वो
कईं घंटे
एक मेट्रो शहर में-
हिन्दुस्तान का दिल कहते हैं हम जिसे!!

आज कार चलाते एक शख्स ने
टक्कर मार दी गाय को,
और पलट कर भी न देखा-
श्राद्ध पर रोटी खिलाने के लिये
गाय ढूँढेगा
तब शायद याद आ जाये
इस बेज़ुबान की-
माँ का दर्जा दिया है हमने जिसे!!

सड़क किनारे  पड़े पड़े
लाश बन गया है एक शरीर-
जिसे ठोकर मारते हुए
चल पड़ी है दुनिया
तरक्की की राह पर,
विश्व का
नम्बर एक बनने की चाह लिये

कहते हैं ये शहर नहीं सोता
पर हाँ
आँखें जरूर मूँद लेता है
पीड़ा देख नहीं सकता पगला!!

लाशें चीख रही हैं-
समय की माँग है-
संवेदना की
अर्थी पर रोने के लिये
रूदालियों को बुलाया जाये!!!
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Wednesday, August 3, 2011

क्या आप जानते हैं - थर्मामीटर और वायरलैस का किसने और कब किया आविष्कार? Scientists Who Invented Thermometer And Wireless- Do You Know?

हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में कईं उपकरण या वस्तुयें ऐसी होती हैं जिन्हें हम देखते तो हैं पर हम उन पर ध्यान नहीं देते। वे कैसे बने, किसने कब कैसे बनाया? आज हम कुछ ऐसी ही चीज़ों के बारे में संक्षेप में जानेंगे।

पहली बात करते हैं डायनामाईट की। इसका जिक्र मैंने भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेताओं के लेख में भी किया था। डायनामाईट का आविष्कार एल्फ़्रेड नोबेल (1833-1896) ने किया। स्वीडन के इस वैज्ञानिक से नाइट्रोग्लीसरीन (Nitro Glycerin) की बोतल गलती से Keisulghur पर गिर गई, जो एक बारीक पाऊडर होता है। नोबेल को लगा कि वहाँ उसी समय एक छोटा ब्लास्ट होना चाहिये था। पर वो एक पेस्ट बन गया। नोबेल ने महसूस किया कि वो पेस्ट ज्वलनशील तो है परन्तु उससे घबराने की बात नहीं थी। उन्होंने उस पेस्ट का नाम डायनामाईट रखा। Dynamite एक ग्रीक शब्द Dunamis से बना है जिसका अर्थ पाऊडर होता है। नोबेल नहीं जानते थे कि वो पाऊडर आज वैश्विक खतरा बन चुका है।



1590 के दशक में इटली के एक वैज्ञानिक ने शीशे की नली से तापमान मापा। वो आविष्कार कारगर साबित हुआ और आज हम उसको थर्मामीटर के नाम से जानते हैं। वैज्ञानिक थे गैलीलियो।

क्या कभी आपने सोचा है कि बिना तारों के आपकी ज़िन्दगी कैसी हो गई है? जहाँ चाहो वहाँ से बात करो!! पर इसके बारे में विचार आया तो किसे आया? बचपन में इस वैज्ञानिक का नाम पढ़ा तो था पर फिर भूल गया था। ये थे मार्कोनॊ (१८७४-१९३७)।1901 में इटली के इस वैज्ञानिक ने विद्युत तरंगों को बिना तार के एक जगह से दूसरी जगह तक भेजने में सफलता पाई। उन्होंने इंग्लैंड के कार्नवाल से कनाडा के न्यूफ़ाऊंडलैंड तक विद्युत तरंगों को भेजा। यानि अटलांटिक महासागर के ऊपर से। उस एक आविष्कार ने आज के मोबाईल फ़ोन को जन्म दिया।

अगली बात करते  हैं कार की। पहली कार किसने और कब बनाई इसके बारे पता लगाना कठिन  है। कार के उपकरण बनाने में जर्मनी की तकनीक का आज मुकाबला नहीं है। जर्मनी के ही एक वैज्ञानिक डायबलर ने 1886 में पेट्रोल से चलने वाला एक इंजन बनाया। इस इंजन को एक वाहन में लगा कर उसे कईं किलोमीटर तक सफलता पूर्वक चलाया।
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