Thursday, December 1, 2011

किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है Film Anari 1959, Singer Mukesh

राजकपूर की फ़िल्म अनाड़ी आई थी 1959 में। आज भूले बिसरे गीत में शामिल हैं इसी फ़िल्म के गीत। राजकपूर के अधिकतर गाने मुकेश ने गाये हैं और उनकी आवाज़ के कहने ही क्या...

किसी  की  मुस्कुराहटों  पे  हो  निसार 


इस गाने को यूट्यूब पर सर्च करने पर आपको सैकड़ों ऐसे गाने भी मिल जायेंगे जो किसी न किसी सम्गीत प्रेमी ने राज कपूर व मुकेश की याद में स्वयं गाये हैं... उन्हें श्रद्धांजलि दी है..यही इसके बोल, आवाज़ का कमाल है...
ब्लॉगर में कोई "बग" है जिसके कारण इस गाने को सर्च करने पर भी "असली" गाना नहीं दिखा रहा है अत:  लिंक पर आपको स्वयं जाना होगा..


असली गाना इस लिंक पर 
http://www.youtube.com/watch?v=tKpfIAXnPr0


किसी  की  मुस्कुराहटों  पे  हो  निसार 
किसी  का  दर्द  मिल  सके  तो  ले  उधार
किसी  के  वास्ते  हो  तेरे  दिल  में  प्यार
जीना  इसी  का  नाम  है

किसी  की  मुस्कुराहटों  पे  हो  निसार
किसी  का  दर्द  मिल  सके  तो  ले  उधार
किसी  के  वास्ते  हो  तेरे  दिल  में  प्यार
जीना  इसी  का  नाम  है

माना  अपनी  जेब  से  फ़कीर  हैं
फिर  भी  यारों  दिल  के  हम  अमीर  हैं
माना  अपनी  जेब  से   फ़कीर  हैं
फिर  भी  यारों  दिल  के  हम  अमीर  हैं

मिटे  जो  प्यार  के  लिए  वो  ज़िन्दगी 
चले  बहार  के  लिए  वो  ज़िन्दगी
किसी  को  हो  न  हो  हमें  तो  ऐतबार
जीना  इसी  का  नाम  है

किसी  की  मुस्कुराहटों  पे  हो  निसार
किसी  का  दर्द  मिल  सके  तो  ले  उधार
किसी  के  वास्ते  हो  तेरे  दिल  में  प्यार
जीना  इसी  का  नाम  है

रिश्ता  दिल  से  दिल  के  ऐतबार  का 
जिंदा  है  हमी  से  नाम  प्यार  का 
रिश्ता  दिल  से  दिल  के  ऐतबार  का 
जिंदा  है  हमी  से  नाम  प्यार  का 


कि मरके  भी  किसी  को  याद  आयेंगे 
किसी  के  आंसुओ  में  मुस्कुरायेंगे 
कहेगा  फूल  हर  कली  से  बार  बार 
जीना  इसी  का  नाम  है 

किसी  की  मुस्कुराहटों  पे  हो  निसार
किसी  का  दर्द  मिल  सके  तो  ले  उधार
किसी  के  वास्ते  हो  तेरे  दिल  में  प्यार
जीना  इसी  का  नाम  है


सब  कुछ  सीखा  हमने , न  सीखी  होशियारी 

सब  कुछ  सीखा  हमने , न  सीखी  होशियारी
सच  है  दुनियावालों , की  हम  हैं  अनाड़ी

दुनिया  ने  कितना  समझाया
कौन  है  अपना , कौन  पराया
फिर  भी  दिल  की  चोट  छुपा  कर
हमने  आपका  दिल  बहलाया
खुद  पे  मर  मिटने  की , ये  जिद  थी  हमारी  (2)
सच  है  दुनियावालों  की  हम  हैं  अनाड़ी

असली  नकली  चेहरे  देखे
दिल  पे  सौ  सौ  पहरे  देखे
मेरे  दुखते  दिल  से  पूछो
क्या  क्या  ख्वाब  सुन्हेरे  देखे
टूटा  जिस  तारे  पे  नज़र  थी  हमारी  (2)
सच  है  दुनियावालों  की  हम  हैं  अनाड़ी

दिल  का  चमन  उजड़ते  देखा
प्यार  का  रंग उतरते देखा
हमने  हर  जीने वाले  को
धन दौलत  पे  मरते देखा
दिल  पे  मरने वाले मरेंगे भिखारी  (2)
सच  है  दुनियावालों  की  हम  हैं  अनाड़ी

भूले बिसरे गीत के अन्य गीत

जय हिन्द
वन्देमातरम
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Monday, November 28, 2011

चर्चा में: शरद पवार, कोलावरी डी और विदेशी पूँजी निवेश Sharad Pawar, Kolaveri Di, Foreign Direct Investment

पिछले सप्ताह हमारे देश में तीन महत्त्वपूर्ण घटनायें हुईं। पहली शरद पवार को हरविंदर सिंह द्वारा मारा गया थप्पड़, दूसरा कोलावेरी डी का तमिल गीत और तीसरा विदेशी पूँजी का भारत में बढ़ता निवेश।

बात शरद पवार की। महाराष्ट्र में उनके चीनी के कारखाने हों या रियल एस्टेट का कारोबार। वे विश्व के सबसे रईस बोर्ड के अध्यक्ष भी हैं। और देश के कृषि मंत्री भी। हमारा देश शुरू से ही कृषि प्रधान देश रहा है। इस लिहाज से यह मंत्री पद महत्त्वपूर्ण पदों में से एक है। पिछले दस वर्षों में लाखों किसानों ने या तो आत्महत्या की है या फिर खेती छोड़ी है। यह देश के लिये बेहद खतरनाक संदेश है। उस पर उनका आईसीसी के कार्यों में भी घुसे रहने का मतलब है पूरी तरह से कृषि मंत्रालय पर ध्यान न देना। उसपर किसान की जमीन पर भू माफ़ियाओं व बिल्डरों का कब्जा होना। उन्हीं के ही राज्य के विदर्भ क्षेत्र में किसानों का आत्महत्या करना। कितने ही विवाद हैं और कितनी ही समस्यायें। इन सब के लिये कोई नीति ही नहीं है। बहरहाल उन पर थप्पड़ मारने की घटना को हँसी में लेने की बजाय गम्भीरता से लेने की आवश्यकता है। इस थप्पड़ का मतलब देश के लोगों का सरकार के ऊपर से विश्वास का उठना है। यह थप्पड़ उस लोकतंत्र पर भी है जहाँ जिन नेताओं को हम चुन कर संसद भेजते हैं उन्हीं पर भरोसा नहीं कर पाते। यह सरकार की विफ़लता झलकाता है। नेताओं व सरकार पर से भरोसा उठना बेहद चिन्ताजनक व दुखद है। यह घटना दुखद है। पर क्या सरकार पर अथवा नेताओं पर इन सबका असर पड़ेगा? यह कहना कठिन है। क्या नेता व मंत्री व अफ़सर अपनी ज़िम्मेदारी समझ पायेंगे? सवाल बहुत है पर निकट भविष्य में इनके जवाब मिलने कठिन हैं।

आगे चलें तो सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए खुदरा बाज़ार में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी है। मैं कोई वित्त विशेषज्ञ नहीं  हूँ लेकिन यदि मैं दो सदी पीछे जाऊँ तो पाता हूँ कि गलती हमने ईस्ट इंडिया कम्पनी को भारत में आ जाने की भी की थी। गाँधी जी ने स्वदेशी अपनाने का आंदोलन भी किया था। आज वही कांग्रेस विदेशियों को अपने देश में आने का निमंत्रण दे रही है। ग्लोबलाइज़ेशन के इस दौर में यह गलत नहीं है। 49 प्रतिशत तक ठीक है क्योंकि विदेशी कम्पनी का कब्जा नहीं हो पायेगा किन्तु पचास फ़ीसदी से अधिक निवेश का आशय स्पष्ट है कि देश में विदेशियों का कब्जा होगा। सरकार की दलील है कि किसान को पूरा पैसा मिलेगा और महँगाई पर रोक लगेगी। इससे छोटे कारोबारियों को नुकसान भी नहीं होगा। हमारे देश में टाटा, रिलायंस, बिड़ला, प्रेमजी व न जाने कितने ही बड़े नाम व कॉर्पोरेट घराने हैं जो खुदरा कारोबार में आ सकते हैं या फिर आ चुके हैं। क्या सरकार इन कम्पनियों को इतना काबिल नहीं बना सकती? क्या जब देश के कॉर्पोरेट घराने खुदरा बाज़ार में कारोबार करेंगे तो सस्ता सामान मुहैया नहीं करा सकते? ऐसा विदेशी कम्पनी में क्या होता है जो देशी में नहीं? क्या खुदरा नीति देश की कम्पनियों के लिये नहीं बदल सकती कि किसानों तक पूरा पैसा पहुँचे? ऐसा क्यों है कि हम हर बार पश्चिम की ओर मुँह कर के खड़े हो जाते हैं। क्यों नहीं हम स्वयं में सुधार करते? विदेशी ही हमारे देश को चलायेंगे तो यह हमारी कमजोरी है और हमारी विफ़लता। वॉल्मार्ट आदि केवल खाद्य उत्पादन ही नहीं बल्कि घर की सभी वस्तुयें जैसे फ़र्नीचर, बर्तन आदि भी बेच सकेंगे।  जो अर्थशास्त्री हैं वे ही इस पर रोशनी डाल सकते हैं कि देशी कम्पनियाँ क्यों नहीं वो काम कर सकतीं जो विदेशी आ कर करेगी? क्या गारंटी है कि चीनी कम्पनियाँ हमारे देश के छोटे व्यवसायों को नुकसान नहीं पहुँचायेंगी जो पहले ही खतरे से जूझ रहे हैं?

आखिर में बात करते हैं कोलावरि डी की। आमतौर पर वही गाने सुनते हैं जिनके बोल हमें समझ आते हैं या यूँ कहें कि जिन भाषाओं की हमें जानकारी है। पर संगीत शायद एक ऐसा माध्यम है जिसने आदि काल से एक दूसरे को जोड़ा हुआ है। संगीत हर दिल में है। कहते हैं कि संगीत की अपनी कोई भाषा नहीं होती। इसीलिये शायद कोलावरि डी आज उत्तर भारत में भी हिट है। आज दिल्ली के रेडियो चैनलों पर तमिल गीत सुनने को मिल रहा है। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि फ़िल्म "थ्री" रजनीकांत के दामाद की फ़िल्म है इसलिये यह गाना मशहूर हुआ है। कुछ लोग इसे महज इत्तेफ़ाक या भाग्य भी मानते हैं। लेकिन जब रजनीकांत का कोई तमिल गाना दिल्ली में नहीं बजा (या कहें कि मुझे याद नहीं रहा) तो उनके दामाद का गाना बजना महज एक संयोग तो नहीं। पर फिर भी यदि ऐसा हुआ है तो यह देश की एकता के लिहाज से अच्छा संयोग है। अनेकता में एकता यदि ऐसे संयोग से और प्रगाढ़ हो सकती है तो कहने ही क्या!!! 


जय हिन्द
वन्देमातरम
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गदापि गरियसी
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Friday, November 25, 2011

ग़मों का दौर भी आये तो मुस्कुरा के जियो : फ़िल्म हमराज़ (1967) Film Humraaz Mahendra Kapoor, Sahir Ludhiyanvi

आज भूले-बिसरे गीत में फ़िल्म हमराज़ के सदाबहार गीत। १९६७ में आई इस फ़िल्म के निर्माता निर्देशक थे बी.आर.चोपड़ा व इसमें अभिनय किया था सुनील दत्त, राज कुमार, मुमताज़, सारिका, मदन पुरी,इफ़्तेखार,
बलराज साहनी व जीवन ने। फ़िल्म का संगीत था रवि का व इस के गाने लिखे थे उर्दू शायर साहिर लुधियानवी जी ने।
इस फ़िल्म में गीत गाये हैं महेंद्र कपूर जी ने। मोहम्मद रफ़ी व किशोर कुमार के बीच में महेंद्र कपूर ने अपनी एक अलग पहचान बनाई थी। आज की पीढ़ी रफ़ी, किशोर को तो जानती ही होगी पर पता नहीं क्यों मुझे
महेंद्र कपूर के गाये हुए गाने व उनकी आवाज़ बेहद पसंद है। इस फ़िल्म के सभी गीत इन्होंने ही गाये हैं।


न  मुँह  छुपा  के  जियो  और  न  सर  झुका  के  जियो  


न  मुँह  छुपा  के  जियो  और  न  सर  झुका  के  जियो
ग़मों  का  दौर  भी  आये  तो  मुस्कुरा  के  जियो
न  मुँह  छुपा  के  जियो  और  न  सर  झुका  के  जियो


घटा  में  छुपके  सितारे  फ़ना  नहीं  होते
अँधेरी  रात  में  दिए  जला  के  चलो
न  मुँह  छुपा  के  जियो  और  न  सर  झुका  के  जियो



ये  ज़िन्दगी  किसी  मंजिल  पे  रुक  नहीं  सकती
हर  इक  मक़ाम  पे  क़दम  बढ़ा  के  चलो
न  मुँह  छुपा  के  जियो  और  न  सर  झुका  के  जियो



नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...

हे ... नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...
ऐसे ही जग में, आती हैं सुबहें,
ऐसे ही शाम ढले...
हे ... नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...

शबनम के मोती, फूलों पे बिखरे,
दोनों की आस फले  ...
हे ... नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...

बलखाती बेलें, मस्ती में खेलें ,
पेड़ों  से  मिल  के  गले ...
हे ... नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...

नदिया  का  पानी , दरिया  से  मिल  के,
सागर  की  और  चले  ...
हे ... नीले गगन के तले.. धरती का प्यार पले...

भूले बिसरे गीत के अन्य गीत

जय हिन्द
वन्देमातरम

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Tuesday, November 22, 2011

क्या आप जानते हैं- भारत की सबसे बड़ी झीलें कौन सी हैं व विश्व का सबसे लम्बा रेलवे प्लेटफ़ार्म कहाँ पर है? Longest Railway Platform In The World, Largest Lakes Of India

क्या आप जानते हैं के इस अंक में आज हम जानेंगे भारत की सबसे बड़ी झीलों व भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के सबसे बड़े रेलवे प्लेटफ़ार्म के बारे में।

कश्मीर की वूलर झील के बारे में हम पहले से ही जान चुके हैं। गौरतलब है कि यह झील एशिया की भी सबसे बड़ी झील है। 

चिल्का झील (पुरी, ओड़ीशा)


अन्य झीलों की बात करें तो जिक्र आता है ओड़ीशा की चिल्का झील का। यह झील खारे पानी की सबसे बड़ी झील है व बंगाल की खाड़ी में जा कर मिलती है। चिल्का झील पुरी, खुर्द व गंजम जिलों तक फ़ैली हुई है। आपको जानकर हैरानी होगी कि यह झील बहुत सारे पशुओं व पेड़-पौधों के लिये जीवन दायिनी है जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। सर्दियों में इस झील पर 160 से भी अधिक तरह के पक्षी अपना डेरा जमाते हैं। इस झील में कैस्पियन सागर, बैकल झील व अरल सागर से लेकर रूस, मंगोलिया व दक्षिण-पूर्व एशिया, लद्दाख और हिमालय से पक्षी आते हैं। ये पक्षी 12000 कि.मी से भी अधिक का सफ़र तय कर चिल्का झील तक पहुँचते हैं। इस झील की लम्बाई 64 कि.मी है। जी हाँ आपने सही पढ़ा है....

सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) में स्थित गोविंद वल्लभ पंत सागर देश की सबसे बड़ी कृत्रिम रूप से तैयार की गई झील है। इसका नाम भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत जी के नाम से पड़ा।  वे 1950 से 1954 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। उत्तराखंड के बड़े राजनेताओं में से एक रहे। इस झील की गहराई 38 फ़ीट है।

कोल्लेरू (आंध्र प्रदेश)
साफ़ पानी की सबसे बड़ी झील कोल्लेरू झील है। आंध्रप्रदेश की यह झील कृष्णा व गोदावरी नदियों के संगम से बनी सबसे बड़ी झील है। बुडामेरू व तम्मिलेरू मौसमी नदियाँ भी इसी झील में आकर मिलती हैं।
245 वर्ग किमी तक फ़ैली यह झील आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कारण इंसान का लोभ। 42 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अब खेती के लिये लिया जा रहा है, जगह जगह झील ने सूखना शुरु कर दिया है। करीबन दो करोड़ पक्षियों का यह आशियाना धीरे धीरे उजड़ रहा है। यहाँ के पक्षियों की संख्या को देखते हुए वर्ष 1999 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया।

खड़गपुर रेलवे स्टेशन (मिदनापुर-पश्चिम, पं. बंगाल)
आइये अब जानते हैं विश्व के सबसे बड़े रेलवे प्लेटफ़ार्म के बारे में। यह स्टेशन है पश्चिम बंगाल ( माफ़ कीजिये पश्चिम बंगा...पता नहीं ये नाम क्यों रखा है ममता दीदी ने.. बड़ी कठिनाई से बोला जाता है..) का खड़गपुर रेलवे स्टेशन। इस स्टेशन के प्लेटफ़ार्म की लम्बाई है 1.072 किमी। प्रारम्भ में यह प्लेटफ़ार्म 716 मीटर लम्बा था पर इसे पहले 833 मी और फिर बाद में अभी के जितना लम्बा किया गया। खड़गपुर का प्लेटफ़ार्म विश्व में सबसे लम्बा है। यह शहर मिदनापुर पश्चिम जिले में स्थित है। हम सभी जानते हैं कि खड़गपुर आईआईटी के लिये जाना जाता है। भारत की सबसे बड़ी रेलवे वर्कशॉप भी यहीं पर है।

हमारे भारत में गर्व करने के लिये न जाने कितने ही स्थान, झील, नदी, पहाड़ आदि हैं। प्राकृतिक ही नहीं अपितु किले, महल मीनार आदि अनगिनत स्थान हैं किन्तु फिर भी हम इन पर गर्व नहीं करते। भारत को भूल विदेशों की ओर देखते हैं। इसका एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि हम अपने देश को, स्वदेश को पहचानते ही नहीं। इसीलिये ऐसे लेख हमारी जानकारी बढ़ाते हैं। मैं स्वयं भी इन सबसे अनजान रहा हूँ। मुझे भारत और भारतीय पर गर्व है।

आने वाले लेखों में वो बातें जो विदेशी हमारे बारे में कहते हैं, भारत को मानते हैं। अध्यात्म व गौरवशाली इतिहास होंगे धूप-छाँव के मुख्य बिंदु।

जय हिन्द
वन्देमातरम


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Friday, November 18, 2011

एक सौ सोलह चाँद की रातें, एक तुम्हारे काँधे का तिल... मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैं... फ़िल्म इजाज़त के गीत - भाग २ Film Izaazat, Old Hindi Movies Songs

फ़िल्म- इजाज़त
गीतकार-गुलज़ार
गायिका-आशा भोंसले
संगीतकार-राहुल देव बर्मन

हिन्दी फ़िल्म "इजाज़त" सुबोध घोष की बंगाली फ़िल्म "जातुगृह" से प्रेरित है। यह उन गिनी चुनी फ़िल्मों में से एक है जिन्हें गुलज़ार ने निर्मित किया। फ़िल्म में मुख्य भूमिकायें नसीरूद्दीन शाह, रेखा व अनुराधा पटेल ने निभाई हैं।

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैं

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा हैं
सावन के कुछ भीगे दिन रखे हैं
और मेरे एक ख़त में लिपटी रात पडी हैं
वो रात बुझा दो, मेरा सामान लौटा दो

पतझड़ हैं कुछ, 
हैं ना ...
पतझड़ में कुछ पत्तों के गिरने की आहट
कानों में एक बार पहन के लौटाई थी
पतझड़ की वो शांख अभी तक काँप रही हैं
वो शांख गिरा दो, 
मेरा वो सामान लौटा दो...

एक अकेले छतरी  में जब आधे आधे भीग रहे थे
आधे सूखे आधे गिले, सुखा तो मैं ले आयी थी
गीला मन शायद, बिस्तर के पास पडा हो
वो भिजवा दो, 
मेरा वो सामान लौटा दो...

एक सौ सोलह चाँद की रातें, एक तुम्हारे काँधे का तिल
गीली मेहंदी की खुशबू, झूठमूठ के शिकवे कुछ
झूठमूठ के वादे भी, सब याद करा दो
सब भिजवा दो, 
मेरा वो सामन लौटा दो...

एक इजाजत दे दो बस
जब इस को दफ़नाऊँगी 
मैं भी वही सो जाऊँगी...

छोटी सी कहानी से

छोटी सी कहानी से, 
बारिशों की पानी से
सारी वादी भर गयी,

ना जाने क्यों, दिल भर गया,
ना जाने क्यों, आँख भर गयी

शाखों पे पत्ते थे,पत्तों पे बूंदे थी
बूंदो में पानी था,पानी में आंसू थे

दिल में गिल भी थे,पहले मिले भी थे
मिलके पराये थे, दो हमसाये थे


जय हिन्द
वन्दे मातरम

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Tuesday, November 15, 2011

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में जाति व धर्म के आधार पर मिल रही "प्रोत्साहन राशि" एक रिश्वत है? Delhi Government Schools, Religion Caste Based Schemes

सुनने में आया है कि दिल्ली सरकार की ओर से एक स्कीम सरकारी स्कूलों में चल रही है। जिसके तहत हर एक या दो महीने में सरकार की ओर से कभी पाँच सौ, कभी सात सौ तो कभी पन्द्रह सौ रूपये बच्चों के अभिभावकों को दिये जाते हैं। लेकिन केवल अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़े और अल्पसंख्यक (अधिकतर
मुसलमानों) को ही। दिल्ली सरकार इसे प्रोत्साहन राशि कहती है। उसपर आलम यह है कि बच्चे स्कूल आते नहीं हैं। और ग्रेड्स मिलेंगे इसलिये पढ़ते नहीं हैं। हमारी एक रिश्तेदार हैं जो हाल ही में सरकारी स्कूल में अध्यापिका के तौर पर लगी हैं उन्होंने बताया कि बच्चे स्कूल उन्हीं दिनों आते हैं जब उन्हें पता लगता है कि "प्रोत्साहन राशि" मिलने वाली है।

यह है सरकारी विद्यालयों का हाल। अब प्रश्न यह उठता है कि बच्चों को पढ़ाने के लिये प्रोत्साहन राशि क्या एक "भीख" की तरह नहीं है? जहाँ लेने वाला भीख माँग रहा है क्योंकि वो स्कूल ही तभी आ रहा है। उसे पढ़ने का कोई उत्साह नहीं है। उसको पढ़ना नहीं है अपितु भीख माँगनी है। दूसरी ओर देने वाला भी भीख माँग रहा है। यह भीख है वोटों की। वे वोट जो उसे अगली बार फिर कुर्सी तक पहुँचायेंगे। सत्ता की गद्दी हथियाने में मदद करेंगे। चूँकि चुनावों के दौरान पैसे बाँटना अपराध है तो ये कानूनी रूप से "प्रोत्साहन राशि" के नाम पर रिश्वत दी जा रही है।

बच्चों को पढ़ाने के लिये उन्हें किताबें, यूनिफ़ार्म मुफ़्त दी जाती हैं। यह बेहद अच्छा कदम है। आठवीं तक के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा देने से ही हम शिक्षित हो सकेंगे। दिल्ली नगर निगम में ग्यारहवीं तक मुफ़्त शिक्षा का प्रावधान है। वैसे हम लोग साक्षरता दर देखते हैं। जो बढ़ तो रही है लेकिन शिक्षित दर नहीं देखते। लोगों में शिक्षा का अभाव है। साक्षर तो वो भी है जिसे अपने हस्ताक्षर करने आते हैं परन्तु क्या हम उसे शिक्षित कर पायें हैं? शिक्षित होने क्या लक्षण हैं ये मुझे नही पता। मैं तो गली में कूड़ा फ़ैलाने वालों को भी अशिक्षित करार दे देता हूँ या फिर हेलमेट को सर पर मगाने कि जगह जो हाथ में हेल्मेट पहनते हैं। बहरहाल हम बात कर रहे थे मुफ़्त शिक्षा की। सरकार यह कदम नि:संदेह एक बेहतरीन प्रयास है और दूरगामी भी। लेकिन इतने सब के बीच "प्रोत्साहन राशि" को मैं रिश्वत समझता हूँ। रिश्वत इसलिये भी क्योंकि यह केवल एस.सी,
एस.टी और मुसलमानों के लिये ही है। स्कोलरशिप केवल इन वर्गों के लिये ही क्यों हैं? फिर चाहें परिवार की आय कितनी ही हो।

इंजीनियरिंग में दाखिले के लिये आरक्षण है। आईपी में यदि आप दाखिले का फ़ार्म भरते हैं तो उसमें आप पायेंगे कि आपका धर्म व जाति पूछी होती है। और यदि कोई ऑपशन आपको नहीं पायेगा तो वो है "जनरल" श्रेणी का। खैर आरक्षण का यह मापदंड मेरी समझ से परे हो जाता है जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिये कम से कम दो लाख रूपये चाहियें। जो गरीब है, जो महंगाई की मार सह रहा है वो दो लाख रूपये कहाँ से लायेगा? फिर चाहें आप उसे आरक्षण ही क्यों न दें। इसका आशय स्पष्ट है कि दाखिला अमीर अनुसूचित जाति जनजाति व अल्पसंख्यकों को ही मिल रहा है। उन्हें आरक्षण दे कर क्या फ़ायदा?

आरक्षण की जिस बैसाखी से कांग्रेस ने भारत के लोगों को सहारा देने की कोशिश की थी वही बैसाखी इस देश को तोड़ रही है। कांग्रेस ने इलाज करने की बजाय इस बैसाखी का मोहताज बना दिया। ये बैसाखी अब सहारा नहीं है बल्कि खुद एक बीमारी बन गई है जो हमें खोखला कर रही है। क्योंकि ये बीमारी वोट लेने का जरिया मात्र बन कर रह गई है। मुसलमानों के वोट। दलितों के वोट। मुसलमानों व दलितों को प्रोत्साहन राशि का लोभ
दिया जा रहा है। जातिगत या धर्म के आधार पर आरक्षण इस देश को तोड़ रहा है।

आरक्षण आर्थिक आधार पर क्यों नहीं हो सकता? क्या ब्राह्मंण या अगड़ी जाति के लोग गरीब नहीं हो सकते? क्या इस प्रोत्साहन राशि के प्रलोभन की वजह से बच्चे पढ़ेंगे? मुझे तो नहीं लगता। उन्हें पैसा तो मिल रहा है लेकिन पढ़ाई नहीं। वे पढ़्ने के लिये नहीं पैसे लेने के लिये स्कूल आ रहे हैं। उनकी पढ़ाई करने की इच्छा ही नहीं रही है। उन्हें यूनिफ़ार्म दी जाये, उन्हें किताबें दें, उन्हें दोपहर का भोजन दें। यह सब बेहद आवश्यक है। परन्तु उन्हें ऐसी शिक्षा भी दी जाये कि आगे चल कर वे बैसाखी का सहारा न लें। और यदि यह सब हो रहा है तो आर्थिक आधार पर हो न कि जातिगत व धर्म के आधार पर.. क्योंकि आज महँगाई के दौर में गरीबी एक अभिशाप की तरह है और गरीब की कोई जाति नहीं होती।

दिल्लॊ सरकार की वेबसाईट जहाँ आप को तरह तरह की स्कीमें मिल जायेंगीं:
http://delhi.gov.in/wps/wcm/connect/doit_welfare/Welfare/Home/Services-+Schemes

जय हिन्द
वन्देमातरम

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Friday, November 11, 2011

भूले बिसरे गीत: खाली हाथ शाम आई है, खाली हाथ जायेगी..... जब आशा भोंसले और पंचम दा ने गुलज़ार के गीतों में जान डाल दी Old Hindi Songs RD Burman, Asha Bhosle, Gulzar - Film Izaazat

फ़िल्म- इजाज़त
गीतकार-गुलज़ार
गायिका-आशा भोंसले
संगीतकार-राहुल देव बर्मन

हिन्दी फ़िल्म "इजाज़त" सुबोध घोष की बंगाली फ़िल्म "जातुगृह" से प्रेरित है। यह उन गिनी चुनी फ़िल्मों में से एक है जिन्हें गुलज़ार ने निर्मित किया। फ़िल्म में मुख्य भूमिकायें नसीरूद्दीन शाह, रेखा व अनुराधा पटेल ने निभाई हैं।

खाली हाथ शाम आयी हैं, खाली हाथ जायेगी

खाली हाथ शाम आयी हैं, खाली हाथ जायेगी
आज भी न आया कोई, खाली लौट जायेगी

आज भी न आये आँसू, आज भी न भीगे नैना
आज भी ये कोरी रैना, कोरी लौट जायेगी

रात की सियाही कोई, आये तो मिटाए ना
आज ना मिटाई तो ये, कल भी लौट आयेगी

छोटी सी कहानी से, बारिशों की पानी से

छोटी सी कहानी से, बारिशों की पानी से
सारी वादी भर गयी,

ना जाने क्यों, दिल भर गया,
ना जाने क्यों, आँख भर गयी

शाखों पे पत्ते थे,पत्तों पे बूंदे थी
बूंदो में पानी था,पानी में आंसू थे

दिल में गिल भी थे,पहले मिले भी थे
मिल के पराये थे, दो हमसाये थे
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Sunday, November 6, 2011

भूपेंद्र हज़ारिका को भावभीनी श्रद्धांजलि.. गंगा बहती हो क्यूं?.. Bhupendra Hazarika Bharat Lost Voice Of East

यह वर्ष हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिये बेहद दुखदाई रहा है। क्रिकेट, बॉलीवुड व ग़ज़ल के बाद शास्त्रीय संगीत ने भी एक रत्न को खो दिया। बात कर रहा हूँ भूपेंद्र हज़ारिका की। पूर्वी भारत के असम में 1926 में जन्मे भूपेंद्र ने हिन्दी फ़िल्मों में संगीत दिया व गीत भी गाये। उनके योगदान को हम कभी नहीं भूल पायेंगे।
उन्होंने शनिवार पाँच सितम्बर को आखिरी साँस ली।

पद्म भूषण(2001)
दादा साहेब फ़ालके अवार्ड (1992)
असोम रत्न (2009)
संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (2009)

भूपेंद्र हज़ारिका को भावभीनी श्रद्धांजलि।


दिल हूम हूम करे (रूदाली)



गंगा बहती हो क्यूँ


ये गीत आज मैंने पहली बार सुना है... फिर सोचा कि लानत है.. मैने ये पहली बार क्यों सुना...
विनती है एक बार अवश्य सुनें...




जय हिन्द
वन्देमातरम
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Wednesday, November 2, 2011

क्या आप जानते हैं अब तक के सबसे निर्मम हत्याकांड के बारे में? Passenger Pigeon Extinction Story

कहते हैं कि भगवान ने इस धरती पर सबसे समझदार जीव जो बनाया है वो है इंसान। पर आज जो मैं आपसे कहने जा रहा हूँ वो आपको अंदर तक झकझोर सकती है। यदि किसी भी पढ़ने वाले में थोड़ा सा भी दिल होगा तो आज का यह लेख आपको सकते में डाल सकता है। मैं चाहता हूँ कि आप इस लेख को ध्यान से पढ़ें।

चित्रों में मुसाफ़िर कबूतर
मानव जाति के प्रारम्भ से लेकर अब तक का सबसे निर्मम हत्याकांड मैं आज आपके समक्ष रख रहा हूँ। अब तक का सबसे निर्मम हत्याकांड.. एक "समझदार (?)" व सामाजिक (?) जीव कितना निर्दयी हो सकता है, कितना आसामाजिक है व इस धरती का सबसे शक्तिशाली जीव होने का किस तरह से फ़ायदा उठाया है ये आपको आज पता चलेगा। हम बेज़ुबान जानवरों व पक्षियों पर किस तरह से अत्याचार करते हैं उसका नमूना आज पेश करूँगा। मैं अपने लेख को सनसनीखेज़ करने के लिये ऐसा नहीं कर रहा हूँ.. मैं कोई टीवी पर टीआरपी बढ़ाने के लिये नहीं ऐसा कह रहा हूँ.. अपितु सच..सच और केवल सच...

क्या आपने मुसाफ़िर कबूतरों का नाम सुना है? ऑल इंडिया रेडियो पर मैंने अक्टूबर में इनके बारे में सुना। वो ऐसी जानकारी थी जिसने मेरे होश उड़ा दिया। विकिपीडिया व नेट पर खोजा तो बात 
मुसाफ़िर कबूतर का बच्चा
बिल्कुल सच थी। वही बात मैं आपके साथ बाँट रहा हूँ। उत्तरी अमरीका व कनाडा के पूर्वी हिस्से में आज से सौ साल पहले तक मुसाफ़िर कबूतर जिन्हें अंग्रेज़ी में Passenger Pigeon कहते हैं, पाये जाते थे।

क्या आप जानते हैं इनकी संख्या कितनी थी? पाँच सौ करोड़.... जी हाँ आपने सही पढ़ा.. पाँच सौ करोड़। ये पक्षी इसी हिस्से उड़ा करते थे। कहते हैं कि जब ये झुंड में उड़ा करते थे तब एक मील चौड़ा और 300 मील लम्बा झुंड बन जाता था....एक ऐसा झुंड जो सूर्य की किरणों को ढँक लेता था और धरती पर एक किरण भी नहीं पड़ने देता था। जब वे उड़ते थे तो ऐसा अँधेरा छा जाता था जिसे छँटने में चौदह घंटे से ज्यादा समय लग जाता था। चौदह घंटे तक आसमान में अँधेरा.. जैसे सूर्य ग्रहण लग गया हो.. ज़रा सोच कर देखिये.. पाँच सौ करोड़ पक्षी एक साथ आकाश में उड़ते हुए....

सिनसिनाती के चिड़ियाघर में मरने वाला अंतिम कबूतर
आज मुसाफ़िर कबूतरों की संख्या है शून्य... शून्य। कारण- जब यूरोप से लोगों का आगमन तेज़ हुआ और वे अपने रहने के लिये जगह बनाने लगे तब इन पक्षियों के जंगल काटे गये। 19वीं शताब्दी में गुलामों के लिये इन कबूतरों का सस्ता माँस मिलने लगा था। यह वो दौर था जब इनके घरौंदों को तेज़ी से तोड़ा व इन्हें काटा जाने लगा था। 1800 से 1870 तक इनका आँकड़ा धीरे धीरे कम हो रहा था किन्तु 1890 आते आते ये इतनी तेज़ी से विलुप्त हो गये कि पता ही नहीं चला। सिनसिनाटी चिड़ियाघर में 1 सितम्बर , 1914 को अंतिम पक्षी ने दम तोड़ दिया। यानि करीबन सौ वर्षों में पाँच सौ करोड़ मौतें....

इस सत्य घटना में आपको परेशान कर सकती है..आपके रौंगटे खड़े कर सकती है.. आपको दु:खी कर सकती है.. आपको शर्मिंदा कर सकती है..। जैसे मैं हूँ। मुझे जब इस घटना का पता चला तो मैं शर्मिंदा था स्वयं पर.. मानव जाति पर...अपने स्वार्थ व स्वाद हेतु कितना गिर सकता है इंसान इसका उदाहरण है यह घटना...इसके आगे मैं कुछ नहीं कह सकता.. स्तब्ध...

भारत से विलुप्त होने के कागार पर खड़ी हैं अन्य कुछ प्रजातियाँ भी..

साभार:
http://en.wikipedia.org/wiki/Passenger_Pigeon
http://www.eco-action.org/dt/pigeon.html

जय हिन्द
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Saturday, October 29, 2011

झाँसी की रानी - सुभद्राकुमारी चौहान Jhansi Ki Rani ( By Subhadra Kumari Chahan)


पिछले कुछ वर्षों से बच्चों के पाठ्यक्रम से वे राष्ट्रभक्ति व जीवन से रूबरू कराने वाली शिक्षाप्रद कवितायें "लुप्त" हो गईं हैं। सोचा कि क्यों न उन्हें दोबारा पढ़ा जाये और ब्लॉग पर उतारा जाये। हालाँकि ये कवितायें इंटेरनेट पर काफ़ी जगह मिल जायेंगी परन्तु इन्हें पढ़ने का मज़ा ही कुछ और है। इसी कड़ी में आज की कविता समर्पित है रानी लक्ष्मी बाई को। सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा लिखित झाँसी की रानी-


जन्म: 19 नवम्बर 1835 , वाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु: 17 जून 1858, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
पाठकों से विनती है कि ऊपर दी गईं जन्म व मृत्यु की तिथियों से रानी लक्ष्मीबाई की आयु का अंदाज़ा लगायें। रौंगटें न खड़े हों तो कहियेगा... ऐसी वीरांगना को शत शत नमन.....

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्ट-कुल-देवी भी उसकी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
वीर बुंदेलों सी विरदावली सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया,शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी दिल्ली की,लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोयीं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अब जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया,यह था संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
तेरा यह बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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Monday, October 24, 2011

लघुकथा- दीपावली एक त्यौहार या शहरों में बढ़ती औपचारिकता.. Deepawali- Festival Turning Into Formality In Metros

बेटा, दीवाली आ रही है.. कुछ मिठाई बनानी है। तुम्हें सामान की लिस्ट दे दूँ? शाम को लौटते हुए ले आना..

माँ तुम मिठाई घर में बनाओगी?

हाँ.. क्यों? अपने शहर में तो हम घर में ही बनाते हैं.. भूल गया.. तू जब छोटा था तो कैसे कईं कईं पकवान बनते देखता और आस-पड़ोस में सब के यहाँ बाँटने जाता था..

माँ...वो छोटा शहर था.. यह मेट्रो है मेट्रो.. यहाँ सारी सुख सुविधायें हैं.. तुम मिठाई का नाम बताओ.. हलवाई को बोल दूँगा, वो दे जायेगा। क्यों नाहक परेशान हो रही हो..

पर मैं परेशान नहीं हो रही.. ये तो हर साल की बात है..

सौ बातों की एक बात माँ.. मेरे पास इतना समय नहीं है। ऑफ़िस में काम का इतना बोझ रहता है कि सर दर्द से फ़ट जाता है ऊपर से तुम्हारा ये सामान।

तो बेटा मैं बहू को बोल देती हूँ...

वो भी तो कॉलेज पढ़ाने जाती है माँ.. क्या क्या करे वो बेचारी भी। तुम प्लीज़ बिना बात का क्लेश मत करो...

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अरे तुमने सभी दोस्तों को ईमेल कर दिया न?

क्या? दीवाली का कार्ड?

हाँ...

हाँ और फ़ेसबुक पर भी अपडेट कर दिया..

ये काम बिल्कुल सही हो गया.. बड़ी सुविधा है इसमें.. कोई चिकचिक नहीं..तकनीक का फ़ायदा तो है भई..

सही कह रहे हो...

                                                    **************************

बेटा.. ज़रा अपने चाचा को फ़ोन लगाना घर पर..छह महीने हुए उनसे बात करे हुए..हाल-चाल जाने..

माँ.. उन्होंने कौन सा हमें पूछा है..?

पर बेटा.. दीवाली का मौका है.. एक बार बात करना तो बनता है..

सुबह से फ़ोन मिला रहा हूँ.. लग नहीं रहा है.. नेटवर्क प्रोब्लम लग रही है..रहने दो न माँ...

अच्छा चल.. शाम तक एक बार और मिला कर देख लियो..


                                                           **************************

अरे सुनो...शाम आठ बजे तक तो पूजा खत्म हो जायेगी...

हाँ तो..

वो रा-वन मूवी आ रही है शाहरूख खान की...

ह्म्म्म्म.. समझ गया..

वो नया मल्टीप्लेक्स भी तो खुल गया है सब्जी मंडी जहाँ हटी है...

हाँ.. सही कहती हो.. हमारे इलाके में भी डिवलेप्मेट हो रही है..

पर माँ का क्या करें?

माँ कहाँ जायेगी... उन्हें पूजा करने देते हैं... शायद उन्हें उनके राम मिल जायें..

और हमें .. "रा-वन (रावण)..."

हा हा हा....
                                                            ************************

सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामय:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दु:ख भाग्भवेत..


दीपावली के पर्व पर आप सभी को ढेरों शुभकामनायें। आइये इस पर्व पर ये प्रण लें कि न केवल अपने घरों में अपितु अपनी आत्मा में भी प्रेम रूपी दीया जलायें।
हमारे देश में अनेकानेक सामाजिक बीमारियाँ हैं.. उन्हें एक एक कर के दूर करना होगा। आत्मा में लोकपाल बैठाना होगा। प्रेम, करूणा व दया की भावना जगानी होगी।
अपने घर, अपनी गली, अपना मोहल्ला, अपना शाहर, अपना राज्य और फिर अपना देश.. इन सभी को "आज" से बेहतर "कल" देना का प्रण करना होगा। 


आपके व आपके परिवार के लिये यह दीपावली खुशियाँ लेकर आये। ईश्वर आने वाले वर्ष में आपको शक्ति प्रदान करे व मंगलमय हो, यही कामना करता हूँ।


जय हिन्द
वन्देमातरम

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Wednesday, October 19, 2011

क्या आप जानते हैं एक बार रक्तदान से आप कितनी जान बचा सकते हैं? Donate Blood Save Life

पिछले सप्ताह ही हमारी कम्पनी में रक्तदान शिविर लगा। सुबह से शाम तक लगे इस शिविर में 145 लोगों  ने रक्त दिया। हमारी कम्पनी में करीबन छह सौ लोग हैं। उस दृष्टि से यह आँकड़ा थोड़ा कम लगा। और वो भी तब जब कैम्पस में सैमसंग और बार्क्लेज़ जैसी कम्पनियों के हजारों लोग हैं। बहरहाल...

रक्तदान को महादान कहा गया है। इसके कईं फ़ायदे हैं। पर क्या क्या फ़ायदे हैं ये जानने की जिज्ञासा हुई। इंटेरनेट खंगाला तो कुछ फ़ायदे नज़र आये। उन्हें आपके साथ बाँट रहा हूँ। चूँकि ये इंटेरनेट से हैं इसलिये त्रुटि हो सकती हैं। हालाँकि धूप-छाँव पर डालने से पहले मैंने कुछ वेबसाईटों पर जाँच करी है इसलिये अस्सी फ़ीसदी तो सही होनी चाहियें।

ये देखा गया है कि खून में लोहे की मात्रा हृदय के रोगों को बढ़ाती है। रक्त में मिलने वाला लोहा कोलेस्ट्रॉल के ऑक्सीडेशन के काम आता है। और यही प्रक्रिया आर्ट्रीज़ (Arteries) के लिये हानिकारक होती है। रक्त में लोहे की मात्रा अधिक होने से कॉलेस्ट्रॉल के ऑक्सीकरण की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। नियमित रक्तदान से रक्त में लोहे की मात्रा संतुलित रहती है और इसलिये हृदय रोग की संभावनायें भी कम होती हैं।

शरीर से रक्त के निकाले जाने से रक्त में RBC कम हो जाते हैं। इसी कमी को पूरा करने के लिये शरीर में अस्थि-मज्जा (Bone Marrow) द्वारा तुरंत नये RBC का निर्माण होता है। इससे रक्त साफ़ व ताज़ा रहता है

हीमोक्रोमाईटिस एक तरह की जैविक बीमारी है जिसमें शरीर के Tissue में खराब पाचन के कारण लोहा जमा होता चला जाता है। इस स्थिति में शरीर के अंग खराब हो सकते हैं। हालाँकि भारतीयों में यह विकार कम पाया जाता है। लेकिअन यदि इंग्लैंड जैसे देश में देखें तो आप पायेंगे कि 300-400 लोगों में से एक व्यक्ति इस बीमारी का शिकार है।

एक सामान्य व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्त दान कर सकता है। एक बार में 450 मिली तक रक्तदान किया जाता है। और ऐसा माना गया है कि इससे 650 कैलोरी इस्तेमाल होती हैं।

और सबसे बड़ा फ़ायदा यह कि इससे किसी की जान बच सकती है।

चलते चलते...
  • क्या आप जानते हैं कि आपका दिया गया रक्त तीन भागों में बँट जाता है और तीन लोगों को चढ़ाया जा सकता है। ये तीन भाग हैं Red Blood Cells, प्लेटलेट्स व प्लाज़्मा (Plasma)|
  • क्या आप जानते हैं कि वैज्ञानिक अभी तक प्रयोगशाला में रक्त नहीं  बना सके हैं। रक्त का निर्माण पूर्णत: प्राकृतिक है और हमारे शरीर में ही हो सकता है।
  • हम में से पच्चीस फ़ीसदी लोगों को हमारे जीवन काल में एक बार रक्त की आवश्यकता पड़ती है

तो फ़िर ये हिचकिचाहट क्यों? रक्तदान कर के देखिये.. अच्छा लगता है...


जय हिन्द
वन्देमातरम


अधिक जानकारी के लिये:
http://www.mayoclinic.org/donate-blood-rst/know.html
http://sankalpindia.net/drupal/health-benefits-donating-blood
http://en.wikipedia.org/wiki/Blood_donor#Benefits

दो अन्य वेबसाईट से चुराये गये दो पोस्टर...
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Friday, October 14, 2011

क्या आप जानते हैं - कुतुब परिसर में खड़े लौहस्तम्भ को किस राजा ने बनवाया था? Qutub Complex, Iron Pillar History - Incredible India

अतुल्य भारत की पिछली कड़ी में कुतुब मीनार का जिक्र किया गया था। उसी कुतुब मीनार की चार दीवारी में खड़ा  हुआ है लौह स्तम्भ।

कुतुब परिसर में स्थित लौह स्तम्भ
दिल्ली के कुतुब मीनार के परिसर में स्थित यह स्तम्भ सात मीटर ऊँचा है। इसका वजन लगभग छह टन है। इसे गुप्त साम्राज्य के चन्द्रगुप्त द्वितीय (जिन्हें चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य भी कहा जाता है) ने लगभग 1600 वर्ष पूर्व बनवाया। मुझे यह जानकर हैरानी हुई थी कि आज का यह लौह स्तम्भ प्रारम्भ से यहाँ नहीं था। गुप्त साम्राज्य के सोने के सिक्कों से यह प्रमाणित होता है कि यह स्तम्भ विदिषा (विष्णुपदगिरी/उदयगिरि - मध्यप्रदेश) में स्थापित किया गया था। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने जैन-मंदिर परिसर के सत्ताईस मंदिर तोड़े तब यह स्तम्भ भी उनमें से एक था। मंदिर से तोड़े गये लोहे व अन्य पदार्थ से से उसने कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई। 



संस्कृत में अंकित कुछ वाक्य
कहते हैं कि राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इस स्तम्भ को भगवान विष्णु के लिये समर्पित कर दिया था और इसे एक पहाड़ी-विष्णुपदगिरि पर खड़ा करवाया। इस पर लिखी गईं संस्कृत की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से यह बताती हैं कि बाह्लिक युद्ध के पश्चात उन्होंने यह स्तम्भ बनवाया। उनके काल में यह स्तम्भ समय बताने का भी कार्य करता था। विष्णुपदगिरि पहाड़ी पर स्थित इस स्तम्भ पर सूर्य की किरणें जिस ओर पड़तीं थीं उनकी गणना से समय पता लगाया जाता था।

ऐसा माना जाता है कि तोमर-साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तम्भ कुतुब परिसर में लगवाया। लौह स्तम्भ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन 1052 के तोमर राजा अनन्गपाल (द्वितीय) का जिक्र है।

सन 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तम्भ को नुकसान पहुँचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

इस लौह स्तम्भ की खास बात यह है कि इसमें कभी ज़ंग नहीं लगा है। एक आम लोहा बारिश, सर्दी व गर्मी की लगातार बदलती ऋतुओं के कारण आसानी से ज़ंग खा जाता है किन्तु इसे हमारे इतिहास के बेहतरीन कारीगर व वैज्ञानिक क्षमता का उदाहरण ही कहा जायेगा कि यह लौह स्तम्भ आज विश्व में शोध का विषय बन गया है।

पंडित बाँकेराय द्वारा संस्कृत से किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद
नोट: मैंने यह लेख लिखने से पहले लौह स्तम्भ पर ज़ंग न लगने के कारण को जानना चाहा। परन्तु यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाया। हिन्दी में यदि विज्ञान की पढ़ाई की होती तो शायद कुछ बता पाता। इसलिये आप सब के समक्ष मैं विकीपीडिया के लेख की कुछ पंक्तियाँ जस की तस यहाँ चिपका रहा हूँ। इसके लिये मैं माफ़ी माँगता हूँ किन्तु मेरे पास और कोई चारा नहीं था.. :-( इतना समझ पाया हूँ कि लोहे में फ़ॉस्फ़ोरस का मिश्रण भी इसके ज़ंग-रहित होने का एक कारण है...

In a report published in the journal Current Science, R. Balasubramaniam of the IIT Kanpur explains how the pillar's resistance to corrosion is due to a passive protective film at the iron-rust interface. The presence of second-phase particles (slag and unreduced iron oxides) in the microstructure of the iron, that of high amounts of phosphorus in the metal, and the alternate wetting and drying existing under atmospheric conditions are the three main factors in the three-stage formation of that protective passive film.[1

Lepidocrocite and goethite are the first amorphous iron oxyhydroxides that appear upon oxidation of iron. High corrosion rates are initially observed. Then, an essential chemical reaction intervenes: slag and unreduced iron oxides (second phase particles) in the iron microstructure alter the polarization characteristics and enrich the metal–scale interface with phosphorus, thus indirectly promoting passivation of the iron[14] (cessation of rusting activity)

The next main agent to intervene in protection from oxidation is phosphorus, enhanced at the metal–scale interface by the same chemical interaction previously described between the slags and the metal. The ancient Indian smiths did not add lime to their furnaces

The most critical corrosion-resistance agent is iron hydrogen phosphate hydrate (FePO4-H3PO4-4H2O) under its crystalline form and building up as a thin layer next to the interface between metal and rust. Rust initially contains iron oxide/oxyhydroxides in their amorphous forms. Due to the initial corrosion of metal, there is more phosphorus at the metal–scale interface than in the bulk of the metal. Alternate environmental wetting and drying cycles provide the moisture for phosphoric-acid formation. Over time, the amorphous phosphate is precipitated into its crystalline form (the latter being therefore an indicator of old age, as this precipitation is a rather slow happening). The crystalline phosphate eventually forms a continuous layer next to the metal, which results in an excellent corrosion resistance layer.[17] In 1,600 years, the film has grown just one-twentieth of a millimetre thick.[18]

साभार - विकीपीडिया

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वन्देमातरम

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Monday, October 10, 2011

अलविदा "जग"जीत.... श्रद्धांजलि....Ghazal Maestro Jagjit Singh

पिछले पैंतालीस दिन.. पहले शम्मी कपूर, फिर नवाब पटौदी..फिर स्टीव जॉब्स और अब हमारी पीढ़ी को ग़ज़ल के मायने सिखाने वाले जगजीत सिंह... ये सभी हस्तियाँ अपने अपने क्षेत्र के "लीजैंड" थे। परन्तु न जाने क्यों जगजीत सिंह जी के जाने का दु:ख सबसे अधिक हुआ है...

हम जिसे गुनगुना नहीं सकते..
वक्त ने ऐसा गीत क्यों गाया....

शायद इसलिये क्योंकि हम जैसे नौसिखिये संगीत प्रेमियों को ग़ज़ल सुनवा देना ही बहुत है...  वो पीढ़ी जो ग़ज़ल से दूर भागती है उस पीढ़ी में यदि ग़ज़ल प्रेमी बचे हुए हैं तो वो शायद जगजीत सिंह जी की वजह से ही मुमकिन हुआ है...

न जाने ऐसे कितने ही लोग हैं जिनके लिये ग़ज़ल मतलब जगजीत... जगजीत सिंह मतलब ग़ज़ल.. ग़ज़ल कैसे लिखी जाती है... कितनी मात्रायें होती हैं.. सुर क्या होता है... कोई परवाह नहीं... जगजीत सिंह को सुन लेना ही बहुत है....
उनकी आवाज़ में जो ठहराव था.. जो कशिश थी... वो शायद किसी और में नहीं.... उनकी आवाज़ ऐसी थी जिसे सुनो तो उसी में डूब जाओ..

सोमवार सुबह जैसे ही उनकी मृत्य का समाचार सुना.. मानो पैरों तले जमीन खिसक गई... रोने का मन किया... ईश्वर भी न जाने कैसे कैसे खेल खेलता है... और हम.. जब ये मालूम है कि यदि जीवन है तो मृत्यु भी अटल है.. फिर भी क्यों...???

चाहें रोमांटिक मूड हो या ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा... उन्होंने सभी तरह की ग़ज़ल गाईं...

होठों से छू लो तुम..मेरा गीत अमर कर दो..., "तुमको देखा तो ये ख्याल आया", "तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो","झुकी झुकी सी नज़र..", "होश वालों को खबर क्या.."
"सरकती जाये है रूख से नकाब..आहिस्ता..आहिस्ता.." आदि न जाने ऐसे गीत हैं जिन्हें सुनकर होठों पर स्वयं ही हल्की सी मुस्कान आ जाती है....

दूसरी ओर...
"ये दौलत भी ले लो ये शौहरत भी ले लो...भले छीन लो मुझसे..",
"कोई फ़रियाद तेरे दिल में दबी हो जैसे..." जैसे दर्द भरे नगमें भी उन्हीं की आवाज़ की गवाही देते हैं...
इनमें "ये दौलत भी ले लो..." ग़ज़ल तो ऐसी है कि इसके बिना जगजीत सिंह पर बात करना.. हमारा ग़ज़ल सुनना.. सब बेकार व बेमानी लगता है... "मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन.. वो काग़ज़ की कश्ती..वो बारिश का पानी..."

ग़ज़ल की समझ कभी नहीं रही... और यदि जगजीत सिंह जी फ़िल्मों के लिये गाने नहीं गाते तो शायद हमारी पीढ़ी निदा फ़ाज़ली, फ़िराक गोरखपुरी जैसे शायरों के शे’रों को सुनने व पढ़ने से महरूम रह जाती..... किसने शे’र लिखे पता नहीं.. पर गाये.. जगजीत सिंह साहब ने....

जगजीत सिंह जी... आप भारत के रत्न हैं... आपको मेरी छोटी सी श्रद्धांजलि...

इक आह भरी होगी.. हमने न सुनी होगी..
जाते जाते तुमने.. आवाज़ तो दी होगी...
इस दिल पे लगा के ठेस ... जाने वो कौन सा देश.. ..
कहाँ तुम चले गये...
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Friday, October 7, 2011

पूर्वोत्तर के बच्चों के लिये वरदान है रानी बाग का आर्य समाज मंदिर Arya Samaj Mandira, Rani Bagh, North-East Children

रविवार दो अक्टूबर को दिल्ली में रानी बाग स्थित आर्य समाज मंदिर में जाना हुआ। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहाँ पर उत्तर-पूर्व से आये छोटे-बड़े अस्सी से नब्बे बच्चे पढ़ते हैं। इन्हें वैदिक शिक्षा तो दी ही जाती है साथ ही डीएवी अथवा एस.एम आर्य पब्लिक स्कूल के माध्यम से सीबीएसई की भी पढ़ाई भी कराई जाती है। दसवीं या बारहवीं तक की इस मुफ़्त शिक्षा की मदद से बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो पाते है। पूर्वोत्तर में हो रहे धर्म परिवर्तन व आतंकवाद से जूझते यह बच्चे यहाँ आकर अपनी पढ़ाई करते हैं।

रविवार को जब इन बच्चों को शाम का नाश्ता मिला तो जब तक सभी तो नाश्ता नहीं मिल गया तब तक किसी ने भी उसे खाना शुरू नहीं किया। इन बच्चों से मिलना ही हमें बहुत कुछ सिखा जाता है। छोटे छोटे मासूम बच्चों के मुँह से "धन्यवाद" या "थैंक्यू" सुना तो मन प्रसन्न हो गया।

उसके बाद हम लोग रानी बाग से सटे सैनिक विहार के आर्यसमाज मंदिर गये। यह कन्या कुटुम्ब है अथवा यहाँ पर भी पूर्वोत्तर की साठ से सत्तर कन्यायें अपनी वैदिक व सीबीएसई की शिक्षा ग्रहण करती हैं।


आर्य समाज मंदिर की तीन तस्वीरें आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ।




वहाँ लिखे एक पोस्टर से पंक्तियाँ चुरा रहा हूँ:


धर्म: दूसरों को बिना दु:ख दिये सुख उत्पन्न किया जाने वाला कर्म ही धर्म है।


मानवता: आत्मा को प्रतिकूल लगने वाला व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये। जो व्यवहार आपको स्वयं अच्छा नहीं लगता वही आप
दूसरों के साथ कैसे कर सकते हैं?
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप स्वयं के लिये चाहते हैं।


सत्य: जो पदार्थ व ज्ञान जैसा है उसे वैसा ही जानना, मानना और आचरण करना ही सत्य है।

वह दौर जिसमें सरकारें व मीडिया पूर्वोत्तर को घास भी नहीं डालतीं व उस क्षेत्र को भारत का नहीं समझतीं हैं उस दौर में यह मंदिर उत्तर-पूर्व के बच्चों के लिये वरदान के समान हैं।


।जय हिन्द।
।वन्देमातरम।
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Sunday, October 2, 2011

दो अक्टूबर: परिवर्तन संसार का नियम है.. आत्मविश्लेषण. 2nd October.. Time to Introspect

नोट: लेख लम्बा है पर मैं चाह कर भी छोटा नहीं कर पाया।

प्रिय मित्रों,

कुछ साल पहले तक घर घर में एक कैलेंडर अथवा पोस्टर लगा रहता था जिस पर लिखा होता था - परिवर्तन संसार का नियम है। जब बड़े हुए और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में नौकरी करी तो पता चला कि भगवान कृष्ण का यह वचन आज का मैनेजमेंट फ़ंडा बन गया है। "Embrace Change" और "Change is Good" जैसे जुमले हर मैनेजमेंट गुरु की ज़ुबान पर चढ़े हुए हैं। गनीमत यह है कि अमरीका अथवा ब्रिटेन ने इस "सत्य" का पेटेंट नहीं करवाया।

आज दो अक्टूबर है। गाँधी और शास्त्री का जन्मदिन है... समय आत्मविश्लेषण का है। समय पिछले एक वर्ष में हुई घटनायें व परिवर्तनों को जानने व समझने का है। पिछले वर्ष जो एक सिलसिला प्रारम्भ किया था उसी को आगे ले जाने का है।

क्या देश व दुनिया में परिवर्तन हुआ है?

मुझे याद है पिछले वर्ष भी मैंने देश में हो रहे कथित "डिवलेप्मेंट" पर चिंता व्यक्त की थी। कहीं खाली जमीन दिखी नहीं कि "डिवलेप्मेंट" की बातें शुरू हो गईं। जब तक उस जमीन पर गगन चुम्बी इमारतें व मॉल नहीं बन जाते तब तक हम, बिल्डर व सरकार तीनों ही साँस नहीं लेते। फिर चाहें जमीन का वो हिस्सा कितना ही उपजाऊ क्यॊं न हो। इसी "विकास" का नतीजा रहा भट्टा पारसौल का गाँव। ग्रेटर नोएडा में हुए इस हड़कम्प की गूँज आज तक विभिन्न कोर्टों में चल रही है। कभी राहुल गाँधी भट्टा पारसौल पहुँचते हैं तो कभी फ़रीदाबाद व गुड़गाँव के लोग राहुल बाबा के खिलाफ़ नारेबाजी करते हैं। अजब सी राजनीति होने लगी है। कभी सिंगूर की जमीन तो कभी ओड़ीशा में पोस्को का प्लांट। हर ओर केवल जमीन की जंग है। महाभारत काल में हुई जमीन की जंग इसके आगे छोटी पड़ती नज़र आती है। इससे स्पष्ट समझ आ जाता है कि डिवलेप्मेंट पर हमारी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है। तेलंगाला के मुद्दे को हर पार्टी गरमा कर रखना चाहती है। चाहें जगन रेड्डी हो...टीआरएस हो..तेदेपा हो..भाजपा अथवा कांग्रेस.. सभी तेलंगाना चाहते हैं... वोट बटोरना चाहते हैं..

न जाने कितने और राज्यों के टुकड़े निकल कर आने बाकि हैं अभी भारत में से...

राजनैतिक दलों का वोट के लिये नीतियों में बदलाव करना भी जस का तस है। तमिलनाडु विधानसभा में अम्मा और "करूणा" के सागर करूणानिधि ने राजीव के हत्यारों का समर्थन कर फ़ाँसी रोकनी चाही तो चहीं जम्मू कश्मीर में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। भाजपा को छोड़ सभी दल अफ़्ज़ल गुरू को बचाने में लगे हैं। हालाँकि राज्य में कांग्रेस थोड़े पसोपेश में है। परन्तु अब्दुल्लाओं व मुफ़्तियों का रूख स्पष्ट है। समझ यह नहीं आता कि प्रधान मंत्री के हत्यारों व संसद और देश के गद्दारों का कोई हिमायती कैसे हो सकता है? वोटों की खातिर राष्ट्रभक्ति को दाँव पर कैसे लगाया जा सकता है। वैसे खबर पंजाब से भी थी कि अकाली दल आतंकवादी भुल्लर की सजा माफ़ कराना चाहता है पर अपबे सहयोगी भाजपा के दबाव के कारण कुछ कर नहीं पाया। यहाँ भी कोई परिवर्तन नहीं। कोई बदलाव नहीं।

पिछले दो दशकों से आरक्षण की आग लगातार भड़की हुई है। राजनैतिक दल इसे शांत करना भी नहीं चाहते।  आरक्षण की लकड़ी से जितनी आग भड़केगी उतना ही वोट का चूल्हा जलता रहेगा। आरक्षण नामक बैसाखी ने देश को अपंग बना दिया है। मायावती ने हाल ही में कभी मुसलमानों, कभी अगड़ों तो कभी जाटों को आरक्षण देने की माँग रखी। मतलब यह कि आरक्षण पर भी इस देश में कोई परिवर्तन नहीं आया है। न ही कोई अन्ना और न ही कोई रामदेव आगे आया है।

जमीन से बात शुरू हुई थी तो जमीन पर ही खत्म करना चाहूँगा। बात करते हैं कर्नाटक में हुए अवैध खनन की व बेल्लारी के रेड्डी बँधुओ की। दक्षिण भारत में पहली बार बनी भाजपा की सरकार की नैया "जमीन" ने ही डगमगा दी। पूर्व मुख्यमंत्री येद्दुयरप्पा पर "जमीन" के इतने आरोप लगे कि उनको अपनी कुर्सी से हाथ धोना पड़ा। पर हक़ीकत यह भी कि कर्नाटक एकमात्र राज्य नहीं है जहाँ अवैध खनन हो रहा है। कोर्ट की नज़र जरा भी टेढ़ी हुई तो आंध्र से हो रहे अवैध निर्यात, ओड़ीशा व झारखंड में भी चल रहे खनन पर रोक लगाई जा सकती है और कईं "बड़ी मछलियाँ" भी इस जाल में फ़ँस सकती हैं।


राजनीति को छोड़ कर यदि समाज की बात करें तो कभी कभार लगता है कि शायद हम सभ्य समाज का हिस्सा ही नहीं है। गलियों से निकलो तो लोगों ने अपने घर के बाहर कूड़ा डाला होता है। नगर निगम की गाड़ी मुफ़्त में कूड़ा उठाने आती है उसके बावजूद लोग कूड़ा फ़ैलाते हैं, सड़क पर पान खा कर थूकते हैं। ऐसे लोगों से निवेदन है कि कृपया अपने घर में सोफ़े पर बैठ कर फ़र्श पर थूकें।

पिछले एक सप्ताह में दिल्ली में दो-तीन ऐसी घटनायें हुईं जो ये दर्शाती है कि हमारी "सोच" व "स्टेटस" में कितना परिवर्तन हुआ है। गुड़गाँव टोल पर आधी रात में टोलकर्मी की हत्या। वजह मात्र 27 रूपये। दिल्ली-नोएडा टोल पर टवेरा द्वारा एक पुलिसकर्मी को उड़ा देना। कारण - पुलिसवाला तेज़ आती टवेरा को रोकने को कह रहा था। और दो दिन पूर्व ही रात को 18-19 साल का एक एक युवक (बच्चा ?) तेज़ गाड़ी चलाता हुआ फ़ुटपाथ से टकराया और मारा गया। आप ही बतायें कि विचारों व सामाजिक दृष्टि से हम कितने बीमार हैं?

ये सब घटनायें होती हैं तो दिल दुखी होता है कि आखिर हम जा कहाँ रहे हैं? क्या इसी को कहते हैं "डिवलेप्मेंट"? क्या यही है जीडीपी की "ग्रोथरेट"? वैसे पैसा ही खुशी का पैमाना होता तो आज पश्चिम भी सुखी होता। देश में केवल भ्रष्टाचार ही एक मात्र मुद्दा नहीं.. अन्नाओं व बाबाओं व गुरूओं को आगे आना ही होगा। 

परिवर्तन कहाँ कहाँ ?

यदि भगवान कृष्ण की मानें तो परिवर्तन तो संसार में होगा ही। पर यह परिवर्तन अच्छा होगा या बुरा...? पिछले एक वर्ष में इस देश ने भ्रष्टाचार के कईं केस झेले हैं। किन्तु बाबा रामदेव का कालेधन का आंदोलन और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के विरूद्ध भूख हड़ताल ने देश में कुछ परिवर्तन अवश्य किया है। मैं यह नहीं कहूँगा कि सभी नेताओं व जनता का हृदय परिवर्तन हो गया है। पर हाँ यह अन्ना के अनशन का असर था कि दिल्ली सरकार व नगर निगम ने सिटीज़न चार्टर की पन्द्रह सितम्बर से शुरूआत कर दी। अब हर काम करने से पहले सरकार व निगम के अधिकारी हमें उस काम में लगने वाले समय के बारे में बता दिया करेंगे।  

हम सरकारी लोकपाल व जनलोकपाल की बातें करते हैं किन्तु जब हमें यह पता चले कि 55 प्रतिशत भारतीयों ने अपने "कर कमलों" के द्वारा रिश्वत दी है तो पैरों तले जमीन खिसकते देर न लगेगी। जब जनता ही भ्रष्ट है तो "ऊपर"वाले क्या करेंगे। हम सुविधा के नाम पर "एजेंटों" को पैसा खिलाते हैं। ट्रैफ़िक पुलिस को तो पचास रूपये के "पत्ते" से "पटा" लेते हैं।

पिछले एक वर्ष में ही फ़ेसबुक व ट्विटर ने जो धमाल मचाया है उससे सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रान्ति आई है। इसी का नतीजा रहा कि अन्ना का अनशन इतना कामयाब हो पाया। लोगों में जागरूकता आ रही है। सूचना तेज़ गति से लोगों तक पहुँच रही है। पर इससे थोड़ा बच कर रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि गलत सूचना भी उतनी ही तेज़ गति से चलेगी।

एक भ्रष्टाचार ही नहीं अपितु और भी अन्य क्षेत्र हैं जहाँ हमें सुधार की जरूरत है। विदेश नीति पर मैं कुछ नहीं कहूँगा। चीन के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। आप सब जानते ही हैं। बंग्लादेशियों का गैरकानूनी तरीके से भारत में दाखिल होना...आदि आदि...
लेख के पहले हिस्से में भी मैं कुछ बीमरियों के बारे मैं पहले ही बता चुका हूँ जिनसे देश जूझ रहा है।

जिस देश में जीडीपी की दर आठ से नौ प्रतिशत है वह देश यदि महिला उत्पीड़न, भुखमरी व कुपोषण में कभी सौ देशों के नीचे तो कभी डेढ़ सौ देशों से भी नीचे रहे तो यह उस देश के लिये डूब मरने जैसा है। स्वयं को सबसे अधिक विकासशील कहे जाने वाले देश की हालत इतनी बदतर है यह सोचा भी नहीं जा सकता। यह देश किस हक़ से संयुक्त राष्ट्र में अपनी सीट चाह रहा है यह चिंतन करने वाली बात है। इसमें गर्व करने वाली कोई बात नहीं है।

धूप-छाँव, मैं और मेरा दायित्व?

अक्टूबर २०१० वह दौर था जब मैंने धूप-छाँव पर दोबारा लिखना शुरू किया था। करीबन दो साल के लम्बे अंतराल के पश्चात दोबार अपने ब्लॉग पर लिखना एक सुखद अनुभव रहा। इस बार राजनैतिक व सामाजिक लेखों के अलावा "क्या आप जानते हैं" व "तस्वीरों में देखिये" जैसे स्तम्भ शुरू किये। इसके अलावा राजनीति पर चुटकी लेने के लिये "गुस्ताखियाँ हाजिर हैं" जैसी श्रूंख्ला भी लिखनी शुरू की। समय बीतता गया और "भूले बिसरे गीत" व "अतुल्य भारत" जैसी श्रूंख्लायें भी आरम्भ हो गईं। राजनीति के लेखों से ऊब का नतीजा रहा है इन सभी स्तम्भों की शुरुआत। कभी कभी देश में हो रही राजनीति देखकर मन खिन्न हो जाता है। और इन स्तम्भों के लिये "मसाला" ढूँढते हुए मेरा स्वयं का भी भरपूर ज्ञानवर्धन हुआ।

पिछले वर्ष से अब तक कुछ परिवर्तन हुआ है पर कुछ और बदलाव की इच्छा है। कहीं पढ़ा कि कोई व्यक्ति सही अथवा गलत नहीं होता। सभी अलग तरह के व्यक्ति हैं। सभी की सोच व विचार अलग हैं। यह तो हमारी परवरिश व हमारे साथ हुई घटनायें हैं जिनके प्रभाव से हम किसी व्यक्ति को अच्छा व बुरा समझ लेते हैं।

कबीर दास जी कहते हैं कि बुरा जो देखन मैं चला तो मुझसे बुरा न कोए।

हम किसी दूसरे को सुधार नहीं सकते.. कोई अच्छा मित्र हो तो एक या दो बार सलाह जरूर दे सकते हैं..पर स्वयं को सुधारने का जिम्मा तो हम पर ही है। यदि अपनी बात करूँ तो मुझमें कुछ बुरी आदते हैं। थोड़ा बहुत जो इस बुद्धि को समझ आया वह यह है कि कभी किसी बात पर चिड़चिड़े न हो। मेरी सबसे बुरी आदत यह है कि जो चीज़ मुझे अच्छी नहीं लगती या कोई मेरे मुताबिक नहीं बोलता या करता तो मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ। मैं ये मान नहीं पाता कि दूसरा व्यक्ति मुझसे अलग है। आगे गाड़ी धीरे चल रही है.. मुझे परेशानी है... किसी ने रेड लाईट पार कर दी.. मुझे तक़लीफ़ है...छोटा भाई या बहन मेरे कहे अनुसार काम नहीं करता तो मैं चिड़चिड़ा हो जाता हूँ.. उन्हें डाँट देता हूँ.... और भी कईं छोटी छॊटी बातें होती हैं जो हमार खून जलाने का काम करती हैं। उससे किसी का भला नहीं होता बल्कि स्वयं का शरीर ही खराब होता है।

क्रोध मनुष्य का व बुद्धि का शत्रु है। इस वर्ष यही वाक्य को समझ कर आगे बढ़ने का प्रयास करना है। अभी तक धर्म व अध्यात्म ही एक तरीका नज़र आ रहा है जिससे स्वयं में सुधार हो सकता है। हमारे ग्रंथों में गीता-रामचरितमानस में न जाने कितनी ही अनगिनत बातें हैं जो हम उनसे सीख सकते हैं। कोई भी व्यक्ति परफ़ेक्ट नहीं होता। थोड़ी बहुत गुंजाईश हमेशा रहती है, रहेगी। जीवन से सीखना जिसने जारी रखा वही सफ़ल है। जीवन में कुछ करने की इच्छा है। रूका हुआ पानी केवल सड़ता है जबकि बहता पानी स्वयं भी प्रफ़ुल्लित रहता है और उसके राह में आने वाले पेड़-पौधों को भी खुशियाँ देता है। जिस किसी से भी अच्छी बात सीखने को मिले सीख लो। कईं ऐसी बातें पढ़ने को मिल जाती हैं..कुछ मित्र ऐसी बातें कह जाते हैं कि दिल में घर कर जाती हैं..उन सभी का धन्यवाद जिनसे मैंने तिनका भर ही सीखा हो... 

लेखों के जरिये तो यह सफ़र जारी रहेगा ही पर आने वाले वर्ष में जमीनी स्तर पर भी कुछ सामाजिक कार्य करने की इच्छा है।

अगले कुछ माहों में धूप-छाँव पर भी आप धर्म व अध्यात्म से जुड़े कुछ लेख पढ़ सकेंगे। मैं अभी इन सब बातों में बहुत छॊटा हूँ इसलिये त्रुटि की पूरी सम्भावना है।

जैन धर्म में एक दिन होता है जब लोग अपनी गलतियों के लिये क्षमा माँगते हैं। यदि कोई भूल हुई हो या मेरे कारण किसी का भी दिन दुखा हो तो उसके लिये मैं क्षमाप्रार्थी हूँ।

देश व दुनिया में कब परिवर्तन होगा पता नहीं.. सही ..गलत..कुछ नहीं पता... पर स्वयं में अपनी बुद्धि के अनुसार बदलाव की चाह लिये...
स्वयं में, देश में, लोगों में....परिवर्तन के इंतज़ार में.. अगला साल क्या रंग लेकर आयेगा पता नहीं....

घरों में से "गीता-सार" भी न जाने कहाँ खो गया है...

रामचरितमानस के उत्तरकांड की सूक्तियों के साथ लेख समाप्त करता हूँ।


परहित सरस धरम नहीं भाई ।
परपीड़ा सम नहीं अधमाई ॥



परोपकार के समान कोई धर्म नहीं..दूसरों को पीड़ित करने के समान कोई पाप नहीं...





फ़िल्म सफ़र का यह गाना आज गुनगुनाने का मन कर रहा है...




नदिया चले, चले रे धारा,
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा

जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है
आँधी से, तूफ़ान से डरता नहीं है
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
तू ना चलेगा तो चल देंगी राहें
मंजिल को तरसेंगी तेरी निगाहें
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा

पार हुआ वो रहा जो सफर में
पार हुआ वो रहा जो सफर में
जो भी रुका, घिर गया वो भंवर में
नाव तो क्या, बह जाए किनारा
नाव तो क्या, बह जाए किनारा
बड़ी ही तेज समय की है धारा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा
नदिया चले, चले रे धारा,
चन्दा चले, चले रे तारा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा
तुझ को चलना होगा,
तुझ को चलना होगा


जय हिन्द
वन्देमातरम

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